मुस्लिम बहुविवाह पर सुप्रीम कोर्ट कठोर, महिलाओं के समानाधिकार पर बड़ी बहस
Supreme Court Notice On Muslim Polygamy Ban Petition
मुस्लिमों के बहुविवाह पर सुप्रीम कोर्ट कठोर, महिलाओं के समान अधिकार पर बड़ी बहस
सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ में बहुविवाह और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। अदालत अब यह जांचेगी कि क्या ऐसे प्रावधान लैंगिक समानता के संवैधानिक मानकों पर खरे उतरते हैं।
मुस्लिम पर्सनल लॉ और मुस्लिम महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों की बहस नई बात नहीं हैं। ताजा मामले में इससे जुड़ी एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में है। याचिका में मुस्लिम पर्सनल लॉ के कुछ प्रावधानों और मुस्लिम बहुविवाह जैसी व्यवस्थाओं को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ये प्रावधान महिलाओं के साथ समानता के सिद्धांत के विपरीत हैं और संविधान के अनुच्छेद 14, 15 तथा 21 का उल्लंघन करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने तथ्यों पर गौर करते हुए पहली नजर में मामले को सुनवाई योग्य माना है और केंद्र सरकार से सवाल पूछे हैं..
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मुस्लिम पर्सनल लॉ को चुनौती देने वाली याचिका में क्या कहा गया है
याचिका महिला अधिकार कार्यकर्ता जाकिया सोमन की ओर से दायर की गई है, जिनके साथ कुछ शिक्षाविद और पत्रकार भी शामिल हैं।
याचिका में कहा गया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के कुछ प्रावधान महिलाओं के साथ समान व्यवहार नहीं करते। मुस्लिम समुदाय में बहुविवाह की प्रथा को पूरी तरह खत्म करने की मांग करते हुए याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह प्रथा मुस्लिम महिलाओं के लिए अन्याय और कठिनाइयों का कारण बनती है।
याचिका में अदालत से यह घोषित करने की अपील की गई है कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 82 के तहत बहुविवाह को अवैध माना जाए। साथ ही मुस्लिम विवाह और तलाक के लिए भी हिंदू विवाह की तरह अनिवार्य वैधानिक पंजीकरण व्यवस्था लागू करने की अपील की गई है।
याचिका में दावा किया गया है कि बहुविवाह और महिलाओं के प्रति अलग कानूनी व्यवहार संविधान के समानता सिद्धांत से मेल नहीं खाते। याचिकाकर्ताओं ने अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 15 (लिंग आधारित भेदभाव का निषेध) और अनुच्छेद 21 (जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का हवाला दिया है।
तर्क यह भी है कि उत्तराधिकार और विवाह जैसे विषय मूलतः नागरिक अधिकारों से जुड़े हैं। याचिका में कहा गया कि इन विषयों को केवल धार्मिक प्रथा बताकर संवैधानिक जांच से बाहर नहीं रखा जा सकता।
याचिका में मांग की गई है कि एक विशेष कोष बनाया जाए जिससे बहुविवाह से प्रभावित पहली और दूसरी पत्नी को आर्थिक सहायता और अंतरिम राहत दी जा सके।
न्यायिक प्रक्रिया की राह और याचिका की सुनवाई
इस मामले में अभी अदालत ने इन तर्कों पर अंतिम राय व्यक्त नहीं की है। लेकिन तथ्यों पर गौर करते हुए फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई में.. केंद्र का पक्ष सामने आने के बाद अदालत आगे की कार्रवाई करेगी। केंद्र सरकार अब सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब दाखिल करेगी जिसके बाद ही अन्य संबंधित पक्ष भी अपना पक्ष रख सकते हैं। उसके बाद अदालत सभी लिखित जवाब और मौखिक तर्कों पर विचार करेगी। और यदि शीर्ष अदालत को जरूरी लगा तो मामले को संविधान पीठ के समक्ष भी भेजा जा सकता है।
मुस्लिम बहुविवाह पर रोक और महिलाओं के समान अधिकारों की बात
एक बात तो साफ है मुस्लिम पर्सनल लॉ के प्रावधानों में, अक्सर मजहब का नाम देकर बदलाव किए जाने का विरोध होता आया है। लेकिन यह भी सच है कि बहुविवाह और महिलाओं के समान अधिकारों से जुड़ी यह याचिका भारतीय संवैधानिक कानून के महत्वपूर्ण मामलों में शामिल हो गई है। इससे मुस्लिम वर्ग में भी महिलाओं के अधिकारों से जुड़े व्यक्तिगत कानूनों की नई संवैधानिक समीक्षा का रास्ता खुल सकता है। इसलिए कहा जा सकता है कि अदालत का अंतिम फैसला केवल एक समुदाय तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि संवैधानिक कानून की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होगा।

