हंगरी की सैंकडों ग्रामीण महिलाओं ने क्यों और कैसे की पतियों की हत्या?

हंगरी के नाग्यरेव (Nagyrév) गांव में 1911 से 1929 के बीच ‘एंजेल मेकर्स’ (Angel Makers) नाम पाई महिलाओं ने आर्सेनिक जहर देकर 45 से अधिक (अनुमानित 50 से 300) पुरुषों की हत्या की थी। यह इतिहास के सबसे भयानक सामूहिक जहर कांडों में से एक है।

घटना की मुख्य बातें
• स्थान: घटना हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट से 130 किलोमीटर दूर तिसाजुग (Tiszazug) क्षेत्र के नाग्यरेव गांव में हुई थी।
• मास्टरमाइंड: पूरे षड्यंत्र की शुरुआत जुसुन्ना फाजेकाश (Zsuzsanna Fazekas, जिन्हें ‘आंटी ज़ुस्सी’ भी कहा जाता था) नामक दाई (midwife) ने की थी।
• ज़हर का तरीका: महिलाओं ने मक्खियाँ पकड़ने वाला कागज़ (flypaper) उबालकर उससे आर्सेनिक ज़हर निकाला। यह ज़हर वे अपने पतियों और रिश्तेदारों को खाने, सूप या वाइन में मिलाकर देती थीं।
• हत्या की वजह: तब महिलाएं घरेलू हिंसा, मारपीट, जबरन शादियों, गरीबी और पारिवारिक उत्पीड़न से बेहद परेशान थीं। दाई फाजेकाश ने उन्हें इस दमन से मुक्ति पाने को ज़हर देने का रास्ता दिखाया।
खुलासा और परिणाम
• भंडाफोड़: लगभग दो दशकों तक यह भयावह रहस्य छिपा रहा, लेकिन 1929 में एक गुमनाम पत्र के बाद पुलिस ने इस मामले की जांच शुरू की।
• शव बाहर निकाले: पुलिस ने गांव के कब्रिस्तान से कई शवों को बाहर निकालकर उनकी जाँच की, जिनमें आर्सेनिक की पुष्टि हुई।
• मुकदमा: इस मामले में लगभग 26 से 50 महिलाओं और कुछ पुरुषों पर मुकदमे चलाए गए, जिनमें से कई को सजा हुई और कुछ को मौत की सजा दी गई।

4 दिसंबर 1929 को अमेरिकी अख़बार ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने हंगरी में सामने आए एक ऐसे मामले की ख़बर छापी थी, जिसने लोगों को हैरान कर दिया था. उन दिनों क़रीब 50 महिलाओं पर मुक़दमा शुरू हुआ था.

इन महिलाओं पर आरोप था कि उन्होंने इस यूरोपीय देश के एक दूरदराज़ गांव में रहने वाले ज़्यादातर पुरुषों को ज़हर देकर मार डाला.

रिपोर्ट छोटी थी, लेकिन उसमें चौंकाने वाली जानकारियां थीं. कहा गया था कि 1911 से 1929 के बीच बुडापेस्ट से क़रीब 130 किलोमीटर दक्षिण में स्थित नादीरेव गांव की कई महिलाओं ने 50 से ज़्यादा पुरुषों को ज़हर देकर मार डाला.

इन महिलाओं को ‘एंजेल मेकर्स’ के नाम से जाना जाने लगा था. उन पर आरोप था कि उन्होंने आर्सेनिक वाले घोल से पुरुषों को ज़हर दिया और उनकी हत्या की.

कुछ लोग इसे आधुनिक इतिहास में महिलाओं द्वारा पुरुषों की सामूहिक हत्या का सबसे बड़ा मामला मानते हैं.

इन महिलाओं को खुली अदालत में पेश किया गया. वहां एक नाम बार-बार सामने आया- ज़ूज़ाना फ़ाज़ेकाश, जो गांव की दाई (मिडवाइफ़) थी.

उस समय यह गांव ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य के अधीन था और वहां कोई डॉक्टर नहीं था. ऐसे में फ़ाज़ेकाश ही गांव की महिलाओं को इलाज से जुड़ी सेवाएं देती थीं. गांव की चिकित्सा व्यवस्था पर उनका लगभग पूरा नियंत्रण था.

गांव की रहने वाली मारिया गोनिया ने 2004 में बीबीसी की एक रेडियो डॉक्यूमेंट्री में बताया था कि फ़ाज़ेकाश को इन ज़हर देकर की गई हत्याओं की मुख्य सूत्रधार क्यों माना जाता था. उनके मुताबिक़, गांव की सभी महिलाएं अपनी परेशानियां फ़ाज़ेकाश से साझा करती थीं.

उन्होंने कहा, “उसने महिलाओं से कहा कि अगर उनके पतियों के साथ समस्या है, तो उसके पास इसका एक आसान समाधान है.”

हालांकि फ़ाज़ेकाश को इन हत्याओं का मुख्य सूत्रधार माना गया, लेकिन मामले से जुड़े दस्तावेज़ों और गांव की महिलाओं की गवाही में उनकी ज़िंदगी की एक दूसरी तस्वीर भी सामने आती है. इनमें पुरुषों की ओर से महिलाओं के साथ की गई हिंसा, दुर्व्यवहार और यौन उत्पीड़न की घटनाओं का ज़िक्र था.

लेकिन यह मामला कई साल तक छिपा रहा. पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक़, पहली हत्या 1911 में दर्ज हुई थी. लेकिन 1929 तक कोई जांच शुरू नहीं हुई.

आख़िर पुलिस को अभियुक्तों तक पहुंचने का सुराग कैसे मिला?

एक अलग दौर
1911 में ज़ूज़ाना फ़ाज़ेकाश नाम की एक महिला नादीरेव गांव में आईं.

मारिया गोनिया के मुताबिक़ और अदालत में सामने आई गवाहियों के आधार पर, फ़ाज़ेकाश ने दो वजहों से लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा.

पहली वजह यह थी कि दाई के तौर पर अपने काम के अलावा उन्हें दवाओं से इलाज की भी जानकारी थी. वह दवाएं बनाने के लिए कुछ रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल भी करती थीं. उस इलाक़े में इस तरह की जानकारी बहुत आम नहीं थी.

दूसरी वजह यह थी कि उनके पति के बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं थी.

मारिया गोनिया ने बताया, “नादीरेव में न तो कोई पादरी था और न ही कोई डॉक्टर. इसलिए उनकी जानकारी और हुनर की वजह से लोग उनके पास जाने लगे और उन पर भरोसा करने लगे.”

उन्होंने आगे बताया, “धीरे-धीरे इस महिला को घरों के बंद दरवाज़ों के पीछे होने वाली बातों की जानकारी मिलने लगी. ऐसे पुरुष जो अपनी पत्नियों को पीटते थे, उनके साथ ज़बरदस्ती करते थे और उनमें से कई अपनी पत्नियों को धोखा देते थे. दुर्व्यवहार और हिंसा बहुत ज़्यादा थी.”

इसी दौरान फ़ाज़ेकाश ने एक ऐसा काम भी किया, जो उस समय ग़ैर-क़ानूनी था. वह अनचाहे गर्भ को गिराने के लिए महिलाओं का गर्भपात करती थीं. इसके लिए उन पर मुक़दमा भी चला, लेकिन उन्हें कभी दोषी नहीं ठहराया गया.

गोनिया के मुताबिक़, उस समय बड़ी समस्या यह थी कि बहुत सी शादियां परिवार तय करते थे. कम उम्र की लड़कियों की शादी ऐसे पुरुषों से कर दी जाती थी, जो कई बार उनसे बहुत ज़्यादा उम्र के होते थे.

उन्होंने कहा, “उस समय तलाक़ का कोई प्रावधान नहीं था. अगर आपके साथ मारपीट या दुर्व्यवहार होता था, तब भी आप अपने पति से अलग नहीं हो सकती थीं.”

हालांकि, उस दौर की रिपोर्टों में एक और बात का ज़िक्र मिलता है. इनमें से कई तयशुदा शादियों के साथ एक तरह का क़रार भी होता था. इसमें ज़मीन, विरासत और क़ानूनी ज़िम्मेदारियों जैसी बातें शामिल होती थीं.

गोनिया ने बताया, “फ़ाज़ेकाश धीरे-धीरे महिलाओं को यक़ीन दिलाने लगीं कि वह उनकी समस्याओं का हल निकाल सकती हैं.”

ज़हर देने का पहला मामला 1911 में सामने आया. इसके बाद के वर्षों में और भी कई पुरुषों की मौत हुई. उस समय पहला विश्व युद्ध चल रहा था और ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य भी धीरे-धीरे बिखर रहा था.

18 साल के दौरान, पतियों और परिवार के मुखियाओं की मौत के 45 से 50 मामले सामने आए. इन सभी को गांव के कब्रिस्तान में दफ़ना दिया गया.

धीरे-धीरे बहुत से लोग नादीरेव को ‘क़ातिलों का गांव’ कहने लगे.

इन घटनाओं ने पुलिस का ध्यान खींचा. 1929 की शुरुआत में अधिकारियों ने कब्रें खोदकर शवों की जांच शुरू की. उन्हें एक ऐसा सबूत मिला, जिसका इस्तेमाल अभियुक्तों के ख़िलाफ़ किया जा सकता था, वो था -आर्सेनिक.

महिलाओं पर मुक़दमा
फ़ाज़ेकाश गांव में एक आम, एक मंज़िला घर में रहती थीं. यह घर सड़क की ओर था. कहा जाता है कि इन हत्याओं में इस्तेमाल किए गए ज़्यादातर ज़हर इसी घर में तैयार किए गए थे.

19 जुलाई 1929 को उन्होंने इसी घर से पुलिस अधिकारियों को अपनी गिरफ़्तारी के लिए आते देखा.

मारिया गोनिया ने बताया, “जब उन्होंने देखा कि पुलिस उनके घर की ओर आ रही है, तो उन्हें समझ आ गया कि अब उनका बचना मुश्किल है. पुलिस के घर पहुंचने तक उनकी मौत हो चुकी थी. उन्होंने वही ज़हर पी लिया था, जिसे उन्होंने ख़ुद तैयार किया था.”

लेकिन इन हत्याओं के लिए सिर्फ़ फ़ाज़ेकाश को ज़िम्मेदार नहीं माना गया.

1929 से राज्य की राजधानी सेलेंक में 26 महिलाओं पर मुक़दमा चलाया गया.

इनमें से आठ को मौत की सज़ा सुनाई गई और बाकी को जेल भेज दिया गया. इनमें सात महिलाओं को उम्रक़ैद की सज़ा मिली.

लेकिन सिर्फ़ दाई ही इन हत्याओं के लिए ज़िम्मेदार नहीं थीं.

इन महिलाओं में से बहुत कम ने अपना अपराध कबूल किया. इन हत्याओं के पीछे असल वजह क्या थी, यह भी कभी पूरी तरह साफ़ नहीं हो पाया.

डॉक्टर और इतिहासकार गेज़ा चे ने अदालत के दस्तावेज़ों का हवाला देते हुए बीबीसी को बताया कि इस मामले के कई रहस्यमय पहलू अब भी अनसुलझे हैं.

इस शोधकर्ता के मुताबिक़, “इन महिलाओं के मक़सद को लेकर कई तरह के सिद्धांत हैं. इनमें ग़रीबी और लालच से लेकर ऊब और ज़िंदगी से थक जाने तक की बातें शामिल हैं.”

इस इतिहासकार ने बताया, “कुछ रिपोर्टों के मुताबिक़, जब उनके पति युद्ध के मोर्चे पर थे, तब इनमें से कुछ महिलाओं के संबंध रूसी युद्धबंदियों से बन गए थे. इन युद्धबंदियों को खेतों में काम करने के लिए उस इलाक़े में लाया गया था.”

उन्होंने कहा कि जब उनके पति युद्ध से वापस लौटे, तो इन महिलाओं के लिए अचानक मिली आज़ादी को खोना मुश्किल हो गया. इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक क़दम उठाने का फ़ैसला किया.

‘द एंजल मेकर्स’ किसी अन्य अपराध कथा से बिल्कुल अलग एक सच्ची घटना पर आधारित कहानी (ट्रू-क्राइम) है—1920 के दशक की एक दाई, जो शायद इस सदी की सबसे खूंखार हत्यारी रही होगी। उसने महिलाओं के एक ऐसे गिरोह की अगुआई की, जो कम से कम 160 पुरुषों की हत्या के लिए ज़िम्मेदार था।
यह खौफनाक दास्तान आज के हंगरी के एक ग्रामीण कृषि इलाके में घटी। इन हत्यारिनों की अप्रत्याशित कतार—गांव की पत्नियों, माताओं और बेटियों—को देखकर यह चौंकाने वाला एहसास होता था कि ऐसा कहीं भी और किसी के साथ भी हो सकता था। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में गांव की एक तीक्ष्ण बुद्धि वाली दाई थी, जिसे “मुस्कुराते बुद्ध” के रूप में जाना जाता था और सब उसे “आंटी सूज़ी” कहते थे। वह मक्खियां पकड़ने वाले कागज (फ्लाईपेपर) से संखिया (आर्सेनिक) का अर्क निकालती थी और उसे ‘नागीरेव’ (Nagyrév) की महिलाओं में बांटती थी। अपने एप्रन की जेब से आर्सेनिक से भरी शीशी निकालते हुए आंटी सूज़ी पूछती, “तुम उसके साथ क्यों उलझ रही हो?” शुरुआत में, कई महिलाओं ने अपने क्रूर और अत्याचारी पतियों से हमेशा के लिए आज़ाद होने के लिए इस जानलेवा घोल का इस्तेमाल किया।
लेकिन जैसे-जैसे बिना किसी रोक-टोक और नतीजों के लाशों की संख्या बढ़ती गई, इन हत्यारिनों के हौसले भी बढ़ते चले गए। जहर की हर खाली शीशी के साथ, एक नई शीशी खाली करने की एक नई वजह सामने आ जाती। कुछ महिलाओं ने बीमार रिश्तेदारों से छुटकारा पा लिया, तो कुछ ने जमीन और घर हड़पने के लिए आर्सेनिक का इस्तेमाल “विरासत के पाउडर” के रूप में किया। पंद्रह से भी अधिक वर्षों तक, इन अप्रत्याशित हत्यारिनों ने बेखौफ होकर मौत का तांडव रचा और वे इसे ऐसे अंजाम देती रहीं मानो यह कोई आम घरेलू काम हो—सूप और शराब में आर्सेनिक की खुराक मिलाना, कॉफी और ब्रांडी में इसे घोल देना। जब तक उनके अपराधों का पर्दाफाश हुआ, तब तक सैकड़ों लोगों के मारे जाने की आशंका बन चुकी थी।
1929 में अज्ञात चिट्ठियों ने इन अपराधों की पोल खोली। जैसे ही न्याय के भूखे एक कुशल अभियोजक (प्रॉसीक्यूटर) ने जांच शुरू की, दुनिया भर के पत्रकार—जिनमें ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ भी शामिल था—इन नाटकीय घटनाओं को कवर करने के लिए उमड़ पड़े।
‘द एंजल मेकर्स’ बेहद प्रामाणिक शोध के साथ इस दिल दहला देने वाली पूरी कहानी को समेटती है—शुरुआती हत्याओं से लेकर अंतिम फांसी तक—आधुनिक इतिहास के सबसे सनसनीखेज और हैरान कर देने वाले मर्डर रिंग्स में से एक की कहानी।
* आर्सेनिक का ज़हर: जानिए कैसे आंटी सूज़ी के नाम से जानी जाने वाली गांव की एक दाई ने साधारण मक्खीमार कागज़ से एक जानलेवा घोल तैयार किया और अपनी परिस्थितियों से छुटकारा पाने को बेताब महिलाओं में अपनी एप्रन की जेब से इसे बांटा।
* महिलाओं का एक गुप्त गिरोह: गांव की पत्नियों और माताओं के उस चौंकाने वाले हत्यारे गिरोह की हकीकत जानिए, जिन्होंने अत्याचारी पतियों को ज़हर देने से शुरुआत की और फिर उनके हौसले इतने बढ़ गए कि उन्होंने ज़मीन और संपत्ति हथियाने के लिए आर्सेनिक को “विरासत के पाउडर” के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।
* 1920 के दशक का हंगरी: 1920 के दशक के हंगरी के एक ऐसे ग्रामीण इलाके में कदम रखिए, जो दुनिया की नज़र से अछूता दिखता था, जहाँ एक स्याह राज़ पंद्रह से अधिक वर्षों तक सबके सामने ही पलता रहा।
* खोजी पत्रकारिता: बेनामी चिट्ठियों से 1929 में शुरू हुई उस नाटकीय जांच को करीब से देखिए, जहाँ एक दृढ़ निश्चयी अभियोजक और दुनिया भर के पत्रकारों ने इस सदी के सबसे सनसनीखेज अपराधों में से एक की परतें खोलीं।
पैटी मैकक्रैकन एक पुरस्कार विजेता पत्रकार हैं, जिनके लेख स्मिथसोनियन मैगज़ीन, वॉल स्ट्रीट जर्नल, द गार्जियन और कई अन्य प्रकाशनों में छप चुके हैं। उन्होंने शिकागो ट्रिब्यून सहित विभिन्न न्यूज़ रूम्स में काम किया है और वे दो बार ‘नाइट इंटरनेशनल प्रेस फेलो’ रह चुकी हैं।
सारांश (SYNOPSIS): 1920 के दशक के ग्रामीण हंगेरियाई गांव नागीरेव में बच्चों का जन्म केवल गांव की दाई के हाथों ही होता था—एक चतुर और चालाक महिला, जिसे सब “आंटी सूज़ी” कहते थे। सच तो यह था कि ज्यादातर सभी स्वास्थ्य समस्याओं का इलाज आंटी सूज़ी ही करती थी, क्योंकि यह गरीब कृषि प्रधान कस्बा नजदीकी शहर से मीलों दूर था और वहाँ कोई स्थानीय चिकित्सक नहीं था। अपने लेप और अर्क के चलते वह कई लोगों के लिए बहुत अहम थी, लेकिन उन महिलाओं के लिए सबसे ज़्यादा, जिनके पति अत्याचारी थे और जिनके पास बचने का कोई रास्ता नहीं था। उनके लिए आंटी सूज़ी के पास एक खास समाधान था: आर्सेनिक की शीशियां, जिसे उसने मक्खीमार कागज़ से उबालकर निकाला था। कम से कम 160 पुरुषों की मौत को ज़िम्मेदार हत्यारों के गिरोह के केंद्र में रही आंटी सूज़ी को 20वीं सदी की सबसे कुख्यात धारावाहिक हत्यारों (सीरियल किलर्स) में से एक माना गया है। शुरुआती हत्याओं से लेकर सनसनीखेज मुकदमे तक, हर पहलू को विस्तार से बयां करती ‘द एंजल मेकर्स’ हमारे दौर की सबसे रोंगटे खड़े कर देने वाली और सबसे कम जानी-पहचानी सच्ची अपराध गाथाओं में से एक का दस्तावेज़ है।

 

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