एक्टिविस्ट है कि पत्रकार? कैसी पत्रकारिता करता है श्याम मीरा सिंह?
‘माइक छीन लिया, डंडे मारे, फिर भी नारे लगाता रहा…’, श्याम मीरा सिंह ने सुनाई हिरासत और पुलिस की कहानी
दिल्ली में SIR के ख़िलाफ़ प्रदर्शन की कवरेज के दौरान पत्रकार श्याम मीरा सिंह को हिरासत में लिया गया था। द रेड माइक के साथ बातचीत में उन्होंने पुलिस पर मारपीट और रिपोर्टिंग से रोकने के आरोप लगाए। उन्होंने स्वतंत्र पत्रकारिता, नागरिक पत्रकारिता और पत्रकारों को ‘रीलबाज़’ कह निरस्त करने की कोशिशों पर भी सवाल उठाए।
By Saurabh Shukla 25 Oct 2026
दिल्ली में 10 अक्टूबर को SIR विरोधी प्रदर्शन में पत्रकारों को हिरासत में ले उनसे कथित मारपीट की घटनाओं ने प्रेस की आज़ादी पर चर्चा है। प्रदर्शन की कवरेज करते स्वतंत्र पत्रकार श्याम मीरा सिंह को भी दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया। उनके अनुसार, पुलिस ने उन्हें तब पकड़ा, जब वह कनॉट प्लेस में एक भीड़ की गतिविधियां रिपोर्ट कर रहे थे। श्याम का आरोप है कि भीड़ ने उन्हें घेर लिया और पुलिस ने उनकी सुरक्षा करने के बजाय भीड़ के दबाव में उन्हें हिरासत में ले लिया। द रेड माइक से बातचीत में श्याम मीरा सिंह ने 10 अक्टूबर की घटना बताई कि प्रदर्शन पूर्व ही पत्रकारों को ख़बरें मिल रही थीं कि कनॉट प्लेस के ए ब्लॉक में कुछ लोग स्वतंत्र पत्रकारों और कंटेंट क्रिएटर्स को निशाना बना सकते हैं। पहले ही एक पत्रकार ने कर दिया था सतर्क
उनके अनुसार, स्टारबक्स के सामने करीब 200 से 300 लोगों का एक समूह जमा था। श्याम का आरोप है कि यह समूह सरकार और चुनाव आयोग के समर्थन में नारे लगा राहुल गांधी के ख़िलाफ़ बोलता था। अगर कोई स्वतंत्र पत्रकार या विपक्षी कार्यकर्ता वहां दिखता, तो उसे घेरने और परेशान करने की कोशिश होती थी।
दिल्ली पुलिस की भूमिका पर उठाए सवाल
श्याम ने बताया कि न्यूज़लॉन्ड्री के एक पत्रकार ने उन्हें पहले ही सतर्क रहने को कहा था। उस पत्रकार के अनुसार, भीड़ में कुछ लोग श्याम के वहां आने की बात कर रहे थे और उन्हें घेरने की योजना बना रहे थे। इसके बाद BBC, न्यूज़लॉन्ड्री और दूसरे संस्थानों के पत्रकारों ने समूह में रहकर रिपोर्टिंग का फ़ैसला किया। श्याम के अनुसार, जब तक वे 14-15 पत्रकार साथ थे, तब तक किसी ने उन पर हमला नहीं किया। लेकिन उनमें लगातार यह डर बना हुआ था कि कभी भी उन्हें निशाना बनाया जा सकता है।
‘पुलिस ने मेरी मदद करने के बजाय मुझे ही न्यूसेंस बताया’
श्याम ने बताया कि जब वह एक वीडियो अपलोड करने दूसरी जगह गए और वापस लौटे, तब उनके साथ केवल एक कैमरामैन था। तभी उन्होंने एक व्यक्ति को टोपी पहने दूसरे युवक को पीटते देखा। उन्हें शक हुआ कि कोई व्यक्ति जानबूझकर मुस्लिम पहचान का रूप देकर मारपीट कर रहा है, ताकि सांप्रदायिक तनाव पैदा किया जा सके। उन्होंने पुलिस को इसकी जानकारी देने और घटना रिपोर्ट करने की कोशिश की। लेकिन तभी वहां मौजूद कुछ लोगों ने उन्हें घेर सवाल किया कि उन्हें क्या दिक्कत है। श्याम का कहना है कि भीड़ ने उनके ख़िलाफ़ नारेबाज़ी शुरू कर दी और मारपीट की स्थिति बनने लगी। वह मदद की उम्मीद में पास खड़े सशस्त्र बलों के जवानों के पास गए, लेकिन उन्होंने कोई मदद नहीं की। तब उन्होंने दिल्ली पुलिस के एक जवान, धर्मेंद्र कुमार, को बताया कि भीड़ उन्हें निशाना बना सकती है। श्याम के अनुसार, पुलिसकर्मी ने उनकी बात सुनने के बजाय कहा, “तुम न्यूसेंस फैला रहे हो।” पुलिस ने भीड़ रोकने या उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के बजाय उन्हें ही वहां से हटाने की कोशिश की। कुछ दूर जाकर वही पुलिसकर्मी वापस आया और उन्हें पकड़ ले गया। श्याम ने कहा, “उस भीड़ के कहने पर पुलिस वाले ने मुझे पकड़ा। उसे पता था कि मैं पत्रकार हूं। मेरे हाथ में इतना बड़ा माइक था, मेरा कार्ड लगा हुआ और कैमरामैन भी साथ था।” उनके अनुसार, पुलिस ने उन्हें इस तरह खींचकर पकड़ा और वैन में डाला, जैसे वह कोई आतंकवादी या दंगाई हों। जिस भीड़ ने उन्हें घेर मारपीट की कोशिश की, उसमें से किसी को भी पुलिस ने नहीं पकड़ा। श्याम ने कहा कि वह इस घटना से पहले ही एक वीडियो में कनॉट प्लेस के ए ब्लॉक में भीड़ और स्वतंत्र पत्रकारों को निशाना बनाए जाने की आशंका जता चुके थे। उनके अनुसार, वीडियो पोस्ट करने के तीन घंटे बाद उनसे भी वैसा ही हुआ।
‘मोदी मुर्दाबाद कहना गाली है तो 300 बार कहूंगा’
श्याम मीरा सिंह के अनुसार, हिरासत में लिए जाने पर उन्होंने अमित शाह और नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ नारे लगाए। इस पर पुलिसकर्मी ने उन पर डंडे से हमला किया। जिस पुलिसकर्मी से उन्होंने पहले मदद मांगी थी, उसी ने उन पर तीन बार पूरी ताक़त से डंडे मारे। जब उन्होंने पुलिसकर्मी से पूछा कि उन्हें क्यों मारा जा रहा है, तो जवाब मिला कि वह मोदी मुर्दाबाद और अमित शाह मुर्दाबाद के नारे लगा रहे थे। श्याम के अनुसार, पुलिसकर्मी ने इन नारों को गाली बताया। श्याम ने यह भी बताया कि हिरासत में ले जाते समय पुलिस ने बड़ी बसों के बजाय जालीदार वैन का इस्तेमाल किया। ऐसी गाड़ियां उन्होंने पहले संवेदनशील इलाक़ों में देखी थीं, जिनमें आतंकवाद के आरोपियों को ले जाया जाता है। वैन की छोटी खिड़की से वह अपनी बात रिकॉर्ड कर रहे थे और तभी पुलिसकर्मी ने उन पर डंडे चलाए।
‘माइक छीन लिया गया, तब मैंने नागरिक के तौर पर नारे लगाए’
श्याम के नारे लगाने को लेकर सोशल मीडिया पर सवाल भी उठे। कुछ लोगों ने कहा कि पत्रकार को नारेबाज़ी नहीं करनी चाहिए और इस तरह वह अपनी पत्रकारिता की निष्पक्षता खो सकता है। द रेड माइक के साथ बातचीत में श्याम ने माना कि सामान्य परिस्थितियों में पत्रकार को रिपोर्टिंग करते समय नारे नहीं लगाने चाहिए। लेकिन उन्होंने कहा कि 10 अक्टूबर की स्थिति सामान्य नहीं थी। उन्होंने कहा, “जब तक मैंने माइक पकड़ी हुई और मैं रिपोर्टिंग कर रहा हूं, तब तक नारे नहीं लगाने चाहिए। लेकिन जब मेरा माइक ही छीन लिया गया, जब पत्रकार को पत्रकार रहने ही नहीं दिया गया, तब मैं एक नागरिक के तौर पर सामने आया।” श्याम के मुताबिक, उस समय पत्रकारों को हिरासत में लेना सिर्फ़ पत्रकारिता पर हमला नहीं था, बल्कि संविधान और नागरिक अधिकारों पर भी हमला था। उन्होंने कहा कि पुलिस का काम संविधान की रक्षा करना और नागरिकों को सुरक्षा देना है। लेकिन जब पुलिस ही अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे हट जाए, तो नागरिक के तौर पर आवाज़ उठाना ज़रूरी हो जाता है। उन्होंने कहा, “जब पत्रकारों को उनका बुनियादी काम नहीं करने दिया गया, तो मुझे लगा कि यह लड़ाई जितनी प्रदर्शनकारियों और देश के नागरिकों की है, उतना ही बराबर का भागीदार मैं भी हूं।” श्याम ने यह भी कहा कि वह उन लोगों की राय का सम्मान करते हैं, जो मानते हैं कि पत्रकारों को नारे नहीं लगाने चाहिए। लेकिन उनके मुताबिक, जब उनसे रिपोर्टिंग का अधिकार छीन लिया गया और उन्हें हिरासत में ले लिया गया, तब उन्होंने नागरिक के तौर पर अपनी बात रखी।
‘46 पत्रकारों को हिरासत में लेना सामान्य घटना नहीं’
श्याम ने 10 और 11 अक्टूबर को पत्रकारों की बड़े पैमाने पर हुई हिरासत को अभूतपूर्व बताया। बातचीत में उन्होंने पत्रकार मंदीप पुनिया की ओर से तैयार की गई उस सूची का ज़िक्र किया, जिसमें 46 पत्रकारों के नाम शामिल हैं। उनका कहना था कि इस बार सिर्फ़ प्रदर्शनकारियों को नहीं, बल्कि पत्रकारों और कंटेंट क्रिएटर्स को भी निशाना बनाया गया। उन्होंने कहा, “किसी एक आंदोलन में अगर एक पत्रकार को हिरासत में ले लिया जाता था, तो वह बहुत बड़ी खबर बनती थी। लेकिन अचानक 10 तारीख़ के बाद आप देखते हैं कि सिर्फ़ नागरिकों को ही नहीं, पत्रकारों को भी हिरासत में डालना शुरू कर दिया गया।” श्याम के मुताबिक, प्रज्ञा मिश्रा, अनमोल प्रीतम और दूसरे पत्रकारों के साथ भी कार्रवाई हुई। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर इतने पत्रकारों को राजधानी में हिरासत में लिया जा रहा था, तो सरकार की ओर से उन्हें रिपोर्टिंग से न रोकने का स्पष्ट संदेश क्यों नहीं दिया गया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को भी पत्रकारों और वकीलों को उनके काम से रोकने के ख़िलाफ़ टिप्पणी करनी पड़ी, लेकिन इसके बावजूद हिरासत की कार्रवाई हुई। श्याम को पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने ले जाया गया था। उनके मुताबिक, बाद में वकील और दूसरे पत्रकार थाने पहुंचे और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला देते हुए उनकी रिहाई की मांग की। श्याम ने बताया कि शुरुआत में पुलिस ने टालने की कोशिश की, लेकिन जब पत्रकारों और वकीलों ने विरोध तेज़ करने की बात कही, तब उन्हें छोड़ा गया। उन्होंने आरोप लगाया कि थाने में पुलिसकर्मियों ने उन्हें सबक सिखाने और उनकी पिटाई करने जैसी बातें भी कहीं। हालांकि, बाद में उन्हें गिरफ़्तारी के बजाय हिरासत में लिए जाने के तौर पर छोड़ा गया। ‘500 रुपये का माइक लेकर आने वाले रीलबाज़ नहीं, नागरिक पत्रकार हैं’ बातचीत के दौरान श्याम ने उन टीवी पत्रकारों और एंकरों की आलोचना की, जो स्वतंत्र पत्रकारों और कंटेंट क्रिएटर्स को ‘रीलबाज़’ कहकर उनकी पत्रकारिता पर सवाल उठाते हैं। उन्होंने इस सोच को वर्गवादी बताते हुए कहा कि हर किसी के पास बड़े मीडिया संस्थानों में काम करने या महंगे संसाधन जुटाने की सुविधा नहीं होती। श्याम ने कहा, “यह कितनी क्लासिस्ट बात है कि आप देश के कंटेंट क्रिएटर्स या नागरिकों से कह रहे हैं कि 500 रुपये का माइक लेकर आ जाते हैं। यह एक तरह का कास्टिज़्म भी है। जो लोग संसाधनहीन हैं, जो बड़े संस्थानों या बड़ी यूनिवर्सिटी तक नहीं पहुंच सके, आप उन्हें रीलबाज़ कहकर ख़ारिज कर रहे हैं।”
श्याम ने संविधान के अनुच्छेद 19 का हवाला देते हुए कहा कि भारत में पत्रकारों के लिए अलग से कोई विशेष संवैधानिक दर्जा नहीं है, जो उन्हें आम नागरिकों से अलग करता हो। उनके मुताबिक, नागरिक पत्रकारिता भी अभिव्यक्ति की आज़ादी का हिस्सा है। श्याम ने कहा, “इस देश में सिटिजन जर्नलिज़्म भी उतना ही बराबर है, जितनी NDTV या इंडिया टुडे के पत्रकार की पत्रकारिता। किसी गांव में बैठी एक महिला का वीडियो बना देना भी उतना ही अहम हो सकता है। इसके लिए किसी कोर्स या डिग्री की ज़रूरत नहीं है।” उन्होंने टीवी चैनलों के डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया पर उनकी मौजूदगी को लेकर भी सवाल उठाए। श्याम ने कहा कि अगर इंस्टाग्राम पर वीडियो और रील बनाने वाले पत्रकार नहीं हैं, तो बड़े टीवी चैनलों को भी अपने इंस्टाग्राम और यूट्यूब पेज बंद कर देने चाहिए, क्योंकि उनके एंकर भी इन्हीं प्लेटफॉर्म पर वीडियो डालते हैं।
उनके अनुसार, “यह दोहरे मापदंड हैं कि वही नियम आपके लिए कुछ और हैं और किसी दूसरे के लिए कुछ और। रील एक माध्यम है। आप उसका इस्तेमाल खुद करते हैं, लेकिन दूसरों को उसी वजह से पत्रकार मानने से इनकार करते हैं।”
‘हम कहानी नहीं हैं, हम कहानी कहने वाले हैं’
बातचीत के आख़िर में श्याम ने स्वतंत्र पत्रकारिता के सामने मौजूद चुनौतियों और पत्रकारिता के बदलते माध्यमों पर बात की। उनका कहना था कि डिजिटल प्लेटफॉर्म ने पत्रकारिता की नई धाराएं खोली हैं। पहले टेलीविज़न और फिर यूट्यूब की तरह इंस्टाग्राम भी अब रिपोर्टिंग का एक माध्यम बन चुका है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का काम सिर्फ़ किसी घटना को रिकॉर्ड करना नहीं, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर नागरिक के तौर पर अपनी ज़िम्मेदारी को समझना भी है।
श्याम ने एक उदाहरण देते हुए कहा कि अगर पुलिस किसी निर्दोष प्रदर्शनकारी को बुरी तरह पीट रही हो, तो पत्रकार का काम घटना की रिपोर्टिंग करना है, लेकिन क्या वह उस व्यक्ति को बचाने की कोशिश भी कर सकता है? उसके अनुसार, पत्रकारिता और नागरिक ज़िम्मेदारी एक-दूसरे से पूरी तरह अलग करके नहीं देखी जा सकती। बातचीत में स्वतंत्र पत्रकारों को लेकर चल रहे नैरेटिव पर सवाल उठाए गए। इस पर श्याम ने कहा कि पत्रकारिता की पहचान किसी संस्थान या एंकर के प्रमाणपत्र से नहीं, बल्कि दर्शकों और पाठकों से तय होनी चाहिए।
‘…मोदी बेशर्म प्रधानमंत्री है’: कंपनी पॉलिसी उल्लंघन पर AajTak ने निकाला, PM को जिम्मेदार बता खुद को दिखा रहा ‘शहीद’
आजतक कर्मचारी श्याम मीरा सिंह बर्खास्त
आजतक कर्मचारी ने अपने टर्मिनेशन को बताया पीएम को जिम्मेदार
इंडिया टुडे ग्रुप के आजतक (AajTak) से जुड़े रहे श्याम मीरा सिंह ने जुलाई 19, 2021 को ट्विटर पर अपनी बर्खास्तगी के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जिम्मेदार बताया, जबकि असलियत में उसे कंपनी की सोशल मीडिया पॉलिसी का उल्लंघन करने को टर्मिनेट किया गया है।
कॉन्ट्रैक्ट के उल्लंघन पर बर्खास्त हुआ श्याम मीरा सिंह
श्याम ने टर्मिनेशन के बाद ट्विटर पर दो स्क्रीनशॉट शेयर किए। इस ट्वीट में उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सम्मान न देने की बात की है। साथ ही इन ट्वीट्स में प्रधानमंत्री मोदी को बेशर्म भी कहा है। उसने लिखा है, “बार-बार दोहराना चाहता हूँ। हाँ! मोदी बेशर्म प्रधानमंत्री है।”
श्याम मीरा सिंह का टर्मिनेशन लेटर (साभार: @shyammeerasingh)
ट्वीट में श्याम ने कंपनी द्वारा भेजे गए उस मेल को भी साझा किया है जिसमें उन्हें उनकी बर्खास्तगी के बारे में बताया गया। इसमें मीडिया हाउस ने कहा कि दो आधिकारिक चेतावनियों समेत कई बार वार्निंग दिए जाने के बाद भी श्याम सोशल मीडिया पर अपने पोस्ट करते रहे, जो कि कंपनी की पॉलिसी के विरुद्ध है।
मालूम हो कि इंडिया टुडे समूह की सोशल मीडिया नीति मीडिया हाउस से जुड़े कर्मचारियों को उनकी व्यक्तिगत राय सोशल मीडिया पर डालने से मना करती है। साथ ही उन्हें उनके सोशल मीडिया का उपयोग केवल उन समाचारों के लिए इस्तेमाल करने की सलाह देती है जो मीडिया हाउस द्वारा प्रकाशित या प्रसारित किए गए हैं।
इंडिया टुडे की सोशल मीडिया पॉलिसी
साल 2020 के अक्टूबर माह में इंडिया टुडे ने इस संबंध में निर्देश जारी किए थे। एडवाइजरी में कहा गया था कि इंडिया टुडे ग्रुप के साथ अनुबंध रखने वाला व्यक्ति अपने व्यक्तिगत हैंडल का उपयोग केवल उस समूह से संबंधित सामग्री या प्रचार को पोस्ट करने के लिए कर सकता है, जिसका उपयोग प्रिंट, डिजिटल या ऑन एयर में किया गया है। इसमें आगे कहा गया कि ऐसे व्यक्ति (इंडिया टुडे के साथ कॉन्ट्रैक्ट वाले) किसी पोस्ट का रिप्लाई या उनको रीट्वीट भी नहीं कर सकते, भले ही उन्हें उसमें टैग किया गया हो। वे केवल समूह की सामग्री पर ही जवाब दे सकते हैं।
बता दें कि जब से ये दिशा-निर्देश लागू हुए हैं, तब से मीडिया हाउस के कई शीर्ष कर्मचारी जैसे राजदीप सरदेसाई, गौरव सावंत, राहुल कंवल, पाणिनी आनंद वगैरह भी अपने व्यक्तिगत विचारों को सोशल मीडिया पर शेयर करने से बच रहे हैं। ऐसे में जाहिर सी बात है कि श्याम मीरा सिंह कोई अपवाद नहीं हो सकते थे।
सोशल मीडिया यूजर्स ने उड़ाया मजाक
सोशल मीडिया पर श्याम का ट्वीट वायरल होने के बाद इस पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। लोगों ने उन पर तंज कसा है कि राजदीप सरदेसाई जैसे पत्रकारों को मोदी से घृणा करने पर बर्खास्त नहीं किया गया, लेकिन उनको ऐसे ट्वीट्स के लिए कर दिया गया। यूजर कहते हैं कि जरूर वह अपनी नौकरी में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रहे होंगे तभी उन्हें निकाला गया, अगर पीएम मोदी कारण होते तो कई कर्मचारियों पर कार्रवाई होती।
Yeah, they don’t terminate Rajdeep Sardesai for all his anti-Modi hate on air, but terminated you for couple of innocuous tweets…. You must be terrible at your job https://t.co/guSvBoFywt
— Gappistan Radio (@GappistanRadio) July 19, 2021
कई यूजर्स ने उन्हें बेवकूफ करार देते हुए सलाह दी कि वह अपने सीनियर्स से कुछ सीखें ताकि अपनी नफरत ‘पत्रकारिता का सच’ कहकर छिपा सकें और सरकारी नीतियां बड़े प्लेटफॉर्म पर बदनाम कर सकें।
कुछ ने उन्हें कहा कि वह कंपनी पॉलिसी के अनुसार काम करना सीखें और समझें कि कॉर्पोरेट जगत में कैसे काम किया जाता है।

