देहरादून के फुटपाथ कौन खाली करायेगा?

दून में फुटपाथों पर पैदल चलने वालों का अधिकार अब भी अतिक्रमित

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद देहरादून में फुटपाथों पर अतिक्रमण से पैदल यात्रियों को भारी परेशानी  है।

दून में फुटपाथ पैदल यात्रियों का नहीं, कबजेदारों का हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने फुटपाथ अतिक्रमण मुक्त रखने के निर्देश दिए

देहरादून में 80% से अधिक फुटपाथों पर अवैध कब्जा

जिम्मेदार एजेंसियां अतिक्रमण का समाधान नहीं कर पाईं

देहरादून 22 जून 2026 । सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर साफ कर दिया कि फुटपाथ पैदल चलने वालों के लिए हैं और जिम्मेदार एजेंसियां उन्हें अतिक्रमण मुक्त रखें। लेकिन दून में हालात ऐसे हैं कि फुटपाथ अब पैदल यात्रियों के नहीं, बल्कि कब्जेदारों के उपयोग में दिखते हैं।

शहर के व्यस्त बाजारों और प्रमुख मार्गों पर पैदल चलना जोखिम भरा हो चुका है। लोग फुटपाथ छोड़कर वाहनों के बीच सड़क पर चलने को मजबूर हैं। जिम्मेदार नगर निगम, प्रशासन और पुलिस का तंत्र वर्षों बाद भी इस जटिल समस्या का स्थायी समाधान खोजने में विफल रहे हैं।

राजपुर रोड, सहारनपुर रोड, गांधी रोड, जीएमएस रोड, चकराता रोड, ईसी रोड, धर्मपुर और सबसे अधिक पलटन बाजार व धामावाला क्षेत्र में फुटपाथों की स्थिति सबसे खराब है। दुकानों का फैलाव, रेहड़ी-फड़, अवैध पार्किंग और अस्थायी निर्माण ने पैदल रास्तों को निगल लिया है।

मोटे तौर पर शहर के व्यावसायिक क्षेत्रों में 80 प्रतिशत से अधिक फुटपाथ अतिक्रमण की चपेट में हैं। सबसे अधिक परेशानी बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों को है, जिन्हें जान दांव पर लगा सड़क पर वाहनों के बीच से गुजरना पड़ता है।

स्मार्ट सिटी परियोजना में करोड़ों रुपये खर्च कर फुटपाथ बनाए गए, लेकिन उनका लाभ पैदल यात्रियों को नहीं मिल सका। शहर में ट्रैफिक बढ़ रहा है और दुर्घटनाओं का खतरा भी। इसके बावजूद पैदल चलने वालों के अधिकार सबसे नीचे दिखाई देते हैं।

अदालतें बोलती रहीं, दून नहीं जागा
दून में फुटपाथों का संकट नया नहीं है। वर्ष 2012 और 2018 में उत्तराखंड हाईकोर्ट इस मामले में हस्तक्षेप कर चुका है। 2018 में कोर्ट कमिश्नर तक नियुक्त किए गए। वर्ष 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि फुटपाथ पैदल चलने वालों के लिए हैं और कब्जों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

अक्टूबर-2025 में सुप्रीम कोर्ट ने 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में फुटपाथ का आडिट कराने के आदेश दिए।

अब दो दिन पहले शीर्ष अदालत ने फिर जिम्मेदार एजेंसियों को फुटपाथ खाली कराने के निर्देश दिए हैं। लेकिन धरातलीय स्थिति यही है कि अदालतें लगातार बोल रही हैं और शहर का सिस्टम लगातार अनसुना कर रहा है।

फोटो खिंचाने तक सीमित रहे अभियान
शहर में अतिक्रमण हटाओ अभियान भी कम नहीं चले। नगर निगम और प्रशासन समय-समय पर सड़कों पर उतरे, चालान काटे, सामान जब्त किया और फोटो भी खिंचवाई गईं, लेकिन कुछ ही दिनों बाद कब्जे फिर लौट आए। नतीजा यह हुआ कि कार्रवाई से ज्यादा अतिक्रमण की वापसी स्थायी साबित हुई।

अभियान हार गए, कब्जे जीत गए
पलटन बाजार से लेकर राजपुर रोड तक हर कुछ महीने में अभियान चलाया जाता है। कब्जे हटते हैं, लेकिन कुछ दिन बाद फुटपाथ फिर घिर जाते हैं। स्थायी व्यवस्था और जवाबदेही तय न होने से सरकारी कार्रवाई केवल रस्म अदायगी बनकर रह गई है।

कई बार आरोप यह भी लगे कि फुटपाथों पर फड़ और रेहड़ी लगाने के नाम पर अनौपचारिक वसूली का समानांतर तंत्र काम करता है। यही वजह है कि अतिक्रमण हटाने की कवायद कभी स्थायी नतीजे तक नहीं पहुंच सकी।

पैदल यात्री सबसे बड़ा ‘बेघर’ वर्ग
दून में वाहन चालकों के लिए सड़कें हैं, पार्किंग के लिए जगह हैं, दुकानदारों के लिए बाजार हैं, लेकिन पैदल चलने वालों के हिस्से के फुटपाथ लगातार सिकुड़ रहे हैं।

हालत यह है कि शहर में सबसे असुरक्षित व उपेक्षित वर्ग पैदल यात्री बन चुका है। बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं रोज जोखिम उठाकर सड़क पर चलने को मजबूर हैं।

ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि स्मार्ट सिटी में आखिर पैदल आदमी की जगह कहां है?

हाकिंग नीति भी फाइलों में दबी
सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2022 में स्पष्ट कहा था कि फेरीवालों के लिए हाकिंग नीति लागू की जाए और फुटपाथों को कब्जों से मुक्त रखा जाए।

दोबारा अतिक्रमण करने वालों पर कठोर कार्रवाई की व्यवस्था बनाने की भी बात कही गई थी। लेकिन तीन वर्ष बाद भी दून में ऐसी कोई प्रभावी व्यवस्था धरातल पर नहीं उतरी।

इसी से हर कार्रवाई के बाद फुटपाथ फिर कब्जों  में चले जाते हैं। सवाल यह नहीं है कि फुटपाथों पर कब्जा किसने किया, बल्कि यह है कि पैदल चलने वालों का अधिकार वापस  कौन दिलाएगा?

यहां विचित्रता यह है कि नगर निगम और स्मार्ट सिटी की स्मार्ट पार्किंग भी फुटपाथ घेर कर ही चल रही है। भाजपा के ही पूर्व मेयर सुनील उनियाल गामा तो छह नंबर पुलिया पर सिंचाई विभाग की सडक के फुटपाथ पर ठेली बाजार बना कर चले गये और अब मसूरी विधानसभा के विकास का दम भर रहे हैं।

नंबर पुलिया वेंडिंग ज़ोन: सिंचाई विभाग ने अपनी ज़मीन पर काम रुकवाया, MNA का चैलेंज- बनकर रहेगा

राजेश डोबरियाल

September 26, 2019,
6 नंबर पुलिया के पास नगर निगम जो वेंडिंग ज़ोन बना रहा है वह सिंचाई विभाग की ज़मीन पर है और इसके लिए नगर निगम ने सिंचाई विभाग से बात तक नहीं की है.

देहरादून की व्यस्त सड़क पर नगर निगम का वेंडिंग ज़ोन  सिंचाई विभाग की ज़मीन पर है.
छह नंबर पुलिया पर लगी अवैध सब्ज़ी मंडी को लेकर दो विभाग आमने-सामने आ गए. सिंचाई विभाग ने यहां काम रुकवाया तो देहरादून नगर निगम दावा है कि चाहे कुछ भी हो जाए यहां वेंडिंग ज़ोन बनकर रहेगा. ज़मीन सिंचाई विभाग की है और विभाग से अनुमति लिए बिना देहरादून नगर निगम ने यहां वेंडिंग ज़ोन बना दिया. नगर निगम ने त इसके लिए कुछ लोगों से 30000-30000 रुपये भी वसूल लिए हैं. कमाल यह कि नगर निगम ने यह काम इतनी चुपचाप किया कि इस बारे में सिंचाई विभाग को जानकारी तक नहीं हुई,  सिंचाई विभाग को पता चला तो वह हरकत में आया. हालांकि नगरायुक्त वहीं वेंडिंग ज़ोन बनाने का दावा करते रहे.

पहले बहती थी खुली नहर यहां

देहरादून में मसूरी बाइपास रिंग रोड पर स्थित 6 नंबर पुलिया से अंबीवाला गुरुद्वारा तक प्रमुख ज़िला मार्ग पर सड़क, फ़ुटपाथ और सर्विस लेन पर एक सब्ज़ी मंडी लगती है. इस अवैध सब्ज़ी मंडी की जगह नगर निगम ने वेंडिंग ज़ोन बना दिया. निगम  रेहड़ी वालों से 1,08,000 रुपये ले रहा है जिसमें से 30,000 वसूले भी जा चुके हैं.

जबकि इस ज़मीन पर नगर निगम का कोई अधिकार ही नहीं है. ज़मीन सिंचाई विभाग की है. पहले इस इलाक़े में आबादी कम थी, तब यहां एक खुली नहर बहती थी. बाद में नहर अंडरग्राउंड पाइप्स में डाल दी गई . नहर ढकने के बाद यहां सड़क बनी, फ़ुटपाथ भी बना और नहर के पीछे के गांव के लिए सर्विस लेन भी.

विनीत उन ख़ुशनसीब लोगों में से एक हैं जिन्हें नगर निगम वेंडिंग ज़ोन में जगह आबंटित कर रहा है.

गुपचुप बांटीं दुकानें

आबादी बढ़ने के साथ यहां कुछ सब्ज़ी की दुकानें लगने लगीं, जो बढ़ते-बढ़ते 150 से ज़्यादा हो गईं. स्थानीय निवासियों का कहना है कि पुलिसकर्मियों को कुछ पैसे देकर लोग यहां दुकानें लगाते रहे । जिसकी पुलिस या इस मंडी के गिरोह से पहचान नहीं थी उसे यहां घुसने नहीं दिया गया.

पिछले साल सरकार ने नगर निकायों का सीमा विस्तार किया तो यह क्षेत्र देहरादून नगर निगम में आ गया लेकिन इससे ज़मीन के स्वामित्व में कोई परिवर्तन नहीं हुआ । यह अब भी सिंचाई विभाग की ही है. अचानक नगर निगम ने यहां लग रही रेहड़ियों की जगह पर वेंडिंग ज़ोन बनाने का फ़ैसला किया और यह काम इतने गुपचुप ढंग से किया गया कि चंद रेहड़ी वालों के सिवा किसी को ख़बर नहीं लगी. निगम ने न इसका कोई विज्ञापन निकाला न प्रचार किया, बस कुछ लोगों के सामने मुनादी करवा दी.

धर्मपुर से रायपुर जाने वाली सड़क देहरादून का प्रमुख ज़िला मार्ग है और बेहद व्यस्त सड़क है. शाम को यहां भारी जाम लगता है.

अतिक्रमण है, हटाया जाएगा

सिंचाई विभाग को इस बारे में पता चला तो सिंचाई विभाग ने यह काम रुकवा दिया. दून इरिगेशन डिवीज़न के तत्कालीन अधीक्षण अभियंता दिनेश कुमार सिंह के अनुसार सिंचाई विभाग की ज़मीन पर नगर निगम कोई निर्माण कार्य नही सकता । वहां पर सड़क, फ़ुटपाथ और सर्विस लेन लोगों की सुविधा को बनवाए गए थे इसलिए नहीं कि नगर निगम वहां दुकानें बेचनी शुरु कर दे.

सिंह के अनुसार यह कदम उठाने से पहले नगर निगम को खुद ही सोचना चाहिए था. यह अतिक्रमण की श्रेणी में आता है और इसके ख़िलाफ़ जो भी कार्रवाई आवश्वक होगी, वह की जाएगी.

तत्कालीन MNA विनय शंकर पांडेय की चुनौती

देहरादून के तत्कालीन नगरायुक्त विनय शंकर पांडेय ने  कहा कि अब तक तो वहां ठेली-रेहड़ी लगी रही हैं, सिंचाई विभाग उनको तो देख नहीं रहा. सिंचाई विभाग के काम रुकवाने की बात भी पांडेय ने खारिज कर दी और कहा कि एक डिस्ट्रिक्ट वेंडिंग कमेटी बनी होती है. उसके अप्रूवल के बाद ही वहां वेंडिंग ज़ोन बनाया जा रहा है. ये रही नगरायुक्त से  बातचीत…

देहरादून के तत्कालीन नगरायुक्त विनय शंकर पांडेय का कथन था कि सिंचाई विभाग को अपनी ज़मीन पर काम रुकवाने का कोई अधिकार नहीं है.

विनय शंकर पांडेय:  नहीं कोई काम नहीं रुका है. काम बिल्कुल चल रहा है, काम बिल्कुल चलेगा और उनको रोकने का कोई अधिकार नहीं है.

प्रश्न: लेकिन ज़मीन तो उनकी है, बिना उनकी अनुमति के आप कैसे वहां निर्माण कर सकते हैं?

विनय शंकर पांडेय: उनकी ज़मीन है तो अभी तक वहां ठेली-रेहड़ी लग रही थी कि नहीं लग रही थी?

प्रश्न: वह भी इलिगल ही था, अतिक्रमण था.

विनय शंकर पांडेय: अगर एक सरकारी संस्था, दूसरी सरकारी संस्था की ज़मीन पर काम कर रही है तो  इसमें कोई इलिगेलिटी (गैरकानूनी काम) नहीं है. ऐसे तो शहर में एक भी ठेला नहीं लग पाएगा क्योंकि कहीं पीडब्ल्यूडी की ज़मीन है, कहीं इरिगेशन की है, कहीं नगर-निगम की है और कहीं एमडीडीए की. तो इसका मतलब है कि हवा में लगाएं सब, आसमान में…

प्रश्न: लेकिन रेहड़ियां ही क्यों हों, प्रॉपर वेंडिंग ज़ोन क्यों न हो?

विनय शंकर पांडेय: तो यह वेंडिंग ज़ोन ही तो बन रहा है.

प्रश्न: लेकिन ज़मीन तो सिंचाई विभाग की है. मेरी एक वकील से बात हुई थी उन्होंने कहा ,यह गैरकानूनी है.

विनय शंकर पांडेय: तो इसमें आपको क्या प्रॉब्लम है? यह विभाग का आंतरिक मसला है, हम इसको सुलझा लेंगे. और यह (वेंडिंग ज़ोन) बनेगा और बनकर रहेगा.

पूर्व फौजी विनोद भारद्वाज की अपनी ज़मीन पर बनी दुकानों के आगे भी नगर निगम रेहड़ियों को जगह आबंटित कर रहा है।

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