1991 से 2026 तक का पूरा आर्थिक इतिहास, कब, कितना
गिरा रुपया, क्या कदम उठाए गए, कहाँ हो रही है गलती?

 भारत में जब भी डॉलर महंगा होता है, पेट्रोल-डीजल से लेकर मोबाइल, विदेश यात्रा, पढ़ाई और महंगाई तक हर चीज पर असर पड़ता है।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर भारतीय रुपया लगातार कमजोर क्यों होता जा रहा है?

क्या यह सिर्फ एक सरकार की गलती है?

या यह कई दशकों से बनी आर्थिक संरचना की समस्या है?

असलियत यह है कि रुपया एक-दो साल में नहीं, बल्कि धीरे-धीरे कई सरकारों के दौरान कमजोर हुआ है।

हर दौर में कारण अलग रहे — कहीं तेल संकट, कहीं विदेशी कर्ज, कहीं डॉलर की ताकत, तो कहीं

घरेलू आर्थिक नीतियां।

1991 से 2026 तक रुपये की गिरावट: किस सरकार में कितना गिरा रुपया
 
 रुपया गिरता कैसे है?

मान लीजिए भारत को बाहर से तेल खरीदना है।

तेल बेचने वाला देश कहता है — “हमें डॉलर दो।”

अब भारत के पास डॉलर कम हैं और जरूरत ज्यादा है। तो डॉलर महंगा हो जाता है।

यानी:

डॉलर ↑

रुपया ↓

इसे ही रुपये का कमजोर होना कहते हैं।

1947 से 1991 तक: नियंत्रित अर्थव्यवस्था का दौर

आजादी के बाद भारत ने “सोशलिस्ट मॉडल” अपनाया।

सरकार:

-उद्योग नियंत्रित करती थी
-आयात सीमित थे
-विदेशी निवेश कम था
-डॉलर बाजार पूरी तरह खुला नहीं था

इसलिए रुपया कृत्रिम रूप से काफी स्थिर दिखता था।

लेकिन अंदर ही अंदर: