UGC के नए नियमों पर भाजपा में ही विरोध,विपक्ष मौन,कांग्रेस चाहे और कठोर
UGC के नए नियमों का भाजपा के अंदर ही इतना विरोध क्यों हो रहा? विपक्ष की चुप्पी के मायने
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने शिक्षण संस्थानों में सामाजिक भेदभाव को खत्म करने के लिए नए नियम लागू किए हैं, जिसे लेकर अगड़ी जाति के लोग विरोध में उतर गए हैं. इतना ही नहीं बीजेपी के सवर्ण नेता भी अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं तो विपक्ष खामोशी अपना रखी है.
यूजीसी के नए नियम के खिलाफ विरोध प्रदर्शन
नई दिल्ली,27 जनवरी 2026,देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा एक नया नियम लागू होने से राजनीति गरमा गई है. शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने और समानता को बढ़ावा देने के मकसद से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन 2026’ के रूप में नये नियम लागू किए हैं.
यूजीसी के नए नियम को लेकर एक तरफ जहां सामाजिक न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया जा रहा है तो वहीं दूसरी तरफ विरोध के सुर उठने लगे हैं. खासकर अगड़ी जातियों से जुड़े संगठनों और प्रभावशाली नेताओं ने इस लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं.
यूजीसी के नए नियमों को लेकर बवाल इतना बढ़ गया है कि बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. सवर्ण जाति संगठनों ने आंदोलन तेज करने की धमकी दे डाली है. बीजेपी में भी इसे नए नियम को लेकर विरोध बढ़ता जा रहा है. कई मौजूदा और पूर्व सांसदों और विधायकों ने भी अपनी नाराजगी जाहिर की है. जबकि विपक्ष चुप है. ऐसे में सवाल उठता है कि सबसे ज्यादा बेचैनी बीजेपी के नेताओं में ही दिख रही है?
नए नियम को लेकर भाजपा नेता बेचैन
यूजीसी के नए नियम को लेकर भाजपा में ही विरोध हो रहा हैं.भाजपा के दिग्गज नेता बृजभूषण शरण सिंह के विधायक बेटे प्रतीक भूषण ने बिना नाम लिए यूजीसी के नियमों का विरोध किया. उन्होंने कहा कि इतिहास के दोहरे मापदंडों पर अब गहन विवेचना हो जहां बाहरी आक्रांताओं और उपनिवेशी ताकतों के भीषण अत्याचारों को ‘अतीत की बात’कहकर भुलाया जाता है,जबकि भारतीय समाज के एक वर्ग को निरंतर ‘ऐतिहासिक अपराधी’ चिन्हित कर वर्तमान में प्रतिशोध का निशाना बनाया जा रहा है.
कानपुर के बिठूर से भाजपा विधायक अभिजीत सिंह सांगा ने भी यूजीसी के नए नियम पर अपनी नाराजगी जताते हुए कहा है कि इस कानून की सरकार को समीक्षा करनी चाहिए और सबकी सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए ताकि सामाजिक न्याय सुनिश्चित हो. इसके अलावा भाजपा विधान पार्षद देवेन्द्र प्रताप सिंह ने यूजीसी को पत्र लिखकर कहा कि प्रस्तावित प्रावधान सामाजिक समरसता को नुकसान पहुंचा सकते हैं जिससे उच्च शिक्षा व्यवस्था में जातीय तनाव बढ़ने की आशंका है. इससे देश की पूरी शिक्षा व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो सकती है और समाज में जातीय संघर्ष बढ़ सकता है.
भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉक्टर संजय सिंह ने भी यूजीसी के नए नियम का विरोध करते हुए कहा कि वर्तमान हालात से शिक्षण संस्थानों में चिंता और आशंका का वातावरण बन रहा है. उन्होंने यह भी कहा कि बिना संतुलित प्रतिनिधित्व समितियां न्याय नहीं कर सकतीं. ऐसी समितियां सिर्फ औपचारिक निर्णय देती हैं, जिससे समस्याओं का समाधान नहीं हो पाता. न्याय के पथ पर चलते हुए हर नागरिक के सम्मान और सुरक्षा की रक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए. उनका कहना है कि निर्णय प्रक्रिया में सभी वर्गों की भागीदारी जरूरी है, ताकि किसी भी तरह की असमानता न रहे.
भाजपा नेता डैमेज कंट्रोल में जुटे
भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने कहा कि मोदी है तो मुमकिन है. विश्वास रखिए यूजीसी के नोटिफिकेशन की सभी भ्रान्तियां दूर की जाएगी. संविधान को आर्टिकल 14 एवं 15 के अनुसार अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़े वर्ग और सामान्य वर्ग में कोई अंतर नहीं है. 10 प्रतिशत आरक्षण सामान्य वर्ग को केवल और केवल प्रधानमंत्री मोदी से मिला. 1990 मंडल कमीशन लागू होने के बाद इस देश की सभी राजनीतिक पार्टियों ने सरकार बनाई, लेकिन न्याय केवल मोदी जी ने दिया. इंतज़ार कीजिए यूजीसी की भ्रांतियां भी ख़त्म होगी.
यूजीसी से जुड़े एक सवाल पर उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि सवर्ण समाज नाराज नहीं है. उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार की नीतियों का उद्देश्य किसी वर्ग को पीछे करना नहीं, बल्कि उन तबकों को आगे बढ़ाना है जो ऐतिहासिक रूप से विकास की दौड़ में पिछड़ गए हैं. उनका कहना था कि सामाजिक न्याय प्रक्रिया में संतुलन आवश्यक है और सरकार उसी दिशा में काम कर रही है. केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि जो लोग पीछे छूट गए हैं, उन्हें आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है. इसमें किसी समाज के साथ अन्याय नहीं हो रहा है.
भाजपा नेता क्यों हो रहे बेचैन?
यूजीसी का यह नियम लागू होने के बाद अगड़ी जाति के लोग नाराज बताए जा रहे हैं. अगड़ी जाति के मतदाता भाजपा का कोर वोटबैंक माना जाता है. यूजीसी के नए नियम को लेकर विरोध के सुर भी अगड़ी जाति उठा रही है. अगड़ी जाति में आने वाले ठाकुर से लेकर ब्राह्मण और कायस्थ समुदाय से जुड़े संगठन अपनी नाराजगी खुलकर जता रहे हैं. नियम वापस लेने की जिद पर अड़े हैं, उन्हें लगता है कि इस नियम के लागू होने से उनके बच्चों का भविष्य बर्बाद हो सकता है.
अगड़ी जातियों की नाराजगी देखते हुए भाजपा के भी कई नेता असमंजस में हैं. ऐसे में कई नेता खुलकर तो कुछ नेता दबी जुबान से विरोध कर रहे हैं. इसके पीछे असल वजह यह है कि अगड़ी जातियों को लग रहा है कि पूरी राजनीति दलित और ओबीसी के इर्द-गिर्द सिमटती जा रही है और अगड़ी जातियों उनके राजनीतिक एजेंडे से बाहर हो रहे हैं. ऐसे में भाजपा नेताओं को लग रहा है कि यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ उठ रही आवाज पर चुप रहते हैं तो उनकी राजनीति खत्म हो सकती है, क्योंकि यह मुद्दा काफी गर्मा गया है.
यूजीसी का नया नियम क्या है?
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने 13 जनवरी को ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन 2026’ नियम लागू किया है. यूजीसी के अनुसार इन नियमों से कॉलेज, विश्वविद्यालय और उच्च शिक्षण संस्थानों में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के छात्रों के साथ जातिगत भेदभाव रोकने में मदद मिलेगी.
अब नए नियमों को हर शिक्षण संस्थान में लागू करने को इक्वल अपॉर्च्युनिटी सेंटर (ईओसी) बनानी होगी, जिसका मकसद समानता लागू करना और भेदभाव से जुड़ी शिकायतों का समाधान करना होगा. ईओसी में इक्विटी कमेटी बनेगी, जिसकी अध्यक्षता संस्थान के प्रमुख करेंगे. EOC को हर साल एक रिपोर्ट UGC को सौंपनी होगी. UGC भी एक मॉनिटरिंग कमेटी बनाएगा.
देश के हर शिक्षण संस्थान में किसी से जातिगत भेदभाव होता है, तो वो अपनी शिकायत इक्विटी कमेटी से करेगा. कमेटी को शिकायत पर 24 घंटे में कार्रवाई करनी होगी और 15 दिन में संस्थान प्रमुख को रिपोर्ट सौंपेगी. इस रिपोर्ट के आधार पर शिक्षण संस्थान के प्रमुख 7 दिन में कार्रवाई करेंगे. अगर कोई संस्थान नियमों का पालन नहीं करते हैं तो उसकी यूजीसी मान्यता निरस्त हो जाएगी.
यूजीसी के नए नियम पर विरोध
यूजीसी के नए नियमों के लेकर देशभर में बवाल हो रहा है. सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक पर विरोध दिख रहा हैं.अगड़ी जातियों की मांग है कि नियम वापस लिये जाए. अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री राघवेंद्र सिंह राजू कहते हैं कि अगड़ी जातियों को खलनायक जताया जा रहा है. इस नियम का दुरुपयोग हो सकता है, क्योंकि शिकायत करने वाले को कोई प्रमाण देने की जरूरत नहीं है. पहले दोषी मान लिया जाएगा और बाद में आपको ही सिद्ध करना पड़ेगा कि आप निर्दोष हैं.
वह कहते हैं कि यूजीसी के नए नियम सिर्फ छात्रों तक ही सीमित नहीं हैं,बल्कि इसकी परिधि में शिक्षक और कर्मचारी भी आते हैं. ऐसे में अनुजा,अजजा और अन्य पिछड़ा वर्ग शिक्षक भी अपनी शिकायत लिखा सकेंगे और अनुजा,अजजा,अन्य पिछड़ा वर्ग छात्र किसी शिक्षक के खिलाफ भी शिकायत कर सकता है.इस तरह से अगड़ी जाति के छात्रों ही नहीं बल्कि शिक्षकों की भी मुश्किल होने वाली है.
राघवेंद्र सिंह कहते हैं कि अनुदान आयोग 2026 का उद्देश्य दलित व पिछले छात्रों का उत्पन्न रोकना होना चाहिए ना की समान वर्ग के छात्रों को असुरक्षित करना होना चाहिए.यूजीसी के नियम अगड़ी जातियों को परेशान करने वाला है.इसमें गलत शिकायतों से अगड़ी जाति के टीचर्स और विद्यार्थी परेशान हो सकते हैं मेहनत और मेरिट पीछे छूट सकता है.राजनीतिक उद्देश्य से लाया गया बिल है,जिसे लेकर अगड़ी जाति के हिंदू ही नहीं बल्कि मुस्लिम समुदाय भी चिंतित हैं. सरकार अगड़ी जातियों की परीक्षा लेना बंद करे,नहीं तो फिर उसके लिए मुश्किल हो जाएगा.
विपक्षी दलों का मौन अर्थपूर्ण
यूजीसी के नए नियम के लेकर भले ही राजनीति गर्मा गई है, लेकिन विपक्ष मौन साधे हैं.सपा से लेकर बसपा,आरजेडी चुप है.भाजपा नेताओं की राजनीतिक बेचैनी के बीच विपक्ष का साइलेंट मोड में रहना कहीं ना कहीं कई राजनीतिक सवाल खड़े कर रहा है.
मोदी सरकार की हर नीतियों को खिलाफ मुखर रहना वाला विपक्ष चुप क्यों है,उसका सबसे बड़ा कारण राजनीतिक है.सपा से लेकर आरजेडी तक इसीलिए चुप है कि दलित और ओबीसी के खिलाफ विश्वविद्यालय में होने वाले भेदभाव को खत्म करने को नए नियम लागू हो रहे हैं,जिसकी मांग वो करते रहे हैं.अब यूजीसी ने नए नियम लागू कर दिए हैं,तो विपक्ष उसमें पड़ना नहीं चाहती है.
दूसरा कारण यह है कि विपक्ष के नेताओं की पूरी राजनीति दलित औऱ ओबीसी के इर्द-गिर्द सिमटी है.यूजीसी के नए नियम को दलित और ओबीसी सामाजिक न्याय की दिशा में कदम बता रहे हैं,विरोध करने वाले ज्यादातर लोग अगड़ी जाति के हैं,जो मौजूदा समय में भाजपा का कोर वोटबैंक बना हुआ है,ऐसे में विरोध कर अपने-अपने कोर वोटबैंक को नाराज नहीं करना चाहते हैं.साथ ही नियम का समर्थन कर सवर्णों की नाराजगी को भी मोल नहीं लेना चाह रही है.
बवाल के बीच UGC के नए नियमों का कांग्रेस ने किया समर्थन, NSUI ने कहा- भेदभाव दूर करने में यह जरूरी कदम
यूजीसी के नए नियमों पर मचे बवाल के बीच कांग्रेस के छात्र संगठन ने नई गाइडलाइन का समर्थन किया है. NSUI ने कहा कि हम UGC द्वारा जारी जाति-आधारित भेदभाव पर पहल का स्वागत करते है. हालांकि, हमारे कुछ सुझाव और सवाल हैं ताकि प्रस्तावित समिति केवल कागजी औपचारिकता बनकर न रह जाए.
UGC के नए नियमों के खिलाफ सामान्य वर्ग के लोग जगह-जगह प्रदर्शन कर रहे हैं. इस बीच कांग्रेस ने नए नियमों का समर्थन किया है।
NSUI ने UGC के जाति-आधारित भेदभाव को खत्म करने के नए नियमों का समर्थन करते हुए अपनी कुछ शर्तें भी रखीं.समिति में SC, ST, OBC छात्रों और शिक्षकों का अनिवार्य प्रतिनिधित्व और न्यायाधीशों की भागीदारी की जरूरत बताई.NSUI ने पूछा कि समिति का अध्यक्ष कौन होगा और इसे विश्वविद्यालय प्रशासन के प्रभाव से मुक्त रखा जाना चाहिए.
UGC के नए नियमों पर मचे बवाल बीच कांग्रेस के छात्र संगठन NSUI इसके समर्थन में आ गई है. NSUI अध्यक्ष वरुण चौधरी ने सोशल मीडिया मंच पर लिखे लंबे पोस्ट में कहा- NSUI, UGC के जातिगत भेदभाव रोकने की पहल का स्वागत करती है. हालांकि, हमारे सुझाव और सवाल हैं ताकि प्रस्तावित समिति केवल कागजी औपचारिकता बनकर न रह जाए. समिति में SC, ST और OBC समुदायों के छात्रों का अनिवार्य प्रतिनिधित्व होना चाहिए, साथ ही SC, ST और OBC पृष्ठभूमि के शिक्षक भी शामिल किये जायें. समिति की स्वतंत्रता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने को इसमें सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश भी शामिल किये जायें.
सवाल उठाया- आखिर कमेटी का चेयरपर्सन कौन होगा?
वरुण चौधरी की यह सोशल मीडिया पोस्ट NSUI के आधिकारिक एक्स अकाउंट से भी शेयर हट है. जिसमें नए नियमों का समर्थन तो है ही, कुछ सवाल भी किये गये हैं कि कमेटी का चेयरपर्सन कौन होगा? इस पर UGC चुप है. कमेटी विश्वविद्यालय प्रशासन के नियंत्रण की कठपुतली न बने, अन्यथा यह समानता और न्याय के मूल उद्देश्य को ही विफल कर देगा.
पहले की समितियों का जिक्र कर जताई चिंता
एनएसयूआई ने पहले की समितियों का जिक्र करते हुए लिखा कि पहले भी ऐसी कई समितियां विशेषकर लैंगिक भेदभाव से संबंधित बनी हैं परंतु शिकायतों के प्रभावी निपटारे तथा न्याय दिलाने में असफल रही हैं.NFS और आरक्षण नीतियों की विफलता के कारण दलित,आदिवासी और पिछड़े वर्ग के शिक्षण पदों में भारी रिक्तियां हैं. IITs,IIMs तथा केंद्रीय विश्वविद्यालयों में छात्रों की आत्महत्या की दुखद घटनाएं और उच्च ड्रॉपआउट दर रेखांकित करती हैं कि उच्च शिक्षा में बदलाव लाने की आवश्यकता है.
उच्च शिक्षा में भेदभाव पर खुलकर बोलना चाहिए
उच्च शिक्षा में व्याप्त हर प्रकार के भेदभाव पर हमें खुलकर सामूहिक रूप से बोलना चाहिए और इसे समाप्त करने की दिशा में कदम उठाने चाहिए. UGC एक मजबूत, स्वतंत्र और सशक्त समिति का गठन हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में सुनिश्चित करे जो शिकायतों पर कार्रवाई करे, जवाबदेही सुनिश्चित कर न्याय दे. NSUI विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति, लिंग या किसी भी अन्य पहचान के आधार पर हर प्रकार के भेदभाव के खिलाफ दृढ़ता से खड़ी है.

