महर्षि सुश्रुत कांस्य प्रतिमा क्यों लगी रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स एडिनबर्ग में ?

जिस भारतीय ऋषि ने 2600 साल पहले 1120 बीमारियों का रिकॉर्ड जुटाया था, स्कॉटलैंड में उसे मिला सम्मान
जिस भारतीय ऋषि ने 2600 साल पहले 1120 बीमारियों का रिकॉर्ड जुटाया था, स्कॉटलैंड में उसे मिला सम्मान

काशी में महर्षि सुश्रुत ने 2500 साल पहले प्लास्टिक सर्जरी कर नाक जोड़ इतिहास रचा था,  उन्हें आधुनिक सर्जरी का जनक माना जाता है.  इंग्लैंड  के रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ने महर्षि सुश्रुत की कांसे की प्रतिमा स्थापित कर उन्हें आधुनिक शल्य चिकित्सा का पिता स्वीकार किया ।

एडिनबर्ग के रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स में महर्षि सुश्रुत की प्रतिमा का अनावरण किया गया

नई दिल्‍ली 23 जून 2026। काशी में एक व्यक्ति का झगड़ा हो गया, जिसमें उसकी नाक कट गई. कटी  नाक लेकर ये व्यक्ति एक ऋषि के पास गए और कहा कि इसे जोड़ दीजिए. ऋषि ने उसकी कटी हुई नाक को ध्‍यान से देखा और फिर कुछ ही देर में उसे जोड़ दिया. ये घटना लगभग 2500 साल पहले की है और वयक्ति की नाक जोड़ने वाले महर्षि थे आधुनिक प्लास्टिक सर्जरी के जनक महर्षि सुश्रुत. भारत ही नहीं दुनियाभर में लोग उन्‍हें ‘सर्जरी के पितामह’ मानते हैं. हाल ही में दुनिया के सबसे पुराने और सबसे बड़े सर्जिकल संस्थान ‘रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग’ के ‘प्लेफेयर ऑडिटोरियम’ में महर्षि सुश्रुत की 90 किलोग्राम वजनी कांसे (ब्रॉन्ज) की प्रतिमा लगाई गई है.

कौन थे महर्षि सुश्रुत?
भारत के महान ऋर्षियों में से एक महर्षि सुश्रुत को दुनिया का पहला सर्जन माना जाता है. महर्षि सुश्रुत की दूरदर्शिता का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि उन्‍होंने 2500 साल पहले प्‍लास्टिक सर्जरी कर डाली थी. महर्षि सुश्रुत ने लगभग 2600 साल पहले 300 से ज्‍यादा अलग-अलग तरह की थीं. इतना ही नहीं, इन सर्जरी को करने से पहले वह लगभग 124 अलग-अलग सर्जिकल उपकरण भी बना चुके थे. पत्‍ते, कीड़े आदि को भी उन्‍होंने सर्जरी में इस्‍तेमाल किया, जिसकी कोई कल्‍पना भी नहीं कर सकता था. सर्जरी से जुड़े अपने ज्ञान को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने को उन्होंने ‘सुश्रुत संहिता’ लिखी. ‘सुश्रुत संहिता’ को सर्जरी पर दुनिया का पहला ग्रंथ माना जाता है.

1120 बीमारियों का रिकॉर्ड जुटाया था
बताया जाता है कि महर्षि सुश्रुत ने गुरु दिवोदास धन्वंतरि से आयुर्वेद की शिक्षा ली थी. इसके बाद लोगों की सेवा में जुट गए. महर्षि सुश्रुत सिर्फ डॉक्टर नहीं थे, वह एक अध्‍यापक, वैज्ञानिक और मानव जाति के सच्‍चे हितैषी थे. उनका कहना था- ‘जो रोगी के दुख को अपना दुख समझे, वही सच्चा वैद्य है.’ भारत में 15 जुलाई को सुश्रुत दिवस मनाया जाता है. आधुनिक मेडिकल साइंस को आज भी उनका ज्ञान रास्ता दिखा रहा है. सुश्रुत की सबसे बड़ी देन ‘सुश्रुत संहिता’ है, जिसमें उन्‍होंने अपने सर्जरी के तरीके विस्‍तार से लिखे हैं. यह आयुर्वेद का एक प्रमुख ग्रंथ है, जो मुख्य रूप से सर्जरी पर आधारित है. इसमें 184 अध्याय और 1120 रोगों, 700 औषधीय पौधों, 64 खनिज और 57 पशु-उत्पादों का जिक्र किया गया है. यह ग्रंथ केवल सर्जरी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें बाल रोग, स्त्री रोग, विष विज्ञान, मानसिक रोग और शरीर रचना का भी विस्तृत विवरण किया गया है.

महर्षि सुश्रुत का मानना था कि बिना शरीर की रचना को समझे कोई अच्छा सर्जन नहीं बन सकता. इसलिए वे मृत शरीर को पानी में गलाकर उसकी परत-दर-परत जांच करते थे. इसे ‘डिसेक्शन’ कहा गया. छात्रों को ऑपरेशन सिखाने को वे कद्दू, खरबूजा, मृत पशुओं और चमड़े की थैलियों पर अभ्यास करवाते थे.
इंग्लैंड महर्षि सुश्रुत के सामने नतमस्‍तक
आधुनिक शल्य चिकित्सा की शुरुआत 400 वर्ष पहले मानी जाती है. यूरोप में स्कॉटलैंड के मूल निवासी डॉक्टर ने आधुनिक शल्य चिकित्सा यानी सर्जरी का पहला ऑपरेशन किया था. हालांकि, इससे हजारों साल पहले महर्षि सुश्रुत 300 से ज्‍यादा सर्जरी कर चुके थे. भारत के इस महान महर्षि के आगे इंग्लैंड भी नतमस्तक हैं. बीते शुक्रवार इंग्लैंड के ‘रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग’ में महर्षि सुश्रुत की प्रतिमा लगाई गई. इस कार्यक्रम का आयोजन इंग्लैंड में रहने वाले तेलुगु मूल के सर्जन प्रोफेसर चंद्रा चेरुवू के नेतृत्व में किया. इस प्रतिमा को प्रोफेसर चेरुवू और उनके परिवार के ‘चेरुवू फैमिली फाउंडेशन’ ने दान किया है. महर्षि सुश्रुत की प्रतिमा तमिलनाडु के तिरुवनंतमामलाई के एक मूर्तिकार ने तैयार की ।

आंध्र प्रदेश के रहने वाले प्रोफेसर चेरुवू ने महर्षि सुश्रुत पर एक किताब भी लिखी है, जिसमें सबूतों के आधार पर यह बताया गया है कि दुनिया की पहली सर्जरी कब और कहां हुई थी. पुस्तक का नाम ‘महर्षि सुश्रुत: ए कम्पेंडियम – फादर ऑफ सर्जरी’ है. इस प्रतिमा और किताब दोनों को स्वीकार करके, रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग ने पूरी दुनिया के सामने इस बात की पुष्टि कर दी कि महर्षि सुश्रुत ही वास्तव में ‘सर्जरी के पितामह’ हैं।

Why Worlds Oldest Surgery School Now Have Sushruta Statue Know Discovery And Achievement Of Indian Maharishi
दुनिया के सबसे पुराने सर्जरी कॉलेज को क्यों लगाना पड़ा काशी के महर्षि सुश्रुत का Statue, 2500 साल पहले क्या खोजा ?
स्कॉटलैंड में मौजूद रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन दुनिया का सबसे पुराना और पहला सर्जरी कॉलेज है। इसमें अब महर्षि सुश्रुत का स्टैच्यु लगाया गया है, जिन्हें फादर ऑफ सर्जरी भी कहा जाता है। महर्षि सुश्रुत ने चिकित्सा के क्षेत्र में बहुत बड़ा योगदान दिया है। आइए जानते हैं कि उन्होंने करीब 2500 साल पहले कौन-कौन से बड़े आविष्कार और खोज की।
मॉडर्न साइंस बहुत ज्यादा एडवांस हो गई है और आज के दौर में किसी अंग की सर्जरी करना या ट्रांसप्लांट करना आसान बात हो गई है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मॉडर्न साइंस की दुनिया का सबसे पहला सर्जरी कॉलेज कहां है? ये स्कॉटलैंड के एडिनबर्ग में है और इसका नाम है रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन। अब शुक्रवार को यहां पर भारत के काशी में जन्मे महर्षि सुश्रुत की मूर्ति का अनावरण किया गया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ऐसा क्यों किया गया है? भारत के महर्षि सुश्रुत ने करीबन 2500 साल पहले ऐसी कौन सी खोज या आविष्कार किए, जो पूरी दुनिया के लिए एक मील का पत्थर बन गए?
महर्षि सुश्रुत ने क्या खोज की (फोटो क्रेडिट- X/IndiaInScotland & iStock)
महर्षि सुश्रुत को कहते हैं फादर ऑफ सर्जरी
जब आधी दुनिया को बीमारियों व दवा की जानकारी भी नहीं थी, तब भारत के काशी में जन्मे महर्षि सुश्रुत ने सर्जरी की शुरुआत कर दी थी। इस वजह से इन्हें फादर ऑफ सर्जरी कहा जाता है यानी सर्जरी की शुरुआत करने वाले। इन्होंने ही सुश्रुत संहिता का लेखन किया, जिससे आगे चलकर आयुर्वेद व मॉडर्न साइंस की बुनियाद बनी। इसी उपलब्धि को सम्मान देने और आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन ने महर्षि सुश्रुत की मूर्ति लगवाई है।
2500 साल पहले की थी डायबिटीज की खोज
डायबिटीज की बीमारी के कारण दुनियाभर में करोड़ों लोग परेशान हैं और अगर इसे मैनेज ना किया जाए तो किडनी खराब होने से जान भी जा सकती है। मगर आपको जानकर हैरानी होगी कि इस बीमारी के बारे में सबसे पहले 2500 साल पहले 5th Century BC में महर्षि सुश्रुत ने ही सुश्रुत संहिता में बताया था। एनसीबीआई पर मौजूद शोध के मुताबिक, महर्षि ने इसे मधुमेह नाम दिया यानी शहद जैसा पेशाब।
इन्होंने बताया कि मधुमेह की वजह से ना केवल पेशाब का स्वाद मीठा हो जाता है, बल्कि यह चिपचिपा भी हो जाता है, जिस वजह से चींटियों को आकर्षित कर सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि यह बीमारी आमतौर पर अमीर जाति वालों को ज्यादा शिकार बनाती है और इसके पीछे चावल, मिठाई और अनाज का अत्यधिक सेवन जिम्मेदार होता है।
101 धार रहित और 20 पैने औजार का ज्ञान
एनसीबीआई पर मौजूद एक और शोध महर्षि सुश्रुत के बारे में विस्तार से बताता है। इसके मुताबिक उन्होंने 1120 खास बीमारियों के बारे में दुनिया को जानकारी दी। इन्होंने 101 धार रहित औजार (मेडिकल टूल) और 20 पैने औजार (मेडिकल टूल) का ज्ञान दुनिया को दिया। महर्षि सुश्रुत ने सर्जरी (शस्त्रकर्म) के अलग-अलग प्रकार के बारे में भी बताया।
छेदन –
सटीक कट लगाकर शरीर को कम नुकसान पहुंचाकर प्रभावित अंग को निकालना।
भेदन –
प्रभावित टिश्यू या बाहरी वस्तु (पस या रक्त) को बाहर निकालना।
लेखन –
प्रभावित टिश्यू, गंदगी या बाहरी वस्तु को बाल की जड़ की तरफ खुरचकर उतारना।
वेधन –
संक्रमित फ्लूइड या टॉक्सिन को छेद करके बाहर निकालना।
एष्यन –
बॉडी के अंदर के प्रभावित हिस्से या कैविटी का पता करने के लिए सर्जरी करना।
आह्यन –
बाहरी या दूषित चीज से होने वाली बाधा को बाहर निकालना।
विश्राव्यन –
सूजन कम करने या रिकवरी तेज करने के लिए पस, मवाद, तरल को नियंत्रित तरीके से बाहर निकालना।
सीव्यन –
धागे और सुई की मदद से खुले जख्म को बंद करना।
कौन-कौन से सर्जिकल टूल बताए
महर्षि सुश्रुत द्वारा बताए गए सर्जिकल टूल के बारे में एनसीबीआई पर मौजूद शोध में बताया गया है। उन्होंने धार रहित 101 औजारों को 6 प्रकार में विभाजित किया, जैसे स्वस्तिक यंत्र (चिमटी या क्रॉस आकार के 24 टूल), संदंश यंत्र (पकड़ने वाली चिमटी वाले 2 टूल), ताल यंत्र (चम्मच या प्लेट के आकार वाले 2 टूल), नाड़ी यंत्र (खोखली नलिकाओं वाले 20 टूल), शलाका यंत्र (छड़ के आकार वाले 28 टूल) और उपयंत्र (रस्सी, धागे, कपड़े जैसे 25 टूल)।
इसके अलावा उन्होंने 20 पैने औजार इस्तेमाल करने की जानकारी भी दी है, जैसे मण्डलाग्र (गोल सिरे वाला चाकू), उत्पलपत्र (कमल की पंखुंडी की तरह पतला चाकू), अर्धधार (एक तरफ धार वाला चाकू), नखशस्त्र (नाखून के आकार का चाकू), मुद्रिका (अंगूठी के आकार का चाकू), करपत्र (हड्डियों को काटने वाली आरी), शरारिमूख (एक तरह की कैंची) आदि।

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