कॉकरोच कैसै और कितने समय जिंदा रहते हैं?
कॉकरोच कितने साल तक जिंदा रहते हैं?
नई दिल्ली,24 मई 2026,कॉकरोच एक ऐसा कीड़ा है जिसे देखकर ज्यादातर लोग डर जाते हैं या तुरंत उसे मारने की कोशिश करते हैं. यह अक्सर गंदी जगहों पर दिखाई देता है. कॉकरोच गंदगी फैलाने और बीमारी बढ़ाने के लिए जाना जाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर एक कॉकरोच कितने समय तक जिंदा रह सकता है? इसका जवाब सुनकर शायद आपको भी हैरानी हो सकती है.
कॉकरोच आमतौर पर गर्म, नम और अंधेरी जगहों पर रहना पसंद करते हैं. यही वजह है कि ये अक्सर किचन, नालियों, बाथरूम और पुराने सामान के आसपास ज्यादा दिखाई देते हैं. दुनिया के कई देशों में कॉकरोच की अलग-अलग प्रजातियां पाई जाती हैं. ये बहुत तेजी से बढ़ने वाले कीड़े माने जाते हैं.
कॉकरोच सिर्फ गंदगी में ही नहीं रहते, बल्कि ये कई चीजों को खा भी सकते हैं. इनके भोजन में बचा हुआ खाना, कागज, कपड़े, किताबें और यहां तक कि मृत कीड़े भी शामिल होते हैं. यही कारण है कि इन्हें बहुत ज्यादा जीवित रहने वाला कीड़ा माना जाता है. कई बार घर में सफाई होने के बाद भी कॉकरोच आसानी से खत्म नहीं होते.
अगर इनकी लाइफ की बात करें तो आमतौर पर कॉकरोच 100 दिनों से लेकर 2 साल तक जिंदा रह सकते हैं. कुछ फीमेल कॉकरोच मेल कॉकरोच की तुलना में ज्यादा समय तक जीवित रहती हैं. रिपोर्ट्स के अनुसार कुछ मादा कॉकरोच करीब दो साल तक भी जिंदा रह सकती हैं. वहीं अगर कॉकरोच को सुरक्षित माहौल और पर्याप्त भोजन मिल जाए तो वे और ज्यादा समय तक जीवित रह सकते हैं.
कॉकरोच को लेकर एक और दिलचस्प बात यह है कि ये बेहद कठिन परिस्थितियों में भी जिंदा रह सकते हैं. इन्हें खत्म करने के लिए लोग कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन कई बार ये उनसे भी बच निकलते हैं. यही वजह है कि कॉकरोच को दुनिया के सबसे ज्यादा जीवित रहने वाले कीड़ों में गिना जाता है.
कॉकरोच को लेकर कई ऐसे रोचक तथ्य हैं जिनके बारे में जानकर लोग हैरान रह जाते हैं. बहुत कम लोग जानते हैं कि कॉकरोच करीब 40 मिनट तक अपनी सांस रोक सकता है. दरअसल, इंसानों की तरह वह मुंह से सांस नहीं लेता, बल्कि उसके शरीर में छोटे-छोटे छेद होते हैं जिनसे वह सांस लेता है. यही वजह है कि कॉकरोच कुछ समय तक पानी में रहने के बाद भी जिंदा बच सकता है।
कॉकरोच की सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि वह बिना सिर के भी कुछ दिनों तक जिंदा रह सकता है. ऐसा इसलिए क्योंकि उसके शरीर के अलग-अलग हिस्से अपने आप काम कर सकते हैं. सिर कटने के बाद भी उसका शरीर कुछ समय तक चलता रहता है और सांस भी चलती रहती है. हालांकि सिर न होने की वजह से वह खाना और पानी नहीं पी पाता, जिसके कारण कुछ दिनों बाद उसकी मौत हो जाती है.
कॉकरोच अंधेरे में ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं. दिन के समय ये अक्सर नालियों, दीवारों की दरारों या नमी वाली जगहों पर छिपे रहते हैं. जैसे ही रात होती है और अंधेरा बढ़ता है, ये बाहर निकलकर इधर-उधर घूमने लगते हैं. यही कारण है कि ज्यादातर लोगों को कॉकरोच रात में ज्यादा दिखाई देते हैं.
तिलचट्टा Cockroach
कई तिलचट्टा जातियाँ: (A) जर्मन तिलचट्टा (B) अमेरिकी तिलचट्टा (C) ऑस्ट्रेलियाई तिलचट्टा (D, E) ओरियेंटेल तिलचट्टा
वैज्ञानिक वर्गीकरण
जगत: जंतु
संघ: आर्थ्रोपोडा (Arthropoda)
वर्ग: कीट (Insecta)
अधिगण: डिक्ट्योप्टेरा (Dictyoptera)
गण: ब्लाट्टोडेया (Blattodea)
कुल
en:Anaplectidae
en:Blaberidae
en:Blattidae
en:Corydiidae
en:Cryptocercidae
en:Ectobiidae
en:Lamproblattidae
en:Nocticolidae
en:Tryonicidae
तिलचट्टा (Cockroach) कीटों का एक जीववैज्ञानिक उपगण है। यह ब्लाट्टोडेया जीववैज्ञानिक गण का भाग हैं, जिसमें दीमक भी शामिल हैं। विश्व में लगभग 4,600 ज्ञात तिलचट्टा जातियाँ हैं जो लगभग 500 उपगणों में आयोजित हैं। इनमें से केवल 30 जातियाँ ही मानव बसेरों से सम्बन्धित पाई जाती हैं।
विवरण
तिलचट्टे एक सर्वाहारी, रात्रिचर प्राणी है जो अंधेरे में, गर्म स्थानों में, जैसे रसोई घर, गोदाम, अनाज और कागज के भंडारों में पाया जाता है। पंख से ढका हल्का लाल एवं भूरे रंग का इसका शरीर तीन भागों सिर, वक्ष और उदर में विभाजित रहता है। सिर में एक जोड़ी संयुक्त नेत्र पाया जाता है एवं एक जोड़ी संवेदी श्रृंगिकाएँ (एन्टिना) निकली रहती है जो भोजन ढूँढ़ने में सहायक होती हैं। वक्ष से दो जोड़ा पंख और तीन जोड़ी संधियुक्त टाँगें लगी रहती हैं जो इसके प्रचलन अंगों का कार्य करते हैं। शरीर में श्वसन रंध्र पाये जाते हैं। उदर दस खंडों में विभक्त रहता है। छिपकली तथा बड़ी-बड़ी मकड़ियाँ इसके शत्रु हैं।
तिलचट्टे का शरीर २.५ सेण्टीमीटर से ४ सेण्टीमीटर लम्बा तथा १.५ सेण्टीमीटर चौड़ा होता है। शरीर ऊपर से नीचे की ओर चपटा एवं खंडयुक्त होता है। नर तिलचट्टा मादा तिलचट्टा से साधारणतः छोटा होता है। तिलचट्टे का श्वसन तंत्र अनेक श्वासनलिकाओं से बनता है। ये नलिकाएँ बाहर की ओर श्वासरंध्रों द्वारा खुलती हैं। तिलचट्टे में दस जोड़े श्वासरंध्र होते हैं, दो वक्ष में और आठ उदर में। तिलचट्टे की श्रृंगिकाये तीन भागों में विभक्त होती है जिसका आधारीय खंड स्केप मध्य खंड पेडिसेल ओर ऊपरी खंड फ्लेजिलम कहलाता है। यह विज्ञान जगत में अपने मेहनत को प्रसिद्ध हैं। इनका परिसंचरण तंत्र खुला होता है इसलिए ये अपने शरीर के प्रत्येक खंड में उपस्थित छोटे छोटे छिद्रों से सांस ले सकते हैं। काकरोच सांस लेने के लिए मुंह या सिर पर निर्भर नहीं होते हैं। इसलिए सिर कटने के बाद भी काकरोच एक सप्ताह या इससे अधिक दिनों तक जिंदा रह सकते हैं। इनकी मौत इसलिए होती है, क्योंकि मुंह के बिना ये पानी नहीं पी पाते और प्यास से मर जाते हैं।

