अंदर की बात: दिल्ली विवि छात्रसंघ चुनाव में जाट-गूजर समीकरण कैसे रहा हावी?

DUSU में जाट-गुर्जर समीकरण लगातार क्यों पड़ता है भारी, पूर्वांचल के छात्र कैसे पड़ रहे कमजोर

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (DUSU) चुनाव में छात्र राजनीति के नए समीकरण सामने आए है. जाट-गुर्जर का दबदबा दिखाई दिया, जबकि पूर्वांचली वोटर कमजोर रहे. चुनाव में ‘दिल्‍ली किसकी जाटों की’ के पोस्‍टर भी नजर आए.
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (DUSU) चुनाव 2026 में ABVP लगभग क्लीन स्वीप कर दिया. चार में सिर्फ एक पद उपाध्यक्ष पर निर्दलीय लड़े दीपांशु शौकीन ने जीत दर्ज की. एबीवीपी के यश डबास अध्‍यक्ष, रिया छावड़ी सचिव और लक्ष्य राज सिंह संयुक्त सचिव बने. इस चुनाव में सबसे बड़ी हार NSUI की हुई जो एक सीट भी नहीं जीत सकी.

DUSU चुनाव परिणाम ने DU की छात्र राजनीति को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं. पिछले डेढ़ दशक में जातीय समीकरण कितने प्रभावी हुए? चुनाव में जाट उम्मीदवारों का दबदबा क्यों बढ़ा? 2008-09 के बाद एक भी महिला अध्यक्ष क्यों नहीं बनी? बागी उम्मीदवारों, Gen Z आंदोलन और पूर्वांचली वोटरों ने चुनाव में कितना असर डाला? लेफ्ट की पकड़ क्यों कमजोर हुई और ‘DU के बाबाओं’ की भूमिका कितनी अहम रही? चुनाव के नतीजों को समझने के लिए इन सभी पहलुओं को एक साथ में देखना जरूरी है, तो आइए सिलसिलेवार तरीके से जानते हैं.

DUSU चुनाव में महाराजा सूरजमल के पोस्टर दिखाई दिए.
15 साल में बदला जातीय समीकरण
2008-09 के बाद DUSU की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला. जाट और फिर गुर्जर समुदाय की छात्र राजनीति में सक्रियता और प्रभाव लगातार बढ़ा. छात्र संगठनों ने उम्मीदवारों को टिकट देते समय जातीय समीकरण पर भी फोकस किया. पिछले एक दशक से ज्यादा के चुनावों में प्रमुख संगठनों के उम्मीदवार चयन में यह पहलू दिखाई देता है. 2026 के चुनाव में भी अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद पर जाट उम्मीदवारों की जीत हुई.

यश डबास-दीपांशु की जोड़ी पर उठे सवाल
DUSU चुनाव के दौरान यश डबास और दीपांशु शौकीन के बीच किसी अंदरूनी समझ या गठजोड़ की चर्चा भी हुई. हालांकि, दोनों ने इसे खारिज किया. लेकिन प्रचार के दौरान दोनों के पर्चे एक साथ बांटे जाने और उनके समर्थकों के बीच समान नारों को लेकर सवाल जरूर उठे.

यह चर्चा चुनाव के बाद भी तब तेज हुई, जब काउंटिंग सेंटर से निकलने के बाद दीपांशु और फिर यश डबास के समर्थकों के बीच ‘दिल्ली किसकी… जाटों की’ जैसे नारे सुनाई दिए. साथ ही महाराजा सूरजमल के पोस्टर दिखाई दिए. हालांकि, बाद में ABVP के अन्य उम्मीदवारों के पहुंचने पर ये पोस्टर हटाकर नारे भी बदल दिए गए.
NSUI का टिकट और दीपांशु की बगावत
चुनाव में दीपांशु शौकीन की कहानी टिकट वितरण से ही शुरू हो गई थी. चर्चा थी कि NSUI उन्हें अध्यक्ष पद के लिए टिकट देना चाहती थी, जबकि दीपांशु उपाध्यक्ष पद से चुनाव लड़ना चाहते थे. इसकी एक वजह यह भी बताई गई कि अध्यक्ष पद पर यश डबास के मैदान में होने के कारण दोनों जाट उम्मीदवारों का एक ही पद पर आमना-सामना न हो.

NSUI से टिकट न मिलने और नामांकन वापस लेने के दबाव के बाद दीपांशु ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया. नतीजों में यही बगावत सबसे बड़े उलटफेर में बदल गई. उन्होंने उपाध्यक्ष पद पर 30,615 वोट हासिल किए और बड़ी जीत दर्ज.

पूर्वांचली वोट और इशू मौर्या की चुनौती
DU की राजनीति में लंबे समय से पूर्वांचली उम्मीदवार को लेकर भी चर्चा रही है. इस बार ABVP ने वाराणसी से आने वाले इशू मौर्या को मैदान में उतारा. चुनाव से पहले उनके प्रदर्शन को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे थे, लेकिन नतीजे उन उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहे.

खासतौर पर आउटर दिल्ली के उन कॉलेजों में, जहां जाट छात्र मतदाताओं की संख्या अधिक मानी जाती है, वहां इशू को अपेक्षित समर्थन नहीं मिला. चर्चा है कि चुनाव के दौरान यूपी-बिहार से जुड़े छात्र बड़ी संख्या में मतदान के लिए नहीं निकले.

चुनाव में जीत के बाद की तस्‍वीर.
नूपुर शर्मा के बाद से महिला अध्यक्ष का इंतजार
DUSU की राजनीति में महिला प्रतिनिधित्व को लेकर भी बड़ा सवाल उठ रहा है. 2008 में ABVP की नूपुर शर्मा के अध्यक्ष बनने के बाद से कोई भी महिला DUSU अध्यक्ष नहीं बनी है. DUSU के इतिहास में महिला अध्यक्षों की संख्या भी बेहद सीमित रही है. 2019 में NSUI ने चेतना त्यागी को अध्यक्ष पद का उम्मीदवार बनाया था, लेकिन वह चुनाव हार गईं. 2025 में भी NSUI ने महिला उम्मीदवार को मैदान में उतारा था, लेकिन अध्यक्ष पद हासिल नहीं हो सका.

महिला प्रतिनिधित्व की चर्चा के बीच चुनाव प्रचार का तरीका भी महत्वपूर्ण फैक्‍टर रहता है. DUSU चुनाव में पैसा, बाहुबल, आक्रामक प्रचार, गाड़ियों के काफिले और बड़ी संख्या में समर्थकों की मौजूदगी लंबे समय से चर्चा का हिस्सा है. ऐसे माहौल में छात्र संगठनों के सामने महिला उम्मीदवारों को शीर्ष पद पर उतारने को लेकर अलग-अलग रणनीतिक सवाल भी रहते हैं. लेफ्ट संगठनों ने कई बार महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा, लेकिन केंद्रीय पैनल पर उन्हें जीत नहीं मिल सकी.
DUSU के ‘बाबाओं’ की राजनीतिक चाल
DUSU चुनाव में सिर्फ उम्मीदवार और संगठन ही चुनाव नहीं लड़ते, कैंपस की राजनीति में प्रभाव रखने वाले पुराने छात्र नेताओं और ‘DU के बाबाओं’ की भूमिका की भी चर्चा होती है. ये अपने पसंदीदा उम्मीदवारों को समर्थन, संसाधन और नेटवर्क उपलब्ध कराते हैं. पूरा चुनाव कई बार शतरंज के खेल की तरह दिखाई देता है, सामने उम्मीदवार होते हैं, लेकिन उनके पीछे कई राजनीतिक समीकरण काम करते हैं. उम्मीदवारों को कंधे पर उठाकर प्रचार करने वालों के पीछे भी ऐसे पुराने चेहरे दिखाई देते हैं, जिनका DU की छात्र राजनीति में लंबे समय से प्रभाव रहा है.

चुनाव में बगावत का बोलबाला
2026 के चुनाव की सबसे बड़ी कहानियों में बागी उम्मीदवारों का प्रदर्शन रहा. दीपांशु शौकीन इसका सबसे बड़ा उदाहरण बने, लेकिन वह अकेले नहीं थे. संयुक्त सचिव पद के उम्मीदवार विशेष यादव की कहानी भी महत्वपूर्ण रही. चुनाव से एक रात पहले उन्हें NSUI से टिकट मिलने की बात कही गई, लेकिन अगले दिन टिकट गोपाल चौधरी को दे दिया गया.

विशेष यादव निर्दलीय मैदान में उतरे और कई राउंड में बढ़त बनाए रखी. उन्हें समाजवादी पार्टी का समर्थन भी मिला. अंतिम नतीजे में लक्ष्य राज सिंह ने जीत दर्ज की, जबकि विशेष यादव बेहद करीब रहे. चुनाव के बाद विशेष यादव और उनके समर्थकों ने परिणाम को लेकर विरोध किया. NSUI ने भी चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाए.
Gen Z आंदोलन का प्रभाव नहीं
कुछ महीने पहले दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए Gen Z विरोध-प्रदर्शनों के बाद यह चर्चा तेज हुई थी कि युवाओं में संघ या BJP विचार परिवार को लेकर असंतोष बढ़ रहा है. उस आंदोलन में DU के छात्र भी बड़ी संख्या में पहुंचे थे, लेकिन DUSU के नतीजों में ABVP ने अध्यक्ष समेत तीन पदों पर जीत दर्ज की. इससे ऐसा लगता है क‍ि आंदोलन का DUSU चुनाव पर ज्यादा प्रभाव नहीं रहा. दूसरी ओर, चुनाव में लेफ्ट छात्र संगठनों का प्रदर्शन भी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रहा.

चुनाव में जीत के बाद एबीवीपी के उम्‍मदीवार और कार्यकर्ता जश्‍न मनाते हुए.
सत्य निकेतन से शुरुआत, जाति पर ठहराव
सत्य निकेतन की घटना ने DUSU के चुनावी माहौल को काफी प्रभावित किया. छात्र सुरक्षा, हॉस्टल, पानी, लाइब्रेरी, क्लासरूम और कैंपस इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे मुद्दे चुनाव के शुरुआती दौर में प्रमुख रहे. लेकिन जैसे-जैसे मतदान का दिन करीब आया, चुनावी चर्चा का एक बड़ा हिस्सा जातीय और सामाजिक समीकरणों की ओर चला गया. छात्र सुरक्षा और हॉस्टल जैसे मुद्दों के साथ उम्मीदवारों की जाति, क्षेत्र और संगठनात्मक समीकरण भी वोटिंग की रणनीति का हिस्सा बने.
क्‍या सवाल छोड़ गया DUSU 2026 चुनाव?
DUSU 2026 का चुनाव सिर्फ चार पदों के नतीजों तक सीमित नहीं है. यश डबास की अध्यक्ष पद पर जीत, दीपांशु शौकीन की निर्दलीय बगावत, ABVP की तीन सीटें, NSUI का खाता न खुलना, जातीय समीकरण, महिला प्रतिनिधित्व का सवाल, लेफ्ट की चुनौती और Gen Z आंदोलन समेत सत्य निकेतन हादसे के बाद छात्र सुरक्षा के मुद्दे ने मिलकर इस चुनाव की कहानी लिखी है. अब असल सवाल यह है कि आने वाले सालों में दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति पारंपरिक संगठनात्मक और जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द ही घूमती रहेगी?

जब राष्ट्रीय स्तर पर हम जाति से ऊपर उठकर विषयों के आधार पर मतदान की बात करते हैं, तब देश के प्रमुख शिक्षण संस्थानों में जातीय पहचान का इतना प्रभाव यह सोचने पर मजबूर करता है कि भारत की भावी राजनीति और नेतृत्व किस दिशा में आकार ले रहे हैं. विडंबना यह भी है कि राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता के प्रतीक माने जाने वाले स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा के नीचे भी जातीय पहचान के पोस्टर लहराए जाते हैं. तो क्या यह प्रवृत्ति देश और उसके भविष्य के लिए सकारात्मक संकेत है?

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