छात्रों की गूंज कैसे बन गई दिल्ली विवि छात्रसंघ में कांग्रेस का सन्नाटा?
क्यों DUSU में ABVP की जीत से ज्यादा हैं NSUI की हार के चर्चे, सन्नाटे में बदली ‘गूंज’
NSUI के दो विद्रोहियों दीपांशु शौकीन और विशेष यादव ने पलीता लगाकर दिल्ली विश्वविद्यालय में NSUI की ‘गूंज’ को सन्नाटे में बदल दिया.
नई दिल्ली 20 सितंबर 2026। छात्रों की गूंज कार्यक्रम में जब राहुल गांधी इंदौर में स्टैंडअप कामेडियन पुलकित मणि के साथ मिमिक्री करके तालियां बजवा रहे थे. ठीक तभी दिल्ली विश्वविद्यालय के नार्थ कैंपस में विवेकानंद मूर्ति के नीचे ABVP का उत्सव चल रहा थ. चार दिन पहले तक दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ और नार्थ कैंपस में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद 2012 के बाद अपना सबसे मुश्किल छात्रसंघ का चुनाव लड़ रही थी. लेकिन शनिवार को जब रिज़ल्ट आया तो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद NSUI को चारों खाने चित कर चुकी थी. तो क्या ‘छात्रों की गूंज’ से युवाओं को अपनी ओर खींचने की राहुल गांधी की कोशिश अपने ही घर में फेल हो गई है.
आइए इसे परिणामों से समझने की कोशिश करते हैं. आंकड़ें देखें तो दिल्ली विश्वविद्यालय में 2025 में NSUI को मात्र 1 सीट यानि उपाध्यक्ष का पद मिला था. लेकिन इस बार NSUI जीरो पर सिमट गई. मोटे तौर पर छात्रों की गूंज दिल्ली विश्वविद्यालय आते-आते ख़ामोश हो गई. छात्रों की गूंज दिल्ली विश्वविद्यालय के जातिगत राजनीति नहीं भेद पाई, जिसकी उम्मीद NSUI के रणनीतिकारों ने लगाई थी. 2025 के छात्र संघ चुनाव में NSUI ने दो जाट और दो गुर्जर उम्मीदवारों को टिकट दिया था. लेकिन इस बार NSUI ने एक नया प्रयोग करते हुए विजय मीणा दलित छात्र को अध्यक्ष के पद पर, पंजाबी उम्मीदवार वीर चतरथ को उपाध्यक्ष पद पर, जाट उम्मीदवार नम्रता चौधरी को सचिव पद पर और संयुक्त सचिव पद पर फिर जाट उम्मीदवार गोपाल चौधरी को उतारा. यानि कांग्रेस से दो जाट, 1 पंजाबी और एक दलित चुनावी मैदान में थे.
NSUI के इस जातिगत समीकरण पर NSUI के दो बागी दीपांशु शौकीन और विशेष यादव ने पलीता लगाकर दिल्ली विश्वविद्यालय में NSUI की ‘गूंज’ सन्नाटे में बदल दी. दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्रों की गूंज विफल होने की एक झलक पिछले साल और इस साल के वोटों से भी लगा सकते हैं. 2025 में उपाध्यक्ष पद पर राहुल झांसी को करीब 29300 वोट मिले थे, लेकिन इस साल NSUI के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार विजय मीणा को 21390 वोट पाकर संतोष करना पड़ा. अब सवाल उठता है कि Genz आंदोलन और सत्य निकेतन में PG गिरने से हुई मौत पर छात्रों की नाराज़गी को कैंपस में NSUI क्यों नहीं भुना पाई.
उम्मीदवार के मसले पर क्यों कमजोर रही NSUI
दरअसल NSUI अब भी ABVP के मुक़ाबले ना तो बेहतर उम्मीदवार दे पा रही है ना ही छात्रों के मुद्दे पर सही तरह से लड़ पा रही है. इसकी एक झलक NOTA में दिख रही है. DUSU के चुनाव में पिछले साल NOTA पर 23674 वोट पड़े थे. इस बार बढ़कर 23942 वोट पड़े. NSUI ने इस बार NEET और Hostel की कमी का मुद्दा जोरशोर से उठाया, लेकिन NEET परीक्षा रद्द के खिलाफ प्रदर्शन में नियमित हिस्सा लेने वाले और सत्य निकेतन पीजी मामले में नंगे पैर चलने वाले दीपांशु शौकीन का पत्ता ही काट दिया गया. इससे कैंपस के छात्रों के बीच ये संदेश गया कि NSUI मुद्दों के लिए संघर्ष करने वाले छात्र नेता की जगह बड़े नेता के बच्चे को ज्यादा तरजीह देती है. लेकिन इस पूरे चुनाव में NSUI के लिए सांत्वना पुरस्कार (consolation prize ) यही है पहली बार है अध्यक्ष के पद पर जाट की जगह एक दलित को अपना उम्मीदवार बनाकर जातिगत राजनीति से ऊपर उठने की कोशिश की गई. सवाल यही है क्या दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ में NSUI के हार की इस गूंज से कांग्रेस भी सबक लेगी?
DUSU चुनाव में NSUI की करारी हार की वजह बनी ये एक बड़ी चूक, कांग्रेस समर्थकों को भारी मलाल
Read In AppDUSU चुनाव में NSUI की करारी हार की वजह बनी ये एक बड़ी चूक, कांग्रेस समर्थकों को भारी मलालडूसू छात्रसंघ चुनाव में कांग्रेस के छात्र संगठन को मिली करारी हार के पीछे पार्टी के एक भूल को सबसे अहम वजह बताया जा रहा है. कांग्रेस के कई समर्थक भी इस भूल को ही हार की सबसे बड़ी वजह बता रहे हैं.
NSUI की करारी हार का कारण एक बड़ी चूक, कांग्रेस समर्थकों को भारी मलाल
दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव (DUSU Elections) में कांग्रेस के छात्र संघ NSUI को सेंट्रल पैनल की चारों सीट अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव पद पर हार का मुंह देखना पड़ा. हालांकि काउंटिंग में कई बार ऐसे मौके आए, जब NSUI लीड कर रही थी. लेकिन गिनती पूरी होते ही पूरी तस्वीर साफ हो गई. NSUI का सूपड़ा साफ. कांग्रेस के छात्र संगठन को मिली यह करारी हार पार्टी के समर्थकों को बहुत चुभ रही है. कारण कुछ दिनों पहले ही इसी दिल्ली में नीट पेपर लीक के खिलाफ छात्रों का जबरदस्त प्रदर्शन हुआ था. जंतर-मंतर प्रदर्शन के बाद उम्मीद थी कि नतीजे सत्ता और सरकार समर्थित छात्र संगठन के खिलाफ जाएंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने चार में तीन सीटों पर जीत हासिल की.
DUSU चुनाव में NSUI की हार की सबसे बड़ी वजह
डूसू छात्रसंघ चुनाव में कांग्रेस के छात्र संगठन को मिली करारी हार के पीछे पार्टी की एक भूल सबसे बडा कारण बताया जा रहा है. कांग्रेस के कई नेता-कार्यकर्ताओं के साथ-साथ बड़ी संख्या में समर्थक भी इस भूल को ही हार की सबसे बड़ी वजह बता रहे हैं.
एक नजर में DUSU चुनाव नतीजा
अध्यक्षः ABVP के यश डबास ने NSUI के विजय शंकर मीणा को हराया. यश डबास को कुल 24,576 वोट मिले, जबकि मीणा को 22,523 वोट प्राप्त हुए. डबास 2,053 वोटों के अंतर से अध्यक्ष पद जीते.
उपाध्यक्षः निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन ने 30,615 वोट पा उपाध्यक्ष पद जीता. ABVP के इशु मौर्या 16910 वोट से दूसरे नंबर पर रहे, जबकि NSUI के वीर चतरथ मात्र 4313 वोट पा सके. शौकीन को NSUI ने टिकट नहीं दिया तो उन्होंने स्वतंत्र चुनाव लड़ा.
सचिवः ABVP की रिया छावड़ी एकतरफा जीती. उन्हें 21,650 वोट मिले, जबकि NSUI के उम्मीदवार को मात्र 14,869 वोट.
संयुक्त सचिव: ABVP के लक्ष्य राज सिंह 16,615 वोट पा जीते. इस पद पर कड़ा मुकाबला हुआ । समाजवादी छात्र सभा के विशेष यादव 15,778 वोटों से दूसरे स्थान जबकि NSUI के गोपाल चौधरी 15,206 वोट पा तीसरे स्थान पर रहे.
कांग्रेस से कहां हुई चूक?
दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव की सुगबुगाहट शुरू हुई, तब NSUI लीडर थी. जंतर-मंतर प्रदर्शन और चुनाव के बीच सत्य निकेतन दुर्घटना ने संगठन को और ताकत दी. लेकिन उम्मीदवार चयन में कांग्रेस से वो ब्लंडर चूक हुई, जिसमें सारे किए-कराए पर पानी फेर दिया. उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय और सबसे बड़ी जीत दर्ज करने वाले दीपांशु शौकीन NSUI के ही कार्यकर्ता हैं.
दीपांशु शौकीन को टिकट नहीं देना बड़ी गलती
दीपांशु खुद चार साल से NSUI से छात्रों की आवाज उठा कर रहे थे. उन्होंने पिछली बार भी चुनाव लड़ने की कोशिश की थी. लेकिन कमजोर आर्थिक बैकग्राउंड से आने वाले दीपांशु को पिछले साल टिकट नहीं मिला. हालांकि संगठन ने कहा था कि उनकी मेहनत का इनाम उन्हें जरूर मिलेगा. अब बात इस साल के चुनाव की. दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव 2026 को दीपांशु शौकीन ने पूरी तैयारी कर रखी थी. दावा है कि NSUI ने उनके नाम की घोषणा भी कर दी थी.
कांग्रेस मुख्यालय के प्रभारी मनीष चतरथ के बेटे को मिला टिकट
लेकिन फिर बाद में NSUI ने दीपांशु शौकीन को हटाकर वीर चतरथ को टिकट दे दिया. यहीं कांग्रेस की सबसे बड़ी भूल सिद्ध हुई. वीर चतरथ कांग्रेस मुख्यालय प्रभारी मनीष चतरथ के बेटे हैं. उनका मजबूत आर्थिक बैकग्राउंड है. परिवार कांग्रेस से लंबे समय से जुड़ा है. राहुल गांधी के साथ उनके परिजनों की खूब तस्वीरें है. लेकिन वीर चतरथ को टिकट देना कांग्रेस का अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा फैसला सिद्ध हुआ.
कांग्रेस मुख्यालय के प्रभारी मनीष चतरथ और उनके बेटे वीर के साथ राहुल गांधी की पुरानी तस्वीर.
Photo Credit: सोशल मीडिया
नंगे पैर कैंपस में घूम-घूम कर दीपांशु ने किया प्रचार
दीपांशु शौकीन निर्दलीय चुनाव में कूद पड़े. 4 साल से उनके काम से छात्र उन्हें पहचान रहे थे. इसी बीच सत्य निकेतन में पीजी गिरने वाली दुर्घटना हो गयी. दीपांशु ने बढ़-चढ़कर छात्रों की मदद की. फिर उन्होंने इस दुर्घटना में जान गंवाने वाले छात्रों को न्याय के लिये चप्पल-जूता तक त्याग दिया. नंगे पैर कैंपस में घूम-घूम कर प्रचार करने लगे.
‘राजा का बेटा ही राजा बनेगा’ वाला नैरेटिव
दीपांशु एक सामान्य परिवार से हैं. उनके पिता DTC के डेली वेज वाले कंडक्टर हैं. लेकिन बतौर छात्र नेता वो वीर चतरथ से कही अच्छे थे. दीपांशु का टिकट कटने से यह नैरेटिव बना कि ‘राजा का बेटा ही राजा बनेगा’, यह दस्तूर कांग्रेस में अब भी कायम है. इस नैरेटिव ने छात्रों को दीपांशु के पक्ष में गोलबंद किया. यह गोलबंदी केवल दीपांशु के लिए ही नहीं हुई, अध्यक्ष और सचिव पद के लिए भी हुआ. NSUI दोनों पद पर हार गई.
विशेष यादव को भी NSUI ने नहीं दिया मौका
दीपांशु जैसी कहानी ही विशेष यादव की भी है. विशेष यादव भी NSUI की ओर से टिकट के प्रबल दावेदार थे. लेकिन उन्हें भी मौका नहीं दिया गया. बाद में विशेष यादव निर्दलीय उतरे, उन्हें समाजवादी छात्र सभा ने अपना समर्थन दिया. फिर जब ज्वाइंट सेक्रेटरी का रिजल्ट आया तो विशेष यादव NSUI के उम्मीदवार से ज्यादा वोट हासिल कर दूसरे पर नजर आए. कांग्रेस समर्थकों का दावा है कि यदि दीपांशु शौकीन और विशेष यादव को मौका दिया गया होता तो DUSU चुनाव के नतीजे कुछ और होते.
कन्हैया कुमार कांग्रेस में ‘हीरो’ से कैसे बन गए ‘विलेन’? डूसू चुनाव में NSUI की करारी हार से उठे 5 सवाल
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) चुनाव में एनएसयूआई की शर्मनाक हार के बाद कांग्रेस के भीतर घमासान मच गया है. सूत्रों के मुताबिक, टिकट बंटवारे में हुए भारी ब्लंडर को लेकर राहुल गांधी ने सख्त रुख अपनाया है और प्रभारी कन्हैया कुमार को शीर्ष नेतृत्व की नाराजगी का सामना करना पड़ा है. देखते ही देखते कन्हैया कुमार कांग्रेस में ‘हीरो’ से ‘विलेन’ बनने के कगार पर आ गए हैं. जानिए डूसू चुनाव हार के बाद राहुल गांधी किस-किस को लताड़ा.
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव 2026 के नतीजों ने कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई के भीतर एक बड़े राजनीतिक भूचाल को जन्म दे दिया है. कभी छात्र राजनीति और वामपंथी आंदोलन से निकलकर कांग्रेस के पोस्टर बॉय बने कन्हैया कुमार अब एनएसयूआई के प्रभारी के तौर पर इस हार के सबसे बड़े निशाने पर आ गए हैं. सूत्रों के हवाले से यह बड़ा दावा सामने आया है कि डूसू में एनएसयूआई के बेहद खराब प्रदर्शन और गलत उम्मीदवार चयन को लेकर कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल को फोन कर अपनी सख्त नाराजगी जताई. इसके बाद बुलाई गई एक आपातकालीन समीक्षा बैठक में कन्हैया कुमार को के सी वेणुगोपाल ने कड़ी फटकार लगाई है. कन्हैया कुमार को कई सवालों का जवाब भी मांगा गया है.
दीपांशु शौकीन की जीत सिर्फ इसलिए असाधारण नहीं है कि उन्होंने एनएसयूआई के उम्मीदवार को हराया. वह डूसू के केंद्रीय पैनल में करीब 17 साल बाद आने वाले स्वतंत्र उम्मीदवार हैं और उपाध्यक्ष पद जीतने वाले पहले स्वतंत्र उम्मीदवार बताए गए हैं. दीपांशु की पृष्ठभूमि भी इस चुनाव को अलग रंग देती है. दीपांशु के पिता डीटीसी बस कंडक्टर हैं और उनकी मां आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं. वह दिल्ली के पीरागढ़ी इलाके से आते हैं और शहीद भगत सिंह कॉलेज से पढ़ाई करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी के बौद्ध अध्ययन विभाग में पोस्टग्रेजुएशन कर रहे हैं. सत्या निकेतन में हॉस्टल-पीजी बिल्डिंग हादसे के बाद छात्र सुरक्षा और आवास का मुद्दा भी उनके अभियान में प्रमुख रहा. उन्होंने छात्रों के मुद्दों को लेकर अपने अभियान को आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाया.
कन्हैया कुमार को यह बड़ा राजनीतिक झटका
दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन चुनाव 2026 के नतीजों से कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई के सामने कई गंभीर सवाल खड़े हैं. चुनाव में एनएसयूआई केंद्रीय पैनल की एक भी सीट नहीं जीत सकी. एबीवीपी ने चार में से तीन पद जीते, सबसे बड़ा उलटफेर उपाध्यक्ष पद पर हुआ, जहां एनएसयूआई से टिकट न मिला तो निर्दलीय मैदान में उतरे दीपांशु शौकीन ने बड़ी जीत पाई.
दीपांशु को 30,615 वोट , जबकि एबीवीपी के इशू मौर्य को 16,910 और एनएसयूआई के वीर छत्रथ को सिर्फ 4,313 वोट मिले. दीपांशु ने दूसरे नंबर पर रहे उम्मीदवार को 13,705 वोटों से हराया. खास बात यह है कि वह लंबे समय तक एनएसयूआई से जुड़े रहे और 2025 व 2026 में संगठन से टिकट पाने की कोशिश कर चुके थे.
दीपांशु की जीत ने बदल दिया पूरा नैरेटिव
डूसू चुनाव घोषणा के साथ ही एनएसयूआई में टिकट बंटवारे पर गुटबाजी और असंतोष चरम पर था. कन्हैया कुमार पर आरोप लगे कि उन्होंने ज़मीनी पकड़ वाले कई अनुभवी और लोकप्रिय छात्र नेताओं की अनदेखी कर अपने पसंद के पैराशूट उम्मीदवार उतारे. संयुक्त सचिव पद के सशक्त दावेदार विशेष यादव को एनएसयूआई ने टिकट नहीं दिया. तब विशेष यादव ने समाजवादी छात्रसभा से चुनाव लड़ 15,778 वोट पा एनएसयूआई को तीसरे नंबर पर धकेल दिया.
बागी दीपांशु शौकीन की जीत ने बढ़ाई कन्हैया की मुश्किलें
अध्यक्ष पद को दावेदारी ठोक रहे लोकप्रिय छात्र नेता दीपांशु शौकीन को कन्हैया कुमार और केंद्रीय टीम ने किनारे कर दिया. टिकट कटने से नाराज दीपांशु शौकीन एनएसयूआई से बगावत कर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतर गए. चुनाव परिणामों में दीपांशु शौकीन ने न केवल ऐतिहासिक जीत पाई, बल्कि उन्होंने एबीवीपी और एनएसयूआई के आधिकारिक उम्मीदवारों को भारी अंतर से हराया. निर्दलीय की इस प्रचंड जीत ने एनएसयूआई नेतृत्व और कन्हैया कुमार के रणनीतिक कौशल की पोल खोलकर रख दी.
राहुल गांधी का फोन और मीटिंग में क्या हुआ?
डूसू चुनाव नतीजे आते ही राहुल गांधी ने संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल को फोन किया. इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम से पहले वेणुगोपाल और राहुल गांधी में बात हुई. राहुल गांधी ने हार पर वेणुगोपाल से जमीनी फीडबैक न लेने पर सवाल उठाए. देर रात केसी वेणुगोपाल ने कन्हैया कुमार सहित कई नेताओं के साथ बैठक कर हार की समीक्षा की. सूत्रों के अनुसार बैठक में वेणुगोपाल ने कन्हैया कुमार को कठोर निर्देश देते हुए पांच सवाल पूछे हैं.
डूसू चुनाव में एनएसयूआई के चारों सीट हारने से राहुल गांधी नाराज बताए जा रहे हैं. (फाइल फोटो)
‘हीरो’ से ‘विलेन’ बनने की राह पर कन्हैया?
बैठक में कन्हैया कुमार पर मनमाने ढंग से टिकट बांटने और जीतने वाले बागी उम्मीदवार दीपांशु शौकीन को किनारे करने का सीधा आरोप लगा. जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू करने वाले कन्हैया कुमार को कांग्रेस ने देश भर में युवा मतदाताओं को आकर्षित करने की जिम्मेदारी सौंपी थी. हालांकि, दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे देश के सबसे बड़े छात्र राजनीति के मंच पर इस तरह की करारी हार और आंतरिक बगावत ने उनके नेतृत्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं कि जब निर्दलीय प्रत्याशी अपनी दम चुनाव जीत सकता है, तो आधिकारिक संगठन की ऐसी दुर्दशा का जिम्मेदार प्रभारी का गलत आकलन ही है. डूसू चुनाव में एबीवीपी की बढ़त और निर्दलीय दीपांशु शौकीन की जीत ने एनएसयूआई के भीतर दरारें चौड़ी कर दी हैं. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि राहुल गांधी की चेतावनी के बाद क्या कन्हैया कुमार को एनएसयूआई प्रभारी पद से हटाया जाता है या उन्हें अपनी रणनीति सुधारने का एक और मौका मिलता है.


