दो कोड़ी के जिहादी शायर राहत इंदौरी की मौत के बाद भी यूं हुई दुर्गति
मरने से पहले भी देश पर कलंक था
मरने के बाद भी कलंक ही रह गया
बहुत से लोग रोये होंगे फूटकर ते री मैय्य त में,
मेरे देश मे तु इकलौता गद्दार थोड़ी है…
2001 में श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेई को उनके घुटनों के सर्जरी के समय राहत कहा था, “100 करोड़ के मुल्क का वजन जिन पैरों पर है, उनका खुद वजन नहीं संभलता।” यह कहकर इस बात को उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि वह अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में ही बात कर रहा है।
इसके बाद तंज कसते हुए व अपमानित करते हुए राहत इंदौरी तमाम वाहवाही के बीच अपना शेर पढ़ा, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री के घुटनों की सर्जरी का मजाक उड़ाया गया था।
शेर
“रंग चेहरे का ज़र्द कैसा है
आईना गर्द-गर्द कैसा है
काम घुटनों से जब लिया ही नहीं
फिर ये घुटनों में दर्द कैसा है”
इस शेर को सुनकर मुशायरे में ठहाके और तालियाँ गूँज गईं थीं। कुछ लोग उठकर आए और राहत को सम्मानित भी किया था।
झूठ और जेहादी मानसिकता से कोई शायर बन सकता है मगर इन्सान नहीं। बिल्कुल घटिया मानसिकता का आदमी था राहत इंदौरी, जिसने घुटने को सिर्फ और सिर्फ सेक्स से जोड़ा
और अंत में मजाक उड़ाते हुए बाजपेयी को दो कौड़ी का इंसान और खुद को करोड़ों का शायर बताते हुए कहता है
मैं करोड़ों का शायर हूँ दो कौड़ी के आदमी का नाम लेकर अपना समय बर्बाद नहीं करता।
एक मुशायरे में उन्होंने गोधरा कांड को लेकर ये कह दिया था कि उस दिन कारसेवकों के साथ कुछ हुआ ही नहीं था। मीडिया ने हौआ बना दिया और ये बताया कि रेल के डिब्बों में आग लगा दी गई थी।
इसके बाद राहत इंदौरी अपना शेर फरमाते हुए कहा हैं:
“जिनका मसलक है रौशनी का सफर
वो चिरागों को क्यों बुझाएँगें
अपने मुर्दे भी जो जलाते नहीं
जिंदा लोगों को क्या जलाएँगे”
साथ ही यह भी बताने की कोशिश की कि यह काम हिंदुओं का हो सकता है क्योंकि हिंदू ही शव का दाह संस्कार करते हैं।
जिंदगी भर तुमने सबको गरियाया , गौ माता पर व्यंग्य कसकर कहा “गाय से डर लगता है शेर से नहीं”
भारत के प्रधान मंत्री को तुमने कहा”नालायक चला जा तुझे तेरी बीवी बुलाती है”
जब बोया पेड़ बबूल का
तो आम कहा से होय?
देश और धर्म के प्रति गद्दारी करने वालो के लिए कोई आदर ,सम्मान नहीं मेरे मन में न होना चाहिए
हमारे लिए तुम पूजनीय नहीं जू तनीय थे और रहोगे ।
बहुत से लोग रोये होंगे फूटकर ते री मैय्य त में,
मेरे देश मे तु इकलौता गद्दार थोड़ी है,
जो कौम को मुल्क से बड़ा समझे,
अच्छा इंसान थोड़ी है?
म र गया तो म र गया,
शा यर था कोई भगवान थोड़ी है।🤭
है बहुत अंधियारा अब सूरज को निकलना चाहिए,
जिस तरह भी हो ये मौसम बदलना चाहिए।
फूल बनकर जो जिया है वो यहां मसला गया,
जिस्त को फौलाद के सांचे में ढल ना चाहिए।🔥🔥
मुसलमानों की हिमायत में राहत का लिखा ये तो पढा और सुना ही होगा-
अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो, जान थोड़ी है
ये सब धुआँ है, कोई आसमान थोड़ी है लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है मैं जानता हूँ कि दुश्मन भी कम नहीं लेकिन
हमारी तरह हथेली पे जान थोड़ी है हमारे मुँह से जो निकले वही सदाक़त है
हमारे मुँह में तुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है जो आज साहिब-ए-मसनद हैं कल नहीं होंगे
किराएदार हैं, ज़ाती मकान थोड़ी है सभी का खून है शामिल यहाँ की मिट्टी में
किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है
और इसका बेचैन मधुपुरी का जवाब न पढा हो,ये भी हो नही सकता-
ख़फ़ा होते हैं तो हो जाने दो, घर के मेहमान थोड़ी हैं
सारे जहाँ भर से लताड़े जा चुके हैं, इनका मान थोड़ी है ये कान्हा राम की धरती है, सजदा करना ही होगा
मेरा वतन ये मेरी माँ है, लूट का सामान थोड़ी है मैं जानता हूँ, घर में बन चुके हैं सैकड़ों भेदी
जो सिक्कों में बिक जाए, वो मेरा ईमान थोड़ी है मेरे पुरखों ने सींचा है, इस वतन को अपने लहू के कतरों से
सभी का खून शामिल था यहाँ की मिट्टी में, हम अनजान थोड़े हैं किंतु जिनके अब्बा ले चुके पाकिस्तान
अब उनका हिंदुस्तान थोड़ी है!(कुछ वर्शन में अंत में और जोड़ा जाता है जैसे:
बहुत लूटा फिरंगी ने, कभी बाबर के नाजायज पूतों ने
यह मेरा घर है मेरी जान, मुफ्त की सराय थोड़ी है)

