गन्ना (नियंत्रण) आदेश 1966 और 2026 में क्या अंतर है? क्या हैं भाकियू (सर्व) की आपत्तियां?
केंद्र सरकार के उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने हाल ही में गन्ना (नियंत्रण) आदेश, 2026 का प्रारुप (Draft) जारी किया है। यह नया आदेश 60 साल पुराने ‘गन्ना (नियंत्रण) आदेश, 1966’ की जगह लेगा।
इसका मुख्य उद्देश्य देश के चीनी क्षेत्र और उससे जुड़े नियमों का आधुनिकीकरण करना और चीनी मिलों में एथेनॉल (Ethanol) उत्पादन को एक मुख्य उत्पाद के रूप में औपचारिक रूप से स्थापित करना है।
इस नए प्रारुप के प्रमुख प्रावधान, किसानों और मिलों पर इसके प्रभाव की मुख्य बातें :
1. एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा और नई परिभाषा
चीनी कारखाने का विस्तार: अब “चीनी कारखाने” की परिभाषा की परिधि बढ़ा दी गयी है। इसमें गन्ने के रस, सिरप, चीनी और शीरे (Molasses) से सीधे एथेनॉल बनाने वाली इकाइयां भी शामिल की गयी हैं।
बैंक गारंटी से छूट: जो इकाइयां केवल एथेनॉल उत्पादन करेंगी, उन्हें ₹2 करोड़ की ‘परफॉर्मेंस बैंक गारंटी’ जमा करने से छूट होगी।
रूपांतरण फॉर्मूला: नए नियमों में 600 लीटर एथेनॉल को 1 टन चीनी उत्पादन के बराबर (Conversion Rate) माना जाएगा।
2. गन्ना किसानों को भुगतान और सुरक्षा नियम
14 दिनों में भुगतान अनिवार्य: चीनी मिलों को गन्ने की आपूर्ति होने के 14 दिनों में किसानों या सहकारी समितियों को उचित और लाभकारी मूल्य (FRP) का भुगतान करना होगा।
देरी पर 15% ब्याज: यदि मिलें 14 दिनों में भुगतान करने में विफल रहती हैं, तो उन्हें देरी की अवधि को 15% प्रति वर्ष की दर से किसानों को ब्याज देना होगा।
3. चीनी मिलों के बीच की दूरी के नियम
दूरी सीमा में बदलाव: नई चीनी मिल खोलने को दो मिलों के बीच की न्यूनतम दूरी 15 किलोमीटर से बढ़ाकर 25 किलोमीटर करने का प्रस्ताव है ताकि मिलों में गन्ने को अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा घटे और गन्ने की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित हो पाये।
4. खांडसारी चीनी का विनियमन
देश में निर्मित खांडसारी चीनी को भी अब अनिवार्य लाइसेंसिंग और एफआरपी (FRP) की व्यवस्था की परिधि में लाने का प्रस्ताव है।
वर्तमान स्थिति और विवाद: सरकार ने इस प्रारुप पर सभी संबंधित पक्षों और किसान संगठनों से 20 मई 2026 तक सुझाव और आपत्तियां मांगी थीं। विभिन्न किसान संगठनों ने इसके कुछ प्रावधानों (जैसे रिकवरी दर की गणना और लागत आकलन) पर अपनी चिंताएं और सुझाव दिये हैं, जिन पर अंतिम नीति बनाते विचार होना है।
गंभीर चिंतायें और आपत्तियां
गन्ना (नियंत्रण) आदेश, 2026 के प्रारुप पर देश के विभिन्न किसान संगठनों और विशेषज्ञों ने कुछ गंभीर चिंताएं और आपत्तियां जताई हैं।
भारतीय किसान यूनियन (सर्व) के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजकिशोर शर्मा, सलाहकार कमलेश कुमार शर्मा तथा उपाध्यक्ष अनिल शर्मा का मानना है कि नए नियमों में मिलों और एथेनॉल उत्पादन को तो काफी बढ़ावा दिया गया है, लेकिन किसानों के जमीनी हितों को कई जगह दृष्टिविगत किया गया है।
प्रारुप को लेकर भाकियू (सर्व) की प्रमुख आपत्तियां और मांगें हैं:
1. गन्ने के दाम (FRP) की गणना पर विवाद
चिंता: नए नियमों में चीनी के साथ-साथ एथेनॉल, बिजली (Co-generation), और प्रेस-मड (Press-mud) को भी मिलों के उप-उत्पाद (By-products) के रूप में मजबूती से शामिल किया गया है।
मांग: भाकियू (सर्व) का कहना है कि जब मिलें गन्ने से चीनी के अलावा एथेनॉल और बिजली बेचकर भारी लाभ कमा रही हैं, तो उस लाभ का एक हिस्सा (Profit Sharing) गन्ने के उचित और लाभकारी मूल्य (FRP) की गणना में जोड़ा जाना चाहिए। गन्ने की कीमत केवल चीनी की रिकवरी पर तय न होकर, इन सभी सह-उत्पादों की कुल कमाई के आधार पर तय हो।
2. 15 किलोमीटर बनाम 25 किलोमीटर की दूरी का नियम
चिंता: सरकार ने दो चीनी मिलों के बीच की न्यूनतम दूरी 15 किलोमीटर से बढ़ाकर 25 किलोमीटर करने का प्रस्ताव दिया है। भाकियू (सर्व) का मानना है कि इससे क्षेत्र में मिलों का एकाधिकार (Monopoly) बढ़ जाएगा।
मांग: अगर किसी क्षेत्र में एक ही मिल होगी, तो किसान पूरी तरह उसी मिल पर निर्भर हो जाएंगे। प्रतिस्पर्धा कम होने से मिलें गन्ने की तौल में गड़बड़ी या भुगतान में मनमानी कर सकती हैं।भाकियू (सर्व) की मांग है कि दूरी की सीमा पुरानी ही रखी जाए ताकि उनके पास अपनी फसल बेचने के एक से अधिक विकल्प हों।
3. खांडसारी उद्योगों पर नियंत्रण का विरोध
चिंता: नए आदेश में पारंपरिक खांडसारी इकाइयों (क्रशरों) पर भी कड़े नियम और लाइसेंसिंग लागू करने का प्रस्ताव है।
मांग: भाकियू (सर्व) मानती है कि जब बड़ी चीनी मिलें गन्ने का उठान समय पर नहीं करतीं या उनका भुगतान अटका देती हैं, तब छोटे क्रशर और खांडसारी उद्योग ही किसानों का सहारा बनते हैं। इन पर अत्यधिक सरकारी नियंत्रण होने से ये बंद हो सकते हैं, जिससे गन्ना उत्पादकों का संकट और बढ़ जाएगा।
4. 14 दिन में भुगतान और ब्याज की जमीनी हकीकत
चिंता: कागजों पर 14 दिनों में भुगतान और देरी पर 15% ब्याज का नियम पुराना ही है, लेकिन व्यवहार में चीनी मिलें सालों-साल भुगतान लटकाए रखती हैं और ब्याज का भुगतान कभी नहीं करतीं।
मांग: भाकियू (सर्व) की मांग है कि नियम केवल कागजी न रखा जाए। यदि कोई मिल 14 दिनों में भुगतान नहीं करती, तो जिला प्रशासन तुरंत मिल की चीनी या एथेनॉल अपने अधिकार में ले नीलाम करे और सीधे किसानों के खातों में पैसे भेजने की कठोर कानूनी व्यवस्था (Strict Enforcement) होनी चाहिए।
रिकवरी दर (Recovery Rate) का विषय
उत्तर भारत (विशेषकर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब) के किसान संगठनों का कहना है कि रिकवरी दर तय करने की तकनीक पारदर्शी नहीं है। मिलें अक्सर रिकवरी दर कम दिखाती हैं, जिससे किसानों को प्रति क्विंटल कम दाम मिलता है। भाकियू (सर्व) की मांग है कि रिकवरी जांच को सरकारी या स्वतंत्र लैब्स की व्यवस्था हो ।
एआईएसएफएफ ने 10.25 प्रतिशत की चीनी पुनर्प्राप्ति दर के आधार पर एफआरपी की गणना करने के प्रस्ताव का विरोध किया और इसे कई गन्ना उत्पादक राज्यों के किसानों के लिए अनुचित बताया। इसके बजाय, संगठन ने मांग की कि एफआरपी को 9.5 प्रतिशत की पुनर्प्राप्ति दर के आधार पर निर्धारित किया जाए, जो उसके अनुसार कई क्षेत्रों में औसत पुनर्प्राप्ति स्तरों को अधिक सटीक रूप से दर्शाता है।
संघ ने यह मांग भी दोहराई कि गन्ने की कीमतें स्वामीनाथन फॉर्मूला (C2+50 प्रतिशत) के अनुसार निर्धारित की जानी चाहिए, जो किसानों को उनकी खेती की कुल लागत से ऊपर न्यूनतम 50 प्रतिशत का लाभ मार्जिन प्राप्त करने की सिफारिश करता है।
एथेनॉल उत्पादन पर बढ़ते जोर को लेकर चिंता जताते हुए एआईएसएफएफ ने कहा कि मसौदा आदेश एथेनॉल क्षेत्र को समर्थन देने पर अधिक बल देता है, जबकि लाखों गन्ना किसानों और कृषि श्रमिकों के हितों की अनदेखी करता है। फेडरेशन के अनुसार, चीनी मिलें एथेनॉल उत्पादन, बिजली उत्पादन और उर्वरक निर्माण के माध्यम से अतिरिक्त आय अर्जित कर रही हैं, लेकिन किसानों को इन लाभों का कोई हिस्सा नहीं मिल रहा है।
संगठन ने मांग की कि इथेनॉल और अन्य उप-उत्पादों की बिक्री से उत्पन्न अधिशेष का 50 प्रतिशत गन्ना उत्पादकों और श्रमिकों के साथ साझा किया जाए, यह तर्क देते हुए कि वे मूल्य श्रृंखला में प्राथमिक योगदानकर्ता हैं।
उद्योग के विशाल आकार को रेखांकित करते हुए ज्ञापन में कहा गया है कि 2025-26 के मौसम में गन्ने की खेती 57.35 लाख हेक्टेयर में होने का अनुमान है। इसमें यह भी बताया गया है कि देश भर में लगभग 67.7 लाख कृषि श्रमिक गन्ने की खेती, कटाई और परिवहन गतिविधियों में लगे हुए हैं।
संघ के अनुसार, देश के 55.7 लाख पंजीकृत गन्ना उत्पादकों में से अधिकांश छोटे और सीमांत किसान हैं, जिनमें से आधे से अधिक के पास एक हेक्टेयर से कम भूमि है। संगठन ने कहा कि ये किसान चीनी मिलों से भुगतान में देरी के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हैं।
एआईएसएफएफ ने गन्ने के भुगतान में बढ़ते बकाया पर भी चिंता व्यक्त की और कहा कि मिलों को 14 दिनों के भीतर भुगतान करने के लिए बाध्य करने वाला मौजूदा प्रावधान प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया गया है। इसने सख्त जवाबदेही उपायों और विलंबित बकाया पर ब्याज के अनिवार्य भुगतान की मांग की।
संघ द्वारा उठाई गई एक अन्य प्रमुख चिंता दो चीनी मिलों के बीच न्यूनतम दूरी को 15 किलोमीटर से बढ़ाकर 25 किलोमीटर करने का प्रस्ताव था। संगठन का तर्क था कि इस तरह के कदम से मिलों के बीच प्रतिस्पर्धा कम हो सकती है, एकाधिकार की स्थिति पैदा हो सकती है और किसानों की सौदेबाजी की शक्ति कमजोर हो सकती है।
सहकारी क्षेत्र के संबंध में, संघ ने सहकारी और सार्वजनिक क्षेत्र की चीनी मिलों के आधुनिकीकरण और सुदृढ़ीकरण की वकालत की। इसने सहकारी चीनी कारखाना बोर्डों के नियमित चुनावों और किसान-नेतृत्व वाली सहकारी संस्थाओं के लिए अधिक वित्तीय और प्रशासनिक स्वायत्तता की भी मांग की।
ये मांगें किसान संगठनों के बीच बढ़ती चिंताओं को दर्शाती हैं कि चीनी और जैव ऊर्जा क्षेत्रों में भविष्य के सुधारों से यह सुनिश्चित होना चाहिए कि उद्योग के विकास के लाभ गन्ना उत्पादकों और कृषि श्रमिकों के साथ अधिक समान रूप से साझा किए जाएं।
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आगे की राह: 20 मई 2026 तक सभी पक्षों से सुझाव लिए जा चुके । अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार यें आपत्तियां स्वीकार कर प्रारुप में क्या परिवर्तन करती है, ताकि उद्योग के साथ-साथ किसानों की हित रक्षा भी हो सके।
निष्कर्ष: कुल मिलाकर, इस आदेश से इन तीनों राज्यों में चीनी उद्योग अधिक आधुनिक और एथेनॉल-केंद्रित (Ethanol-focused) बनेगा। लेकिन जमीनी स्तर पर खांडसारी उद्योगों पर कड़ाई और मिलों की दूरी बढ़ाए जाने से किसानों और स्थानीय व्यापारियों के बीच असंतोष की स्थिति बनी हुई है।
उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में गन्ना भुगतान का मुद्दा हमेशा से बेहद संवेदनशील, राजनीतिक और आर्थिक रूप से जटिल रहा है। कागजों पर नियम सख्त होने के बावजूद, हर साल किसानों का अरबों रुपया मिलों पर बकाया रह जाता है।
इस संदर्भ में वर्तमान स्थिति और गन्ना (नियंत्रण) आदेश, 2026 के इस संकट पर पड़ने वाले कानूनी व जमीनी प्रभावों का पूरा विश्लेषण नीचे दिया गया है:
1. उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में गन्ना भुगतान की वर्तमान स्थिति
इन दोनों राज्यों में भुगतान की समस्या मुख्य रूप से निजी चीनी मिलों (Private Mills) के साथ है, जबकि सहकारी (Cooperative) मिलें सरकार की मदद से थोड़ा बेहतर प्रदर्शन करती हैं।
उत्तर प्रदेश की स्थिति: यूपी में करीब 120 चीनी मिलें हैं। हर पेराई सीजन (Crushing Season) के अंत तक किसानों का कुल बकाया कई बार ₹5,000 करोड़ से ₹8,000 करोड़ तक पहुंच जाता है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में सरकार के दबाव और सीधे एथेनॉल से होने वाली कमाई के कारण भुगतान की रफ्तार सुधरी है, लेकिन पश्चिमी यूपी की कुछ प्रमुख निजी मिलें (जैसे बजाज ग्रुप की मिलें) अभी भी भुगतान में महीनों की देरी करती हैं।
उत्तराखंड की स्थिति: उत्तराखंड में मुख्य रूप से हरिद्वार और उधमसिंह नगर जिलों में मिलें सक्रिय हैं (जैसे इकबालपुर, लक्सर, किच्छा और बाजपुर)। यहाँ भी इकबालपुर जैसी निजी मिलों पर किसानों का करोड़ों रुपया पिछले कई सीजनों से बकाया है, जिसके लिए किसानों को बार-बार धरने और प्रदर्शन करने पड़ते हैं।
2. नया कानून (आदेश 2026) इस संकट को कैसे प्रभावित करेगा?
नया आदेश इस भुगतान संकट को दूर करने के लिए कुछ मजबूत कानूनी और प्रशासनिक रास्ते खोलता है, लेकिन इसके सामने कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं:
क) एथेनॉल से ‘डायरेक्ट कैश फ्लो’ (सकारात्मक प्रभाव)
असर: अब तक मिलों की मुख्य कमाई चीनी बेचने से होती थी, जो अक्सर गोदामों में डंप पड़ी रहती थी (जिसके कारण कैश फ्लो रुक जाता था)। नए आदेश में गन्ने से सीधे एथेनॉल बनाने वाली इकाइयों को बढ़ावा दिया गया है।
फायदा: तेल विपणन कंपनियों (OMCs) से एथेनॉल का भुगतान बहुत तेजी से (अक्सर 21 दिनों के भीतर) मिलों को मिल जाता है। इस डायरेक्ट कैश फ्लो से मिलों के पास नकदी की कमी नहीं होगी, जिससे वे यूपी और उत्तराखंड के किसानों का रोजाना का भुगतान समय पर कर सकेंगी।
ख) 15% ब्याज का नियम: कानूनी बनाम जमीनी हकीकत
असर: 14 दिनों में भुगतान न होने पर 15% वार्षिक ब्याज का नियम नए आदेश में भी बेहद सख्त रखा गया है।
चुनौती: यह प्रावधान पुराने 1966 के आदेश में भी था। लेकिन उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की राज्य सरकारें अक्सर मिलों पर यह ब्याज नहीं थोपती हैं। इसके पीछे तर्क यह दिया जाता है कि यदि मिलें पहले से ही वित्तीय घाटे में हैं, तो उन पर ब्याज का और बोझ डालने से वे पूरी तरह दिवालिया हो जाएंगी और अंततः किसानों का मूल पैसा भी डूब जाएगा। नए कानून की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्य प्रशासन इस ब्याज नियम को कितनी सख्ती से लागू करता है।
ग) राजस्व वसूली प्रमाण पत्र (RRC) और कुर्की की प्रक्रिया
असर: नए आदेश के तहत यदि मिलें भुगतान में डिफॉल्ट करती हैं, तो जिला प्रशासन (DM) को मिल की चीनी, एथेनॉल और अन्य संपत्तियों को कुर्क (Seize) करने और उनकी नीलामी करके किसानों का पैसा चुकाने के स्पष्ट अधिकार दिए गए हैं।
प्रभाव: यूपी और उत्तराखंड में इस कानूनी हथियार का इस्तेमाल पहले भी किया गया है (जैसे इकबालपुर मिल के मामले में उत्तराखंड में और कई मिलों के मामले में यूपी में)। नया कानून इस प्रशासनिक प्रक्रिया को और अधिक केंद्रीकृत और समयबद्ध बनाता है, जिससे मिल मालिकों पर प्रशासनिक दबाव बढ़ेगा।
मुख्य निष्कर्ष और चिंता
कानूनी रूप से गन्ना नियंत्रण आदेश 2026 एक बेहतरीन ढांचा तैयार करता है, लेकिन उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के किसान संगठनों का मानना है कि जब तक “एस्क्रो अकाउंट” (Escrow Account) की व्यवस्था को पूरी तरह अनिवार्य नहीं किया जाता, तब तक संकट पूरी तरह खत्म नहीं होगा।
एस्क्रो अकाउंट व्यवस्था क्या है? किसानों की मांग है कि मिलें चीनी और एथेनॉल बेचकर जो भी पैसा कमाएं, उसका एक निश्चित प्रतिशत (जैसे 85%) सीधे एक अलग बैंक खाते (Escrow Account) में जाए, जिससे केवल और केवल किसानों का गन्ना भुगतान हो, और मिल मालिक उस पैसे को कहीं और डाइवर्ट न कर सकें। नए आदेश में इस पर और अधिक स्पष्टता की उम्मीद की जा रही है।
गन्ना नियंत्रण आदेश, 1966 (Sugarcane Control Order, 1966) भारत सरकार द्वारा आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के तहत जारी किया गया एक महत्वपूर्ण आदेश है। इसका उद्देश्य गन्ने की खरीद, मूल्य निर्धारण, आपूर्ति और चीनी मिलों के संचालन को विनियमित करना है। यह आदेश 16 जुलाई 1966 से लागू हुआ।
मुख्य प्रावधान:
गन्ने का न्यूनतम मूल्य (FRP) तय करना
केंद्र सरकार किसानों के लिए गन्ने का उचित एवं लाभकारी मूल्य (Fair and Remunerative Price – FRP) घोषित करती है।
आरक्षित क्षेत्र (Reserved Area)
किसी चीनी मिल के लिए निश्चित क्षेत्र तय किया जाता है, जहां के किसान अपनी गन्ना फसल उसी मिल को बेचेंगे।
गन्ना आपूर्ति का विनियमन
मिलों और किसानों के बीच गन्ना आपूर्ति व्यवस्था नियंत्रित की जाती है ताकि विवाद कम हों और नियमित आपूर्ति बनी रहे।
खरीद केंद्र एवं भुगतान नियम
चीनी मिलों को समय पर गन्ना खरीद और किसानों को भुगतान सुनिश्चित करना होता है।
राज्य सरकारों को अधिकार
कई प्रावधानों में राज्य सरकारें क्षेत्र निर्धारण, खरीद केंद्र, परिवहन आदि संबंधी आदेश जारी कर सकती हैं।
एथेनॉल ब्लेंडिंग (Ethanol Blending) का सीधा सा मतलब है पेट्रोल में एक निश्चित मात्रा में एथेनॉल (जो मुख्य रूप से गन्ने के रस, शीरे या खराब अनाज से बनता है) को मिलाना। इसका उद्देश्य कच्चे तेल (Crude Oil) के आयात को कम करना, प्रदूषण घटाना और किसानों की आय बढ़ाना है।
भारत सरकार के एथेनॉल ब्लेंडिंग टारगेट (Ethanol Blending Program – EBP) के मुख्य बिंदु और वर्तमान लक्ष्य निम्नलिखित हैं:
1. मुख्य लक्ष्य: E20 (20% एथेनॉल ब्लेंडिंग)
लक्ष्य वर्ष: भारत सरकार ने देश में बिकने वाले कुल पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाने (E20) का अंतिम लक्ष्य वर्ष 2025-26 तय किया है।
समय-सीमा में बदलाव: शुरुआत में सरकार ने यह लक्ष्य 2030 तक का रखा था, लेकिन पर्यावरण और आर्थिक फायदों को देखते हुए सरकार ने इसे पांच साल पहले यानी 2025-26 तक हासिल करने का नीतिगत फैसला लिया।
2. वर्तमान स्थिति (Current Achievement)
भारत पहले ही राष्ट्रीय स्तर पर औसतन 15% से अधिक एथेनॉल ब्लेंडिंग (E15) के आंकड़े को पार कर चुका है।
देश के कई प्रमुख शहरों और पेट्रोल पंपों पर E20 ईंधन (20% एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल) व्यावसायिक रूप से उपलब्ध कराया जा चुका है, और इसका दायरा लगातार बढ़ाया जा रहा है।
3. भविष्य का रोडमैप (Beyond 2026)
E100 और फ्लेक्स फ्यूल: सरकार का अगला कदम फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों (Flex-Fuel Vehicles) को बढ़ावा देना है, जो 20% से लेकर 100% तक (E100) एथेनॉल पर चल सकें। मारुति, टोयोटा और टाटा जैसी कंपनियां इसके लिए इंजन विकसित कर चुकी हैं।
डीजल में ब्लेंडिंग: पेट्रोल के बाद सरकार डीजल में भी बायो-डीजल (Bio-diesel) मिलाने के लक्ष्य (करीब 5%) पर काम कर रही है।
इस टारगेट से गन्ना बेल्ट (UP, उत्तराखंड, हरियाणा) को क्या फायदा है?
गन्ना नियंत्रण आदेश 2026 और इस एथेनॉल टारगेट का चोली-दामन का साथ है:
अतिरिक्त गन्ने का सही इस्तेमाल: जब देश में चीनी का उत्पादन जरूरत से ज्यादा हो जाता है, तो चीनी के दाम गिर जाते हैं और मिलें घाटे में आ जाती हैं (जिससे किसानों का भुगतान अटकता है)। एथेनॉल टारगेट की वजह से मिलें अब उस अतिरिक्त गन्ने को सीधे एथेनॉल में बदल देती हैं।
सुनिश्चित और तेज कमाई: तेल कंपनियां (जैसे IOCL, BPCL, HPCL) मिलों से एथेनॉल खरीदती हैं और उसका भुगतान बहुत तेजी से करती हैं। इससे मिलों के पास नकदी (Cash) बनी रहती है, जो उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में गन्ना भुगतान संकट को स्थायी रूप से हल करने में मददगार साबित हो रही है।
