सुप्रीम कोर्ट: यौनकर्म अपराध नही; कानून व्यवसायीकरण के विरोध में

The Supreme Court Said That It Is Not Our Intention To Eliminate Prostitution The Law Only Deals With Its Commercialization
सुप्रीम कोर्ट: वेश्यावृत्ति को खत्म करना हमारा उद्देश्य नहीं; कानून केवल इसके व्यवसायीकरण के खिलाफ
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यह कानून न ही वेश्यावृति को खत्म करेगा और न ही इसे अपराध की श्रेणी में लाएगा बल्कि इसके व्यवसायीकरण को रोकना हमारा उद्देश्य है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 20वीं शताब्दी की शुरुआत में, वेश्यावृत्ति के लिए महिलाओं की तस्करी आम थी और इसे अनैतिक माना जाता था।

नई दिल्ली 02 जून 2026 : 70 साल पुराने अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम (आईटीपीए) पर काफी विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि इस कानून का मुख्य उद्देश्य न तो वेश्यावृत्ति को समाप्त करना है और न ही इसे आपराधिक अपराध बनाना है, बल्कि इसके व्यवसायीकरण को रोकना है। न्यायमूर्ति जे बी परदीवाला और आर महादेवन की पीठ ने कहा कि हमें पूरा विश्वास है कि वेश्यावृत्ति का उन्मूलन या इसे आपराधिक अपराध बनाना इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य नहीं है। बल्कि, इसका उद्देश्य वेश्यावृत्ति के व्यवसायीकरण, यानी संगठित आजीविका के साधन के रूप में वेश्यावृत्ति को रोकना या समाप्त करना है।
Supreme Court on Prostitution
वेश्यावृति पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

20वीं शताब्दी में महिलाओं की तस्करी सामान्य थी
वेश्यालयों से बचाई गई महिलाओं के पुनर्वास वियष पर विचार करते हुए, पीठ ने 1956 अधिनियम का विश्लेषण किया और कहा कि 20वीं शताब्दी की शुरुआत में, वेश्यावृत्ति को महिलाओं की तस्करी सामान्य थी और इसे अनैतिक माना जाता था, इसलिए यह शब्द कानून से जुड़ गया

वेश्यावृति को लेकर सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश
हाल में सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश में कहा गया था कि पुलिस को स्वेच्छा से काम करने वाली वयस्क यौनकर्मियों के मामलों में हस्तक्षेप करने या उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई करने से बचना चाहिए। यौनकर्मियों का बंदीकरण, दंडित या परेशान नहीं किया जाना चाहिए और पुलिस छापों में उनकी पहचान गोपनीय रखी जानी चाहिए।

वयस्क यौनकर्मियों को उनकी इच्छा के विरुद्ध हिरासत में नहीं लिया जा सकता या बचाया नहीं जा सकता और सुरक्षित हिरासत में नहीं रखा जा सकता। न्यायालय ने यौनकर्मियों की पसंद का सम्मान करते हुए पीड़ित-केंद्रित पुनर्वास पर विशेष बल दिया है।

भारत में वयस्क नागरिकों के आपसी सहमति से स्वेच्छा (अपनी मर्जी) से किया जाने वाला सेक्स वर्क (वेश्यावृत्ति) अपराध नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों के अनुसार, सेक्स वर्कर एक व्यवसाय है और इसमें शामिल वयस्कों को पुलिस उत्पीड़न से बचने व सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार है।
हालांकि, इस पेशे से जुड़ी कई अन्य गतिविधियां अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 (ITPA) और भारतीय कानूनों में पूरी तरह से गैर-कानूनी और दंडनीय हैं

क्या गैर-कानूनी है?
वेश्यालय (Brothel) चलाना: वेश्यालय का संचालन करना या उसे प्रबंधित करना कानूनन अपराध है।
दलाली/एजेंसी (Pimping/Trafficking): किसी अन्य व्यक्ति के लिए ग्राहक खोजना, दलाली करना या यौन शोषण के लिए मानव तस्करी करना पूरी तरह से अवैध है।
सार्वजनिक स्थानों पर ग्राहकों को रिझाना: सार्वजनिक जगहों पर या उसके आसपास ग्राहकों को बुलाना और परेशान करना गैर-कानूनी है।

बाल वेश्यावृत्ति: नाबालिगों (18 वर्ष से कम) को वेश्यावृत्ति में धकेलना जघन्य अपराध है।

यौनकर्मियों के कानूनी अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोई भी वयस्क सेक्स वर्कर यदि अपनी मर्जी से यह काम कर रहा है, तो पुलिस को उसके निजी जीवन या काम में दखल देने का अधिकार नहीं है। यदि पुलिस किसी रेड या कार्रवाई में जाती है, तो उन्हें यौनकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार नहीं करना चाहिए। मीडिया को भी हिदायत दी गई है कि वे रेस्क्यू या रेड के दौरान यौनकर्मियों की तस्वीरें प्रकाशित न करें।

अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम, 1956

अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम में अपराध
क़ानूनी प्रावधान
न्यायालयों के देह व्यापार से संबंधित निर्णय 

भारतवर्ष में वैवाहिक संबंध के बाहर यौन संबंध अच्छा नहीं समझा जाता है। वेश्यावृत्ति भी इसी में है। लेकिन दो वयस्कों के यौन संबंध, यदि वह जनशिष्टाचार के विपरीत न हो, कानून व्यक्तिगत मानता है, जो दंडनीय नहीं है। “भारतीय दंड विधान” 1860 से “वेश्यावृत्ति उन्मूलन विधेयक” 1956 तक सभी कानून सामान्यतया वेश्यालयों के कार्यव्यापार को संयत एवं नियंत्रित रखने तक ही प्रभावी रहे हैं। वेश्यावृत्ति का उन्मूलन सरल नहीं है, पर ऐसे सभी संभव प्रयास किए जाने चाहिए जिससे इस व्यवसाय को प्रोत्साहन न मिले, समाज की नैतिकता का ह्रास न हो और जनस्वास्थ्य पर रतिज रोगों का दुष्प्रभाव न पड़े। कानून स्त्री व्यापार में संलग्न अपराधियों को कठोरतम दंड देने में सक्षम हो। यह समस्या समाज की है। समाज समय की गति पहचाने और अपनी उन मान्यताओं और रूढ़ियों का परित्याग करे, जो वेश्यावृत्ति को प्रोत्साहन देती हैं। समाज के अपेक्षित योगदान के अभाव में इस समस्या का समाधान संभव नहीं है।

वेश्यावृत्ति का अर्थ –

किसी भी व्यक्ति का आर्थिक लाभ को लैंगिक शोषण को वेश्यावृत्ति कहते हैं।

वेश्यागृह का अर्थ –

किसी मकान, कमरे, वाहन या स्थान से या उसके किसी भाग से है, जिसमें किसी अन्य व्यक्ति के लाभ को किसी का लैंगिक शोषण का दुरूपयोग किया जाए या दो या दो से अधिक महिलाओं के अपने आपसी लाभ को वेश्यावृत्ति की जाती है।

अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम के अंतर्गत निम्नलिखित कार्य अपराध हैं –

1. कोई व्यक्ति जो वेश्यागृह चलाता है, उसका प्रबंध करता है या उसके रखने और प्रबंध में मदद करता है तो उसको कम से कम व अधिक से अधिक तीन साल कठोर कारावास, और 2000/- रूपये जुर्माना होगा। यदि वह व्यक्ति दोबारा इस अपराध का दोषी पाया जाता है तो उसको कम से कम दो साल व अधिक से अधिक पांच साल का कठोर कारावास और दो हजार रूपये का जुर्माना होगा।
2. कोई व्यक्ति जो किसी मकान, या स्थान का मालिक, किराएदार, भारसाधक, एजेंट है, उसे वेश्यागृह को प्रयोग करता है या उसे यह जानकारी है कि ऐसे किसी स्थान या उसके भाग को वेश्यागृह को प्रयोग में लाया जाएगा,या वह अपनी इच्छा से ऐसे किसी स्थान या उसके किसी भाग को वेश्यागृह के रूप में प्रयोग करने में भागीदारी देता है। तो ऐसे व्यक्ति को दो साल तक की जेल और दो हजार रूपये का जुर्माना हो सकता है। यदि वह दोबारा इस अपराध का दोषी पाया जाता है तो उसको पांच साल के कठोर कारावास व जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।

वेश्यावृत्ति की कमाई पर रहना –

कोई भी 16 साल की आयु से अधिक का व्यक्ति अगर किसी वेश्या की कमाई पर रह रहा है, तो ऐसे व्यक्ति को दो साल की जेल या एक हजार रूपये का जुर्माना हो सकता है या दोनों।

अगर कोई व्यक्ति किसी बच्चे या नाबालिग की वेश्यावृत्ति की कमाई पर रहता है तो ऐसे व्यक्ति को कम से कम 7 साल व अधिक से अधिक 10 साल की जेल हो सकती है।

कोई भी व्यक्ति जो 16 साल से अधिक आयु का है –

  • 1. वेश्या के साथ उसकी संगत में रहता है, या
  • 2. वेश्या की गतिविधियों पर अपना अधिकार, निर्देश या प्रभाव इस प्रकार डालता है, जिससे यह मालूम होता है कि वह वेश्यावृत्ति में सहायता, प्रोत्साहन या मजबूर करता है या
  • 3. जो व्यक्ति दलाल का काम करता है।

तो माना जाएगा कि (जब तक इसके विपरीत सिद्ध न हो जाए) कि ऐसे व्यक्ति वेश्यावृत्ति की कमाई पर रह रहे हैं।

वेश्यावृत्ति के लिए किसी व्यक्ति को लाना, फुसलाना या बहलाने की चेष्टा करनाः-

यदि कोई व्यक्ति –

1. किसी व्यक्ति को उसकी सहमति या सहमति के बिना वेश्यावृत्ति को लाता है, लाने की कोशिश करता है, या

2. किसी व्यक्ति को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने को फुसलाता है, ताकि वह उससे वेश्यावृत्ति करवा सके तो ऐसे व्यक्ति को कम से कम 3 साल व अधिक से अधिक 7 साल के कठोर कारावास और 2000/- रूपये के जुर्माने से दंडित किया जाता है और अगर यह अपराध किसी व्यक्ति की सहमति के विरूद्ध किया जाता है तो दोषी व्यक्ति को सात साल की जेल जो अधिकतम 14 साल तक हो सकती है, दंडित किया जा सकता है और अगर यह अपराध किसी बच्चे के विरूद्ध किया जाता है तो दोषी को कम से कम 7 साल की जेल, व उम्र कैद भी हो सकती है।

वेश्यागृह में किसी व्यक्ति को रोकना –

अगर कोई व्यक्ति किसी को उसकी सहमति या सहमति के बिना –

1. वेश्यागृह में रोकता है ।

2. किसी स्थान पर किसी व्यक्ति को किसी के साथ जो कि उसका पति या पत्नी नहीं है, संभोग करने के लिए रोकता है तो ऐसे व्यक्ति को कम से कम सात साल की जेल जो कि दस साल या उम्र कैद तक हो सकती है और जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।

अगर कोई व्यक्ति किसी बच्चे के साथ वेश्यागृह में पाया जाता है, तो वह दोषी तब माना जाएगा, जब तक इसके लिए विपरीत सिद्ध नहीं हो जाता है।

अगर बच्चे या 18 वर्ष से कम उम्र का व्यक्ति वेश्यागृह में पाया जाता है, और उसकी चिकित्सीय जांच के बाद यह सिद्ध होता है कि उसके साथ लैंगिक शोषण हुआ है, तो यह माना जाएगा कि ऐसे व्यक्ति को वेश्यावृत्ति करवाने के लिए रखा गया है या उसका लैंगिक शोषण आर्थिक लाभ के लिए किया जा रहा है।

अगर कोई व्यक्ति किसी महिला या लड़की का –

  • 1. सामान जैसे गहने, कपड़े, पैसे या अन्य संपत्ति आदि अपने पास रखता है या
  • 2. उसको डराता है कि वह उसके विरूद्ध कोई कानूनी कार्यवाही शुरू करेगा, अगर वह अपने साथ वह गहने, कपड़े, पैसे या अन्य संपत्ति जो कि ऐसे व्यक्ति के महिला या लड़की को उधार या आपूर्ति के रूप में या फिर ऐसे व्यक्ति के निर्देश में दी गई हो, ले जाएगी। तो यह माना जाएगा कि ऐसे व्यक्ति ने महिला या लड़की को वेश्यागृह में या ऐसी जगह रोका है, जहां वह महिला या लड़की को संभोग को मजबूर कर सके।

 

सार्वजनिक स्थानों या उसके आस-पास वेश्यावृत्ति करना 

यदि कोई व्यक्ति जो वेश्यावृत्ति करता है या करवाता है, ऐसे स्थानों पर –

1. जो राज्य सरकार ने चिन्हित किए हों या

2. जो 200 मीटर में किसी सार्वजनिक पूजा स्थल, शिक्षण संस्थान, छात्रावास, अस्पताल, परिचर्या गृह ऐसा कोई भी सार्वजनिक स्थान जिसको पुलिस आयुक्त या मजिस्ट्रेट ने अधिसूचित किया हो।

तो ऐसे व्यक्ति को 3 महीने तक कारावास हो सकता है।

कोई व्यक्ति यदि किसी बच्चे से ऐसा अपराध करवाता है तो उसको कम से कम सात साल व अधिकाधिक आजीवन कारावास या 10 साल तक जेल हो सकती है ।जुर्माने से भी दंडित किया जा सकता है।

अगर कोई व्यक्ति जो –

  • 1. ऐसे सार्वजनिक स्थानों का प्रबंधक है, वेश्याओं को व्यापार करने व वहां रूकने देता है।
  • 2. कोई किराएदार, दखलदार या देखभाल करने वाला व्यक्ति वेश्यावृत्ति को ऐसे स्थानों के प्रयोग की अनुमति देता है।
  • 3. किसी स्थान का मालिक,एजेंट ऐसे स्थानों को वेश्यावृत्ति को किराए पर देता है तो वह तीन महीने के कारावास और 200/- रूपये जुर्माने या दोनों से दंडित किया जा सकता है।

यदि वह व्यक्ति फिर ऐसे अपराध का दोषी पाया जाता है तो वह छः महीने की जेल और दो सौ रूपये के जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।

अगर ऐसा अपराध किसी होटल में किया जाता है तो उस होटल का लाइसेंस निरस्त कर दिया जाएगा।

वेश्यावृत्ति को किसी को फुसलाना या याचना करना 

अगर कोई व्यक्ति सार्वजनिक स्थानों पर किसी व्यक्ति को किस घर या मकान से इशारे, आवाज, अपने आपको दिखाकर किसी खिड़की या बालकनी से वेश्यावृत्ति को आकर्षित, फुसलाता या विनती करता है या छेड़छाड़, आवारागर्दी या इस प्रकार का कार्य करता है, जिससे यहां पर रहने वाले या आने-जाने वालों को बाधा या परेशानी होती है, तो उसको 6 महीने की जेल और पांच सौ रूपये के जुर्माने से या दोनों से दंडित किया जा सकता है।

अगर वह फिर से यह अपराध करता है तो उसको एक साल की जेल और पांच हजार रूपये के जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।

अगर यह अपराध कोई पुरूष करता है तो वह कम से कम सात दिन तथा अधिक से अधिक तीन महीने की जेल से दंडित किया जा सकता है।

अपने संरक्षण में रहने वाले व्यक्ति को फुसलाना –

यदि कोई व्यक्ति अपने संरक्षण, देखभाल में रहने वाले किसी व्यक्ति को वेश्यावृत्ति को फुसलाता है, उकसाता है या सहायता करता है, तो वह कम से कम सात साल की जेल जो कि उम्र कैद या दस साल तक सजा हो सकती है, जेल व जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।

सुधार संस्था में भेजने का आदेश –

सार्वजनिक स्थानों या उनके आस-पास वेश्यावृत्ति करना, वेश्यावृत्ति को किसी को फुसलाना या याचना करने के संबंध में दोषी महिला को उसकी शारीरिक या मानसिक स्थिति के आधार पर न्यायालय उसको सुधार संस्था में भी भेजने का आदेश दे सकता है। सुधार संस्था में कम से कम दो साल व अधिक से अधिक पांच साल को भेजा जा सकता है।

विशेष पुलिस अधिकारी एवं सलाहकार बॉडी –

राज्य सरकार इस अधिनियम में अपराधों के संबंध में विशेष पुलिस अधिकारियों को नियुक्त करेगी।

सरकार कुछ महिला सहायक पुलिस अधिकारियों की भी नियुक्ति कर सकती है।

इस अधिनियम में दिए गए सभी अपराध संज्ञेय हैं –

इस अधिनियम में दिए गए अपराध के दोषी व्यक्ति को विशेष पुलिस अधिकारी या उसके निर्देश पर बिना वारंट  गिरफ्तार किया जा सकता है।

तलाशी लेना –

विशेष पुलिस अधिकारी या दुर्व्यापार पुलिस अधिकारी बिना वारंट किसी स्थान की तलाशी तब ले सकते हैं, जब उनके साथ उस स्थान के दो या दो से अधिक सम्मानित व्यक्तियों, जिनमें कम से कम एक महिला भी साथ हो।

वहां मिलने वाले व्यक्तियों को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाएगा। ऐसे व्यक्तियों की आयु, लैंगिक शोषण, व यौन संबंधी बीमारियों की जानकारी को चिकित्सीय जांच करायी जाएगी।

ऐसे स्थानों पर मिलने वाली महिलाएं या लड़कियों से, महिला पुलिस अधिकारी ही पूछताछ कर सकती है।

वेश्यागृह से छुड़ाना –अगर मजिस्ट्रेट को किसी पुलिस अधिकारी या राज्य सरकार से नियुक्त किसी व्यक्ति से सूचना मिलती है कि कोई व्यक्ति वेश्यावृत्ति कर रहा है या करता रहा है तो पुलिस अधिकारी (जो इंस्पेक्टर की श्रेणी से उच्च का होगा) उस स्थान की तलाशी लेने और वहां मिलने वाले लोगों को उसके सामने पेश करने को कह सकता है।

वेश्यागृह को बंद करना –

मजिस्ट्रेट को पुलिस से या किसी अन्य व्यक्ति से सूचना मिलती है कि कोई घर मकान, स्थान आदि सार्वजनिक स्थान के 200 मीटर के भीतर वेश्यावृत्ति को प्रयोग किया जा रहा है तो वह उस जगह के मालिक किराएदार, एजेंट या जो उस स्थान की देखभाल कर रहा है, उसे नोटिस देगा कि वह सात दिन में जवाब दें कि क्यों न उस स्थान को अनैतिक काम को प्रयोग किए जाने वाला घोषित किया जावे।

संबंधित पक्ष को सुनने के बाद यदि यह लगता है कि वहां पर वेश्यावृत्ति हो रही है तो मजिस्ट्रेट सात दिन में उसको खाली करने व उसकी अनुमति के बिना किराये पर न देने के आदेश दे सकता है।

संरक्षण गृह में रखने को आवेदन –

कोई व्यक्ति जो वेश्यावृत्ति करता है या जिससे वेश्यावृत्ति करायी जाती है, वह मजिस्ट्रेट से संरक्षण गृह में रखने व न्यायालय से सुरक्षा को आवेदन कर सकता है।

वेश्याओं को किसी स्थान से हटाना –मजिस्ट्रेट को सूचना मिलने पर यदि लगता है कि उसके क्षेत्राधिकार में कोई वेश्या रह रही है, तो वह उसको वहां से हटने व फिर उस स्थान पर न आने का आदेश दे सकता है।

विशेष न्यायालयों की स्थापना –

इस अधिनियम में किए गए अपराधों को राज्य सरकार व केंद्र विशेष न्यायालय भी स्थापित कर सकती है। भारतीय दंड संहिता में भी महिलाओं व बच्चों को बेचने व खरीदने पर प्रतिबंध लगाने को प्रावधान हैं।

क़ानूनी प्रावधान

18 साल से कम उम्र की लड़की को गैर कानूनी संभोग को फुसलाना (धारा-366-क)

यदि कोई व्यक्ति किसी 16 साल से कम उम्र की लड़की को फुसलाता है, किसी स्थल से जाने को या कोई कार्य करने को यह जानते हुए कि उसके साथ अन्य व्यक्ति गैर कानूनी संभोग करेगा या उसको मजबूर किया जाएगा तो ऐसे व्यक्ति को 10 साल तक की जेल और जुर्माने से दंडित किया जाएगा।

विदेश से लड़की का आयात करना (धारा 366-ख)

अगर कोई व्यक्ति किसी 21 साल से कम उम्र की लड़की को विदेश से या जम्मू कश्मीर से लाता है, यह जानते हुए कि उसके साथ गैर कानूनी संभोग किया जाएगा या उसको मजबूर किया जाएगा तो ऐसे व्यक्ति को 10 साल तक की जेल और जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।

वेश्यावृत्ति आदि को बच्चों को बेचना (धारा-372)

अगर कोई व्यक्ति किसी 18 साल से कम उम्र के बच्चे को वेश्यावृत्ति, या गैर कानूनी संभोग, या किसी कानून के विरूद्ध और दुराचारिक काम में लाए जाने या उपयोग किए जाने को उसको बेचता है या भाड़े पर देता, तो ऐसे व्यक्ति को 10 साल तक की जेल और जुर्माने से भी दंडित किया जा सकता है।

यदि कोई व्यक्ति किसी 18 साल से कम उम्र की लड़की को किसी वेश्या या किसी व्यक्ति को, जो वेश्यागृह चलाता हो या उसका प्रबंध करता हो, बेचता है, भाड़े पर देता है तो यह माना जाएगा कि उस व्यक्ति ने लड़की को वेश्यावृत्ति को बेचा है, जब तक कि इसके विपरीत सिद्ध न हो जाए।

वेश्यावृत्ति आदि को बच्चों को खरीदना (धारा 373) 

अगर कोई व्यक्ति किसी 18 साल से कम उम्र के बच्चे को वेश्यावृत्ति, या गैर कानूनी संभोग, या किसी कानून के विरूद्ध, और दुराचारिक काम में लाए जाने या उपयोग किए जाने को उसको खरीदता है या भाड़े पर देता है, तो ऐसे व्यक्ति को 10 साल की जेल और जुर्माने से भी दंडित किया जा सकता है।

न्यायालयों के देह व्यापार से संबंधित निर्णय
1. उ्रच्चतम न्यायालय ने गौर जैन बनाम भारत संघ में कहा है कि वेश्यावृत्ति एक अपराध है, लेकिन जो महिलाएं देह व्यापार करती है, उनको दोषी कम और पीड़ित ज्यादा माना जाएगा। न्यायालय ने यह भी कहा है कि ऐसी परिस्थितियों में रहने वाली महिलाओं और उनके बच्चों को पढ़ाई के अवसर और आर्थिक सहायता भी दी जानी चाहिए तथा उनको समाज की मुख्य धारा से जोड़ने को उनकी शादियां भी करवानी चाहिए, जिससे बाल देह व्यापार में कमी हो सके।

2. उच्च न्यायालय ने प.न. कृष्णलाल बनाम केरल राज्य में कहा कि राज्य के पास यह शक्ति है कि वह कोई व्यापार या व्यवसाय जो गैर कानूनी, अनैतिक या समाज के लिए हानिकारक है, उस पर रोक लगा सकती है

स्रोत: महिला एवं बाल विकास विभाग

 

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने वयस्क महिलाओं के स्वेच्छया यौनकर्म और वेश्यावृत्ति से जुड़े कानूनों पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है。
अदालत ने अपने फैसले में यें प्रमुख बिंदु स्पष्ट किए हैं:
स्वेच्छा से सेक्स वर्क अपराध नहीं: अदालत ने स्पष्ट किया कि जो वयस्क महिलाएं अपनी मर्जी से वेश्यावृत्ति में शामिल हैं, उनके खिलाफ पुलिस कोई कार्रवाई नहीं कर सकती क्योंकि यह अवैध नहीं है。
जबरन ‘बचाव’ (Rescue) और हिरासत गलत: मौजूदा ‘अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम, 1956’ (ITPA) में अधिकारियों को स्वेच्छया यौनकर्मी वयस्क महिलाओं को हिरासत में लेने या उनकी इच्छा के विरुद्ध सुधार गृह भेजने का कोई अधिकार नहीं है。
पुनर्वास (Rehabilitation) थोपा नहीं जा सकता: राज्य सरकारों का महिलाओं के पुनर्वास का दायित्व है, लेकिन यह प्रक्रिया भी जबरन या उनकी इच्छा के खिलाफ नहीं होनी चाहिए。
वैश्यालय (Brothel) चलाना गैरकानूनी: सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के अनुसार, देह व्यापार में लिप्तता अपराध नहीं है,लेकिन वैश्यालय चलाना या दलाली भारत में कानूनन अपराध श्रेणी मे है।

 

​सुप्रीम कोर्ट ने कहा: वयस्क यौन कार्य को यौन तस्करी के साथ जोड़ना गरिमा को ठेस पहुँचाता है; सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ितों के बचाव, बचाव-उपरांत और पुनर्वास के लिए राष्ट्रव्यापी दिशानिर्देश जारी किए
​पीठ ने टिप्पणी की कि नैतिक धारणाएं और रूढ़िवादी मान्यताएं अक्सर वयस्क यौन कर्मियों को केवल पीड़ित या अपराधी के रूप में सीमित कर देती हैं, जिससे उनकी गरिमा, इच्छाशक्ति (एजेंसी) और समान कानूनी संरक्षण को ठेस पहुँचती है।
​द्वारा: अगाथा शुक्ला | 1 जून 2026, दोपहर 2:30 बजे
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला, न्यायमूर्ति आर. महादेवन, सुप्रीम कोर्ट
​सुप्रीम कोर्ट ने मानव तस्करी विरोधी और पीड़ित संरक्षण पर एक महत्वपूर्ण राष्ट्रव्यापी ढांचा जारी किया है। अदालत ने अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम (ITPA), 1956 के तहत स्वैच्छिक वयस्क यौन कार्य को तस्करी के अपराधों के साथ जोड़ने (भ्रमित करने) के प्रति आगाह किया है। अदालत ने माना है कि नैतिक धारणाएं अक्सर वयस्क यौन कर्मियों को गरिमा और समान कानूनी संरक्षण से वंचित कर देती हैं। पीठ ने यह भी नोट किया कि बचाव अभियानों (रेस्क्यू ऑपरेशंस) को नियमित तौर पर बिना योजना के या प्रचारित ‘सामूहिक छापों’ (मास रेड्स) के माध्यम से नहीं किया जाना चाहिए।
​पीठ ने पाया कि कानूनी और सामाजिक प्रतिक्रियाएं अक्सर तस्करी के शिकार पीड़ितों और सहमति से यौन कार्य करने वाले वयस्कों के बीच के अंतर को धुंधला कर देती हैं, जिससे “मासूम पीड़ित” और “दोषी भागीदार” के बीच एक द्वंद्व (बाइनरी) पैदा हो जाता है। अदालत ने उल्लेख किया कि अनैतिकता की ऐसी धारणाएं कानून प्रवर्तन एजेंसियों और यहाँ तक कि नागरिक समाज के लिए भी स्वैच्छिक वयस्क यौन कर्मियों को ऐसे व्यक्तियों के रूप में देखना आसान बना देती हैं जो संवैधानिक गरिमा और संरक्षण के कम हकदार हैं। इस बात पर जोर देते हुए कि तस्करी और सहमति से किए गए वयस्क यौन कार्य को एक ही चश्मे से नहीं देखा जा सकता, अदालत ने कहा कि कानून को व्यक्तिगत इच्छाशक्ति (एजेंसी) के प्रति संवेदनशील होना चाहिए, साथ ही शोषण और संगठित तस्करी के खिलाफ सख्त कार्रवाई भी सुनिश्चित करनी चाहिए।

​तस्करी और पुनर्वास पर लंबे समय से लंबित मामले का फैसला करते हुए, अदालत ने बचाव, पुनर्वास, अभियोजन (प्रॉसिक्यूशन) और पुनर्संयोजन (रीइंटिग्रेशन) को कवर करने वाला एक राष्ट्रव्यापी पीड़ित-संरक्षण ढांचा भी जारी किया।
​न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन ने टिप्पणी की, “…’अनैतिकता’ और ‘सभ्य कार्य’ जैसी धारणाएं वेश्यावृत्ति में शामिल लोगों को ‘मासूम पीड़ित’ (तस्करी के शिकार) और ‘दोषी भागीदार’ (स्वैच्छिक वयस्क यौन कर्मी) के समूहों में बांटने की अनुमति देती हैं। पहले वाले को सहानुभूति और कानूनी संरक्षण दिया जाता है, जबकि बाद वाले को नैतिक अस्वीकृति का सामना करना पड़ता है। किसी व्यक्ति को ‘अनैतिक’ या ‘गिरा हुआ’ चरित्र दे देने से, कानून प्रवर्तन और नागरिक समाज दोनों के लिए स्वैच्छिक वयस्क यौन कर्मियों को ऐसे लोगों के रूप में देखना आसान हो जाता है जो गरिमा और कानूनी संरक्षण के कम हकदार हैं।”

​याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अपर्णा भट पेश हुईं और सुप्रीम कोर्ट की (सेवानिवृत्त) न्यायाधीश न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा ​​तत्कालीन अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के रूप में पेश हुई थीं, और प्रतिवादी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता के. राधाकृष्णन पेश हुए।
​पीठ ने आगे कहा, “ITPA (अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम), वेश्यावृत्ति और तस्करी को एक साथ जोड़कर, अपने दायरे में लोगों के एक बड़े और विविध समूह को ले आता है—उन लोगों से लेकर जिनकी इच्छा के विरुद्ध तस्करी की गई थी, उन लोगों तक जिनकी तस्करी की गई थी लेकिन वे स्वेच्छा से इसे जारी रखते हैं, और उन लोगों तक जिन्होंने खुद के लिए यौन कार्य चुना है। इन सभी व्यक्तियों को, वर्तमान ढांचे के तहत, बिना किसी अंतर के धारा 17 के तहत एक ही प्रक्रिया से गुजारा जाता है। पीड़ित सुरक्षा योजना में इस तरह का दृष्टिकोण न दिखे, इसके लिए हमने दो उपायों की पहचान की है, जिन्हें धारा 17 की प्रक्रिया के आधार पर योजना में शामिल किया जाना चाहिए। पहला, शुरुआत में ही स्वैच्छिक वयस्क यौन कर्मियों की पहचान करने के लिए एक प्रारंभिक जांच की आवश्यकता है, ताकि उन्हें इस प्रक्रिया की पूरी मशीनरी से बचाया जा सके, यानी ‘गैर-हस्तक्षेप का सिद्धांत’।”

​“दूसरा, मजिस्ट्रेट के हिरासत और पुनर्संयोजन पर अंतिम निर्णयों में पीड़ित की सहमति को शासी कारक (गवर्निंग फैक्टर) के रूप में मान्यता देना है, यानी पीड़ित की सहमति को प्राथमिकता देना। तस्करी के अपराध की प्रकृति से अवगत होने के कारण, हमने ऐसी परिस्थितियों की भी पहचान की है जिनमें गैर-हस्तक्षेप के सिद्धांत और पीड़ित की सहमति की प्राथमिकता से हटना उचित होगा, यानी ऐसी स्थितियाँ जहाँ पीड़ित की सुरक्षा खतरे में हो, या पीड़ित द्वारा व्यक्त की गई सहमति/इच्छाएं धमकी, जबरदस्ती या अनुचित प्रभाव का परिणाम हों।”
​अदालत ने व्यावसायिक यौन शोषण के लिए की जाने वाली तस्करी और सहमति से किए जाने वाले वयस्क यौन कार्य के बीच एक स्पष्ट अंतर रेखा खींची, और अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 के तहत दोनों को एक जैसा मानने के प्रति आगाह किया। इसने टिप्पणी की कि तस्करी के खिलाफ कानूनी और संवैधानिक प्रतिक्रिया इस धारणा पर नहीं बनाई जा सकती कि वेश्यावृत्ति में शामिल हर व्यक्ति अनिवार्य रूप से तस्करी का शिकार है। अदालत ने कहा कि इस तरह के घालमेल से अक्सर पुलिस की अत्यधिक व्यापक कार्रवाई होती है और वयस्क यौन कर्मियों की गरिमा, स्वायत्तता और कानूनी सुरक्षा को ठेस पहुँचती है।

​पीठ ने फैसले में कहा, “…उपरोक्त चर्चा से एक निष्कर्ष अवश्य निकलता है: वेश्यावृत्ति और इसमें शामिल लोगों को पीड़ित/इच्छाशक्ति (एजेंसी) और सहमति/जबरदस्ती के सरल द्वंद्वों में सीमित नहीं किया जा सकता। वास्तविकता कहीं अधिक जटिल है। तो सवाल यह है कि हम इन द्वंद्वों से आगे कैसे बढ़ें?”
​“यह समझना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है कि वेश्यावृत्ति में शामिल लोगों को पीड़ित और कर्ता (एजेंट) के द्वंद्वों में रखने से क्या परिणाम होते हैं। यदि हम उन्हें केवल ‘पीड़ित’ के रूप में देखते हैं जिनमें इच्छाशक्ति की कमी है, तो यह जोखिम है कि हम उनकी इच्छाओं और आकांक्षाओं के प्रति कान बंद कर सकते हैं। दूसरी ओर, यदि हम उन्हें ‘कर्ता’ (एजेंट) के रूप में देखते हैं, तो हम उन्हें हस्तक्षेप का कोई उपाय प्रदान ही नहीं कर सकते हैं, बावजूद इसके कि ऐसी वेश्याएं संरचनात्मक और गैर-संरचनात्मक दोनों तरह की कई कमजोरियों का सामना करती हैं। बल्कि, वेश्याओं को ऐसे व्यक्तियों के रूप में देखना सबसे अच्छा है जिनमें कमजोरी (vulnerability) और इच्छाशक्ति (agency) दोनों सह-अस्तित्व में हैं,” पीठ ने कहा।
​“हम सभी में, इच्छाशक्ति और कमजोरी एक साथ मौजूद रहती हैं। जो बदलता है वह यह है कि एक का दूसरे पर कितना प्रभाव पड़ता है, और यह काफी हद तक हमारे जीवन की परिस्थितियों से तय होता है। एक व्यक्ति जो गरीबी, सामाजिक बहिष्कार और आजीविका के विकल्पों की अनुपस्थिति का सामना करता है, उसकी कमजोरी उसके लिए उपलब्ध विकल्पों के दायरे को काफी संकीर्ण कर सकती है। लेकिन यह विकल्प को पूरी तरह से समाप्त नहीं करती है। जब वेश्यावृत्ति में शामिल लोगों की बात आती है तो इस सह-अस्तित्व को स्वीकार करने के दो महत्वपूर्ण निहितार्थ होते हैं। पहला, स्वेच्छा से वेश्यावृत्ति में प्रवेश करने वाली महिला को ‘कर्ता’ के रूप में देखने का मतलब यह नहीं है कि कोई उन कमजोरियों के प्रति अंधा हो जाए जिन्होंने उसके निर्णय को आकार दिया और सीमित किया। उसकी इच्छाशक्ति को समझने के लिए उन परिस्थितियों को समझना आवश्यक है जिनमें इसका उपयोग किया गया था, जिससे उन मामलों में उपायों की आवश्यकता होती है जहाँ इच्छाशक्ति गंभीर रूप से सीमित हो। दूसरा, तस्करी या जबरदस्ती की शिकार महिला को ‘पीड़ित’ के रूप में देखने का मतलब यह नहीं है कि वह इच्छाशक्ति से रहित है। शोषण और जबरदस्ती की स्थितियों के भीतर भी, वह अपने वर्तमान और अपने भविष्य के बारे में निर्णय लेने की क्षमता रखती है,” अदालत ने आगे कहा।
​दिशानिर्देश (Guidelines)
​बचाव-पूर्व चरण (Pre-rescue stage): दिशानिर्देशों में, बचाव-पूर्व चरण में, अदालत ने अधिकारियों को अंधाधुंध प्रवर्तन तरीकों से दूर रहने का निर्देश दिया और विशेष रूप से बचाव के डिफ़ॉल्ट तरीके के रूप में बिना योजना के और प्रचारित “सामूहिक छापों” को समाप्त करने का आह्वान किया। इसने बचाव कार्यों में शामिल अधिकारियों के उचित प्रशिक्षण को अनिवार्य किया, जिसमें पीड़ित के अनुकूल व्यवहार, गैर-दबाव वाले बचाव के तरीके और आघात-संवेदनशील (ट्रॉमा-इन्फॉर्मड) हैंडलिंग पर संवेदीकरण (sensitisation) शामिल है।
​बचाव और बचाव-उपरांत चरण (Rescue and post-rescue stages): अदालत ने महिला पुलिस अधिकारियों और एनजीओ कार्यकर्ताओं को शामिल करने, पीड़ितों को तस्करों से तुरंत अलग करने, व्यक्तिगत सामान और पहचान दस्तावेज वापस दिलाने, अनुवादकों तक पहुंच, सुरक्षित आवास, परामर्श (काउंसलिंग) और तत्काल चिकित्सा सहायता का निर्देश दिया। अदालत ने आगे जोर दिया कि पीड़ितों के बयान सुरक्षा और मनोवैज्ञानिक स्थिरता सुनिश्चित करने के बाद ही दर्ज किए जाने चाहिए, और पूरी प्रक्रिया के दौरान पहचान की गोपनीयता बनाए रखी जानी चाहिए।
​पुनर्वास और पुनर्संयोजन (Rehabilitation and reintegration): पीठ ने राज्यों को संरक्षण गृहों (प्रोटेक्टिव होम्स) में पर्याप्त क्षमता, आजीविका और कौशल प्रशिक्षण, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, मनोरोग देखभाल तक पहुंच और दोबारा तस्करी के खिलाफ दीर्घकालिक सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। इसने यह भी रेखांकित किया कि बहाली और पुनर्संयोजन योजनाएं व्यक्तिगत होनी चाहिए और पीड़ित की सूचित सहमति (इन्फॉर्मड कंसेंट) पर आधारित होनी चाहिए, जिसमें पुनर्संयोजन के बाद समय-समय पर फॉलो-अप किया जाए।
​आपराधिक न्याय पक्ष (Criminal justice side): अदालत ने मुफ्त पेशेवर कानूनी सहायता, अभियोजकों (प्रॉसिक्यूटर्स) और न्यायिक अधिकारियों के संवेदीकरण, और मुकदमे (ट्रायल) के दौरान निरंतर पीड़ित सहायता को अनिवार्य किया।
​हालांकि, अदालत ने एक अलग संगठित अपराध जांच एजेंसी (Organised Crime Investigation Agency) के गठन के लिए परमादेश (Mandamus) जारी करने से इनकार कर दिया, और यह टिप्पणी की कि वर्तमान में तस्करी विरोधी कार्य कई संस्थानों में वितरित हैं। इसने केंद्र सरकार पर छोड़ दिया कि यदि भविष्य में आवश्यक समझा जाए तो वह ऐसी विशेष संस्था की स्थापना कर सकती है।
​मामले का शीर्षक (Cause Title): प्रज्वला बनाम भारत संघ व अन्य (न्यूट्रल साइटेशन: 2026 INSC 609)
​उपस्थिति (Appearances):
​याचिकाकर्ता: अपर्णा भट, वरिष्ठ अधिवक्ता।
​प्रतिवादी: के. राधाकृष्णन, वरिष्ठ अधिवक्ता; आर.एम. बजाज, अधिवक्ता।

 

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