मत: विषय छुआछूत नही,स्वच्छता का होता है
छुआछूत एक गपोड़ विषय है, जिसे जानबूझकर राजनेताओं ने फैलाया है। क्योंकि उन्हें येडा बनके पेड़ा खाना है।
मूल बात रहन सहन और खान पान से संबंधित है। अपनी अपनी संस्कृति का विषय है। वरना चमार भी अपनी बेटी की शादी कोल या धोबी से नहीं करता।
कोई भी अगर मांसाहार करता है। तो वैष्णव उसे अपनी थाली में भोजन नहीं देगा। ऐसा नहीं है कि वो उन्हें भोजन या पानी नहीं देंगे? बस बर्तन अलग होगा।
वो देते हैं, बस फर्क इतना है कि अपनी थाली या गिलास में नहीं देंगे। उनके लिए थाली और गिलास अलग रखते हैं। यह विषय छुआछूत का नहीं है। मान्यता का है।
अगर कोई मांसाहारी है और दूसरा शाकाहारी। अपने बर्तन में खाने को नहीं देगा। शाकाहारी कभी कटे मांस की थाली में भोजन नहीं करेगा।
आप आज भी भारत के किसी दलित या मुस्लिम बस्ती में जाओ। अत्यधिक गंदगी, मांस और मदिरा का सेवन वही ज्यादा मिलेगा। जो वैष्णव उपासक है, उनसे परहेज करते हैं।।
मेरा तो दैनिक जागरण डिजिटल का ऑफिस ही नोएडा के सेक्टर 16 फिल्म सिटी के पास था, जहां आजतक, न्यूज 18, दैनिक भास्कर, जी न्यूज, टाइम्स ऑफ इंडिया, लल्लनटॉप और न्यूज 24 जैसे बड़े मीडिया संस्थान का ऑफिस हैं।
वहीं पास से ही एक नाला गुजरता है। जहां अवैध रोहिंग्या और दलितों के कम से कम 500 से भी ज्यादा घर हैं, जो गैर कानूनी है।
क्योंकि वो यमुना के बहाव का क्षेत्र है। जहां 500 मीटर के भीतर कोई भी निर्माण अवैध है।
पर मजे की बात यह है कि उसी सड़क के उस पार राष्ट्रीय दलित स्मारक भी है। जो मायावती जी ने अपने मुख्यमंत्री काल में लखनऊ के साथ साथ नोएडा में भी बनवाया था।
यह पार्क दलितों के लिए किसी पवित्र स्थान से कम नहीं है। क्योंकि यहीं पर फुले, अम्बेडकर, कांशीराम और मायावती जी की बड़ी बड़ी आदम कद प्रतिमाएं हैं। जो मेरे World trade tower के 20 वें मंजिल से साफ साफ वो पार्क और यमुना जी दिखती है।
यहां दिक्कत किसी को जाती से जाति का नहीं है, उसके रहन सहन और खानपान के साथ उसके क्षेत्र में फैली गंदगी भी है।
वरना मेरे बिल्डिंग के मालिक एक स्वर्ण ही जी हैं। वो हर मंगलवार, गुरुवार और शनिवार को बिल्डिंग के सामने भंडारा चलाते हैं।
जिसके 99 परसेंट लाभ दाता रोहोगियां मुस्लिम और दलित ही हैं। वो गरीबों पर भला करते है। दलितों और मुस्लिम को फ्री में खाना देते है। ये बात केवल बिल्डिंग्स मालिक नहीं है।
तमाम रईस लोग हर दिन कुछ न कुछ खाना या सामान गरीबों में बांटते है। जिसको पाने वाले 99 परसेंट दलित और रोहिंग्या होते हैं।
हां, बस एक अंतर है। अत्यधिक गंदगी, चिल्ल पो के कारण वो उनकी बस्ती में सीधे प्रवेश नहीं करते। बस सड़क पर भंडारा लगा देते हैं। आओ। सब खा जाओ। वो बड़े और छोटे में भेदभाव नहीं करते।
इसलिए कह रहा कि छुआछूत के एक गपोड़ी विषय है। कोई शाकाहारी अपनी थाली में मांस खाने वाले हो भोजन नहीं देगा। चमार अपनी बेटी की शादी धोबी या कोल आदिवासी से नहीं करेगा।
मुख्य बात रहन सहन और खानपान का तरीका अलग होना है। जिसे लोग ब्राह्मणवाद का नाम देकर वो खुद फैलाते हैं। जो अपनी जाति से नीची वाली जाति को इज्जत नहीं देता।
@ पत्रकार दीपक पांडे की फेसबुक वॉल से

