शाइरों का अडानी सेठ है राष्ट्रीय नाज़िम नदीम फ़र्रूख़, किसी को भी बना दे स्टार
*♦️मुशाइरों की दुनिया का अडानी सेठ है राष्ट्रीय नाज़िम नदीम फ़र्रूख़, किसी को भी बना सकता है स्टार-*
*♦️ अपनी शोहरत के दम पर नये-नये तरीक़ों से पैसा कमा रहे हैं कुछ शाइर, पुलिस को रखनी चाहिए नज़र-*
*♦️जो कभी प्रोफेसर ही नहीं रहा वो पचास से अपने नाम के आगे लिख रहा है प्रोफेसर-*
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(हमारे मुशाइरे भाग-53)
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‘अज़हर’ मुशाइरा तो अदबगाह था मगर
हमने तमाशागाह इसे ख़ुद बना दिया
-अज़हर इनायती
अदब तो बेच दिया तालियों-लिफ़ाफ़े में
बनोगे और भला तुम भी नामवर कितना
-लोकेश कुमार सिंह ‘साहिल’
दोस्तो!
जिस तरह से आज हिंदुस्तान में कारोबार के मामले में अडानी सेठ को राष्ट्रीय सेठ कहा जाने लगा है, वैसे ही पिछले दस-बारह सालों में नदीम फ़र्रूख़ ने जिस तरह से देश-विदेश के बेशतर बड़े मुशाइरों पर क़ब्ज़ा कर एक तरफ़ा अपनी तूती बुलवाई है, उसके मद्द-ए-नज़र उसे मुशाइरों की दुनिया का अडानी सेठ कहना क़तई ग़लत नहीं होगा। आज बहुत से लोग तो उसे मुशाइरा इंडस्ट्री का वो ख़ुदा मान बैठे हैं जो किसी भी गुमनाम और बुरे से बुरे शाइर को शोहरतों के शिखर पर बैठाने की कुव्वत रखता है। हिंदुस्तान में अल्लाह ने ये ताक़त इसके अलावा सिर्फ़ रेहान सिद्दीक़ी और शाज़िया क़िदवई को अता की है। ये दोनों भी किसी बुरे से बुरे शाइर को स्टार बनाने का माद्दा रखते हैं। उनके पास वो सारा सिस्टम और मैनेजमेंट मौजूद है जिसका स्विच दबाते ही गुमनाम शाइर शोहरत के आसमान पर चढ़ने नहीं बल्कि उड़ने लगता है। हिमांशी बाबरा उन ख़ुशनसीबों में से जिसे नदीम फ़र्रूख़ और रेहान सिद्दीक़ी- शाज़िया क़िदवई इन दोनों अज़ीम हस्तियों का ऐसा साथ मिला कि चंद सालों में ही वो देश-विदेश के मुशाइरों की स्टार शाइरा बन चुकी है। इसी के जैसा एक और ख़ुशनसीब शाइर इब्राहीम अली ज़ीशान है जो इनकी बदौलत मुशाइरों के आसमान पर एक रौशन सितारा बन कर चमक रहा है।
*♦️मुशाइरों की दुनिया का सबसे कमज़ोर नाज़िम नदीम फ़र्रूख़ अपने सियासी और प्रशासनिक रसूख़ से बना सबसे सबसे महंगा नाज़िम-*
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दोस्तो!
मुशाइरों की दुनिया में एक से बढ़कर एक नाज़िम आए हैं, जिनकी निज़ामत का एक मैयार हुआ करता था। वो किसी शाइर को पेश करते वक़्त उतनी ही तारीफ़ करते थे, जितनी तारीफ़ का वो हक़दार होता था। आज भी ऐसी मैयारी निज़ामत करने वाले Mansoor Usmani साहब हमारे बीच मौजूद हैं। उनकी निज़ामत में बोले गये अदबी जुमले याद और कोट करने लायक़ होते हैं लेकिन इस समय मुशाइरों की दुनिया में बतौर नाज़िम अब तक के सबसे कमज़ोर नदीम फ़र्रूख़ का एक तरफ़ा बोलबाला है जो निज़ामत के नाम पर सिर्फ़ चापलूसी की भाषा इस्तेमाल करता है। अपने रसूख़ की वजह से आज उसके और उसकी टीम के पास ज़ियादातर बड़े- मझले मुशाइरे होते हैं।
इस वक़्त जो शु’अरा सबसे ज़ियादा मुशाइरों में नज़र आते हैं, पहले उन नामों को जान लेते हैं और फिर नदीम फ़र्रूख़ की उस कोर टीम की बात करते हैं। इस वक़्त देश में सबसे ज़ियादा बड़े मुशाइरे पढ़ने वालों में वसीम बरेलवी, इक़बाल अशहर,शकील आज़मी, पापुलर मेरठी,महशर आफ़रीदी,अबरार काशिफ़,अज़्म शाकरी, हिमांशी बाबरा, जौहर कानपुरी, शबीना अदीब, अल्ताफ़ ज़िया, हाशिम फ़िरोज़ाबादी, नवाज़ देवबन्दी, माजिद देवबन्दी, आदिल रशीद, सलीम सिद्दीक़ी, ख़ुर्शीद हैदर, इब्राहीम अली ज़ीशान, मनिका दुबे, राजेश रेड्डी, मनमोहन दानिश,नुसरत मेहदी,
नईम अख़्तर ख़ादमी, नदीम शाद मुईन शादाब समेत चंद नाम और जोड़े जा सकते हैं।
इनके अलावा बड़े मुशाइरों में कुछ लोकल या इलाक़ाई शाइर भी शामिल कर लिए जाते हैं।
इन शु’अरा में से नदीम फ़र्रूख़ की कोर टीम में शकील आज़मी, महशर आफ़रीदी, हिमांशी बाबरा, इब्राहिम अली ज़ीशान, आदिल रशीद, सलीम सिद्दीक़ी के नाम लिए जा सकते हैं। इनके अलावा जो बाक़ी शाइर हैं, उनमें से दो-चार शाइर कन्वीनर्स की डिमांड के मुताबिक भी शामिल कर लिए जाते हैं।
नदीम फ़र्रूख़ के अलावा देश में एक दूसरा बड़ा ग्रुप इक़बाल अशहर का है। इसकी कोर टीम में इक़बाल अशहर, वसीम बरेलवी, पापुलर मेरठी, अज़्म शाकरी, नदीम शाद, हाशिम फ़िरोज़ाबादी, महशर आफ़रीदी और शकील आज़मी, हिमांशी बाबरा भी शामिल हैं। इस ग्रुप में निज़ामत की ज़िम्मेदारी अबरार काशिफ़ संभालता है।
एक तीसरा ग्रुप है रेहान सिद्दीक़ी और शाज़िया क़िदवई का जो ‘अंदाज़-ए-बयां और’ के बैनर तले देश में शाइरों की खोज करके हमारे अदब पर बड़ा अहसान करता है। फिर खोजे गए शाइरों को मुशाइरा पढ़वाने दुबई ले जाता है। ये दो देशों में अलग-अलग नामों से रजिस्टर्ड कंपनी है जिसके बारे में हम आगे डिटेल में बात करेंगे। अभी मेरा मक़सद आपको ये बताना है कि सैकड़ों करोड़ की इस मुशाइरा इंडस्ट्री पर कितने ग्रुप का क़ब्ज़ा है और इसमें से सबसे बड़ा ग्रुप नदीम फ़र्रूख़ का है।
ये तीनों ग्रुप ही हिंदुस्तान से लेकर खाड़ी देशों तक के मुशाइरों में अपना दख़्ल रखते हैं।
*♦️मुशाइरों और शाइरों पर इन्कमटैक्स और पुलिस को रखना चाहिए ख़ुफ़िया निगरानी-*
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दोस्तो!
ज़ियादातर मुशाइरों में शु’अरा का पेमेंट सिस्टम आज भी लिफ़ाफ़े वाला है। यही वजह है कि ये पैसा पूरी तरह एक नंबर में शो नहीं हो पाता है और बहुत से शाइर टैक्स में सरकार को चूना लगाते हैं। इसके अलावा कुछ शाइर अपनी शोहरत का ना-जाइज़ फ़ाइदा उठा कर ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से भी पैसा बनाने का काम करते हैं। यूपी एक बड़े शाइर और नाज़िम का नाम एक बड़े घोटालेबाज़ के साथ किए एक प्रोग्राम को लेकर आया था। दरअस्ल उस प्रोग्राम की आड़ में एक बड़ा आर्थिक घोटाला अंजाम दिया गया था। उस मामले में जब मुख्य आरोपी के साथ उस शाइर का नाम भी पुलिस फाइल में आ गया तो वो कई हफ़्तों अंडरग्राउंड रहा। उसने अपना भेस तक बदल लिया और फिर अपने सियासी और प्रशासनिक रिश्तों का इस्तेमाल कर बड़ी मुश्किल से उसने अपना नाम आरोपियों की लिस्ट से हटवाया।
ऐसे ही एक शाइर, जो फिल्मी गीतकार भी है, वो भी फिल्म फायनेंस करवाने के लिए मोटा कमीशन लेता है और इसकी सरकार को कोई ख़बर नहीं है। दरअस्ल अपनी शोहरत के दम पर इस शाइर के खाड़ी देशों और हिंदुस्तान के कई बड़े बिजनेसमैन और उद्योगपतियों से संबंध बन गये हैं। ऐसे में किसी भी पैसे वाले से फिल्म में फायनेंस करवाने का भी धंधा उसके शुरू कर दिया क्योंकि इसमें मोटा कमीशन मिलता है। इसी साल की शुरुआत में एक प्रोड्यूसर-डायरेक्टर की एक फिल्म रिलीज हुई है। उस प्रोड्यूसर-डायरेक्टर को इस शाइर ने दुबई के एक आदमी से दस करोड़ का फायनेंस दिलवाया था। पैसा मिलने के बाद ये शाइर तयशुदा कमीशन से भी ज़ियादा पैसा मांगने लगा। इस बात पर इसका उस प्रोड्यूसर-डायरेक्टर से झगड़ा हो गया। हालांकि उसने इसकी डिमांड के मुताबिक कमीशन तो दे दिया लेकिन अपनी उस फिल्म से इसके गाने निकाल दिए। इसी शाइर ने देश के बड़े शहरों में कई बिल्डरों से अपने शाइर होने का फ़ाइदा इस रूप में उठाया कि उनसे सस्ते दामों में प्लाट ले रखे हैं। अगर सरकार मुशाइरों की आड़ में चल रहे ऐसे धंधों की भी जानकारी निकाले तो पता चलेगा कि कुछ शाइर कैसे अपनी शोहरत का ना-जाइज़ फ़ाइदा उठा कर पैसा बनाने में लगे हुए हैं और सरकारी टैक्स की चोरी कर रहे हैं।
*♦️जो कभी प्रोफेसर ही नहीं रहा वो पचास साल से ख़ुद को बता रहा है प्रोफेसर-*
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दोस्तो!
हमारे अदब की दुनिया भी बड़ी अजीब है। यहां कभी-कभी शाइर बरसों तक झूठ बोलता रहता है और लोग उस पर आंख मूंद कर यक़ीन भी करते रहते हैं। आज मैं आपको एक ऐसे सीनियर शाइर के बारे में बता रहा हूं जो अपनी ज़िन्दगी में कभी प्रोफेसर रहा ही नहीं लेकिन आज तक वो अपने नाम के आगे प्रोफेसर लगाकर लोगों को बेवकूफ़ बना रहा है। मुशाइरों की दुनिया में पिछले 60-62 साल से मौजूद ये शख़्स पिछले पचास सालों से ख़ुद को प्रोफेसर लिखता आ रहा है। जबकि सच्चाई ये है कि ये जिस कालेज में पढ़ाता था, वहां सरकारी तौर पर प्रोफेसर का पद ही स्वीकृत नहीं था। दरअस्ल तब उत्तर प्रदेश सरकार में ये नियम था कि प्रोफेसर का पद सिर्फ़ उन्हीं कालेजों में होगा जहां पोस्ट ग्रेजुएशन है और जिस कालेज में ये शाइर पढ़ाता था वो जूनियर कालेज था लिहाज़ा वहां प्रोफेसर के पद के बजाय रीडर का पद था। जब तक ये शाइर रिटायर हुआ तब तक उस कालेज में रीडर के पद ही रहा लेकिन ये हमेशा अपने नाम के आगे प्रोफेसर लगाता रहा। चूंकि कम पढ़े-लिखे मुसलमानों में प्रोफेसर शब्द का बड़ा रौब पड़ता है तो इसने रीडर के बजाय प्रोफेसर जोड़ लिया और आजतक ख़ूब इज़्ज़त कमाई।
ऐसे और कई शाइरों के वो कारनामें हैं जिनका खुलासा हम आगे करेंगे।
बहुत शुक्रिया।
🙏🙏
(नोट – अगली कड़ी में पढ़ें कि कैसे बुरे शाइरों को हिट करके मुशाइरों को बनाया जाता है कामयाब।)
*✍️ अखिल राज*
*पत्रकार,लेखक,शाइर*
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