इस्लाम प्रचारक मौलाना मौदूदी के वंशज क्या कर रहे हैं?

यह वही सोफिया फारूकी मौदूदी हैं, जो जमात-ए-इस्लामी के संस्थापक मौलाना मौदूदी साहब की पोती हैं और अमेरिकी राज्य जॉर्जिया के कोब काउंटी की स्थानीय रिपब्लिकन राजनीति में एक सक्रिय उम्मीदवार हैं। उन्होंने सार्वजनिक रूप से इजराइल का समर्थन किया है, हमास और आतंकवाद की निंदा की है, वह एक बार फिर सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गई हैं।

मौलाना मौदूदी साहब का अपने वैचारिक क्षेत्र में बहुत बड़ा काम और नाम है। उनके बेटे फारूक मौदूदी का कहना है कि मौदूदी साहब ने अपने बच्चों को जमात-ए-इस्लामी की राजनीति से वैसे ही दूर रखा, जैसे माता-पिता अपने बच्चों को नशे से दूर रखते हैं।

मौदूदी साहब ने अमेरिका, यूरोप और पश्चिम को ‘तागूत’ (गैर-इस्लामी सत्ता) या ‘कुफ़्र की दुनिया’ करार देते हुए भी अपने बच्चों को यूरोप में पढ़ाया और वहीं सेटल कराया।मौदूदी के बेटे ( हैदर फारूक मौदूदी) ने इंटरव्यू में कहा कि मौदूदी साहब ने अपनी किताबें भी अपने बच्चों को पढ़ने तक नहीं दीं, उन्होंने खुद भी अपनी आखिरी सांसें गोरों के अस्पताल में लीं। उनकी मृत्यु 1979 में बफ़ेलो, न्यूयॉर्क के अस्पताल में हुई। इस विरोधाभास के लिए जमात के पास कई दलीलें और स्पष्टीकरण भी होंगे।

और हमारे यहां के लोग तो इस बहस में उलझे हैं कि अमेरिका इजराइल के नाम पर दूसरों के गरीब बच्चों को जंग का ईंधन बनाकर अपने परिवार को तागूतीय या कुफ़्र की दुनिया में सेटल नहीं करना चाहिए…

फिर ईरान में सेटल हो जाओ भाई 😏

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मौलाना सैयद अबुल आला मौदुदी
ابو الاعلی مودودی

पाकिस्तान में मौलाना मौदुदी की कब्र
पहले अमीर और इमाम “जमात-ए-इस्लामी” के
“शैख़ उल इस्लाम ”
अल्लामा
सैय्यद
14वीं सदी के मुजद्दिद
उत्तराधिकारी मियां तुफैल मोहम्मद
“जमात-ए-इस्लामी” के अमीर
कार्यकाल
26 August 1941 – October 1972
उत्तराधिकारी मियां तुफैल मोहम्मद
व्यक्तिगत जानकारी
जन्म 25 सितम्बर 1903
औरंगाबाद, हैदराबाद प्रांत, ब्रिटिश भारत
मृत्यु 22 सितम्बर 1979 (उम्र 75 वर्ष)
बफ़ेलो, न्यूयॉर्क, न्यूयॉर्क
मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी
धर्म इस्लाम
सम्प्रदाय सुन्नी
न्यायशास्र क़ुरआन, हदीस, इज्मा
जालस्थल www.maududi.org
Sayyid Abul A’la Maududi

मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी या अबुल आला मौदूदी (जन्म: 25 सितंबर 1903-1979; इंग्लिश: Abul A’la Maududi) मौलाना मौदूदी नाम से प्रसिद्ध, औपनिवेशिक भारतीय एवं पाकिस्तानी विद्वान,मुस्लिम दार्शनिक,क़ुरआन के अनुवादक’ एवं टीकाकार। ‘जमात ए इस्लामी पाकिस्तान’ के संस्थापक।

वह जमात-ए-इस्लामी के संस्थापक थे, जो उस समय एशिया का सबसे बड़ा इस्लामी संगठन था। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के समय, मौदूदी और जमात-ए-इस्लामी ने सक्रिय रूप से भारत के विभाजन का विरोध करने के लिए काम किया। इसके होने के बाद, मौदूदी और उनके अनुयायियों ने अपना ध्यान इस्लाम के राजनीतिकरण पर केंद्रित कर दिया और पाकिस्तान को एक इस्लामिक राज्य बनाने के लिए समर्थन पैदा किया। माना जाता है कि उन्होंने जनरल मुहम्मद जिया-उल-हक को पाकिस्तान में “शेयराइजेशन” शुरू करने को प्रेरित करने में मदद की थी। न्यायपालिका और सिविल सेवा में हजारों सदस्यों और सहानुभूति रखने वालों को नौकरी दिला कर उन्होंने प्रशासन को शरियत में ढाला ।

परिचय
औपनिवेशिक भारत के औरंगाबाद,हैदराबाद में जन्म लिया,उनके पिता मध्यवर्गीय थे,मौदूद चिश्ती (Maudood Chishti) के वंशज थे,उनका अंतिम नाम “मौदूदी”, चिश्ती सिलसिल्लाह के पहले सदस्य,ख्वाजा सैयद कुतुब उल-दीन मौदूद चिश्ती से लिया गया था।
मुुुहम्मद इक़बाल की सलाह पर लाहौर,पाकिस्तान में रहने लगे। विल्फ्रेड केंटवेल स्मिथ ने उन्हे “आधुनिक इस्लाम के सबसे व्यवस्थित विचारक” बताया।
1941 में उन्होंने ‘जमात ए इस्लामी पाकिस्तान’ की स्थापना की जिसके वे 1972 तक अमीर (अध्यक्ष) रहे, जो कि वर्तमान युग का बडा इस्लामी संगठन है। भारत में अलग ‘जमात इस्लामी हिन्द’बना।
1942 से 1967 तक की अवधि में वे चार बार जेल गये। पाकिस्तान की अनेक जेलों में पाँच वर्ष बंद रहे।
1953 में तो उनकी पुस्तक “कादियानी मसला’ को आधार बना कर फ़ौजी अदालत ने उन्हें फाँसी की सज़ा सुनाई जो बाद में आजीवन कारावास में बदल दी गयी।

पुस्तकें
मौलाना मौदूदी ने 100 से भी अधिक पुस्तकें लिखीं। उन की पुस्तकों का देश-विदेश की 40 भाषाओं में रूपांतरण हो चुका है। मौलाना मुहम्मद अली जौहर की इच्छा कि जिहाद के विषय पर ऐसी पुस्तक लिख दें जिसमें इस्लामी दृष्टिकोण से जिहाद का विवरण हो इस पर मौदूदी ने “अल जिहाद फिल इस्लाम” पुस्तक लगभग ६०० पृष्ठ में उर्दू में लिखी, बिर्टिश लेखिका हुदा ख़त्ताब के सहयोग से वो इंग्लिश में भी प्रकाशित हुई। मराठी में १४४ पृष्ठ और हिंदी में केवल एक अध्याय ‘इस्लामी जिहाद की हक़ीकत’ के अनुवाद करके ‘इस्लामी जिहाद की वास्तविकता’नाम से केवल ३२ पृष्ठ छपे हैं। तब सैयद अबुल आला मौदूदी केवल 24 वर्ष के थे।

अल्लामा इकबाल ने इस पुस्तक के बारे में कहा था:”यह जिहाद की इस्लामी विचारधारा और उसके शांति और युद्ध के कानून पर एक उत्कृष्ट काम है और मैं हर जानकार व्यक्ति को इसका अध्ययन करने की सलाह देता हूं।मौलाना मौदूदी की पुस्तक ‘इस्लाम धर्म’भी बहुत चर्चित पुस्तकों में है।

पुरस्कार और सम्मान
सऊदी अरब में, पहला किंग फैसल अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार 1979 में इस्लाम की सेवा के लिए मिला। मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी इतिहास में दूसरे थे जिनकी गायबाना नमाज़-ए-जनाज़ा काबा में पढ़ी गई थी,जिसमें बादशाह अश्म इब्न-अबजर भी थे ।

अंतिम समय

मौलाना अबुल अला मौदूदी की क़ब्र
अप्रैल 1979 में, किडनी की बीमारी के साथ उन्हें हृदयरोग भी था। इलाज को संयुक्त राज्य अमेरिका गए और न्यूयॉर्क के बफ़ेलो में भर्ती हुए , जहाँ उनके दूसरे बेटे चिकित्सक रहे थे। कुछ शल्यक्रिया के बाद, 75 वर्ष की आयु में 22 सितंबर 1979 को मृत्यु हो गई,बाद में अपने आवास पर अचिह्नित कब्र अर्थात कच्ची कब्र में दफनाये गये।

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