लखनऊ अग्निकांड में 15 मौतें,तीन बंदी,चार सस्पेंड
लखनऊ अग्निकांड में बड़ा एक्शन, बिल्डिंग मालिक समेत दो अन्य गिरफ्तार
अग्निकांड की जांच को दो सदस्यीय विशेष जांच दल (SIT) गठित किया है. यह फैसला दुर्घटना पर हाई लेवल रीव्यू मीटिंग में लिया गया. एसआईटी में अमृत अभिजात, अपर मुख्य सचिव (पर्यटन, धर्मार्थ कार्य एवं संस्कृति विभाग) और प्रवीण कुमार, अपर पुलिस महानिदेशक (एडीजी), लखनऊ जोन है.
अलीगंज अग्निकांड के मुख्य आरोपित के पकडे जाने की बात सामने आई है
लखनऊ,22 जून 2026,लखनऊ अग्निकांड में बड़ा एक्शन हुआ है. पुलिस ने जांच बाद बिल्डिंग मालिक समेत तीन लोग बंदी किया है.इस मामले में 3 लोगों पर FIR की गई है. बिल्डिंग मालिक वीरेंद्र शुक्ला और एनिमेशन ट्रेनिंग स्टूडियो का मालिक तुषांत जैसवाल के साथ रामकृष्ण उपाध्याय भी गिरफ्तार हुआ है.
इस मामले में चार अफसर भी निलंबित हुए हैं. दुर्घटना के समय मुख्यमंत्री योगी ने अपने अलीगढ के सभी कार्यक्रम निरस्त कर लखनऊ लौट दुर्घटनास्थल का निरीक्षण कर ताबडतोड बैठक और निर्णय लिये।
जांच दल को घटना के सभी पहलुओं की गहन जांच कर जिम्मेदार व्यक्तियों और संस्थाओं की भूमिका तय करने का निर्देश दिया गया है.
सरकार ने एसआईटी को सात दिनों में अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपने को कहा है. जांच में आग लगने के कारणों, भवन में सुरक्षा मानकों के पालन, वैधानिक स्वीकृतियों और किसी भी प्रकार की संभावित लापरवाही की पड़ताल होगी. राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि दुर्घटना को जिम्मेदार कोई भी व्यक्ति या संस्था छूटेगी नही और दोषियों पर कठोर कार्रवाई होगी.
विवादों में भी रही है बिल्डिंग
जिस इमारत में आग लगी थी, उसे लेकर एक नया अनावरण हुआ है. अलीगंज योजना के सेक्टर-डी स्थित भवन संख्या एमएस/102/डी का कुल क्षेत्रफल 1992 वर्गफुट है और इसके लिए 20 अगस्त 2014 को आवासीय मानचित्र स्वीकृत किया गया था. हालांकि, साल 2016 में लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) ने भवन में कथित अवैध निर्माण को लेकर मुकदमा किया था.
अवैध निर्माण को लेकर मिले थे कार्रवाई के निर्देश
मामले की सुनवाई के बाद 10 मई 2016 को भवन ध्वस्तीकरण आदेश भी हुआ था. बाद में भवन मालिकों ने यह कहते हुए आपत्ति दर्ज कराई कि उन्हें सुनवाई का सही मौका नहीं मिला और निर्माण स्वीकृत मानचित्र के अनुसार ही है. इसके बाद 5 जुलाई 2016 को ध्वस्तीकरण का आदेश निरस्त हो गया था.
अभिलेखों के अनुसार, भवन वर्ष 1980 में लॉटरी से आवंटित हुआ था. साल 2005 में इसकी सेल डीड (विक्रय विलेख) विजय कुमार और उषा के नाम हुई, जबकि 2013 में इसे वीरेन्द्र प्रताप शुक्ला और सुरेन्द्र प्रताप शुक्ला को बेचा गया. इसके बाद 7 अगस्त 2014 को एलडीए ने नए मालिकों के नाम भवन का नामांतरण कर दिया था. अब अग्निकांड बाद प्रशासन भवन की स्वीकृतियों, निर्माण की वास्तविक स्थिति, सुरक्षा मानकों के पालन और अनियमिततायें भी जांच रहा है.
लखनऊ अग्निकांड का असल जिम्मेदार कौन? डीएम से लेकर नगर आयुक्त तक… 16 अधिकारियों की कुंडली तैयार
होटल एसएसजे इंटरनेशनल, विराट और लेवाना की तरह ही एलडीए के भ्रष्ट तंत्र ने अलीगंज के गेमिंग सेंटर को लाक्षागृह बना दिया। एकल आवासीय नक्शा पास कराकर जिस स्थान पर घन बनना था, वहां तीन मंजिला अवैध व्यावसायिक कांप्लेक्स तनकर खड़ा हो गया।
कई महीने तक हुए इस अवैध निर्माण को देखकर भी एलडीए के तत्कालीन विहित प्राधिकारी, चीफ इंजीनियर, जोन चार के जोनल अधिकारी, सहायक और अवर अभियंताओं ने अपनी आंखें बंद रखी। अब घटना के बाद जब जांच शुरू हुई तो इन 16 अधिकारियों की कुंडली तैयार की गई है। इसे एलडीए देर रात जिलाधिकारी के माध्यम से शासन को सौंपेगा।
एलडीए ने 11 जुलाई 1980 को दिलकुशा निवासी विजय कुमार को लाटरी के माध्यम से भवन /भूखंड संख्या एमएस /102 आवंटित किया था। वर्ष 2005 में एलडीए ने विजय कुमार के पक्ष में रजिस्ट्री कर दी थी। इसके बाद 19 जनवरी 2013 को विजय कुमार ने यह संपत्ति वीरेंद्र प्रसाद शुक्ल और सुरेंद्र प्रसाद शुक्ल को बेच दी थी।
उन दोनों के नाम संपत्ति की रजिस्ट्री के बाद वर्ष 2014 में 1992 वर्गफीट संपत्ति का नामांतरण भी हो गया था। दोनों ने ही 20 अगस्त 2014 को एलडीए से स्वत: मानचित्र योजना में मानचित्र पास कराया था।
इस योजना में मानचित्र और एक शपथपथ देने का प्रविधान था। जिसमें आवेदक को यह बताना होता है कि वह प्रस्तुत मानचित्र में ही उसी के भू उपयोग के अनुसार ही निर्माण करेगा। ऐसा न करने पर मानचित्र स्वत: निरस्त माना जायेगा।
यहां तोड़ दी शपथ
शपथपत्र के साथ आवासीय निर्माण का मानचित्र प्रस्तुत किया गया था। एकल आवासीय यूनिट में निर्माण की जगह अवैध कांप्लेक्स तैयार कर दिया गया। आवासीय नक्शे के मानकों की अनदेखी की गई। सेटबैक को छोड़े बिना ही पूरे कवर्ड एरिया में बेसमेंट और तीन मंजिल निर्माण हो गया।
एकल आवासीय निर्माण की जगह बेसमेंट खोदकर बहुमंजिला भवन बनाते हुए वर्ष 2016 में एलडीए ने एक नोटिस जारी की थी। इस नोटिस के बाद भी मानचित्र को निरस्त नहीं किया गया।
यह था नियम, इसका उल्लंघन
दो हजार वर्गमीटर से कम क्षेत्रफल के भूखंड पर उस समय की भवन निर्माण नियमावली के तहत केवल 65 प्रतिशत क्षेत्र का कवरेज होना चाहिए। 35 प्रतिशत सेटबैक फायर सेवा व अन्य उपयोग के लिए छोड़ा जाना चाहिए। मौके पर 100 प्रतिशत तक कवरेज एरिया पाया गया।
एकल यूनिट में सामने, अगल और बगल दो -दो मीटर का सेटबैक छोड़ने के बाद 40 प्रतिशत हिस्से तक ही बेसमेंट बनाया जाना चाहिए। मौके पर बेसमेंट का कवरेज एरिया 90 प्रतिशत से अधिक है। बेसमेंट की अनुमति के लिए खनन सहित विभिन्न विभागों की एनओसी होना भी जरूरी होता है। एलडीए के रिकार्ड में ऐसी कोई एनओसी नहीं है।
एकल यूनिट में बिना स्टील्थ पार्किंग के अधिकतम ऊंचाई 15 मीटर और स्टील्थ होने पर 17.5 मीटर से अधिक नहीं होना चाहिए। मौके पर बिना स्टील्थ पार्किंग के यह ऊंचाई 19 मीटर से अधिक है।
यह हैं जिम्मेदार
लखनऊ विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष-
अवैध कांप्लेक्स के निर्माण को शपथ पत्र के साथ दिए गए मानचित्र का पालन क्यों नहीं किया गया?
एलडीए ने वर्ष 2016 में जो नोटिस जारी की थी, उसपर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
निर्माण को सील या ध्वस्त क्यों नहीं किया गया?
अवैध निर्माण और बिना अनुमति भूउपयोग करने पर लापरवाह अधिकारियों पर एक्शन क्यों नहीं हुआ?
नगर आयुक्त (नगर निगम)-
पेट क्लीनिक के पास न तो उचित वेंटिलेशन था और न ही कचरा व सुरक्षा प्रबंधन का कोई लाइसेंस। रिहायशी या भीड़भाड़ वाले इलाके में बिना कड़े मानकों के पेट क्लीनिक के संचालन को अनदेखा करना नगर निगम की बड़ी प्रशासनिक विफलता है। वर्ष 2022 से कामर्शियल टैक्स वसूला जाने लगा, उससे पहले छह साल निगम ने कोई कार्रवाई क्यों नहीं की ?
जिलाधिकारी-
जिले के मुखिया होने के नाते कोचिंग संस्थानों और कमर्शियल सेंटरों की सुरक्षा गाइडलाइंस का पालन सुनिश्चित करवाना इनकी जिम्मेदारी है। पूर्व में हुई घटनाओं से सबक न लेते हुए, टास्क फोर्स को सुस्त छोड़ देना प्रशासन की ढिलाई को दर्शाता है।
क्षेत्रीय पुलिस उपायुक्त-
स्थानीय पुलिस की बीट प्रणाली पूरी तरह फेल रही। क्षमता से अधिक छात्रों को तंग कमरों में बिठाने और आपातकालीन निकास बंद होने की शिकायतों पर समय रहते पुलिस प्रशासन ने कोई कानूनी कार्रवाई या तालाबंदी क्यों नहीं की?
फायर विभाग-
किसी भी भवन में अग्निशमन से सुरक्षा मानकों में उपकरणों को लगाया गया है या नहीं, प्रवेश व निकासी जैसी व्यवस्था है या नहीं। इसकी जांच कर एनओसी फायर विभाग जारी करता है। फायर विभाग के अधिकारी इस कांप्लेक्स की तैयारी को लेकर आंखें क्यों मूंदे रहें?
370 की जांच में नियम तोड़ते मिले 81 प्रतिष्ठान
दिल्ली के होटल में पिछले दिनाें लगी आग के बाद एलडीए ने जब बहुमंजिला इमारतों के अग्नि सुरक्षा मानकों की जांच शुरू की तो सारा खेल सामने आ गया। जांच में करीब 30 प्रतिशत प्रतिष्ठानों में अग्निशमन मानकों का उल्लंघन पाया गया। एलडीए व अग्निशमन विभाग की संयुक्त टीम ने 307 प्रतिष्ठानों की जांच की, इसमें 81 के खिलाफ नोटिस जारी किया गया है।
इसमें प्रवर्तन जोन-1 में कुल 68 भवनों में से 21, जोन-2 में 39 में से आठ , जोन-3 में 16 में से दो, जोन-4 में 35 में से 11, जोन-5 में 38 में से सात, जोन-6 में 97 में से 29 और जोन सात में 14 भवनों की जांच कर तीन खिलाफ नोटिस जारी हुई है।
आखिर क्यों धधक रही हैं इमारतें? NEC के बारे में पता नहीं,आसानी से मिल रही NOC,जानें क्या है नियम
भारतीय विद्युत नियमावली की अनदेखी से आग की घटनाएं बढ़ रही हैं. बिना जांच ही NOC दे दी जाती है.
उत्तर प्रदेश में लगातार हो रही आग की घटनाएं चुनौती बनी हुई हैं. 22 जून (सोमवार) को अलीगंज के पुरनिया इलाके में एक दुकान में भीषण आग लग गई. आग की चपेट में एक गेमिंग कोचिंग सेंटर भी आ गया.दुर्घटना में अब तक 15 बच्चों की मौत हुई है.
फायर NOC, ऑडिट और सुरक्षा नियमों के बाद भी इमारतों में आग की घटनाएं हो रही हैं. हालात यह है कि भारतीय विद्युत नियमावली 2023 (National Electrical Code – NEC) के नियमों में NOC तो दी जा रही है, लेकिन सामान्य जनको नियमों के बारे में पता तक नहीं है.
वहीं उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में लगभग 46 विद्युत सुरक्षा अधिकारी तैनात हैं, जिनके कंधों पर NOC देने की जिम्मेदारी है. इन्हीं अधिकारियों पर पूरे उत्तर प्रदेश के व्यावसायिक व औद्योगिक भवनों को भारतीय विद्युत नियमावली 2023 में सुरक्षित बनाने की जिम्मेदारी है. बड़ा सवाल यह है कि 75 जिलों में 46 अधिकारी कैसे जांच करते हैं और कैसे NOC मिल जाती है?
नियमों को लेकर जागरूक नहीं हैं लोग.
लखनऊ के चीफ फायर ऑफिसर अंकुश मित्तल ने कहा, आग की घटनाओं के पीछे मुख्य कारण शॉर्ट सर्किट ही होता है. ज्यादातर मामलों में शॉर्ट सर्किट की वजह से ही आग की घटनाएं सामने आई हैं. सेफ वायरिंग एक्सपर्ट देवेंद्र द्विवेदी ने बताया, केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के रेगुलेशन 2023 को व्यापक तरीके से लागू किया जाए तो 90% तक आग की घटनाओं को कम कर सकते हैं. आग की घटनाओं में 90% घटनाएं शॉर्ट सर्किट से होती हैं.
नियम में दी जाती है एनओसी : विद्युत सुरक्षा निदेशालय के निदेशक गिरीश कुमार ने बताया, निदेशालय का मुख्य कार्य भारतीय विद्युत नियमावली 2023 के नियमों का पालन करना है. इसके लिए हमने कई व्यवस्थाएं की हैं. कमर्शियल व औद्योगिक कनेक्शन देने से पहले बिजली विभाग (UPPCL) हमसे एनओसी लेगा. ऐसे में जब कमर्शियल या औद्योगिक बिल्डिंग को कनेक्शन देना होता है, उससे पहले हमारे अधिकारी जाकर यह सुनिश्चित करते हैं कि भारतीय विद्युत अधिनियम 2023 के नियमों में इलेक्ट्रिकल उपकरण व परिसर में वायरिंग की गई है कि नहीं.
निश्चित स्थान पर ट्रांसफार्मर लगाया गया है कि नहीं, अर्थिंग सही नियमों के तहत की गई है या नहीं, बिजली सप्लाई के अनुपात में निर्धारित कैपेसिटी के वायर (तार) डाले गए हैं या कि नहीं. निर्धारित नियमों के तहत एमसीबी लगाई गई है कि नहीं, जब हम यह सुनिश्चित कर लेते हैं, उसके बाद ही UPPCL कमर्शियल व औद्योगिक भवनाओं को बिजली का कनेक्शन देगा.
अभियान चलाकर की जाती है जांच : डायरेक्टर गिरीश कुमार ने बताया कि भारतीय विद्युत नियमावली 2023 में यह नियम है कि हमारी एनओसी के बगैर कनेक्शन नहीं दिया जा सकता है,कुछ मामलों में यह सामने आया था कि हमारी एनओसी के बगैर भी कनेक्शन दिए गए हैं.जिसे लेकर हमने संबंधित विभाग व भवन मालिक को निर्देश जारी किए हैं.पिछले दिनों बड़े पैमाने पर अभियान चलाकर हमने ऐसे कमर्शियल व औद्योगिक भवन चिन्हित किए हैं.व्यवस्था ठीक होने पर एनओसी दी गई.
विद्युत सुरक्षा निदेशालय के डायरेक्टर गिरीश कुमार ने बताया, हम आग लगने के बाद घटनास्थल पर पहुंचकर इस बात की जांच भी करते हैं कि आखिर आग लगने का कारण क्या है. बिल्डिंग में लगने वाले वायर, एमसीवी व अन्य विद्युत उपकरणों की जांच करने के बाद यह निर्धारित होता है कि आग लगने के पीछे कौन से कारण जिम्मेदार हैं. घटना से प्रभावित लोगों को आर्थिक सहायता देने का भी नियम है. नियमावली में घटना के 18 दिन के अंदर जांच रिपोर्ट देनी होती है.
आग की प्रमुख घटनाएं.
नियम सिर्फ खानापूर्ति को : व्यापारी यूनियन के अध्यक्ष अतुल शुक्ला ने बताया, कमर्शियल भावनों में बिजली देने से पहले भारतीय विद्युत नियमावली के तहत निदेशालय से एनओसी लेना अनिवार्य है, लेकिन यह सिर्फ खानापूर्ति है. एनओसी लेने को संबंधित व्यक्ति ऑनलाइन आवेदन कर देता है और बिना किसी जांच यह आसानी से उसे एनओसी मिल जाती है. भले ही उपभोक्ता ने अपने यहां घटिया क्वालिटी के तार और एमसीबी लगा रखी हो. हर तीन साल में वायरिंग का ऑडिट कराने का नियम है.
एलडीए वीसी प्रथमेश कुमार ने बताया, एलडीए का काम भावनों का नक्शा पास करना है. आवासीय और व्यावसायिक भवनों के नक्शे पास करने के दौरान इस बात का ध्यान रखा जाता है कि अगर कोई आपातकाल की स्थिति होती है, जैसे की आग लगती है तो लोगों के निकलने में आसानी हो, भवन में धुंआ ना भरे जिससे कि स्थिति गंभीर पैदा न हो. एनओसी लेने के बाद ही आवेदक को भवन का प्रयोग करने की अनुमति दी जाती है. जैसे की कमर्शियल भावनाओं में बिना फायर विभाग के एनओसी के भवन संचालित करने की अनुमति एलडीए की ओर से नहीं दी जाती है.
लखनऊ के चीफ फायर ऑफिसर अंकुश मित्तल ने बताया, कि बिल्डिंगों में आग की घटना न हो इसके लिए हम फायर एनओसी देते हैं. भवन स्वामियों को आवेदन करना होता है, जिसके बाद हम जाकर यह सुनिश्चित करते हैं कि भवन आग लगने की स्थिति में कितना सुरक्षित है और वहां पर मानक के अनुरूप फायर सेफ्टी संयंत्र मौजूद है कि नहीं. कई बार अभियान चलाकर फायर सेफ्टी की जांच की जाती है.
अब जानते हैं क्या है जमीनी हकीकत
लखनऊ में 150 से अधिक ऐसे भवन और होटल हैं जिनके पास फायर एनओसी नहीं है. UPPCL ने बिना विद्युत सुरक्षा निदेशालय की एनओसी के कमर्शियल कनेक्शन दिए हैं. असल में विद्युत सुरक्षा निदेशालय की एनओसी के लिए ऑनलाइन आवेदन करना पड़ता है, संबंधित निदेशालय के अधिकारी ज्यादातर मामले में बिना मौके पर विद्युत उपकरणों की जांच किए एनओसी दे देते हैं. इसी एनओसी के आधार पर यूपीपीसीएल बिजली का कनेक्शन दे देता है.
लखनऊ में रेस्टोरेंट का संचालन करने वाली शालिनी वाजपेई ने बताया, वह एक किराए के मकान में रेस्टोरेंट का संचालन करती हैं. सुरक्षा के लिए फायर सुरक्षा उपकरण लगाया है. उनके पास कमर्शियल बिजली कनेक्शन भी है, लेकिन उन्हें इस बात की जानकारी ही नहीं है कि भारतीय विद्युत नियमावली 2023 के तहत विद्युत सुरक्षा निदेशालय से एनओसी भी ली जाती है. न उन्होंने कभी इसके लिए अप्लाई किया और ना ही कभी कोई उनके यहां जांच के लिए पहुंचा.
बीकेटी क्षेत्र में होटल का संचालन करने वाले सम्राट सिंह ने बताया कि वह पिछले पांच साल से होटल का संचालन कर रहे हैं. उन्होंने बिजली विभाग से कमर्शियल कनेक्शन ले रखा है, लेकिन उन्हें भी इस बारे में जानकारी नहीं है कि कमर्शियल कनेक्शन लेने से पहले भारतीय विद्युत नियमावली 2023 के तहत विद्युत सुरक्षा निदेशालय से एनओसी लेना अनिवार्य है. उन्होंने भी बताया कि कभी भी विद्युत सुरक्षा निदेशालय का कोई अधिकारी या कर्मचारी जांच के लिए नहीं पहुंचा.
अलीगंज में कोचिंग का संचालन करने वाले शुभम दुबे ने बताया कि वह एक किराए के कैंपस में कोचिंग का संचालन कर रहे हैं. 150 की संख्या में छात्र पढ़ाई करने के लिए आते हैं. उनके पास बिजली का कमर्शियल कनेक्शन भी है, लेकिन उन्हें भी इस बारे में जानकारी नहीं है कि भारतीय विद्युत नियमावली 2023 के तहत विद्युत सुरक्षा निदेशालय से एनओसी लेना अनिवार्य है. कमर्शियल कनेक्शन के लिए उन्होंने पावर हाउस में संपर्क किया था. लाइनमैन ने उन्हें आसानी से कनेक्शन दिला दिया.
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