चेतावनी पर भी “सतलुज” OTT पर कैसे आई,सरकारी पैनल कर रहा जांच

रेड फ्लैग्स (चेतावनी) के बावजूद ‘सतलुज’ ओटीटी पर कैसे आई? सरकारी पैनल करेगा जांच
​सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने फिल्म निर्माता रोनी स्क्रूवाला और ज़ी5 (ZEE5) अधिकारियों से की पूछताछ
​अदिति टंडन
नई दिल्ली, 08 जुलाई, 2026 सुबह 07:29 बजे IST
​दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म ‘सतलुज’ को ओटीटी प्लेटफॉर्म ज़ी5 से हटा दिया गया है।
​दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म ‘सतलुज’ से जुड़े एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, केंद्र सरकार इस बात की जांच कर रही है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित यह विवादास्पद फिल्म अतीत में मिली चेतावनियों के बावजूद ऑनलाइन (ओटीटी पर) कैसे आ गई।
​सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की उच्च स्तरीय अंतर-विभागीय समिति (IDC), जो विवादास्पद ओटीटी कंटेंट  जांचती है, ने इस पर ज़ी5 के प्रमुखों और ‘सतलुज’ के निर्माता रोनी स्क्रूवाला से बातचीत की है।
​शीर्ष सूत्रों ने बताया कि मुख्य विषय था कि—यह फिल्म वर्तमान रूप में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) से मंजूरी न मिलने और अदालतों से भी राहत न मिलने के बाद ओटीटी पर कैसे पहुंच गई।
​पता चला है कि ज़ी5 और ‘सतलुज’ के निर्माताओं ने पैनल को बताया है कि उन्हें फिल्म से जुड़ी अतीत की चेतावनियों (रेड फ्लैग्स) के बारे में जानकारी नहीं थी। फिल्म निर्माताओं ने सबसे पहले दिसंबर 2022 में सर्टिफिकेशन को सेंसर बोर्ड से संपर्क किया था। सूत्रों ने कहा कि सीबीएफसी की मंजूरी को जो फिल्म सौंपी गई थी, उसका शीर्षक “घल्लूघारा” था।
​आधिकारिक रिकॉर्ड से पता चला है कि सीबीएफसी ने मई 2023 में फिल्म निर्माताओं को फिल्म को लेकर अपनी आपत्तियों—राष्ट्रीय सुरक्षा पर इसके संभावित प्रतिकूल प्रभाव—के बारे में सूचित कर दिया था। एक शीर्ष सूत्र ने आज बताया, “इसके बाद, फिल्म निर्माताओं ने फिल्म में बदलाव और कट लगाने के सेंसर बोर्ड के आदेशों के खिलाफ अदालत का रुख किया। अदालत ने फिल्म निर्माताओं को कोई राहत नहीं दी, जिसके बाद उन्होंने आखिरकार 7 जनवरी, 2025 को मामला वापस ले लिया।”
​अधिकारियों ने यह भी जोड़ा कि सरकारी और सीबीएफसी रिकॉर्ड में इस फिल्म का नाम लगातार “घल्लूघारा” ही बना रहा। एक आधिकारिक सूत्र ने कहा, “फिल्म निर्माताओं ने अब इसका नाम बदल दिया और कंटेंट को ऑनलाइन स्ट्रीम कर दिया, जबकि फिल्म के अतीत और इसे मंजूरी न मिलने के कारणों के बारे में सब कुछ पता था। यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब संबंधित ओटीटी प्लेटफॉर्म और फिल्म निर्माताओं तथा प्रमोटरों को देना होगा।” उन्होंने आगे बताया कि इन विषयों पर स्पष्टीकरण मांगा जा रहा है।
​आईडीसी (IDC) सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की एक स्थायी समिति है, जिसका गठन सूचना प्रौद्योगिकी नियम-2021 में किया गया है। यह ओटीटी कंटेंट को हटाने (टेकडाउन) को सरकार के सर्वोच्च समीक्षा पैनल के रूप में काम करती है, जो अन्यथा भारत में (सेंसर बोर्ड की तरह) विनियमित नहीं है।
​आईडीसी ने रविवार को ‘सतलुज’ को ऑनलाइन ब्लॉक करने के अंतरिम आदेश पारित किए थे और अब टेकडाउन या अन्य अंतिम आदेश पारित करने से पहले संबंधित पक्षों (हितधारकों) की सुनवाई प्रक्रिया में है।
​सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम-2000 की धारा 69A सरकार को भारत की संप्रभुता और अखंडता, रक्षा, सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, सार्वजनिक व्यवस्था के हित में या संज्ञेय अपराधों के उकसावे रोकने को किसी भी जानकारी तक सार्वजनिक पहुंच को ब्लॉक करने का अधिकार देती है। इसी प्रावधान में ज़ी5 से फिल्म ‘सतलुज’ को हटाने का आदेश दिया गया था।

“सतलुज ” इकहरा,इकतरफा कहानी

 

हॉलीवुड फिल्म ‘A Few Good Men’ में अमेरिकी सैन्य वकील बने टॉम क्रूज अमरीकी नौसेना अड्डे पर नौसैनिक प्रशिक्षु के साथ की गई प्रतिबंधित कड़ाई की वजह से मृत्यु हो जाने पर उसके साथ वह कड़ाई करने के आरोप में फंसे दो अश्वेत प्रशिक्षुओं को बेगुनाह सिद्ध करने और एक कर्नल की इस पूरे प्रकरण में संलिप्तता पर की गई साहसिक कानूनी लड़ाई दिखायी गयी हैं। हॉलीवुड की फिल्म में मृतक श्वेत था और फंसने वाले अश्वेत।  इससे यह कोई रंगभेद (कलर डिस्क्रिमिनेशन) की फिल्म नहीं थी मगर अपना बॉलीवुड तो 1992 से दुबई के अंडरवर्ल्ड से तो बिना किसी नैतिकता के अमरीकी फिल्म की कॉपी ‘शौर्य’ (2008) बना ली जिसमें पीड़ित मुस्लिम दिखाया गया। यह कोई नया कारनामा नहीं था, बॉलीवुड मीर रंजन नेगी को कबीर खान बनाकर कथित अल्पसंख्यक मजहब की व्यथा पर्दे पर दिखाता हैं जबकि देश की जैन पारसी जैसी माइक्रो माइनॉरिटी आराम से हैं।

‘शौर्य’ फिल्म में निर्देशक समर खान ने फिल्म में सैन्य अधिकारी बने के.के. मेनन से वह सब डायलॉग बुलवाये जिससे अंतहीन मजहबी हिंसा में लगे लोगों को शासन पीड़ित दिखा सकें। यह अंतहीन मजहबी हिंसा कश्मीर से लेकर दुनियां के भिन्न हिस्सों में बदस्तूर हिंसक बनी हुई है पर अंडरवर्ल्ड का दबाव कहे ह।या निर्देशक समर खान की आर्टिस्टिक फ्रीडम इस इस्लामी हिंसा की निंदा तो दूर उल्टे इस हिंसा से लड़ने वाली सेना का ही अधिकारी इस्लाफोबिक बता दिया। फिल्म सतलुज में भी कुछ इसी प्रकार मजहबी और अलगाववादी हिंसा से लड़ी तत्कालीन पंजाब पुलिस को बर्बर सिद्ध करने का प्रयास हुआ है उसके प्रमुख केपीएस गिल को दमनकारी दर्शाया गया हैं।

फिल्मों से वैसे भी न्यूट्रॅलिटी की उम्मीद नहीं होती जब पत्रकारिता में न्यूट्रॅलिटी नहीं रह गई तो फिर फिल्म तो प्रोपेगेंडा का एक मजबूत हथियार है। प्रोपेगेंडा तो ठीक पर अतिशयोक्ति का भी कुछ पैमाना होना चाहिएह बोलीवुडिया फिल्मों में मसलन जॉली एलएलबी में पुलिसिया फेक एनकाउंटर कम से कम पुरुषों के हुए है, पर सतलुज तो अलग ही फिल्म है उसमें फ्लेवर और स्पाइस न हो तो मजा क्या होगा?

सतलुज फिल्म को बेहद मर्मस्पर्शी बनाने को बूढ़ी पुत्रवियोग में विक्षप्त बेबे का एनकाउंटर दिखाना वैसी ही अति है, पुलिस को बैड लाइट में पेंट करने की कथित आर्टिस्टिक फ्रीडम हैं। आर्टिस्टिक फ्रीडम में ही दशमेश गुरु साहब के लिखे
” सुरा सो पहचानिए, जो लड़े दीन के हेत
पुर्जा पुर्जा कट मरे, कभौ न छड्डे ख़ेत।” जैसा पवित्र युद्धघोष स्टेट के प्रमुख यानि मुख्यमंत्री पर हमले में बैकग्राउंड में चलाया गया, जहां हत्यारे के बम धमाके में पुर्जे-पुर्जे हो गये अर्थात वह शूरवीर की तरह अपने दीन को कुर्बान हो गया।

यह सही बात है कि स्टेट के खिलाफ जंग में कई बार स्टेट भी दायरा तोड़ती है जो भविष्य में आनेवाले शांतिकाल में मानवतावाद की रेसिपी बनती है। जब शांति स्थापित हो जाती है तो स्टेट को सब रास्ता दिखाने लगते हैं कि ऐसा करना चाहिए था वैसा करना चाहिए था। पंजाब में वह वक्त राज्य की हिंसा, निरीह अल्पसंख्यकों के नरसंहार और आतंकियों की हिंसा का था जो गुजर गया वो बुरा वक्त था उसे अनावश्यक कुरेदना है उसी वक्त में ईमानदारी से पहुंचना होगा।

अंत में फिल्म अगर जसवंत सिंह के संघर्ष और गुमशुदगी पर ही टिकी रहती तो एक लाजवाब फिल्म होती, फिल्म की कहानी में जसवंत सिंह के संघर्षों पर केंद्रित रहने की जगह स्टेट हिंसा पर बहुत ज्यादा मसाला भर दिया। मैनें हाल ही में ही “सर्बजीत” फिल्म भी देखी थी उसके बड़े स्टारकास्ट की तुलना में यह सतलुज फिल्म मुझे ज्यादा सटीक, सधी (क्रिस्प) हुई लगी पर अफ़सोस इस कहानी में न्यूट्रलिटी नहीं बरती गई,एकतरफा है और फिल्म अधर में पहुंच गई।

 

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