नंदा की चौकी पुल एप्रोच धंसाव: प्रारंभिक जांच में कंसल्टेंट और IIT रूड़की दोषी
देहरादून पुल धंसाव मामला: IIT और कंसल्टेंट की बड़ी चूक, जांच रिपोर्ट में खुले कई राज
नंदा की चौकी पुल की एप्रोच रोड धंसाव मामले की जांच रिपोर्ट सौंप दी गई है, जिसमें डिजाइन में सुरक्षा उपायों की कमी पाई गई है। जांच में मुख्य जिम्मेदारी कंसल्टेंट और आईआईटी बीएचयू की तय की गई है, साथ ही लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों पर भी सवाल उठे हैं।
पुल के डिजाइन में सुरक्षा उपायों की कमी मिली।
मुख्य जिम्मेदारी कंसल्टेंट और आईआईटी बीएचयू की तय।
लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल।
देहरादून। नंदा की चौकी के पुल की एप्रोच रोड पर धंसाव मामले की जांच क्षेत्रीय मुख्य अभियंता दयानंद ने पूरी कर दी है। इसके साथ ही जांच रिपोर्ट शनिवार को उच्चाधिकारियों के सुपुर्द कर दी गई है। जांच रिपोर्ट में क्या-क्या दर्ज किया गया है, इसे अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है। लेकिन, सूत्रों के हवाले से जो बातें बाहर आई हैं, उसके अनुसार पुल की सुरक्षा के आवश्यक इंतजाम डिजाइन से गायब पाए गए।
पुराने पांवटा साहिब राजमार्ग पर टौंस नदी स्थित नंदा की चौकी का पुल 15 सितंबर 2025 की मध्य रात्रि को अतिवृष्टि के दौरान क्षतिग्रस्त हो गया था। लंबी कसरत के बाद इसका संचालन 12 जुलाई 2026 की सुबह तब शुरू किया गया, जब टौंस नदी की अस्थाई पुलिया तेज बहाव में ढह गई थी। कुछ दिन तो सब ठीक रहा, मगर 28 जुलाई की सुबह करीब पांच बजे पुल की एप्रोच रोड धंस गई। हालांकि, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सख्ती के बाद 12 घंटे में एप्रोच रोड का धंसाव दूर कर यातायात बहाल कर दिया गया था।
लेकिन, इस धंसाव के कारणों की पड़ताल और जिम्मेदारी तय करने के लिए क्षेत्रीय मुख्य अभियंता को जांच सौंप दी गई थी।
जांच में उन्होंने पाया कि टौंस नदी का बहाव एकतरफा एप्रोच रोड की दिशा में होने से यह स्थिति पैदा हुई। इसके लिए काफी हद तक अस्थाई पुलिया के अवशेष भाग को न हटाया जाना और नदी क्षेत्र में बनी एक गौशाला को माना गया।
बताया जा रहा है कि जांच रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि नदी की धारा पूर्व से ही असमान्य रूप से परिवर्तित थी। ऐसे में पुल के डिजाइन में इसको लेकर सुरक्षा के कोई प्राविधान नहीं किए गए थे। कंसलटेंट के डिजाइन को जब आइआइटी बीएचयू को परीक्षण के लिए भेजा गया तो वहां से भी इस दिशा में कोई सुझाव नहीं दिए गए और इसे उपयुक्त बता दिया गया। लिहाजा, प्रमुख रूप से कंसल्टेंट और आइआइटी की जिम्मेदारी तय की गई है।
अफसरों पर भी तय हो सकती है जिम्मेदारी
जांच रिपोर्ट सौंप दिए जाने के बाद यह कहा जाने लगा है कि पुल के डिजाइन को लेकर लोनिवि के जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका को दरकिनार नहीं किया जा सकता। क्योंकि, किसी भी डिजाइन पर अंतिम निर्णय अधीक्षण अभियंता या अन्य अहम अभियंताओं जैसे अफसरों का होता है। उन्हें तय करना होता है कि सुरक्षा के क्या-क्या इंतजाम डिजाइन में शामिल होने चाहिए। यह निर्णय अकेले कंसल्टेंट पर नहीं छोड़ा जा सकता।
जिस अतिवृष्टि से पुल टूटा, उसी को डिजाइन में जगह नहीं
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि बीते मानसून में पुल किस तरह नदी के अत्यधिक तेज बहाव की भेंट चढ़ गया है। ऐसे में पुल के पुनर्निर्माण में इस दिशा में अतिरिक्त प्राविधान करने की जरूरत थी। लेकिन, जांच रिपोर्ट में इन्हीं उपायों का अभाव अधिकारियों की दूरदर्शिता को कठघरे में खड़ा करता है।
सुरक्षा दीवार आगे करने पर भी सवाल
इस दौरान एक बात यह भी निकलर आई कि टौंस नदी पर पुल क्षेत्र में बनाई गई पुरानी दीवार पीछे थी, जो नदी की वास्तविक चौड़ाई के हिसाब से थी। वहीं, पुल के पुनर्निर्माण के दौरान सुरक्षा दीवार को कई मीटर आगे कर दिया गया। इससे नदी की वास्तविक चौड़ाई भी प्रभावित हुई।
बताया जा रहा है कि नई दीवार के पीछे रास्तेनुमा जगह बाख गई है। जिसका प्रयोग आसपास के निर्माणों के लिए कराया जा सकता है। यदि ऐसा है तो यह भी गंभीर मामला नजर आता है। क्योंकि, नदी के कैचमेंट में इस तरह के हस्तक्षेप भविष्य में भी भारी पड़ सकते हैं।


