सर्वाइकल कैंसर टीके पर विवाद क्या है? सरकार क्यों कर रही फंडिंग?
सर्वाइकल कैंसर (HPV) टीके पर मुख्य विवाद दुष्प्रभावों की चिंता, उच्च लागत, परीक्षण प्रक्रिया पारदर्शिता और यौन अनैतिकता को बढ़ावा मिलने की सामाजिक आशंकायें हैं। विशेषज्ञों के अनुसार वैक्सीन ९७% तक प्रभावी है, लेकिन आलोचक इसे बिना पूर्ण शोध जल्दबाजी में लाने और फार्मा कंपनियों के प्रभाव के आरोप भी लगाते हैं।
सर्वाइकल कैंसर वैक्सीन (HPV) से जुड़े प्रमुख विवाद
सुरक्षा और दुष्प्रभाव: टीके के बाद बेहोशी, चक्कर आना, सिरदर्द और इंजेक्शन वाली जगह पर दर्द जैसे दुष्प्रभाव आम तौर पर हल्के होते हैं। हालांकि, कुछ रिपोर्टों में गंभीर एलर्जी या रेयर मामलों में ओवेरियन समस्याओं के दावे किए गए हैं, लेकिन शोध इन दावों का खंडन करते हैं।
परीक्षण और नैतिकता: भारत में शुरुआती ट्रायल में नैदानिक परीक्षणों के परिणाम प्रकाशित होने से पहले ही टीके को उपलब्ध कराने में जल्दबाजी के आरोप लगे, जिसे कुछ संगठनों ने “लैब चूहा” (Guinea Pigs) की तरह इस्तेमाल करने जैसा बताया।
यौन अनैतिकता की आशंका: चूँकि यह वैक्सीन 11-14 वर्ष की लड़कियों को दी जानी है, कुछ सामाजिक और सांस्कृतिक रूढ़िवादी यह मानते हैं कि यह किशोरों में यौन सक्रियता को बढ़ावा दे सकती है।
लागत और पहुँच: वैक्सीन की उच्च लागत (
रुपये तक) एक बड़ा विषय रहा है, हालांकि अब सरकार इसे निःशुल्क उपलब्ध कराने की योजना पर काम कर रही है।
वैज्ञानिक और स्वास्थ्य संबंधी तर्क: आलोचकों का कहना है कि यह सभी प्रकार के HPV (केवल मुख्य 30% प्रकार) से सुरक्षा नहीं देता, इसलिए नियमित पैप टेस्ट जारी रखना आवश्यक है।
सर्वाइकल कैंसर के टीके (HPV वैक्सीन) पर विवाद मुख्यतः सुरक्षा, उम्र, लागत और नैतिक/सामाजिक विषयों को लेकर रहा है। यह टीका मानव पैपिलोमा वायरस (HPV) से बचाव को दिया जाता है, जो सर्वाइकल कैंसर का प्रमुख कारण है।
1. टीके और कंपनियां
Gardasil (निर्माता: Merck & Co.)
Cervarix (निर्माता: GlaxoSmithKline)
भारत में भी अब स्वदेशी HPV वैक्सीन लॉन्च हो चुकी है।
मुख्य विवाद
1️⃣□ सुरक्षा (Safety) को लेकर आशंकाएँ
शुरुआती वर्षों में कुछ देशों में टीकाकरण के बाद बेहोशी, चक्कर, एलर्जी जैसी घटनाएँ सामने आईं।
भारत में 2009–10 के एक ट्रायल में कुछ किशोरियों की मृत्यु के बाद बड़ा विवाद हुआ। हालांकि जांच में यह स्पष्ट नहीं हुआ कि मौतें सीधे टीके के कारण थीं, लेकिन नैतिक प्रक्रियाओं और सहमति (consent) को लेकर सवाल उठे।
World Health Organization (WHO) और अन्य स्वास्थ्य एजेंसियों का कहना है कि यह टीका सुरक्षित और प्रभावी है।
2️⃣□ कम उम्र में टीकाकरण पर आपत्ति
टीका 9–14 वर्ष की लड़कियों (और अब लड़कों को भी) को दिया जाता है।
कुछ का तर्क था कि इतनी कम उम्र में “यौन संचारित वायरस” का टीका देना सामाजिक/नैतिक रूप से गलत संदेश दे सकता है।
चिकित्सा विशेषज्ञों का जवाब: यह टीका संक्रमण से पहले दिया जाना सबसे प्रभावी होता है।
3️⃣□ लागत और फार्मा कंपनियों की भूमिका
शुरुआत में टीका महंगा था, आरोप लगे कि बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ मुनाफा कमा रही हैं।
सरकारों पर लॉबिंग के आरोप भी लगे।
4️⃣□ अनिवार्य टीकाकरण पर बहस
कुछ देशों/राज्यों में स्कूल में प्रवेश को HPV वैक्सीन अनिवार्य करने की कोशिश हुई, जिसका विरोध “व्यक्तिगत स्वतंत्रता” के नाम पर हुआ।
वर्तमान स्थिति (भारत संदर्भ)
भारत में सर्वाइकल कैंसर महिलाओं में आम कैंसरों में से एक है।
सरकार राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में HPV वैक्सीन शामिल करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) और WHO के अनुसार, वैक्सीन से सर्वाइकल कैंसर के जोखिम में काफी कमी आती है।
निष्कर्ष
वैज्ञानिक समुदाय की सहमति है कि HPV वैक्सीन सुरक्षित और प्रभावी है। विवाद मुख्यतः प्रारंभिक ट्रायल, नैतिक प्रक्रियाओं, लागत और सामाजिक धारणाओं के कारण रहे।
भारत में 2009–10 का HPV वैक्सीन ट्रायल विवाद
2009–10 में आंध्र प्रदेश और गुजरात में किशोरियों पर HPV वैक्सीन का एक “डिमॉन्स्ट्रेशन प्रोजेक्ट” चला। इसमें मुख्य रूप से Gardasil (निर्माता: Merck & Co.) और Cervarix (निर्माता: GlaxoSmithKline) दी गईं।
कौन शामिल था?
यह प्रोजेक्ट PATH (एक अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्था) ने राज्य सरकारों के सहयोग से चला।
तकनीकी सहयोग में Indian Council of Medical Research (ICMR) भी था।
विवाद कैसे शुरू हुआ?
1️⃣□ सात किशोरियों की मृत्यु
ट्रायल में 7 लड़कियों की मौत हुई (4 आंध्र प्रदेश, 3 गुजरात)।
मौतों के कारणों में सांप का काटना, डूबना, बीमारी, आत्महत्या बताया गया।
जांच में सीधे टीका मौत का कारण सिद्ध नहीं किया गया।
फिर भी, इससे बड़ा जन-विवाद खड़ा हुआ।
2️⃣□ सहमति (Consent) और नैतिकता पर सवाल
आरोप लगे कि कई जगह अभिभावकों की लिखित सहमति सही तरीके से नहीं ली गई।विवाद का मुख्य कारण ‘सूचित सहमति’ (Informed Consent) की कमी थी। हॉस्टल वार्डनों ने माता-पिता की अनुमति बिना फॉर्म साइन कर दिए थे, जो अनैतिक था।
कुछ आदिवासी और गरीब परिवारों की बच्चियों को बिना पर्याप्त जानकारी शामिल किया गया।
कहा गया कि प्रोजेक्ट “पब्लिक हेल्थ डेमो” बताया गया, जबकि प्रक्रियाएँ क्लीनिकल ट्रायल जैसी थीं।
3️⃣□ संसद और जांच
मामला संसद में उठा।
2013 में संसद की Parliamentary Standing Committee on Health and Family Welfare ने अपनी रिपोर्ट में PATH और संबंधित एजेंसियों की कार्यप्रणाली की आलोचना की।
रिपोर्ट में नैतिक मानकों और निगरानी तंत्र मजबूत करने की सिफारिश की गई।
आगे क्या हुआ?
भारत सरकार ने कुछ समय को HPV वैक्सीन कार्यक्रम धीमा कर दिया।
बाद में, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय डेटा समीक्षा बाद वैक्सीन सुरक्षा को लेकर भरोसा दोहराया गया।
World Health Organization और ICMR ने स्पष्ट किया कि HPV वैक्सीन सुरक्षित और प्रभावी है।
भारत स्वदेशी HPV वैक्सीन भी विकसित कर राष्ट्रीय कार्यक्रम में शामिल करने की दिशा में बढ़ा हैं।
निष्कर्ष
विवाद का केंद्र मौतें नहीं, बल्कि प्रक्रिया और नैतिक मानक थे।
वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर HPV वैक्सीन सुरक्षित मानी जाती है, लेकिन 2009–10 की घटना ने भारत में क्लीनिकल ट्रायल और सार्वजनिक स्वास्थ्य परियोजनाओं की निगरानी को अधिक कठोर बनाया।
HPV वैक्सीन: किस आयु में और कितनी डोज?
भारत सहित दुनिया भर में सिफारिशें World Health Organization (WHO) और Indian Council of Medical Research (ICMR) के दिशानिर्देशों पर आधारित हैं।
1️⃣□ आदर्श उम्र (Best Age)
9–14 वर्ष (लड़कियाँ और लड़के)
यह सबसे उपयुक्त आयु मानी जाती है।
कारण: इस आयु में HPV संक्रमण शुरू नहीं हुआ होता, इसलिए वैक्सीन सबसे अधिक प्रभावी रहती है।
2️⃣□ डोज (खुराक) की संख्या
आयु – 9–14 वर्ष
कितनी डोज? – 1 या 2 डोज (नीतियों के अनुसार)
अंतराल – यदि 2 डोज: – 6 महीने का अंतर
15 वर्ष और अधिक- 2 डोज – 6 महीने का अंतर
कमजोर प्रतिरक्षा (HIV आदि)- 3 डोज- 0, 2 और 6 महीने
हाल के वर्षों में WHO ने 9–14 वर्ष की आयु में सिंगल डोज (एक खुराक) को भी प्रभावी माना है, ताकि अधिक लोगों तक टीकाकरण पहुँच सके।
3️⃣□ क्या विवाहित या बड़ी आयु की महिलाएँ लगवा सकती हैं?
हाँ, 26 वर्ष तक नियमित रूप से और कुछ मामलों में 45 वर्ष तक भी डॉक्टर की सलाह से लगवाई जा सकती है।
लेकिन ध्यान रहे:
यदि पहले से HPV संक्रमण हो चुका है, तो वैक्सीन इलाज नहीं करती, केवल भविष्य के संक्रमण से बचाती है।
4️⃣□ क्या लड़कों को भी लगती है?
हाँ।
HPV केवल सर्वाइकल कैंसर ही नहीं, बल्कि गले, गुदा और जननांग कैंसर का भी कारण बन सकता है। इसलिए कई देशों में लड़कों को भी टीका दिया जाता है।
संक्षेप में
सबसे अच्छा समय: 9–14 वर्ष
सबसे सामान्य योजना: 1 या 2 डोज
सुरक्षा: वैश्विक स्तर पर सुरक्षित मानी गई
सर्वाइकल कैंसर टीकाकरण (HPV Vaccine) पर फरवरी 2026 में भारत सरकार के 14 वर्ष की लड़कियों के लिए राष्ट्रव्यापी मुफ्त टीकाकरण अभियान शुरू करने के बाद चर्चा फिर से तेज हो गई है।
सुरक्षा और साइड इफेक्ट्स के दावे
सोशल मीडिया पर अक्सर दावा होता है कि यह टीका भविष्य में प्रजनन क्षमता (Fertility) प्रभावित कर सकता है या इसके गंभीर न्यूरोलॉजिकल साइड इफेक्ट्स हैं।
विशेषज्ञों की राय: WHO और दुनिया भर की स्वास्थ्य संस्थाओं का कहना है कि 50 करोड़ से अधिक डोज दिए जाने पर भी प्रजनन क्षमता पर कोई बुरा प्रभाव नहीं मिला है। सामान्य साइड इफेक्ट्स में हल्का बुखार या इंजेक्शन वाली जगह पर दर्द शामिल है।
ट्रायल बनाम वास्तविक कैंसर सुरक्षा
कुछ आलोचकों का तर्क है कि चूंकि कैंसर होने में 20-30 साल लगते हैं, इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि टीका पूरी तरह प्रभावी है।
वैज्ञानिक पक्ष: वैश्विक स्तर पर (जैसे ऑस्ट्रेलिया और यूके में) किए गए अध्ययनों ने सिद्ध किया है कि टीकाकरण के बाद महिलाओं में ‘प्री-कैंसर’ घावों और HPV संक्रमण के मामलों में 90% तक की गिरावट आई है।
2026 विवाद और राजनीति
फरवरी 2026 में भारत सरकार के मुफ्त टीकाकरण अभियान शुरू करने पर कुछ समूहों ने इसे “विदेशी कंपनियों का एजेंडा” बताया है।
स्वदेशी टीका: यह विवाद घटाने को भारत ने अपना स्वदेशी टीका ‘Cervavac’ भी विकसित किया है, जिसे धीरे-धीरे सरकारी अभियान में शामिल किया जा रहा है।
निष्कर्ष: विवाद का एक बड़ा हिस्सा वैज्ञानिक तथ्यों के बजाय पुरानी घटनाओं की गलत व्याख्या और सोशल मीडिया पर फैली भ्रांतियों से प्रेरित है। विशेषज्ञों के अनुसार, सर्वाइकल कैंसर भारत में महिलाओं में होने वाला दूसरा सबसे सामान्य कैंसर है, और टीकाकरण इससे बचने का सबसे प्रभावी तरीका है।
टीके का प्रकार: सरकार ने HPV वैक्सीन के रूप में Gardasil-4 (गार्डासिल) का चयन किया है, जो सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर मुफ्त में उपलब्ध है.
स्वदेशी विकल्प: इसमें भारत में निर्मित पहली स्वदेशी वैक्सीन ‘सर्वावैक’ (Cervavac) का उपयोग भी शामिल है, जिसकी कीमत निजी बाजार में ₹2,000-4,000 के बीच है, लेकिन सरकारी अभियान में यह मुफ्त है.
बजट और भागीदारी: गार्डासिल की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए, भारत सरकार ने GAVI, द वैक्सीन एलायंस के साथ साझेदारी में 250 मिलियन अमेरिकी डॉलर (2306 करोड रुपए) की फंडिंग की व्यवस्था की है.

