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hindi NewslegalCan Muslims Be Exempted From Ucc Constitutional Perspective Explained
क्या मुसलमानों को UCC से बाहर रखने की मांग जायज है? जानिए संविधान, अनुच्छेद 44 और सुप्रीम कोर्ट का कानूनी नजरिया
देश में समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर बहस के बीच कुछ मुस्लिम संगठनों द्वारा खुद को इसके दायरे से बाहर रखने की मांग उठाई गई है। क्या ऐसी मांग संविधान के अनुरूप है? संविधान, सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों और उपलब्ध कानूनी तथ्यों के आधार पर क्या यह सही है ?
Authored by: मनीष राज
Updated: 20 Jul 2026, 4:29 pm IST|नवभारतटाइम्स.कॉम
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नई दिल्ली: भारत में समान नागरिक संहिता Uniform Civil Code , UCC को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। उत्तराखंड सरकार के UCC लागू किए जाने और असम, गुजरात, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश समेत कुछ राज्यों में इस पर सुगुबुगाहट शुरू होने के बाद यह चर्चा फिर तेज हो गई है। इसी बीच कुछ मुस्लिम धार्मिक एवं सामाजिक संगठनों ने मांग उठाई कि यदि UCC लागू किया जाए तो मुस्लिम समुदाय को इससे बाहर रखा जाए। यह मांग संविधान, मौलिक अधिकारों और राज्य की नीतियों के संदर्भ में कई कानूनी सवाल खड़े करती है। हमारा संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, लेकिन साथ ही राज्य को समान नागरिक संहिता लागू करने का नीति-निर्देशक सिद्धांत भी सौंपता है। ऐसे में यह समझना आवश्यक है कि कानून और न्यायपालिका इस विषय को किस दृष्टि से देखते हैं।
UCC and Muslim Exemption Demand
क्या मुसलमानों को UCC से बाहर रखने की मांग जायज है? – संविधान, और सुप्रीम कोर्ट का कानूनी नजरिया क्या है
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UCC क्या है और संविधान में इसका आधार क्या है?
Uniform Civil Code , UCC समान नागरिक संहिता से जाना जाता है। यह एक ऐसा प्रस्ताव है जो भारत में रहने वाले सभी नागरिकों—चाहे उनका धर्म या जाति कुछ भी हो के लिए शादी, तलाक, संपत्ति के बंटवारे, और बच्चा गोद लेने जैसे व्यक्तिगत मामलों में एक समान कानून की वकालत करता है।
UCC का उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और भरण-पोषण जैसे नागरिक मामलों के लिए सभी नागरिकों पर समान कानून लागू करना है। इसका उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 44 में नीति-निर्देशक सिद्धांत के रूप में किया गया है।
संविधान का अनुच्छेद 44 कहता है कि राज्य पूरे भारत में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। हालांकि नीति-निर्देशक सिद्धांत अदालत में सीधे लागू नहीं कराए जा सकते, लेकिन शासन और कानून निर्माण के लिए वे संवैधानिक दिशा प्रदान करते हैं।
संविधान अनुच्छेद 25 सभी नागरिकों को धर्म मानने, पालन करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। लेकिन यह स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है; यह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन है। इसलिए व्यक्तिगत कानूनों में बदलाव करने की शक्ति संसद या राज्य विधानमंडल के पास हो सकती है, यदि वह संविधान के अनुरूप कानून बनाए।
UCC Constitutional Analysis-logo
क्या किसी एक समुदाय को UCC से बाहर रखा जा सकता है?
यदि बात संवैधानिक नजरिए की करें तो उसमें ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो किसी विशेष धार्मिक समुदाय को समान नागरिक संहिता से स्वतः छूट देने की व्यवस्था करता हो। वैसे भारत में पहले भी कुछ क्षेत्रों और जनजातीय समुदायों के लिए विशेष संवैधानिक व्यवस्थाएं मौजूद रही हैं, लेकिन वे अलग संवैधानिक प्रावधानों के कारण हैं, न कि केवल धार्मिक पहचान के आधार पर। इसलिए केवल धर्म के आधार पर किसी समुदाय को बाहर रखने की मांग का कानूनी औचित्य स्वतः सिद्ध नहीं माना जा सकता। अंतिम निर्णय इस बात पर निर्भर करेगा कि कानून का प्रारूप क्या है और उसका संवैधानिक परीक्षण कैसे होता है।
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सुप्रीम कोर्ट का UCC पर क्या नजरिया रहा है?
हाल ही में, शरीयत कानून की कुछ धाराओं को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि UCC समान नागरिक संहिता लागू करने का समय आ गया है। कोर्ट ने आगाह किया कि बिना सोचे-समझे किसी पर्सनल लॉ को रद्द करने से देश में उत्तराधिकार या संपत्ति के नियमों में भारी कानूनी खालीपन आ सकता है। इसलिए संसद को एक व्यापक और स्पष्ट कानून बनाना चाहिए।
पहले भी Mohd. Ahmed Khan v. Shah Bano Begum (1985) में शीर्ष अदालत ने कहा था कि समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर टिप्पणी करते हुए जोर दिया था कि समान नागरिक संहिता राष्ट्रीय एकता और लैंगिक न्याय को मजबूत कर सकती है।
इसके बाद Sarla Mudgal v. Union of India (1995) में न्यायालय ने कहा कि अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों से कई कानूनी जटिलताएं उत्पन्न होती हैं और अनुच्छेद 44 को लागू करने की दिशा में प्रयास होने चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसलों के जरिए यह स्पष्ट किया है कि यूसीसी का किसी धर्म से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि यह संविधान का एक लक्ष्य है। यह संविधान के अनुच्छेद 44 का हिस्सा है, जो राज्य को सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून बनाने का निर्देश देता है।
एक बात यह भी है कि हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कभी यह आदेश नहीं दिया कि UCC तत्काल लागू किया जाए। इस मामले में अदालत का मानना है कि ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून बनाना संसद और विधानमंडलों का अधिकार क्षेत्र है। न्यायपालिका का कार्य केवल कानून की संवैधानिक वैधता की समीक्षा करना है।
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मुस्लिम संगठनों की मांग और संवैधानिक बहस
कुछ मुस्लिम संगठन यह तर्क देते हैं कि मुस्लिम पर्सनल लॉ धार्मिक आस्था का अभिन्न हिस्सा है और इसे अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षण प्राप्त है। दूसरी ओर कई संवैधानिक विशेषज्ञों का मत है कि व्यक्तिगत कानूनों का हर हिस्सा धार्मिक अनुष्ठान नहीं माना जा सकता। यदि किसी कानून का उद्देश्य लैंगिक समानता, सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों को बढ़ावा देना है, तो राज्य आवश्यक सुधार कर सकता है। वैसे देखा जाए तो यह बहस दरअसल… धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के बीच संवैधानिक संतुलन खोजने की है।
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संवैधानिक प्रावधानों की कसौटी
गौर करने वाली बात यह है कि संविधान एक ओर धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है तो दूसरी ओर अनुच्छेद 44 के माध्यम से समान नागरिक संहिता की दिशा में राज्य को प्रयास करने की सलाह भी देता है। तथ्यों को देखते हुए एक बात साफ है, वर्तमान संवैधानिक ढांचे में केवल किसी एक धार्मिक समुदाय को UCC से बाहर रखने का स्पष्ट प्रावधान नहीं है। यदि भविष्य में ऐसा कोई कानून बनता है, तो उसकी वैधता का परीक्षण संवैधानिक प्रावधानों , विशेष कर अनुच्छेद 14, 25, 26 और अन्य प्रासंगिक प्रावधानों की कसौटी पर कस कर ही किया जा सकेगा।
मनीष राज
लेखक के बारे में
मनीष राज
मनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन… और पढ़ें
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