कजिन मैरिज से पाकिस्तान बना खुली लैब, गायब जींस की हो रही स्टडी

Cousin Marriage in Pakistan: पाकिस्तान में कजिन से शादी के चलन से ऐसा क्या हो रहा कि वैज्ञानिक हुए हैरान
अक्सर चचेरे-ममेरे भाई-बहनों की शादी को वैज्ञानिक तौर पर ठीक नहीं समझा जाता है लेकिन एक नई स्टडी में कजिन मैरिज से कई प्रकार के जीन्स को स्टडी करने और दवाओं को बनाने में मदद मिलने का दावा किया गया है. दक्षिण एशियाई लोगों पर की गई इस बड़ी जीनोमिक स्टडी से पता चलता है कि जिन लोगों में कुछ खास जीन नहीं होते, वो किस तरह की समस्याओं का सामना करते हैं.

पाकिस्तान में कजिन मैरिज
नई दिल्ली,19 जून 2026,दुनिया भर में कजिन मैरिज (चचेरे-ममेरे, फुफेरे-मौसेरे भाई-बहनों के बीच शादी) के मामले में पाकिस्तान पहले पायदान पर आता है. अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्था ‘वर्ल्ड पॉपुलेशन रिव्यू’ में 2023 में छपे आंकड़ों के अनुसार, पाकिस्तान में रक्त संबंधों के भीतर निकाह करने की दर करीब 61.2% है.

समय-समय पर सामने आईं तमाम साइंटिफिक रिसर्च इस बात की पुष्टि करती हैं कि एक ही जेनेटिक पूल या खून के रिश्तों में शादी करना आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है. डॉक्टरों और वैज्ञानिकों का मानना है कि इन शादियों से पैदा होने वाले बच्चों में जेनेटिक डिसॉर्डर यानी गंभीर आनुवांशिक विकार और कई जानलेवा बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.

लेकिन एक नई रिसर्च में सामने आया है कि पाकिस्तान में लगभग 34,000 लोग ‘ह्यूमन नॉकआउट’ हैं, यानी ऐसे लोग जिनमें कम से कम एक जीन ने काम करना बंद कर दिया है और इससे उनकी सेहत पर कोई खास असर नहीं हुआ है.

क्या है ‘ह्यूमन नॉकआउट’

विज्ञान की भाषा में कहें तो जब शरीर का कोई खास जीन पूरी तरह निष्क्रिय हो जाता है या गायब हो जाता है तो उसे ह्यूमन नॉकआउट (Human Knockout) कहा जाता है. आम तौर पर इंसानों में हर जीन की दो कॉपियां (एक माता से और एक पिता से) होती हैं. रक्त संबंधों में शादी होने की वजह से बच्चों को माता-पिता दोनों से एक जैसा म्यूटेशन मिलता है जिससे उनके शरीर में कोई खास जीन पूरी तरह गायब हो जाता है.

17 जून को ‘नेचर’ में छपी एक स्टडी के मुताबिक, ये निष्कर्ष सबसे बड़े दक्षिण एशियाई जीनोमिक अध्ययनों में से एक का हिस्सा हैं जिसमें देश के 1,73,303 जीनोम का आकलन किया गया. इस शोध का मकसद मानव आनुवंशिकी के विकास को समझना और इससे जरूरी दवाओं के निर्माण में मदद करना था.

स्टडी में मिले चौंकाने वाले नतीजे

कोलंबिया यूनिवर्सिटी वैगेलोस कॉलेज ऑफ फिजिशियन एंड सर्जन्स में मेडिकल साइंसेज के प्रोफेसर और ग्लोबल जीनोमिक्स के डायरेक्टर दानिश सालेहीन ने एक प्रेस रिलीज में कहा, ‘जीनोम स्टडीज में दक्षिण एशियाई लोगों की भागीदारी बहुत कम रही है. दुनिया की जनसंख्या का 25 प्रतिशत हिस्सा होने के बावजूद ग्लोबल जीनोमिक डेटाबेस में उनकी हिस्सेदारी सिर्फ 2 प्रतिशत है. लेकिन दक्षिण एशियाई जीनोम की खास विशेषताएं जो जनसंख्या के इतिहास और सांस्कृतिक रीति-रिवाजों से बनी हैं. दुनिया भर में मेडिकल क्षेत्र में ऐसी बड़ी सफलता का आधार बन सकती हैं जिनसे हर जगह के रोगी लाभान्वित हो.’

भारत में इसी तरह की एक रिसर्च ‘जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट’ में देश भर के 83 ग्रुप्स के 9,768 स्वस्थ लोगों के पूरे DNA का विश्लेषण किया गया. इसमें 4.4 करोड़ ऐसे जेनेटिक वैरिएंट्स मिले जो ग्लोबल डेटाबेस में नहीं थे जो काफी चौंकाने वाला है.

जेनेटिक रिसर्च में कमियां
कराची में सेंटर फॉर नॉन-कम्युनिकेबल डिसीजेज में सालेहीन के ‘पाकिस्तान जीनोम रिसोर्स’  शुरु किए दो दशक हो चुके हैं. उन्हें तब जो बात समझ आई थी, उसका इशारा 1960 के दशक से ही अमेरिका की अमिश समुदाय पर हुई स्टडीज कर रही थीं और वह ये है कि जिन समुदायों में चचेरे भाई-बहनों या रिश्तेदारों में शादी की दर ज्यादा होती है, वहां जेनेटिक स्टडीज के मामले में रिसर्चर्स को एक विशेष लाभ मिलता है.

…..एक ही परिवार में शादी से एक ऐसे समुदायों में जीन की बनावट एक जैसी होने के कारण दुर्लभ आनुवंशिक म्यूटेशन और उनके इंसानी शरीर पर होने वाले असर खोजना और समझना वैज्ञानिकों को बहुत आसान हो जाता है, जो सामान्य जनसँख्या में ढूंढ पाना असंभव है.

निकट संबंधी माता-पिता के बच्चों को समान जेनेटिक म्यूटेशन (आनुवंशिक उत्परिवर्तन) विरासत में मिलते हैं, जिनमें वे परिवर्तन भी शामिल हैं जिनमें कुछ जीन निष्क्रिय हो जाते हैं.ऐसे ‘नॉक आउट’ मामले वैज्ञानिकों को यह देखने का अवसर देते हैं कि एक इंसान एक विशेष जीन के बिना कैसे काम करता है और क्या कुछ ऐसे जीन हैं जिन्हें रोगों के इलाज को ‘बंद’ यानी निष्क्रिय किया जा सकता है.

अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि पाकिस्तान जीनोम रिसोर्स में शामिल 20% लोगों में कम से कम एक जीन गायब है. अध्ययन में, उन्होंने ऐसे 6,500 जीन पहचाने जो निष्क्रिय (स्विच ऑफ) हो गए थे.

सालीहीन ने कहा,कि ‘हमारे पाकिस्तान अध्ययन की विशेष बात यह है कि हम अनुसंधान में शामिल प्रतिभागियों के पास वापस जा सकते हैं और विस्तृत चिकित्सकीय जांच कर सकते हैं ताकि यह देखा जा सके कि जीन के गायब होने का व्यक्ति पर कैसा असर पड़ सकता है.’

‘नॉकआउट’ वैज्ञानिकों को क्यों हैं मौका?
अक्सर जीन से जुड़े आविष्कार तब होते हैं जब वैज्ञानिक चूहों में कुछ विशेष जीन हटाकर देखते हैं कि इससे उनके स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है.लेकिन अनुसंधान से पता चल रहा है कि इंसानों और चूहों में जीन अक्सर अलग-अलग तरह से काम करते हैं.इसी से चूहों पर असर करने वाली कई दवाएं मानव पर काम नहीं करतीं जिससे लाखों डॉलर,समय और परिश्रम नष्ट हो जाता है.

सालेहीन ने बताया,कि ‘हम ऐसे लोगों को पहचानना चाहते हैं जिनमें जीन की काम करने वाली कॉपी नहीं होती और यह देखना चाहते हैं कि क्या इसका उनके स्वास्थ्य पर कोई प्रभाव पड़ता है.’

हाल के अध्ययन में ठीक यही किया गया.

रिसर्च में सामने आया, “RXFP1 जीन”, जो पहले चूहों के हृदय के काम करने को जरूरी माना जाता था,जिन लोगों में नहीं था,उनमें कोई स्वास्थ्य समस्या नहीं दिखी .यहां तक कि PRDM9 जीन,जो चूहों की प्रजनन क्षमता को आवश्यक है,उसका मानव प्रजनन क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ा.

ऐसा अनुसंधान दवाओं की खोज और निर्माण को बहुत बड़े संकेत देता हैं.अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों में CIDEB जीन नहीं होता,वो लिवर रोगों से सुरक्षित रहते हैं.इससे पता चलता है कि CIDEB इनहिबिटर्स फैटी लिवर की बीमारी का इलाज हो सकते हैं.

कुछ मामलों में जीन की कमी डॉक्टरों को सावधान भी कर सकती है.पार्किंसंस की प्रायोगिक दवाएं अक्सर LRRK2 जीन को लक्ष्य करती हैं,लेकिन इस अध्ययन से पता चला कि जिन लोगों में यह जीन नहीं था, उन्हें किडनी की समस्याएं हुईं. अब वैज्ञानिक जानते हैं कि उन्हें पार्किंसंस की दवाएं ले रहे लोगों की किडनी के कामकाज पर नजर रखनी चाहिए.

सालेहीन ने कहा,कि ‘फार्मास्युटिकल इंडस्ट्री कई दशकों से साइड इफेक्ट्स की समस्या का सामना कर रही है. हमारा डेटाबेस कंपनियों को उन दवाओं पर लाखों डॉलर खर्च करने से बचा सकता है जिनके फेल होने की संभावना है.साथ ही ये उन्हें आगे बढ़ने को प्रोत्साहित भी कर सकता है.’

सालेहीन के दावों के विपरीत पाकिस्तान में लीवर (जिगर) की बीमारियों की दर चिंताजनक रूप से बहुत अधिक है। हालिया आंकड़ों और पाकिस्तान मेडिकल एसोसिएशन (PMA) की रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान इस समय वैश्विक स्तर पर लीवर से जुड़ी कुछ गंभीर बीमारियों के सबसे बड़े संकटों का सामना कर रहा है।
​पाकिस्तान में लीवर की बीमारी के प्रमुख आंकड़े और स्थिति निम्नलिखित हैं:
​1. हेपेटाइटिस C का दुनिया में सबसे बड़ा बोझ
​पाकिस्तान मेडिकल एसोसिएशन (PMA) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, पाकिस्तान में हेपेटाइटिस का संक्रमण बहुत तेजी से फैला है:
​हेपेटाइटिस C: पाकिस्तान में हेपेटाइटिस C के मरीजों की संख्या दुनिया में सबसे ज़्यादा है। देश में अनुमानित 98 लाख से 1 करोड़ लोग हेपेटाइटिस C के साथ जी रहे हैं। कुछ प्रांतों और क्षेत्रों में इसका प्रसार (प्रिवैलेंस रेट) 7.7% से 9% तक पहुंच गया है।
​हेपेटाइटिस B: लगभग 38 लाख से 40 लाख लोग क्रोनिक हेपेटाइटिस B से पीड़ित हैं।
​अज्ञानता: सबसे बड़ी चुनौती यह है कि संक्रमित लोगों में से केवल 25% से 30% लोग ही अपनी बीमारी से वाकिफ हैं, बाकी आबादी में इसकी जांच या निदान ही नहीं हो पाया है।
​2. मृत्यु दर और गंभीर जटिलताएं
​लीवर खराब होने (सिरोसिस) और लीवर कैंसर के कारण पाकिस्तान में हर साल बड़ी संख्या में मौतें होती हैं:
​हेपेटाइटिस वायरस और अन्य जटिलताओं के कारण पाकिस्तान में हर साल लगभग 37,000 मौतें होती हैं। ये मौतें मुख्य रूप से लीवर सिरोसिस (Liver Cirrhosis) और हेपेटोसेलुलर कार्सिनोमा (लीवर कैंसर) के कारण होती हैं।
​विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आयु-समायोजित (Age-adjusted) आंकड़ों के अनुसार, पाकिस्तान में लीवर की बीमारी से होने वाली मृत्यु दर प्रति 100,000 आबादी पर लगभग 38.05 है, जो इसे इस बीमारी से होने वाली मौतों के मामले में दुनिया में 29वें स्थान पर रखती है।
​3. फैटी लीवर और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां
​वायरल हेपेटाइटिस के अलावा, पाकिस्तान में MASLD/NAFLD (नॉन-अल्कोहलिक फैटी लीवर रोग) के मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं। इसका मुख्य कारण देश में बढ़ती मोटापे की दर, मधुमेह (डायबिटीज), खराब खान-पान और गतिहीन जीवनशैली (Lack of physical activity) है।
​बीमारी फैलने के मुख्य कारण
​असुरक्षित सुइयां और चिकित्सा उपकरण: अस्पतालों और स्थानीय क्लीनिकों में सीरिंज का दोबारा उपयोग और असुरक्षित तरीके से इंजेक्शन लगाना हेपेटाइटिस फैलने की सबसे बड़ी वजह है।
​असुरक्षित रक्त आधान (Blood Transfusion): रक्त चढ़ाने से पहले हेपेटाइटिस की सही तरीके से स्क्रीनिंग न होना।
​सैलून और नाई की दुकानें: दूषित उस्तरे (Blades) और औजारों का उपयोग।
​जागरूकता की कमी: एक शोध के अनुसार, आम आबादी में लगभग 75% लोग लीवर की बीमारी का नाम तो जानते हैं, लेकिन हेपेटाइटिस B के टीके (Vaccine) या इसके फैलने के सही कारणों के बारे में केवल 19-28% लोगों को ही अच्छी जानकारी है।
समरक्त (कजिन मैरिज) विवाह की प्रमुख स्वास्थ्य समस्याएं :
चचेरे, ममेरे या मौसेरे भाई-बहनों (First Cousins) में शादी करने को चिकित्सा विज्ञान की भाषा में ‘कॉन्सैनगुइनिटी’ (Consanguinity) या समरक्त विवाह कहा जाता है। आनुवंशिकी (Genetics) और चिकित्सा विज्ञान के दृष्टिकोण से, कजिन मैरिज से होने वाले बच्चों में गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं और जन्मजात विकारों का जोखिम सामान्य आबादी की तुलना में काफी बढ़ जाता है।
​इसके पीछे का मुख्य वैज्ञानिक कारण और प्रमुख स्वास्थ्य समस्याएं निम्नलिखित हैं:
​मुख्य वैज्ञानिक कारण: ऑटोसोमल रिसेसिव विकार
​हमारे शरीर में हर जीन की दो कॉपियां (एक माता से और एक पिता से) होती हैं। कई आनुवंशिक बीमारियां ‘रिसेसिव’ (Recessive) होती हैं, यानी वे बीमारी तब तक सामने नहीं आतीं जब तक कि बच्चे को माता और पिता दोनों से ही वह खराब जीन न मिले।
​चूंकि कजिन (जैसे चचेरे-ममेरे भाई-बहन) एक ही दादा-दादी या नाना-नानी के वंशज होते हैं, इसलिए उनके जीन में बहुत अधिक समानता होती है। यदि परिवार में कोई छुपा हुआ खराब जीन मौजूद है, तो कजिन मैरिज के कारण दोनों माता-पिता से उस खराब जीन के बच्चे में ट्रांसफर होने की संभावना बहुत बढ़ जाती है।
​कजिन मैरिज से होने वाली प्रमुख स्वास्थ्य समस्याएं
  ​1. जन्मजात आनुवंशिक विकार (Congenital Genetic Disorders)
​थैलेसीमिया (Thalassemia): यह एक गंभीर रक्त विकार है जिसमें शरीर में हीमोग्लोबिन ठीक से नहीं बनता। कजिन मैरिज वाले परिवारों में थैलेसीमिया मेजर से पीड़ित बच्चों के जन्म की दर बहुत अधिक देखी गई है।
​सिस्टिक फाइब्रोसिस (Cystic Fibrosis): यह फेफड़ों और पाचन तंत्र को गंभीर रूप से प्रभावित करने वाली एक जानलेवा बीमारी है।
​सिकल सेल एनीमिया: खून से जुड़ी एक और आनुवंशिक बीमारी, जो गंभीर दर्द और ऑर्गन डैमेज का कारण बनती है।
​2. शारीरिक और मानसिक विकलांगता
​मस्तिष्क का अधूरा विकास (Microcephaly): बच्चों का सिर सामान्य से बहुत छोटा रह जाता है, जिससे गंभीर मानसिक और शारीरिक विकलांगता (Intellectual Disability) हो सकती है।
​मेटाबॉलिक विकार (Inborn Errors of Metabolism): शरीर में भोजन को ऊर्जा में बदलने वाले एंजाइम की कमी हो जाती है, जिससे समय के साथ बच्चे के अंगों को नुकसान पहुंचता है।
​3. सुनने और देखने की अक्षमता
​जन्मजात बहरापन (Congenital Deafness): आनुवंशिक कारणों से बच्चों में बचपन से ही सुनने की क्षमता गायब हो सकती है।
​दृष्टि दोष: आंखों की पुतली या रेटिना से जुड़े विकार, जिसके कारण बच्चा अंधापन या बेहद कमजोर दृष्टि के साथ पैदा हो सकता है।
​4. शिशु मृत्यु दर और गर्भावस्था की जटिलताएं
​समय से पहले जन्म (Preterm Birth): बच्चों का समय से पहले पैदा होना या जन्म के समय वजन बेहद कम होना।
​शिशु मृत्यु दर (Infant Mortality): शोध बताते हैं कि कजिन मैरिज से होने वाले बच्चों में जन्म के पहले वर्ष के भीतर या शुरुआती बचपन में मृत्यु का जोखिम सामान्य से 2 से 3 गुना अधिक होता है।
​गर्भपात (Miscarriage) और मृत शिशु का जन्म (Stillbirth): ऐसी शादियों में गर्भपात की दर भी अपेक्षाकृत अधिक देखी जाती है।
​जोखिम का अनुपात:
चिकित्सा शोधों के अनुसार, गैर-रिश्तेदारों में शादी करने पर बच्चे में गंभीर जन्मजात दोष होने का जोखिम लगभग 2% से 3% होता है। वहीं, फर्स्ट कजिन (First Cousins) के बीच शादी होने पर यह जोखिम बढ़कर 5% से 6% (लगभग दोगुना) हो जाता है।
​बचाव और सावधानी
​यदि किसी परिवार में कजिन मैरिज की परंपरा है, तो आधुनिक चिकित्सा विज्ञान शादी या गर्भधारण से पहले ‘आनुवंशिक परामर्श’ (Genetic Counseling) और ‘प्री-मैरिटल जेनेटिक स्क्रीनिंग’ (शादी से पहले जीनों की जांच) कराने की सलाह देता है, ताकि आने वाली पीढ़ी को इन गंभीर खतरों से सुरक्षित रखा जा सके।

क्या बांग्लादेश और इंडोनेशिया में भी कजिन मैरिज का प्रचलन है?
हाँ, बांग्लादेश में कजिन मैरिज (रक्त-संबंधों में विवाह) का प्रचलन है, लेकिन इंडोनेशिया में यह बेहद दुर्लभ और न के बराबर है। दोनों देश मुस्लिम-बहुल होने के बावजूद सांस्कृतिक भिन्नताओं के कारण दोनों जगह शादियों के ट्रेंड काफी अलग हैं।

📑 देशवार स्थिति और प्रचलन दर
बांग्लादेश (औसत दर: 7% से 17%): डेटा के अनुसार बांग्लादेश में कजिन मैरिज का राष्ट्रीय औसत लगभग 17% तक दर्ज किया गया है। यहाँ के ग्रामीण और कुछ विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों (जैसे सिलेट डिवीजन या मयमनसिंह) में यह दर काफी अधिक देखी गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक सुरक्षा, दहेज से बचाव और पारिवारिक संपत्तियों को एक साथ रखने के लिए रिश्तेदारों में शादी करने की परंपरा है।

इंडोनेशिया (औसत दर: बेहद कम): इंडोनेशिया दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम आबादी वाला देश है, लेकिन यहाँ कजिन मैरिज का प्रचलन न्यूनतम स्तर पर है। इंडोनेशियाई समाज में ‘एक्सोगैमी’ (अपने कुल या परिवार से बाहर शादी करना) की मजबूत सामाजिक और पारंपरिक व्यवस्था काम करती है।

 📊 दक्षिण एशिया और वैश्विक तुलना
वैश्विक आंकड़ों की तुलना से स्पष्ट होता है कि इन देशों में इसका स्तर पाकिस्तान जितना गंभीर नहीं है:
देश
कजिन मैरिज/रक्त-संबंधी विवाह की दर
पाकिस्तान 61.2% (दुनिया में सबसे अधिक)
बांग्लादेश 17.0% (क्षेत्रीय स्तर पर भिन्नता)
भारत 7.5% (मुख्यतः दक्षिण भारतीय राज्यों में अधिक)
इंडोनेशिया बेहद न्यूनतम (डेटा का अभाव और सामाजिक रूप से नापसंद)
⚠️ स्वास्थ्य और सामाजिक प्रभाव
बांग्लादेश में हुए आनुवंशिक शोध बताते हैं कि देश में कजिन मैरिज करने वाले जोड़ों के बच्चों में 5 वर्ष से कम उम्र की मृत्यु दर (16.6%) सामान्य जोड़ों के बच्चों (5.8%) की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक है। इसके अलावा गर्भपात (Miscarriage) और आनुवंशिक विकारों का खतरा भी बढ़ता पाया गया है।

भारत के उत्तर और दक्षिणी राज्यों में कजिन मैरिज
भारत के उत्तर और दक्षिणी राज्यों में कजिन मैरिज (रक्त-संबंधी विवाह) को लेकर सांस्कृतिक और सामाजिक नियमों में जमीन-आसमान का अंतर है। उत्तर भारत में जहाँ पारिवारिक शुद्धता और गोत्र नियमों के कारण कजिन मैरिज को पूरी तरह वर्जित (Taboo) माना जाता है, वहीं दक्षिण भारत में इसे एक सम्मानित सामाजिक परंपरा और पारिवारिक रिश्तों को मजबूत करने के माध्यम के रूप में देखा जाता है।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5) के अनुसार, भारत में कुल शादीशुदा महिलाओं में से लगभग 11% अपने रक्त-संबंधियों (Blood Relatives) से विवाहित हैं, जिसमें दक्षिण भारत की हिस्सेदारी सबसे अधिक है।

📑 उत्तर बनाम दक्षिण भारत: मुख्य अंतर
विशेषता
उत्तर भारत (North India) दक्षिण भारत (South India)
सामाजिक स्वीकार्यता पूरी तरह प्रतिबंधित और सामाजिक रूप से अस्वीकार्य। अत्यधिक स्वीकृत और कई समुदायों में पहली प्राथमिकता।
विवाह के नियम गोत्र बहिर्विवाह (Gotra Exogamy): एक ही गोत्र या पैतृक वंश में शादी वर्जित है। क्रॉस-कजिन विवाह (Cross-Cousin): ममेरे/चचेरे भाई-बहनों से शादी मान्य।
प्रमुख राज्य दर (NFHS-5) उत्तर और पूर्वी राज्यों में यह दर 10% से भी कम है। तमिलनाडु (28%), कर्नाटक (27%), आंध्र प्रदेश (26%), तेलंगाना (18%)।
भौगोलिक सीमा आमतौर पर एक ही गाँव या स्थानीय क्षेत्र में शादी नहीं की जाती। अक्सर सगे रिश्तेदारों और परिचित भौगोलिक सीमाओं के भीतर शादी होती है।
🔍 दक्षिण भारत में कजिन मैरिज के सामाजिक-सांस्कृतिक कारण
क्रॉस-कजिन और पैरेलल-कजिन का अंतर: दक्षिण भारतीय संस्कृति (द्रविड़ियन परंपरा) में सगे चाचा या मौसी के बच्चों (Parallel Cousins) को सगे भाई-बहन माना जाता है। लेकिन मामा की बेटी (Mother’s Brother’s Daughter) या बुआ के बेटे/बेटी (Father’s Sister’s Children) को ‘क्रॉस-कजिन’ माना जाता है और इनसे विवाह को प्राथमिकता दी जाती है।

मामा-भतीजी विवाह: कजिन मैरिज के अलावा, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों के कुछ हिंदू समुदायों में सगे मामा और भांजी (Uncle-Niece) के बीच विवाह का भी पुराना चलन रहा है।

संपत्ति और सुरक्षा: परिवार के भीतर शादी होने से पैतृक संपत्ति बाहर नहीं जाती। लड़की को नए घर में सामंजस्य बिठाने में आसानी होती है क्योंकि वह पहले से पूरे परिवार को जानती है।

केरल का अपवाद: दक्षिण भारत के अन्य राज्यों के विपरीत, केरल में कजिन मैरिज की दर बेहद कम (केवल 1.7% से 4.4%) है, जो उत्तर भारत के ट्रेंड से मेल खाती है।
⚠️ उत्तर भारत का सख्त ‘गोत्र और सपिंड’ नियम
उत्तर भारत के हिंदू समाज में ‘सपिंड’ और ‘गोत्र’ के नियमों का कड़ाई से पालन किया जाता है। इसके तहत पिता की ओर से 5 या 7 पीढ़ियों और माता की ओर से 3 या 5 पीढ़ियों के भीतर आने वाले किसी भी रिश्तेदार से विवाह को ‘अधार्मिक’ और जैविक रूप से गलत माना जाता है। यहाँ तक कि एक ही गाँव में रहने वाले लोगों को भी सामाजिक तौर पर भाई-बहन मानकर ग्रामीण स्तर पर विवाह नहीं किए जाते।

🚨 स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता
आधुनिक चिकित्सा और जेनेटिक वैज्ञानिक दक्षिण भारत में इस उच्च दर को लेकर चिंतित हैं। आंकड़ों के अनुसार, देश में दुर्लभ आनुवंशिक बीमारियों (Rare Genetic Diseases) के कारण अस्पतालों में आने वाले लगभग 40% से 50% मरीजों में कजिन मैरिज का पारिवारिक इतिहास मिलता है। इस कारण अब दक्षिण भारत की नई और शिक्षित पीढ़ी में यह चलन धीरे-धीरे कम हो रहा है।

भारत में हिंदू कानून के तहत ‘सपिंड विवाह’ (रक्त-संबंधियों या एक ही मूल वंश में शादी) को कानूनी रूप से अमान्य और प्रतिबंधित माना गया है। हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act, 1955) के तहत कुछ खास सगे और करीबी रिश्तेदारों के बीच विवाह को तब तक अनुमति नहीं दी जाती, जब तक कि उनके समुदाय में इसकी कोई विशेष और बहुत पुरानी परंपरा न हो।📑 सपिंड विवाह से जुड़े मुख्य कानूनी प्रावधानधारा 5(v) के तहत प्रतिबंध: हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5(v) स्पष्ट रूप से कहती है कि दो हिंदू आपस में शादी नहीं कर सकते यदि वे एक-दूसरे के ‘सपिंड’ हैं। ऐसी शादियों को कानूनन शून्य (Void ab-initio) यानी शुरुआत से ही अमान्य घोषित कर दिया जाता है।पीढ़ियों की कानूनी सीमा (धारा 3(f)): कानून के अनुसार, कोई भी व्यक्ति निम्नलिखित पीढ़ियों के दायरे में शादी नहीं कर सकता:माता की ओर से: 3 पीढ़ियां (Generations) – जैसे भाई-बहन, मौसी या मामा के बच्चे।पिता की ओर से: 5 पीढ़ियां (Generations) – जैसे पिता के चचेरे/ममेरे भाई-बहनों के परिवार का दायरा।रक्त के प्रकार: यह नियम केवल सगे खून के रिश्तों पर ही नहीं, बल्कि सौतेले (Half blood), दत्तक (Adoption/गोद लिए हुए बच्चे) और अवैध (Illegitimate) पारिवारिक संबंधों पर भी समान रूप से लागू होता है।🔍 कानून में एकमात्र अपवाद: ‘कस्टम या प्रथा’यदि किसी लड़के और लड़की के समाज, जनजाति या क्षेत्र में सपिंड विवाह की कोई बहुत पुरानी और स्थापित परंपरा (Custom or Usage) है, तो कानूनन वह शादी मान्य हो सकती है।दक्षिण भारत के कई समुदायों में यह अपवाद लागू होता है क्योंकि वहाँ क्रॉस-कजिन विवाह की सदियों पुरानी सामाजिक प्रथा है।कड़ा नियम: कोर्ट में सिर्फ ‘परिजनों की सहमति’ को प्रथा नहीं माना जाता। इसके लिए ठोस और पुख्ता सबूत (Stringent Proof) देने होते हैं कि यह परंपरा लंबे समय से बिना किसी रुकावट के उनके समाज में मान्य है।⚖️ हालिया अदालती फैसला (दिल्ली हाई कोर्ट)हाल ही में नीतू ग्रोवर बनाम भारत संघ (2024) मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने सपिंड विवाह पर लगे प्रतिबंध की संवैधानिक वैधता को पूरी तरह बरकरार रखा है। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि:विवाह के लिए जीवनसाथी चुनने का अधिकार पूरी तरह अनियंत्रित नहीं हो सकता।यदि सपिंड विवाह पर नियम न बनाए जाएं, तो समाज में अनाचारपूर्ण (Incestuous) रिश्तों को बढ़ावा मिलेगा।यह प्रतिबंध समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) का उल्लंघन नहीं करता है।🚨 सजा का प्रावधानयदि कोई जोड़ा बिना किसी स्थापित सामाजिक प्रथा के जानबूझकर सपिंड विवाह करता है, तो हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 18 में उन्हें 1 महीने तक की जेल, ₹1,000 का जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है।

विशेष विवाह अधिनियम, 1954′ (Special Marriage Act, 1954) में सीधे तौर पर ‘सपिंड’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है, लेकिन इसके स्थान पर ‘निषिद्ध संबंधों की डिग्री’ (Degrees of Prohibited Relationship) लागू होती है। चूँकि यह एक धर्मनिरपेक्ष (Secular) कानून है जो सभी धर्मों के नागरिकों पर लागू होता है, इसलिए इसमें हिंदू कानून की तरह ‘सपिंड’ (3 और 5 पीढ़ी के नियम) की तकनीकी परिभाषा न देकर, प्रतिबंधित रिश्तेदारों की एक स्पष्ट सूची (First Schedule) दी गई है।

 

विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत यदि कोई जोड़ा निषिद्ध संबंधों (Prohibited Relationships) के नियमों का उल्लंघन करके शादी करने की कोशिश करता है, तो कानून में इसके खिलाफ आपत्ति दर्ज कराने की एक स्पष्ट प्रक्रिया दी गई है।इस कानून की सबसे बड़ी विशेषता इसका 30 दिनों का नोटिस पीरियड है, जो किसी भी गलत या गैर-कानूनी विवाह को रोकने का अवसर देता है।📑 शादी पर आपत्ति (Objection) दर्ज कराने की कानूनी प्रक्रिया30-दिन का सार्वजनिक नोटिस (धारा 6): जब कोई जोड़ा कोर्ट मैरिज के लिए आवेदन करता है, तो मैरिज ऑफिसर (विवाह अधिकारी) उस नोटिस की एक प्रति अपने कार्यालय के एक स्पष्ट स्थान (Notice Board) पर लगाता है।आपत्ति दर्ज कराने की समय-सीमा (धारा 7): नोटिस प्रकाशित होने के दिन से लेकर अगले 30 दिनों के भीतर कोई भी व्यक्ति उस शादी पर लिखित आपत्ति दर्ज करा सकता है।आपत्ति का आधार: आपत्ति केवल तभी मान्य होती है जब वह कानून की धारा 4 में दी गई शर्तों के उल्लंघन पर आधारित हो (जैसे—जोड़ा आपस में फर्स्ट कजिन या निषिद्ध रिश्ते में हो, पहले से शादीशुदा हो, या उनकी उम्र कानूनी रूप से कम हो)।🔍 विवाह अधिकारी (Marriage Officer) की जांच और शक्तियांशादी पर रोक (धारा 8): आपत्ति दर्ज होते ही मैरिज ऑफिसर शादी की प्रक्रिया को तुरंत रोक देता है। कानूनन उसे आपत्ति दर्ज होने के 30 दिनों के भीतर मामले की जांच पूरी करनी होती है।सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां (धारा 9): जांच के लिए मैरिज ऑफिसर के पास सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां होती हैं। वह गवाहों को समन भेज सकता है, उनसे शपथ पर बयान ले सकता है और दस्तावेज़ (जैसे जन्म प्रमाण पत्र या पारिवारिक वंशावली) मंगवा सकता है।अंतिम निर्णय: यदि जांच में आपत्ति सही पाई जाती है (उदा. जोड़ा वास्तव में निषिद्ध सपिंड रिश्ते से है और उनके यहाँ ऐसी कोई प्रथा नहीं है), तो मैरिज ऑफिसर शादी को रजिस्टर्ड करने से साफ इनकार कर देता है।⚖️ फैसले के खिलाफ अपील करने का अधिकारयदि मैरिज ऑफिसर किसी आपत्ति को स्वीकार कर लेता है और शादी से मना कर देता है, तो पीड़ित जोड़े के पास कानूनन अपील करने का अधिकार होता है:जोड़ा मैरिज ऑफिसर के फैसले के खिलाफ 30 दिनों के भीतर जिला अदालत (District Court) में अपील दायर कर सकता है।जिला अदालत का फैसला इस मामले में अंतिम और सर्वोपरि माना जाता है।

🚨 झूठी आपत्ति दर्ज कराने पर जुर्माना

यदि कोई व्यक्ति दुर्भावनावश या जोड़े को परेशान करने के लिए झूठी और निराधार आपत्ति दर्ज कराता है, तो मैरिज अधिकारी उस व्यक्ति पर ₹1,000 तक का जुर्माना लगा सकता है, जो सीधे पीड़ित जोड़े को मुआवजे के रूप में दिया जाता है।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *