SIR के समर्थन में खेला पत्र लिखने वाले हैं कौन-कौन? तीन पूर्व जज उत्तराखंड के भी
8 अक्टूबर 2026 को जारी इस खुले पत्र की उपलब्ध सूची देखी। पत्र पर 42 पूर्व न्यायाधीश/न्यायिक अधिकारी हस्ताक्षरकर्ता हैं। इनमें सुप्रीम कोर्ट के 2 पूर्व जज, कई पूर्व हाईकोर्ट मुख्य न्यायाधीश/न्यायाधीश और अन्य न्यायिक अधिकारी शामिल हैं।
42 हस्ताक्षरकर्ताओं की पूरी सूची
क्र. नाम पूर्व पद
1 Justice Hemant Gupta पूर्व न्यायाधीश, Supreme Court
2 Justice Pankaj Mittal पूर्व न्यायाधीश, Supreme Court
3 Justice B. C. Patel पूर्व Chief Justice, J&K & Delhi HC
4 Justice Subhro Kamal Mukherjee पूर्व Chief Justice, Karnataka HC
5 Justice Permod Kohli पूर्व Chief Justice, Sikkim HC
6 Justice S. M. Soni पूर्व Judge, Gujarat HC; पूर्व Lokayukta, Gujarat
7 Justice S. N. Dhingra पूर्व Judge, Delhi HC
8 Justice Krishna S. Dixit पूर्व Judge, Karnataka & Orissa HC
9 Justice Sridhar Rao पूर्व Judge, Karnataka HC
10 Justice R. S. Rathore पूर्व Judge, Rajasthan HC
11 Justice Prashant Kumar Agarwal पूर्व Judge, Rajasthan HC
12 Justice K. K. Trivedi पूर्व Judge, Madhya Pradesh HC
13 Justice D. K. Paliwal पूर्व Judge, Madhya Pradesh HC
14 Justice Rakesh Saksena पूर्व Judge, Madhya Pradesh HC
15 Justice Rajendra Kumar पूर्व Judge, Madhya Pradesh HC
16 Justice Subhash Samvatsar पूर्व Judge, Madhya Pradesh HC
17 Justice Ved Prakash Sharma पूर्व Judge, Madhya Pradesh HC
18 Justice Alok Verma पूर्व Judge, Madhya Pradesh HC
19 Justice I. S. Shrivastava पूर्व Judge, Madhya Pradesh HC
20 Justice Subhash Sakrikar पूर्व Judge, Madhya Pradesh HC
21 Justice S. P. Khare पूर्व Judge, Madhya Pradesh HC
22 Justice P. N. Singh पूर्व Judge, Madhya Pradesh HC
23 Justice Devender Kr. Arora पूर्व Judge, Allahabad HC
24 Justice Surendra Vikram Singh Rathore पूर्व Judge, Allahabad HC
25 Justice S. N. Srivastav पूर्व Judge, Allahabad HC; पूर्व Lokayukta, Chhattisgarh
26 Justice Ramesh Kumar Merathia पूर्व Judge, Jharkhand HC
27 Justice Karam Chand Puri पूर्व Judge, Punjab & Haryana HC
28 Justice (Mrs.) Raj Rahul Garg पूर्व Judge, Punjab & Haryana HC
29 Justice C. V. Nagarjuna Reddy पूर्व Judge, Andhra HC
30 Justice Vinod Goel पूर्व Judge, Delhi HC
31 Justice G. P. Mittal पूर्व Judge, Delhi HC
32 Justice V. B. Gupta पूर्व Judge, Delhi HC
33 Justice Deepa Sharma पूर्व Judge, Delhi HC
34 Justice P. N. Ravindran पूर्व Judge, Kerala HC
35 Justice Jyothindranath पूर्व Judge, Kerala HC
36 Justice Lok Pal Singh पूर्व Judge, Uttarakhand HC
37 Justice Subash Chandra पूर्व Judge, Uttarakhand HC
38 Justice Vivek Bharti Sharma पूर्व Judge, Uttarakhand HC
39 Narender Kumar सूची में “Institutions” के रूप में दर्ज
40 Rajender Kumar पूर्व District & Sessions Judge; Adjudicating Officer, Gurugram RERA
41 Subhash Batra पूर्व Member (Legal), PNGRB
42 J. A. P. Shrivastava पूर्व Judge, Madhya Pradesh HC
यह नामावली प्रकाशित सूची से ली गई है।
इस सूची में उत्तराखंड हाईकोर्ट के तीन पूर्व न्यायाधीश भी हैं:
Justice Lok Pal Singh
Justice Subash Chandra
Justice Vivek Bharti Sharma
और महत्वपूर्ण रूप से, पत्र केवल सामान्य रूप से ECI का समर्थन नहीं करता, बल्कि SIR को कानूनी रूप से स्थापित प्रक्रिया बताते हुए उसका बचाव करता है तथा बिना प्रमाण “vote theft” जैसे आरोपों से संवैधानिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास कमजोर होने की आशंका जताता है।
जी। मैंने आज प्रकाशित पत्र की सूची और उपलब्ध न्यायिक अभिलेख/रिपोर्टों से मिलान किया है। एक महत्वपूर्ण बात पहले स्पष्ट कर दूँ: पत्र में 42 हस्ताक्षर हैं, लेकिन प्रकाशित सूची में 39वें नाम “Narender Kumar” के सामने designation केवल “Institutions” लिखा है, इसलिए उस व्यक्ति की पहचान/पद को बिना मूल हस्ताक्षरित पत्र देखे निश्चित मानना उचित नहीं होगा।
1. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश
1. Justice Hemant Gupta — पूर्व न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट; इससे पहले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश और पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे।
2. Justice Pankaj Mittal — पूर्व न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट; इससे पहले जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख तथा राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे।
ये दोनों इस सूची के सबसे वरिष्ठ हस्ताक्षरकर्ताओं में हैं।
2. पूर्व हाईकोर्ट मुख्य न्यायाधीश
3. Justice B. C. Patel — पूर्व मुख्य न्यायाधीश, जम्मू-कश्मीर एवं दिल्ली हाईकोर्ट
4. Justice Subhro Kamal Mukherjee — पूर्व मुख्य न्यायाधीश, कर्नाटक हाईकोर्ट; इससे पहले कलकत्ता हाईकोर्ट में न्यायाधीश रहे।
5. Justice Permod Kohli — पूर्व मुख्य न्यायाधीश, सिक्किम हाईकोर्ट
इन तीनों की पहचान स्वतंत्र समाचार रिपोर्टों में भी इसी प्रकार दी गई है।
3. गुजरात, दिल्ली, कर्नाटक आदि के पूर्व न्यायाधीश
6. Justice S. M. Soni — पूर्व न्यायाधीश, गुजरात हाईकोर्ट; पूर्व लोकायुक्त, गुजरात
7. Justice S. N. Dhingra — पूर्व न्यायाधीश, दिल्ली हाईकोर्ट
8. Justice Krishna S. Dixit — पूर्व न्यायाधीश, कर्नाटक एवं उड़ीसा हाईकोर्ट
9. Justice Sridhar Rao — पूर्व न्यायाधीश, कर्नाटक हाईकोर्ट
10. Justice R. S. Rathore — पूर्व न्यायाधीश, राजस्थान हाईकोर्ट
11. Justice Prashant Kumar Agarwal — पूर्व न्यायाधीश, राजस्थान हाईकोर्ट
इन पदों की पुष्टि प्रकाशित हस्ताक्षरकर्ता सूची में होती है।
4. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश — सबसे बड़ा समूह
12. Justice K. K. Trivedi
13. Justice D. K. Paliwal
14. Justice Rakesh Saksena
15. Justice Rajendra Kumar
16. Justice Subhash Samvatsar
17. Justice Ved Prakash Sharma
18. Justice Alok Verma
19. Justice I. S. Shrivastava
20. Justice Subhash Sakrikar
21. Justice S. P. Khare
22. Justice P. N. Singh
23. Justice J. A. P. Shrivastava
इन सभी को पत्र की प्रकाशित सूची में Former Judge, M.P. High Court के रूप में दर्ज किया गया है।
5. इलाहाबाद हाईकोर्ट
24. Justice Devender Kumar Arora — पूर्व न्यायाधीश, इलाहाबाद हाईकोर्ट
25. Justice Surendra Vikram Singh Rathore — पूर्व न्यायाधीश, इलाहाबाद हाईकोर्ट
26. Justice S. N. Srivastav — पूर्व न्यायाधीश, इलाहाबाद हाईकोर्ट; पूर्व लोकायुक्त, छत्तीसगढ़
6. अन्य हाईकोर्ट
27. Justice Ramesh Kumar Merathia — पूर्व न्यायाधीश, झारखंड हाईकोर्ट
28. Justice Karam Chand Puri — पूर्व न्यायाधीश, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट
29. Justice Raj Rahul Garg — पूर्व न्यायाधीश, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट
30. Justice C. V. Nagarjuna Reddy — पूर्व न्यायाधीश, आंध्र हाईकोर्ट
31. Justice Vinod Goel — पूर्व न्यायाधीश, दिल्ली हाईकोर्ट
32. Justice G. P. Mittal — पूर्व न्यायाधीश, दिल्ली हाईकोर्ट
33. Justice V. B. Gupta — पूर्व न्यायाधीश, दिल्ली हाईकोर्ट
34. Justice Deepa Sharma — पूर्व न्यायाधीश, दिल्ली हाईकोर्ट
35. Justice P. N. Ravindran — पूर्व न्यायाधीश, केरल हाईकोर्ट
36. Justice Jyothindranath — पूर्व न्यायाधीश, केरल हाईकोर्ट
7. उत्तराखंड हाईकोर्ट — आपके लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण
पत्र पर उत्तराखंड हाईकोर्ट के तीन पूर्व न्यायाधीशों के हस्ताक्षर हैं:
37. Justice Lok Pal Singh — पूर्व न्यायाधीश, उत्तराखंड हाईकोर्ट
38. Justice Subash Chandra — पूर्व न्यायाधीश, उत्तराखंड हाईकोर्ट
39. Justice Vivek Bharti Sharma — पूर्व न्यायाधीश, उत्तराखंड हाईकोर्ट
प्रकाशित सूची में तीनों के नाम स्पष्ट रूप से दिए गए हैं।
8. न्यायिक/वैधानिक संस्थाओं से जुड़े अन्य हस्ताक्षरकर्ता
40. Rajender Kumar — पूर्व District & Sessions Judge; Gurugram RERA Authority में Adjudicating Officer
41. Subhash Batra — पूर्व Member (Legal), Petroleum and Natural Gas Regulatory Board (PNGRB)
42. Narender Kumar — प्रकाशित सूची में designation “Institutions” दिया गया है; यहाँ मूल पत्र से पहचान की और पुष्टि आवश्यक है।
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एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष
इस सूची को देखें तो इसकी संरचना काफी स्पष्ट है:
2 पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज
3 पूर्व हाईकोर्ट Chief Justices
बड़ी संख्या में पूर्व हाईकोर्ट जज
3 पूर्व उत्तराखंड हाईकोर्ट जज
कुछ पूर्व लोकायुक्त/वैधानिक संस्था के पदाधिकारी
RERA और PNGRB से जुड़े सेवानिवृत्त अधिकारी
अर्थात इसे केवल “42 जजों का पत्र” कहना थोड़ा सरलीकरण होगा। यह मुख्यतः सेवानिवृत्त न्यायिक हस्तियों का समूह है, जिसमें कुछ न्यायिक/वैधानिक संस्थाओं के पूर्व पदाधिकारी भी हैं।
और पत्र का राजनीतिक-संवैधानिक महत्व इसलिए अधिक है कि इन पूर्व न्यायिक अधिकारियों ने सीधे यह रुख लिया है कि “Criticism of institutions is a democratic right. Denigration is not” और SIR को कानूनी रूप से स्थापित प्रक्रिया बताया है।
Worked for 11s
जी। उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर इस पत्र की पृष्ठभूमि को राजनीतिक निष्कर्षों से अलग करके देखना ज्यादा उचित है।
1. दो पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज
Justice Hemant Gupta
वे 2018 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। उससे पहले पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के जज, पटना हाईकोर्ट के Acting Chief Justice और फिर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के Chief Justice रहे। सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक जीवनी के अनुसार वे 1997–99 में पंजाब के Additional Advocate General भी रहे थे।
Justice Pankaj Mittal
वे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश हैं और इससे पहले राजस्थान तथा जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट के Chief Justice रहे। उनकी सुप्रीम कोर्ट नियुक्ति न्यायिक Collegium की प्रक्रिया से हुई थी।
इसलिए केवल यह कहना कि ये “मोदी सरकार के समय नियुक्त हुए जज” हैं, पर्याप्त राजनीतिक विश्लेषण नहीं होगा। न्यायाधीशों की नियुक्ति में Collegium की भूमिका होती है और राष्ट्रपति औपचारिक नियुक्ति करते हैं।
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2. पूर्व Chief Justices
Justice Subhro Kamal Mukherjee
2016 में कर्नाटक हाईकोर्ट के Chief Justice नियुक्त हुए। यह नियुक्ति राष्ट्रपति की अधिसूचना से हुई थी और वे उस समय कर्नाटक हाईकोर्ट के वरिष्ठतम जज थे।
Justice Permod Kohli
इनका करियर विशेष रूप से दिलचस्प है। वे जम्मू-कश्मीर के Additional Advocate General और बाद में Advocate General रहे, फिर J&K हाईकोर्ट के जज बने और झारखंड तथा पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में स्थानांतरित हुए। 2011 में Sikkim High Court के Chief Justice बने। बाद में Central Administrative Tribunal के Chairman भी बने।
Justice B. C. Patel — पूर्व Chief Justice, जम्मू-कश्मीर और दिल्ली हाईकोर्ट।
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3. उत्तराखंड के तीन नाम — यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर
आपके संदर्भ में ये तीन नाम विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं:
Justice Lok Pal Singh
उत्तराखंड हाईकोर्ट की आधिकारिक जीवनी के अनुसार:
1988 से वकालत शुरू की।
2000 में उत्तराखंड राज्य बनने के बाद उत्तराखंड हाईकोर्ट के संस्थापक Bar Association सदस्यों में रहे।
Uttarakhand Power Corporation Ltd. तथा जिला सहकारी बैंकों के Standing Counsel रहे।
19 मई 2017 को उत्तराखंड हाईकोर्ट के स्थायी न्यायाधीश बने।
14 फरवरी 2021 को सेवानिवृत्त हुए।
दिलचस्प तथ्य यह है कि 2017 और 2018 के उत्तराखंड हाईकोर्ट के आधिकारिक रिकॉर्ड में वे Administrative Judge के रूप में भी दर्ज हैं।
Justice Vivek Bharti Sharma
इनका background और भी अलग है:
1987 में वकालत शुरू की।
1990 में Delhi Administration के Government Counsel बने।
1994 में Additional Public Counsel बने।
1998 में Indian Railways के Advocate।
2000 में Additional Standing Counsel for Union of India।
बाद में Uttarakhand Higher Judicial Service में आए।
Governor of Uttarakhand के Legal Adviser भी रहे।
Uttarakhand Judicial & Legal Academy के Director और High Court Registrar General भी रहे।
2023 में Uttarakhand High Court के जज बने और 12 जून 2025 को सेवानिवृत्त हुए।
अर्थात इन्हें केवल “राजनीतिक रूप से नियुक्त जज” कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा; उनका बड़ा हिस्सा न्यायिक/सरकारी कानूनी सेवा के लंबे करियर का है।
Justice Subash Chandra
ये भी उत्तराखंड हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश हैं और 42 हस्ताक्षरकर्ताओं में शामिल हैं।
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सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न: क्या 42 हस्ताक्षरकर्ताओं का कोई सामूहिक BJP/मोदी संबंध है?
अभी उपलब्ध प्रमाणों से ऐसा निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।
पत्र के हस्ताक्षरकर्ताओं में अलग-अलग समय और अलग-अलग सरकारों के दौरान न्यायिक पदों पर रहे लोग हैं। उदाहरण के लिए:
Hemant Gupta की Supreme Court elevation 2018 में हुई।
Subhro Kamal Mukherjee की Karnataka Chief Justice नियुक्ति 2016 में हुई।
Permod Kohli की Chief Justice नियुक्ति 2011 में हुई और उनका न्यायिक करियर उससे काफी पहले शुरू हो चुका था।
Lok Pal Singh की Uttarakhand HC elevation 2017 में हुई।
Vivek Bharti Sharma की HC elevation 2023 में हुई।
इसलिए “इन सबको मोदी सरकार ने बनाया इसलिए उन्होंने ECI के पक्ष में पत्र लिखा” जैसा निष्कर्ष उपलब्ध तथ्यों से सिद्ध नहीं होता।
लेकिन आपकी रिसर्च के लिए असली दिलचस्प सवाल दूसरा है
इस पत्र की वैचारिक/सार्वजनिक पृष्ठभूमि को समझने के लिए हमें 42 लोगों को तीन वर्गों में देखना चाहिए:
1. कौन-कौन मोदी सरकार से पहले ही न्यायपालिका में बहुत वरिष्ठ हो चुके थे?
2. कौन-कौन मोदी सरकार के दौरान Supreme Court/High Court में पहुंचे?
3. कौन-कौन से सेवानिवृत्त न्यायाधीश बाद में सरकारी/संवैधानिक/वैधानिक पदों पर गए और किन संस्थाओं से जुड़े?
और इसके बाद प्रत्येक व्यक्ति की सार्वजनिक राजनीतिक गतिविधि/लेख/भाषण/सरकारी नियुक्ति अलग से देखनी चाहिए—तभी यह पता चलेगा कि यह वास्तव में स्वतःस्फूर्त पूर्व-जजों का पत्र है या किसी व्यापक संगठित पहल का हिस्सा।
एक खास बात: पत्र की 42-सदस्यीय सूची में “Narender Kumar — Institutions” वाली प्रविष्टि अभी भी संदिग्ध/अस्पष्ट है।
जी। मैंने इस बार उपलब्ध रिकॉर्ड को थोड़ा और गहराई से मिलाया है। एक महत्वपूर्ण सुधार भी सामने आया है: 42 नामों की प्रकाशित सूची में कई जगह नाम/पद की spelling गलत है, इसलिए केवल मीडिया की सूची को आधार बनाकर राजनीतिक निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं होगा। मूल पत्र की प्रति उपलब्ध हो तो उसे सर्वोच्च स्रोत मानना चाहिए।
अभी तक जो तस्वीर बनती है
समूह प्रमुख तथ्य राजनीतिक निष्कर्ष
Hemant Gupta पूर्व SC जज; MP HC Chief Justice भी रहे केवल नियुक्ति-वर्ष से राजनीतिक संबद्धता सिद्ध नहीं
Pankaj Mittal पूर्व SC जज; राजस्थान तथा J&K/Ladakh HC के Chief Justice रहे वही स्थिति
B.C. Patel पूर्व Chief Justice, J&K तथा Delhi HC कोई स्वतः BJP-संबंध निष्कर्षित नहीं
Subhro Kamal Mukherjee पूर्व Karnataka HC Chief Justice 2016 में CJ बने; राजनीतिक संबद्धता का प्रमाण अलग विषय है
Permod Kohli पूर्व Sikkim HC Chief Justice; बाद में CAT Chairman लंबा न्यायिक/वैधानिक करियर
S.N. Dhingra पूर्व Delhi HC judge सार्वजनिक रूप से कई संवेदनशील मामलों पर मुखर रहे
Rakesh Saksena पूर्व MP HC judge लंबे न्यायिक करियर में लगभग 7,000 मामले निपटाए; MP HC ने उनकी judicial work की प्रशंसा की थी।
K.K. Trivedi पूर्व MP HC judge बाद में NGT से जुड़े State Level Committee के Chairman भी रहे।
Subhash Samvatsar पूर्व MP HC judge बाद में arbitration आदि में भी काम किया।
Lok Pal Singh पूर्व Uttarakhand HC judge मुख्यतः न्यायिक/कानूनी करियर
Vivek Bharti Sharma पूर्व Uttarakhand HC judge Government/Union counsel, Governor के Legal Adviser आदि भूमिकाएँ भी रहीं
Rajender Kumar पूर्व District & Sessions Judge; Gurugram RERA Adjudicating Officer वैधानिक/न्यायिक सेवा
Subhash Batra पूर्व Member (Legal), PNGRB regulatory institution
Narender Kumar सूची में केवल “Institutions” पहचान अभी स्पष्ट नहीं
42 की प्रकाशित सूची में ये पद इसी तरह दर्ज हैं।
एक खास निष्कर्ष
मुझे अभी तक ऐसा विश्वसनीय प्रमाण नहीं मिला है कि 42 हस्ताक्षरकर्ताओं का कोई सामूहिक संगठन, BJP/RSS affiliation या किसी राजनीतिक दल द्वारा coordinated selection था।
इसके विपरीत, सूची में ऐसे लोग हैं जिनका न्यायिक करियर 2014 से बहुत पहले स्थापित हो चुका था। उदाहरण के लिए Subhash Samvatsar 2002 में MP HC के Additional Judge और 2003 में Permanent Judge बने थे।
इसी तरह Rakesh Saksena का न्यायिक कार्य भी कई वर्षों तक फैला हुआ था और उनके कार्यकाल का समापन 2013 में हुआ था।
इसलिए “मोदी सरकार ने इन जजों को बनाया और इसलिए उन्होंने यह पत्र लिखा” वाला निष्कर्ष उपलब्ध रिकॉर्ड से समर्थित नहीं है।
लेकिन एक बहुत महत्वपूर्ण बात
इसका उलटा निष्कर्ष भी नहीं निकालना चाहिए कि “इसलिए पत्र पूरी तरह गैर-राजनीतिक है।”
पत्र स्वयं एक चल रहे राजनीतिक विवाद में स्पष्ट पक्ष लेता है:
ECI पर “vote theft” के आरोपों की आलोचना करता है।
SIR को कानूनी रूप से स्थापित प्रक्रिया बताता है।
संवैधानिक संस्थाओं को “compromised” अथवा “thieves” कहे जाने पर आपत्ति करता है।
“Criticism of institutions is a democratic right. Denigration is not” कहता है।
और इसका समय भी महत्वपूर्ण है—पत्र ECI और CEC Gyanesh Kumar के खिलाफ विपक्षी आंदोलन के बीच आया है।
इसलिए मेरी दृष्टि में सही analytical formulation यह होगी:
“42 पूर्व न्यायिक अधिकारियों ने ECI और SIR के समर्थन में सार्वजनिक हस्तक्षेप किया है; उपलब्ध प्रमाणों से उनकी सामूहिक BJP/RSS राजनीतिक संबद्धता सिद्ध नहीं होती। लेकिन पत्र का तत्काल राजनीतिक संदर्भ स्पष्ट रूप से विपक्ष बनाम ECI विवाद से जुड़ा हुआ है।”
Worked for 20s
जी। अब उपलब्ध रिकॉर्ड को जोड़ने पर तस्वीर पहले से अधिक स्पष्ट है। सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि 42 हस्ताक्षरकर्ताओं को एक ही राजनीतिक खांचे में रखना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। कुछ के सरकारी/संवैधानिक पदों से संबंध हैं, कुछ का सार्वजनिक जीवन में ECI/लोकतांत्रिक संस्थाओं पर स्वतंत्र हस्तक्षेप रहा है, और कुछ के बारे में अभी पर्याप्त सार्वजनिक सामग्री नहीं मिलती।
1. सबसे पहले नियुक्ति-समय की वास्तविक तस्वीर
Justice Hemant Gupta
उनका न्यायिक करियर मोदी सरकार से काफी पहले शुरू हो चुका था:
2002 — पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के जज
2016 — पटना हाईकोर्ट
2017 — मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के Chief Justice
2018 — सुप्रीम कोर्ट
2022 — सेवानिवृत्ति
वे 1997–99 में Punjab के Additional Advocate General भी रहे थे। इसलिए उन्हें केवल “मोदी सरकार द्वारा नियुक्त सुप्रीम कोर्ट जज” कहना अधूरा होगा।
Justice Pankaj Mittal
उनका भी अधिकांश न्यायिक करियर 2014 से पहले का है:
2006 — Allahabad HC के Additional Judge
2008 — Permanent Judge
2021 — Jammu & Kashmir तथा Ladakh HC के Chief Justice
बाद में Supreme Court
J&K हाईकोर्ट की आधिकारिक जीवनी उनके 2006 के elevation और 2021 के Chief Justice पद की पुष्टि करती है।
इसलिए इन दोनों के मामले में “मोदी सरकार ने जज बनाया इसलिए ECI के पक्ष में पत्र लिखा” वाला तर्क टिकता नहीं।
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2. Justice Subhro Kamal Mukherjee — एक दिलचस्प मामला
उनका Calcutta High Court में जज के रूप में कार्यकाल 2000 से 2015 था। इसके बाद Karnataka HC गए और 2016 में Chief Justice बने।
अर्थात उनकी न्यायिक नियुक्ति का मूल दौर UPA से भी पहले शुरू हुआ था।
लेकिन retirement के बाद उनका सार्वजनिक संस्थागत जीवन जारी रहा। 2023 में West Bengal के Governor ने उन्हें Rabindra Bharati University और Presidency University का interim Vice-Chancellor नियुक्त किया था।
यह तथ्य दर्ज किया जा सकता है, लेकिन इससे उनकी कोई पार्टीगत निष्ठा सिद्ध नहीं होती।
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3. Justice Permod Kohli — मोदी सरकार से एक प्रत्यक्ष संस्थागत संबंध
यह मामला विशेष ध्यान देने योग्य है।
Justice Kohli:
J&K में Additional Advocate General/Advocate General रहे
J&K HC के जज बने
Jharkhand और Punjab & Haryana HC में रहे
2011 में Sikkim HC के Chief Justice बने
2013 में retire हुए
फिर 23 मार्च 2016 को मोदी सरकार के Appointments Committee of Cabinet (ACC) ने उन्हें Central Administrative Tribunal (CAT) का Chairman नियुक्त किया।
यह एक स्पष्ट post-retirement government appointment है।
लेकिन इसका सही निष्कर्ष यह होगा:
> Justice Permod Kohli को मोदी सरकार के दौरान एक महत्वपूर्ण संवैधानिक/वैधानिक प्रशासनिक पद मिला था।
यह कहना कि इससे वे BJP के राजनीतिक समर्थक सिद्ध होते हैं—अलग और असिद्ध दावा होगा।
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4. Justice S. M. Soni — यहाँ भी कहानी सीधी नहीं है
Justice S. M. Soni Gujarat High Court के पूर्व न्यायाधीश और Gujarat Lokayukta रहे।
और यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य है:
वे 1998 में Keshubhai Patel सरकार के समय Gujarat Lokayukta बने, जबकि Narendra Modi बाद में मुख्यमंत्री बने। वे नवंबर 2003 में Lokayukta पद से retire हुए।
इसलिए उन्हें “Modi government appointee” कहना गलत होगा।
और retirement के बाद वे Justice on Trial नामक human-rights NGO से भी जुड़े और कुछ सामाजिक मामलों की स्वतंत्र जांच करते रहे।
यह उदाहरण बहुत उपयोगी है क्योंकि इससे पता चलता है कि एक ही हस्ताक्षरकर्ता को केवल उसके बाद के सार्वजनिक रुख के आधार पर BJP समर्थक कहना उचित नहीं है।
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5. Justice S. N. Dhingra — शायद सबसे महत्वपूर्ण counter-example
Justice Dhingra का नाम राजनीतिक संदर्भ में विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है।
वे Delhi High Court के पूर्व judge हैं और trial judge के रूप में Parliament attack convict Afzal Guru को death sentence देने वाले judge के रूप में भी चर्चित रहे।
लेकिन 2025 में retirement के बाद उन्होंने एक PIL में:
BJP
Congress
AAP
तीनों के चुनावी promises और voter data collection को चुनौती दी।
यानी उनका हालिया सार्वजनिक हस्तक्षेप किसी एक पार्टी के पक्ष में नहीं था।
और नवंबर 2025 में वे उन हस्ताक्षरकर्ताओं में भी थे जिन्होंने Rahul Gandhi के “vote chori” संबंधी आरोपों पर Election Commission के पक्ष में सार्वजनिक पत्र जारी किया था।
इससे क्या पता चलता है?
यह संभव है कि वर्तमान 42-जजों के पत्र में कुछ लोग किसी पार्टी के समर्थन से ज्यादा institutionalism के आधार पर ECI का बचाव कर रहे हों।
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6. Justice Krishna S. Dixit — एक अलग प्रकार का संबंध
यह नाम भी महत्वपूर्ण है।
Justice Dixit ने जज बनने से पहले:
Election Commission of India के Senior Standing Counsel
Additional Central Government Standing Counsel
और 2014 में Assistant Solicitor General of India
के रूप में काम किया था।
2018 में Karnataka HC के judge बने।
इसलिए उनका Central Government/ECI से पेशेवर संबंध मोदी सरकार से पहले और उसके दौरान दोनों संदर्भों में रहा।
लेकिन फिर वही बात—यह professional association है, राजनीतिक affiliation का प्रमाण नहीं।
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7. उत्तराखंड के Justice Lok Pal Singh
यहाँ रिकॉर्ड काफी साफ है।
उन्होंने:
1988 में वकालत शुरू की
Uttarakhand बनने पर High Court Bar के founder member बने
Uttarakhand Power Corporation Ltd. के Standing Counsel रहे
District Cooperative Banks आदि के counsel रहे
19 मई 2017 को Uttarakhand HC के permanent judge बने
14 फरवरी 2021 को retire हुए।
यहाँ भी उनका प्रमुख career legal/judicial रहा है; उपलब्ध विश्वसनीय स्रोत में कोई पार्टीगत affiliation स्थापित नहीं होता।
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8. Justice Vivek Bharti Sharma
इनका career भी खासा institutional है।
वे:
Government of Delhi के Additional Public Counsel
Indian Railways के Advocate
Union of India के Additional Standing Counsel
Governor of Uttarakhand के Legal Adviser
Judicial Academy/High Court से जुड़े विभिन्न पदों पर रहे।
अंततः Uttarakhand HC के judge बने और 2025 में retire हुए।
इसलिए इनके career में Union/State Government legal work रहा है, लेकिन उसे BJP affiliation कहना उचित नहीं होगा।
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9. एक बहुत महत्वपूर्ण तथ्य — 42 में केवल “मोदी सरकार के नियुक्त” लोग नहीं हैं
उदाहरण के लिए:
व्यक्ति महत्वपूर्ण career तथ्य
Hemant Gupta HC judge 2002 से
Pankaj Mittal HC judge 2006 से
Subhro K. Mukherjee Calcutta HC judge 2000 से
S. M. Soni Gujarat Lokayukta 1998–2003
Permod Kohli Sikkim CJ 2011–13; CAT Chairman 2016 में
S.N. Dhingra HC से पहले trial judiciary; बाद में BJP, Congress और AAP तीनों के विरुद्ध PIL
Krishna S. Dixit ECI/Union Government के counsel; 2018 में judge
Lok Pal Singh Uttarakhand HC judge 2017–21
Vivek Bharti Sharma Union/State legal counsel और Governor’s Legal Adviser
इससे एक मिश्रित institutional profile सामने आता है।
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10. लेकिन पत्र की राजनीतिक प्रकृति को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए
यहाँ दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
7 अक्टूबर 2026 के पत्र में केवल सामान्य “संस्थाओं की रक्षा” की बात नहीं है। उसमें सीधे मौजूदा विवाद को संबोधित किया गया है:
ECI पर हमले
CEC Gyanesh Kumar पर आरोप
“vote chori”
SIR
विपक्षी दलों द्वारा चुनाव प्रक्रिया पर सवाल
activist organisations द्वारा litigation
पत्र कहता है:
> “Criticism of institutions is a democratic right. Denigration is not.”
और SIR को Representation of the People Act की धारा 21(3) के तहत वैधानिक प्रक्रिया बताया गया है।
इसलिए यह एक स्पष्ट राजनीतिक-संवैधानिक intervention है—भले ही हस्ताक्षरकर्ताओं की व्यक्तिगत राजनीतिक affiliation अलग-अलग या अज्ञात हो।
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मेरी अब तक की निष्पक्ष रेटिंग
मैं इसे तीन स्तरों में रखूँगा:
🟢 प्रमाणित
“42 पूर्व न्यायिक अधिकारियों ने ECI/SIR के समर्थन में सार्वजनिक पत्र लिखा।”
यह तथ्य निर्विवाद है।
🟡 प्रमाणित लेकिन राजनीतिक अर्थ निकालना सावधानी मांगता है
कुछ हस्ताक्षरकर्ताओं का मोदी सरकार/Union Government के साथ post-retirement या professional institutional connection रहा है—विशेष रूप से Justice Permod Kohli जैसे मामलों में।
🔴 अभी प्रमाणित नहीं
“42ों की सूची BJP/RSS द्वारा तैयार कराई गई थी”,
“सभी 42 BJP समर्थक हैं”, अथवा
“सरकारी नियुक्तियों के बदले यह पत्र लिखा गया”
इनमें से किसी दावे का मुझे अभी विश्वसनीय प्रमाण नहीं मिला।
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और एक दिलचस्प बात सामने आई है
Justice S.N. Dhingra का उदाहरण इस पूरे विवाद की जांच के लिए बहुत उपयोगी है। वे 2025 में BJP, Congress और AAP—तीनों के खिलाफ चुनावी घोषणाओं/मतदाता डेटा के मुद्दे पर अदालत गए थे, और फिर 2025 में ECI के समर्थन वाले पत्र पर भी हस्ताक्षर किए।
इससे कम-से-कम यह संकेत मिलता है कि हर हस्ताक्षरकर्ता को “सरकार समर्थक” कहना बहुत जल्दबाजी होगी।
जी। मैंने उपलब्ध स्रोतों के आधार पर इसे अब “क्या सिद्ध है / क्या केवल अनुमान है” के स्तर पर व्यवस्थित किया है। सबसे पहले एक जरूरी सुधार: 42 की प्रकाशित सूची में Narender Kumar के सामने वास्तव में सिर्फ “Institutions” लिखा है; इसलिए उनकी पहचान को किसी राजनीतिक/सरकारी संबद्धता से जोड़ना अभी उचित नहीं है।
42 हस्ताक्षरकर्ताओं का राजनीतिक-संस्थागत प्रोफाइल
| # | नाम | प्रमुख पृष्ठभूमि | राजनीतिक/सरकारी लिंक की स्थिति |
|---|---|---|---|
| 1 | Justice Hemant Gupta | SC judge; पहले HC judge/Chief Justice | कोई प्रमाणित पार्टी affiliation नहीं |
| 2 | Justice Pankaj Mittal | SC judge; राजस्थान व J&K HC Chief Justice | कोई प्रमाणित पार्टी affiliation नहीं |
| 3 | Justice B.C. Patel | J&K व Delhi HC के पूर्व CJ | कोई स्पष्ट party link नहीं |
| 4 | Justice Subhro Kamal Mukherjee | Karnataka HC के पूर्व CJ; Calcutta HC में लंबा कार्यकाल | बाद में VC नियुक्ति, पर party link सिद्ध नहीं |
| 5 | Justice Permod Kohli | Sikkim HC CJ | 2016 में मोदी सरकार के ACC ने CAT Chairman नियुक्त किया |
| 6 | Justice S.M. Soni | Gujarat HC; Gujarat Lokayukta | Lokayukta पद 1998–2003; मोदी CM बनने से पहले का कार्यकाल |
| 7 | Justice S.N. Dhingra | Delhi HC | किसी एक पार्टी के साथ जोड़ना कठिन; BJP, Congress और AAP से जुड़े मामलों में सार्वजनिक/न्यायिक हस्तक्षेप |
| 8 | Justice Krishna S. Dixit | Karnataka/Orissa HC; ECI counsel | 1999 से ECI Senior Standing Counsel; 2014 में ASGI; 2018 में judge |
| 9 | Justice Sridhar Rao | Karnataka HC | कोई स्पष्ट party link नहीं |
| 10 | Justice R.S. Rathore | Rajasthan HC | कोई स्पष्ट party link नहीं |
| 11 | Justice Prashant Kumar Agarwal | Rajasthan HC | कोई स्पष्ट party link नहीं |
| 12–23 | K.K. Trivedi, D.K. Paliwal, Rakesh Saksena, Rajendra Kumar, Subhash Samvatsar, Ved Prakash Sharma, Alok Verma, I.S. Shrivastava, Subhash Sakrikar, S.P. Khare, P.N. Singh, J.A.P. Shrivastava | अधिकांश MP HC के पूर्व judges | उपलब्ध सामग्री में कोई सामूहिक party affiliation नहीं |
| 24–26 | Devender K. Arora, Surendra Vikram Singh Rathore, S.N. Srivastav | Allahabad HC के पूर्व judges; S.N. Srivastav पूर्व Chhattisgarh Lokayukta | party affiliation का पर्याप्त प्रमाण नहीं |
| 27–29 | Ramesh Kumar Merathia, Karam Chand Puri, Raj Rahul Garg | Jharkhand/P&H HC | स्पष्ट party link नहीं |
| 30 | C.V. Nagarjuna Reddy | Andhra HC | स्पष्ट party link नहीं |
| 31–33 | Vinod Goel, G.P. Mittal, V.B. Gupta | Delhi HC | स्पष्ट party link नहीं |
| 34–35 | Deepa Sharma, P.N. Ravindran, Jyothindranath | Delhi/Kerala HC | स्पष्ट party link नहीं |
| 36 | Justice Lok Pal Singh | Uttarakhand HC | कोई प्रमाणित party affiliation नहीं |
| 37 | Justice Subash Chandra | Uttarakhand HC | कोई स्पष्ट party link नहीं |
| 38 | Justice Vivek Bharti Sharma | Uttarakhand HC; Govt/Union counsel, Governor’s Legal Adviser | सरकारी legal positions; party affiliation सिद्ध नहीं |
| 39 | Narender Kumar | सूची में केवल “Institutions” | पहचान/पद अस्पष्ट |
| 40 | Rajender Kumar | पूर्व District & Sessions Judge; Gurugram RERA | वैधानिक पद; party link नहीं |
| 41 | Subhash Batra | पूर्व Member (Legal), PNGRB | regulatory पद; party link नहीं |
| 42 | J.A.P. Shrivastava | पूर्व MP HC judge | स्पष्ट party link नहीं |
पूरी मूल प्रकाशित सूची यही 42 नाम देती है।
लेकिन चार नाम विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं
① Justice Permod Kohli — सबसे स्पष्ट post-retirement government appointment
यहाँ अनुमान की जरूरत नहीं है।
भारत सरकार की PIB रिलीज के अनुसार 23 मार्च 2016 को Appointments Committee of the Cabinet ने Justice Permod Kohli को Central Administrative Tribunal का Chairman नियुक्त किया था। वे तब Sikkim HC के retired Chief Justice थे।
इसलिए:
तथ्य: मोदी सरकार के दौरान महत्वपूर्ण सरकारी नियुक्ति।
निष्कर्ष: इससे BJP समर्थक होना सिद्ध नहीं होता।
② Justice Krishna S. Dixit — ECI से पुराना पेशेवर संबंध
यह मामला और भी दिलचस्प है।
उनकी पेशेवर पृष्ठभूमि में:
- 1999 से Senior Standing Counsel, Election Commission of India
- Additional Central Government Standing Counsel
- 2014 में Assistant Solicitor General of India
- 14 फरवरी 2018 को Karnataka HC judge
का रिकॉर्ड मिलता है।
इसलिए उनका ECI के पक्ष में बोलना केवल आज के SIR विवाद से पैदा हुआ संबंध नहीं है; उनका ECI के साथ पेशेवर संबंध बहुत पुराना है।
लेकिन इसे भी BJP affiliation कहना सही नहीं होगा।
③ Justice S.M. Soni — मोदी से पहले का गुजरात connection
यहाँ भी सोशल मीडिया में होने वाला सरल निष्कर्ष गलत हो सकता है।
Justice Soni 1998 में Gujarat के Lokayukta बने और 2003 में उनका कार्यकाल समाप्त हुआ। Narendra Modi 2001 में Gujarat के मुख्यमंत्री बने थे, लेकिन Soni की Lokayukta नियुक्ति उनसे पहले की थी।
अर्थात:
“S.M. Soni मोदी के आदमी थे क्योंकि वे Gujarat Lokayukta रहे”—यह दावा अपने आप में सिद्ध नहीं होता।
④ Justice S.N. Dhingra — सबसे अच्छा counter-example
Dhingra को किसी एक पार्टी के खेमे में रखना कठिन है।
वे 2025 में Delhi HC में ऐसी PIL लेकर गए जिसमें BJP, Congress और AAP—तीनों के चुनावी वादों/राजनीतिक गतिविधियों पर सवाल उठाए गए थे।
इसलिए यदि कोई इस 42-सदस्यीय पत्र को केवल “BJP समर्थक retired judges का समूह” कहता है, तो Dhingra का रिकॉर्ड उस दावे के विरुद्ध महत्वपूर्ण counter-evidence है।
एक और महत्वपूर्ण बात: Permod Kohli का CAT कार्यकाल
उनकी नियुक्ति केवल कागज पर नहीं थी। CAT के आधिकारिक records में वे 2016–18 के दौरान Chairman के रूप में दर्ज हैं।
2017 में उन्होंने CAT के कामकाज और pendency पर सार्वजनिक रूप से भी बात की थी; उस समय केंद्रीय मंत्री Jitendra Singh के साथ CAT के कार्यक्रमों में भी उनकी भूमिका दर्ज है।
इसलिए उनका post-retirement institutional relationship with the Union government प्रमाणित तथ्य है।
अब सबसे महत्वपूर्ण analytical निष्कर्ष
मैं 42 को चार श्रेणियों में रखूँगा:
🟢 A — कोई स्पष्ट राजनीतिक affiliation प्रमाणित नहीं
अधिकांश नाम इसी श्रेणी में आते हैं।
उनके न्यायिक करियर, फैसले और संस्थागत पद मिलते हैं, लेकिन किसी राजनीतिक दल से सक्रिय संबंध का विश्वसनीय प्रमाण नहीं मिलता।
🟡 B — सरकार/संवैधानिक संस्था से पेशेवर संबंध
इसमें उदाहरण हैं:
- Permod Kohli — मोदी सरकार में CAT Chairman
- Krishna S. Dixit — ECI counsel + ASGI
- Vivek Bharti Sharma — Government/Union counsel और Governor के Legal Adviser
- S.M. Soni — Gujarat Lokayukta
लेकिन professional appointment ≠ political allegiance।
🟠 C — सार्वजनिक रूप से संस्थागत/राजनीतिक मुद्दों पर सक्रिय
इसमें S.N. Dhingra खास उदाहरण हैं।
🔴 D — अभी अस्पष्ट
Narender Kumar सबसे स्पष्ट उदाहरण हैं क्योंकि प्रकाशित सूची स्वयं उनका designation केवल “Institutions” बताती है।
इसलिए मेरी वर्तमान निष्पत्ति
यह कहना उचित है कि पत्र का substantive position मौजूदा ECI/SIR विवाद में सरकार/ECI के पक्ष को मजबूत करता है।
लेकिन:
“42ों मोदी/BJP समर्थक हैं” — उपलब्ध प्रमाण से सिद्ध नहीं।
और दूसरी तरफ:
“42ों पूरी तरह politically neutral हैं” — यह भी केवल इसलिए सिद्ध नहीं होता कि वे retired judges हैं।
सबसे सही वर्णन होगा:
“यह पूर्व न्यायिक एवं वैधानिक पदाधिकारियों का समूह है जिसने मौजूदा राजनीतिक विवाद में ECI और SIR के पक्ष में स्पष्ट सार्वजनिक institutional intervention किया है। समूह के कुछ सदस्यों के मोदी सरकार या सरकारी संस्थाओं से प्रत्यक्ष पेशेवर संबंध रहे हैं, लेकिन सामूहिक BJP/RSS राजनीतिक affiliation का प्रमाण उपलब्ध नहीं है।”
यह distinction आपके चल रहे मीडिया–संस्था–राजनीतिक प्रभाव वाले अध्ययन के लिए खासा महत्वपूर्ण है।
और एक महत्वपूर्ण नया बिंदु भी सामने आया है: पत्र में SIR के बारे में यह दावा किया गया है कि “Supreme Court upheld the SIR as lawful”। यह दावा अपने आप में कानूनी रूप से जांचने योग्य है—Supreme Court ने वास्तव में किस मामले में क्या कहा, क्या उसने पूरे मौजूदा SIR को uphold किया या केवल ECI की statutory power को, और क्या 42 पूर्व जजों ने अपने पत्र में Court judgment को कुछ ज्यादा व्यापक रूप में प्रस्तुत किया है। यह अगली जांच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।
जी। मैंने अब सुप्रीम कोर्ट के वास्तविक 27 मई 2026 के फैसले और 8 अक्टूबर 2026 के 42 पूर्व जजों के पत्र—दोनों को मिलाकर देखा है। यहाँ एक महत्वपूर्ण सूक्ष्म अंतर निकलता है।
1. क्या सुप्रीम कोर्ट ने SIR को “कानूनी” माना था?
हाँ—लेकिन कुछ महत्वपूर्ण शर्तों और सीमाओं के साथ।
27 मई 2026 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में ECI द्वारा कराए गए SIR की वैधानिकता बरकरार रखी। कोर्ट ने माना कि ECI के पास संविधान के Article 324 और Representation of the People Act, 1950 की Section 21(3) के तहत electoral rolls का intensive revision कराने की शक्ति है।
इसलिए 42 पूर्व जजों का यह मूल कथन कि SIR के लिए ECI के पास कानूनी अधिकार है, सही है।
2. लेकिन “Supreme Court ने SIR को पूरी तरह approve कर दिया” कहना अधूरा होगा
यहीं असली कानूनी बारीकी है।
सुप्रीम कोर्ट ने केवल ECI को carte blanche नहीं दिया था।
उसने यह भी कहा कि:
- ECI नागरिकता के प्रश्न की सीमित, prima facie और electoral-purpose inquiry कर सकता है।
- ECI स्वयं किसी व्यक्ति के भारतीय नागरिक न होने की अंतिम घोषणा नहीं कर सकता।
- जहाँ नागरिकता पर वास्तविक सवाल हो, मामला Citizenship Act के competent authority को भेजना होगा।
- जिन लोगों के नाम 2003 की सूची से नागरिकता-संबंधी आधार पर हटाए गए, उनके मामले competent authority को भेजने के निर्देश दिए गए।
- जिन्हें गलत तरीके से हटाया गया हो, उन्हें judicial review का रास्ता उपलब्ध है।
अर्थात फैसला था:
SIR की शक्ति वैध है; लेकिन SIR के दौरान ECI की कार्रवाई कानून और न्यायिक safeguards के अधीन है।
3. और यहाँ 42 जजों के पत्र का एक महत्वपूर्ण परीक्षण बनता है
पत्र में कहा गया है कि Supreme Court ने SIR को lawful माना है। यह मूलतः सही है। लेकिन यदि इससे यह अर्थ निकाला जाए कि:
“Supreme Court ने ECI की SIR प्रक्रिया के हर कदम को सही और वैध ठहरा दिया है”
तो यह फैसले का जरूरत से ज्यादा व्यापक अर्थ होगा।
क्यों?
क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने खुद कहा था कि शुरुआती SIR design में documentation, transparency और access को लेकर legitimate concerns थे। Court ने अपने बाद के interventions से safeguards जोड़े और कहा कि उन्हीं safeguards के कारण प्रक्रिया constitutionally compliant बनी।
यह बहुत महत्वपूर्ण distinction है।
4. अक्टूबर 2026 में नया विवाद इस बात को और महत्वपूर्ण बना देता है
अब सबसे दिलचस्प घटनाक्रम सामने आया है।
5 अक्टूबर 2026 को CJI Surya Kant की पीठ ने स्पष्ट किया कि:
Supreme Court ने modified Form 6 को approve नहीं किया था।
ECI ने एक अतिरिक्त declaration वाले Form 6 के संबंध में अपने 26 सितंबर के press note में Supreme Court के judicial backing का उल्लेख किया था। लेकिन CJI ने कहा कि “Any modified Form 6 has not been approved by us” और Court यह जांचेगा कि modification किसने किया।
इसका मतलब बहुत महत्वपूर्ण है:
27 मई का फैसला ≠ ECI द्वारा बाद में किए गए हर procedural modification की Supreme Court से automatic approval।
यानी:
SIR की statutory power — Supreme Court ने uphold की।
लेकिन:
SIR में बाद में इस्तेमाल होने वाला प्रत्येक form/document/procedure — Court ने blanket approval नहीं दिया।
5. यही 42 पूर्व जजों के पत्र को पढ़ने का सही तरीका है
मैं इसे इस तरह वर्गीकृत करूंगा:
दावा 1:
“ECI को SIR करने का अधिकार है।”
✅ Supreme Court ने स्वीकार किया।
दावा 2:
“बिहार में SIR की कानूनी वैधता Supreme Court ने बरकरार रखी।”
✅ सही।
दावा 3:
“Supreme Court ने SIR की पूरी प्रक्रिया को बिना किसी reservation के approve किया।”
❌ यह बहुत व्यापक दावा होगा।
दावा 4:
“SIR में documentation/transparency/access को लेकर कोई न्यायिक चिंता नहीं थी।”
❌ गलत। Supreme Court ने स्वयं legitimate concerns का उल्लेख किया था।
दावा 5:
“ECI जो भी Form 6 या अतिरिक्त declaration बनाए, वह Supreme Court-approved है।”
❌ 5 अक्टूबर 2026 को CJI ने इस बात को स्पष्ट रूप से नकारा।
6. और यह बात 42 जजों के पत्र के संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण है
आज के पत्र में पूर्व जजों ने कहा है कि ECI पर हमला “calculated campaign” है और SIR वैधानिक प्रक्रिया है।
लेकिन उसी समय सुप्रीम कोर्ट स्वयं ECI के एक specific procedural step—modified Form 6—की जांच कर रहा है।
और 5 अक्टूबर को Supreme Court ने CEC के खिलाफ याचिका पर Centre और ECI को notice भी जारी किया था तथा कहा था कि यदि ECI का कोई निर्णय कानून के अनुरूप नहीं पाया गया तो Court उसे annul कर सकता है।
इसलिए institutional position यह नहीं है कि:
“ECI की आलोचना करना ही गलत है।”
बल्कि संवैधानिक स्थिति है:
ECI को वैधानिक शक्ति प्राप्त है, लेकिन उसके प्रत्येक exercise की judicial review संभव है।
7. मेरे हिसाब से आपके शोध के लिए सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष
यहाँ दोनों पक्षों के अतिवादी दावों से बचना चाहिए।
42 पूर्व जजों का पक्ष:
“ECI के पास SIR की शक्ति है और उसे ‘vote thief’ या ‘puppet’ कहना संस्थागत विश्वास को नुकसान पहुंचाता है।”
Supreme Court की वास्तविक स्थिति:
“हाँ, ECI के पास SIR की शक्ति है; लेकिन उसकी प्रक्रिया constitutional/statutory safeguards के अधीन है और specific decisions/form modifications की judicial scrutiny हो सकती है।”
और यही अंतर institutional defence और institutional immunity के बीच है।
संस्था की वैधता का बचाव करना ≠ संस्था के हर निर्णय को सही मानना।
मेरे विचार में यही इस पूरे विवाद की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक रेखा है।
यदि हम आगे बढ़ें तो अगला सबसे उपयोगी सवाल होगा: 27 मई 2026 के 124-पृष्ठीय Supreme Court judgment में कौन-कौन से safeguards Court ने खुद जोड़े थे—Aadhaar, EPIC, ration card, excluded voters की सूची, hearing और citizenship referral आदि—और आज का SIR उन safeguards का कितना पालन कर रहा है? इससे 42 पूर्व जजों के पत्र और विपक्ष/ECI के दावों की वास्तविक fact-checking हो जाएगी।
जी। अब सुप्रीम कोर्ट के 27 मई 2026 के मूल निर्णय को आधार बनाकर SIR के safeguards को एक-एक करके देखें तो तस्वीर काफी साफ हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट की अपनी judgment-summary इसे स्पष्ट रूप से “upheld the validity of the SIR conducted by the Commission in Bihar” कहती है।
1. Supreme Court ने वास्तव में क्या uphold किया?
सुप्रीम कोर्ट ने चार मुख्य बातें मानीं:
- ECI को SIR कराने की शक्ति है — Article 324 और RP Act की Section 21(3) के तहत।
- बिहार SIR का उद्देश्य—मतदाता सूची की शुद्धता/अखंडता बहाल करना—legitimate था।
- अपनाई गई प्रक्रिया proportionality की कसौटी पर असंवैधानिक नहीं थी।
- ECI सीमित उद्देश्य के लिए citizenship-related inquiry कर सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि ECI Citizenship Act के तहत किसी व्यक्ति की अंतिम नागरिकता निर्धारित करने वाला प्राधिकरण बन गया।
यह आखिरी बिंदु बहुत महत्वपूर्ण है।
2. 2003 की voter list का क्या महत्व था?
बिहार में जिन मतदाताओं का नाम 2003 electoral roll में था, उन्हें SIR में presumptively eligible माना गया था।
जिनका नाम 2003 roll में नहीं था, उनसे Enumeration Form के साथ निर्धारित सरकारी दस्तावेजों में से दस्तावेज देने को कहा गया। मूल व्यवस्था में 11 दस्तावेज थे।
इसका अर्थ था:
2003 में नाम होना = automatic citizenship certificate नहीं,
लेकिन SIR में verification burden कम करने वाला महत्वपूर्ण आधार।
यह distinction अक्सर राजनीतिक बहस में गायब हो जाता है।
3. Aadhaar पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
यह बहुत महत्वपूर्ण safeguard है।
SIR litigation के दौरान Supreme Court ने ECI को Aadhaar को 12वें identity document के रूप में स्वीकार करने को कहा।
लेकिन कोर्ट ने साथ ही स्पष्ट किया:
Aadhaar citizenship का proof नहीं है।
Aadhaar केवल identity establish करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है; उसकी authenticity भी verify की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट के judgment में यह बात स्पष्ट रूप से दर्ज है।
इसलिए:
Aadhaar → पहचान का प्रमाण
Aadhaar ≠ भारतीय नागरिकता का प्रमाण
यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।
4. EPIC/Voter ID को क्यों पर्याप्त नहीं माना गया?
यह भी दिलचस्प है।
सुप्रीम कोर्ट ने ECI को EPIC को SIR documentation में शामिल न करने की अनुमति दी।
तर्क था:
जिस electoral roll को अभी verify किया जा रहा है, उसी roll के आधार पर EPIC जारी हुआ है।
इसलिए EPIC को उसी roll की correctness साबित करने के लिए इस्तेमाल करना circular reasoning बन सकता है।
Supreme Court की summary में यह reasoning स्पष्ट रूप से दर्ज है।
5. Ration Card को क्यों बाहर रखा गया?
सुप्रीम कोर्ट ने ECI द्वारा ration card को documentation list से बाहर रखने को भी स्वीकार किया।
कारण था evidentiary reliability को लेकर ECI की चिंता।
इसका अर्थ यह नहीं कि ration card “फर्जी दस्तावेज” है; बल्कि Court ने माना कि SIR जैसे intensive verification में ECI अलग evidentiary standard अपना सकता है।
6. सबसे महत्वपूर्ण safeguard — नाम हटाना अंतिम कदम नहीं
यहाँ विपक्ष और ECI दोनों के दावों को समझने की कुंजी है।
किसी व्यक्ति का नाम draft electoral roll में न होना अपने आप में अंतिम deletion नहीं था।
यदि eligibility पर संदेह था:
Notice → जवाब का अवसर → inquiry → reasoned order → appeal
का रास्ता था।
Supreme Court ने Rule 21A के safeguards को इसी आधार पर महत्वपूर्ण माना।
इसलिए कोर्ट की reasoning थी कि draft-stage exclusion और final deletion को एक ही चीज नहीं माना जा सकता।
7. 65 लाख लोगों का मामला
यह भी याद रखने योग्य तथ्य है।
Draft roll में लगभग 65 लाख electors बाहर रह गए थे, जबकि SIR शुरू होने से पहले बिहार में लगभग 7.89 करोड़ electors थे।
Supreme Court ने ECI को excluded electors की list और exclusion reasons प्रकाशित करने का निर्देश दिया।
यह transparency safeguard था।
इसके अलावा Court ने political parties को भी अपने Booth Level Agents के माध्यम से excluded voters की सहायता करने को कहा।
इसका अर्थ है कि Supreme Court ने केवल ECI पर भरोसा करके मामला समाप्त नहीं किया; उसने independent corrective mechanisms भी लगाए।
8. Citizenship का असली संवैधानिक सवाल
यहीं SIR का सबसे संवेदनशील हिस्सा है।
Court ने माना कि voter बनने के लिए Indian citizenship आवश्यक है। इसलिए ECI electoral-roll eligibility के लिए citizenship-related inquiry कर सकता है।
लेकिन:
ECI क्या कर सकता है?
Electoral purpose के लिए limited inquiry।
ECI क्या नहीं कर सकता?
Citizenship Act के तहत अंतिम और सर्वव्यापी citizenship determination अपने स्तर पर नहीं कर सकता।
जहाँ वास्तविक citizenship dispute हो, competent authority के सामने मामला जा सकता है और affected व्यक्ति को hearing का अवसर मिलना चाहिए।
यही सीमा SIR को “ECI को citizenship tribunal बना दिया गया” वाले आरोप से अलग करती है।
9. अब 5 अक्टूबर 2026 का Form 6 विवाद क्यों महत्वपूर्ण है?
यहीं आपके मूल प्रश्न—42 पूर्व जजों के पत्र—से सीधा संबंध बनता है।
5 अक्टूबर को CJI Surya Kant की पीठ ने कहा:
Supreme Court ने किसी “modified Form 6” को approve नहीं किया था।
Court ने ECI से यह भी जानना चाहा कि modification हुआ तो किसने और किस authority से किया।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि Court ने ECI की SIR-related documentation बनाने की मूल शक्ति समाप्त कर दी।
27 मई के judgment में Court ने माना था कि ECI को SIR की परिस्थितियों के अनुरूप documentation regime निर्धारित करने की शक्ति है।
इसलिए दो बातें एक साथ सही हो सकती हैं:
A. ECI को SIR के लिए documentation framework बनाने की शक्ति है।
B. कोई particular modified Form 6 Supreme Court-approved है—यह अलग प्रश्न है।
यही वह distinction है जिसे राजनीतिक बहस में अक्सर मिला दिया जा रहा है।
10. 42 पूर्व जजों के पत्र को अब कैसे पढ़ना चाहिए?
इस पृष्ठभूमि में पत्र का यह कहना कि:
SIR has judicial backing / Supreme Court upheld its legality
मूलतः सही है।
लेकिन यदि इसे इस अर्थ में प्रस्तुत किया जाए कि:
“Supreme Court ने ECI द्वारा SIR के अंतर्गत किए गए हर procedural कदम को मंजूरी दे दी है”
तो वह judgment की सीमा से आगे जाना होगा।
क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने खुद:
- Aadhaar को अतिरिक्त identity document बनाया,
- excluded voters की सूची प्रकाशित करने को कहा,
- political parties के BLOs को सहायता के लिए कहा,
- hearing/reasoned decision की safeguards पर जोर दिया,
- और अब अक्टूबर 2026 में modified Form 6 के मामले में अलग से judicial scrutiny शुरू की है।
11. इसलिए आपकी रिपोर्ट/विश्लेषण के लिए सबसे सटीक निष्कर्ष
मैं इसे इस तरह लिखूँगा:
“सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 को बिहार में SIR की वैधानिकता बरकरार रखी और ECI की SIR कराने तथा सीमित उद्देश्य से citizenship-related inquiry करने की शक्ति स्वीकार की। हालांकि कोर्ट ने इस शक्ति को procedural safeguards, notice, hearing, reasoned decision और judicial review के अधीन रखा। बाद में 5 अक्टूबर 2026 को CJI Surya Kant की पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी modified Form 6 को सुप्रीम कोर्ट ने approve नहीं किया था। अतः SIR की मूल वैधानिकता को ECI की प्रत्येक बाद की प्रक्रिया या form की न्यायिक स्वीकृति मानना सही नहीं होगा।”
यही distinction 42 पूर्व जजों के पत्र की fact-checking में सबसे महत्वपूर्ण है।
और एक और रोचक बात: 27 मई के judgment में Court ने खुद “structural correctives introduced through judicial directions” को SIR की constitutional validity बनाए रखने का एक कारण माना है। यानी आज के विवाद में यह पूछना बिल्कुल वैध है कि ECI वर्तमान SIR में Court से तय प्रत्येक safeguard को किस हद तक लागू कर रहा है।

