सवाल:लोकमाता रानी रासमणि इतिहास में क्यों है गायब ?
कर्मचारी हेनरी मायर्स इलियट 19 वर्ष की उम्र में कंपनी में भर्ती होकर कंपनी में राजस्व वसूली को तैनात बरेली के कलेक्टर (राजस्व संग्राहक) के निजी सहायक बनकर 1826 ईस्वी में आये। वे जॉन इलियट नामक एक चर्च कर्मचारी के 15 बच्चों में से तीसरे बच्चे थे। यहां उन्होंने बरेली और मुरादाबाद में सहायक का काम किया और कंपनी कर्मचारियों की सुविधा को बरेली और मुरादाबाद इलाके के ब्राह्मणों और राजपूतों की बोली के प्रमुख शब्दों की एक सूची अर्थसहित तैयार की ताकि ब्राह्मणों और राजपूतों के कथनों का अर्थ कर्मचारी समझ सकें क्योंकि ये लोग ही उस इलाके में प्रभावी थे। इनकी भाषा का असली अर्थ समझना आवश्यक था। कंपनी कर्मचारियों को वे शब्द अबूझ लगते थे।
बाद में कंपनी कर्मचारियों ने बताया कि बंगाल के हिन्दू कर्मचारी कंपनी के बंगाल के उत्पीड़न और कंगाली तथा बदहाली से पीड़ित होकर कंपनी में नौकरी तो कर लेते हैं पर वे दिन-रात अपने हिन्दू राजाओं और रानियों की प्रशंसा करते रहते हैं। विशेषकर रानी भवानी जिन्होंने तारापीठ में और काशी में मंदिर बनवाये थे तथा अनेक यज्ञ कराये थे। रानी रासमणि ने कंपनी के बंगाल के मछुआरों से जबरन फिरौती वसूली रोक मछुआरों की आजीविका बचाई थी। इस पर फिरगिंयो ने आरोप लगाया कि रानी रासमणि बंगाल की शांति भंग कर रही हैं, उनकी रात-दिन प्रशंसा करते हैं।
उल्लेखनीय है कि ये वही कैवर्त जाति की रानी रासमणि हैं, जिन्होने श्रीरामकृष्ण परमहंस को पूरी श्रद्धा से अपने यहां पुजारी रख दक्षिणेश्वर मंदिर बनवाया, कोलकाता में गंगातट पर बाबूघाट और नीमतल्ला घाट बनवाया, सुवर्ण रेखा नदी से पुरी तक सड़क बनवाई, श्रीरामेश्वरम् से श्रीलंका के मंदिरों तक के लिये बड़ी नौकायें और जहाज चलवाये, हावड़ा का गंगानदी पर पुल बनवाया, ढाका के नवाब द्वारा बंदी 2000 हिन्दू छुड़वाये, दुर्गापूजा यात्रा बंद करने की कंपनी के कमीने कर्मचारियों की कमीनगी विफल की, राष्ट्रीय पुस्तकालय को कोलकाता में जगह दी और हिन्दू कॉलेज के लिये भी जमीन दी, काशी में अनेक मंदिरों को दान दिया, श्रीनगर में शंकराचार्य मंदिर का पुनरूद्धार कराया तथा अन्य अनेक पुण्य कर्म किये। ऐसी श्रेष्ठ रानियों और श्रेष्ठ राजाओं की प्रशंसा कंपनी के हिन्दू कर्मचारी रात-दिन करते हैं जिससे हमारी कंपनी के कर्मचारी बहुत दबते हैं, इसलिये हमें मुसलमानों के हिन्दुओं को बारम्बार पीटने और पराजित करने की कथा रचनी है, इस संकल्प के साथ हेनरी मायर्स इलियट ने कंपनी की सेवा को लिखना शुरू किया और पर्याप्त सामग्री ना मिलने पर अपने मन से कई जाली रचनायें की, उनमें से ही एक है बाबरनामा, जिसके बारे में हम आगे और विवरण देंगें।
यहां मुख्य प्रश्न यह है कि रानी भवानी और रानी रासमणि सहित बंगाल के श्रेष्ठ दनुजमर्दन राजाओं के कामों और लिखे इतिहास ना पढ़कर जो लोग 75 वर्षों में कांग्रेस के अलगाववादी मुसलमानों और देशद्रोही कम्युनिस्टों की रची गप्पों को ही इतिहास कहकर कांग्रेसी राज में पढ़ाये जाने का तथ्य जानते हैं, वे भी जब हेनरी इलियट, जॉन डाउसन तथा उनके भारतीय चेलों की गप्पों के आधार पर ही बाबर की सफलता की कहानी लिखते हैं तो इससे सत्ता का अधर्म आधारित बल और सामान्य भारतीयों का प्रमादपूर्ण बौद्धिक जीवन ही सामने आता है।
* रामेश्वर मिश्र पंकज
*क्या ऐसी किसी महिला के बारे में जानते हैं 🤔 जिसने :*
*1. हावड़ा में गंगा नदी पर पुल बनाकर कलकत्ता शहर बसाया?*
*2. अंग्रेजों को ना तो नदी पर टैक्स वसूलने दिया, और ना ही दुर्गा पूजा की यात्रा को रोकने दिया?*
*3. कलकत्ता में “दक्षिणेश्वर मंदिर” बनवाया?*
*4. कलकत्ता में गंगा नदी पर बाबू घाट और नीमतला घाट बनवाए?*
*5. श्रीनगर में “शंकराचार्य मंदिर” का पुनरोद्धार करवाया?*
*6. मथुरा में “श्री कृष्ण जन्मभूमि” की दीवार बनवाई?*
*7. ढाका में मुस्लिम नवाब से 2,000 हिंदुओं की स्वतंत्रता खरीदी?*
*8. रामेश्वरम से श्रीलंका के मंदिरों के लिए “नौका सेवा” आरम्भ करवाई?*
*9. कलकत्ता का “क्रिकेट स्टेडियम” इनके दान दी गई भूमि पर बना है?*
*10. “सुवर्णरेखा नदी” से पुरी तक सड़क बनाई?*
*11. “प्रेसिडेंसी कॉलेज” और “नेशनल लाइब्रेरी” के लिए धन दिया?*
*क्या इस महान हस्ती को नेहरू, मौलवी, पादरी, वमियों ने आपके सिलेबस में सम्मिलित किया ?*
*मुझे पूरा विश्वास है, कि 99% भारतीय इस महिला को नहीं जानते होंगे!*😢
*इन महान हस्ती का नाम है “रानी रासमणि”!*
*ये कलकत्ता के जमींदार की विधवा थी! 1793 से 1863 तक के जीवन काल में, रानी रास्मणी जी ने इतना यश कमाया है, कि इनकी बड़ी बड़ी प्रतिमाऐं दिल्ली और शेष भारत में लगनी चाहिए थी!*
*रानी रासमणि जी कैवर्त जाति की थी, जो आजकल अनुसूचित जाति में सम्मिलित है!*
*भारत के चाटुकार इतिहासकारों ने “रानी रासमणि” को अपेक्षित सम्मान नहीं दिया!*
*आज की मांग है, हमें हमारे सच्चे और महान सनातन इतिहास से परिचय कराईये!*
नवशिक्षित हिन्दुओं की भारतीय इतिहास को लेकर मूल समस्यायें,
नवशिक्षित हिन्दुओं की भारतीय इतिहास को लेकर मूल समस्यायें क्या हैं, इसे समझने की आवश्यकता है। इस विषय में सर्वप्रथम तो यह जानना आवश्यक है कि जिसे भारत में इतिहास कहते हैं, वह यूरोप और मुस्लिम देशों में आज तक नहीं लिखा गया। इसका कारण यह है कि ईसाइयत और इस्लाम दोनों में ही विद्या की कोई परम्परा नहीं है। यह इतना सहज और सरल सत्य है कि चीजों को जटिलता में देखने के अभ्यस्त और लिखे ग्रंथों के प्रति गहरे आदर के अभ्यस्त हिन्दू इस सरल सत्य को मान ही नहीं पाते। कोई दिखा दे तो भी देख नहीं पाते।
एक सामान्य बात जो प्रसिद्ध इतिहासकार एवं समाज वैज्ञानिक प्रो. कुसुमलता केडिया जी ने अनेक बार स्पष्ट की है, वह अधिकांश नवशिक्षित हिन्दू समझ ही नहीं पाते। वह यह है कि ईसाइयत और इस्लाम में विद्या की कोई भी परंपरा नहीं रही है। वहां जो कुछ इतिहास या हिस्ट्री के नाम पर लिखा गया है, वह एजेंडा आधारित पॉलिटिकल प्रोपेगंडा मात्र है। अपनी राज्यसत्ता और प्रभुत्व पाने की उन्मादपूर्ण लालसा से वे जो पॉलिटिकल एजेंडा तय करते हैं, हिस्ट्री के नाम पर सारा ही लेखन उसी एजेंडा के प्रोपेगंडा के लिये करते हैं। यह यूरोप में सबको पता है परंतु भारत में नवशिक्षितों को नहीं पता है।
इस एजेंडा आधारित पॉलिटिकल प्रोपेगंडा को लेकर भी मुस्लिम और ईसाई लेखकों में जबर्दस्त फर्क है। रेनेसॉ और दुनिया से परिचय के बाद प्रबुद्ध यूरोपीयों ने चर्च का खुला विरोध ना करते हुये भी और अपने पॉलिटिकल एजेंडा को पूरी तरह ध्यान में रखते हुये ही प्रचंड परिश्रम किया है। भारत की जैसी विद्या परंपरा रही है उसमें उस परिश्रम की भरपूर सराहना करनी चाहिये। क्योंकि हमारे यहां राक्षसों, दस्युओं और पिशाचों के भी गुणों की चर्चा भी की जाती है और दोषों तथा पापों की चर्चा भी खुलकर की जाती है। यह मूल भारतीय परंपरा है। जो इन दिनों नवशिक्षितों को स्मरण नहीं है।
चर्च ने ख्रीस्त पंथ के नाम पर अपने अनुयायियों को कष्ट सहन (सफरिंग) की जबर्दस्त ट्रेनिंग दी और यूरोप की जलवायु के कारण तथा वहां अन्न और फलों की विविधता के पूर्ण अभाव के कारण वहां के लोगों को कठिन परिश्रम का सहज अभ्यास रहा है। इस प्रकार कठिन परिश्रम और कष्ट सहन उनके जींस में या भागवत जी के शब्दों में कहें तो, DNA में चला गया है। इसलिये उन्होंने अत्यधिक परिश्रम किया परंतु ख्रीस्त पंथ के उन्मादपूर्ण संस्कार के कारण लेखन में निरंतर छल किया। इसके प्रचुर प्रमाण हैं जो हम देते ही रहते हैं परंतु यहां केवल उस एक प्रमाण का उल्लेख करेंगे जिनका उल्लेख प्रो. कुसुमलता केडिया सर्वाधिक करती हैं।
वह यह है कि इस सर्वविदित तथ्य को कि 17वीं शताब्दी ईस्वी तक यूरोप के लोगों को विश्व के विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं था और 18वीं शताब्दी ईस्वी में कुछ ज्ञात भी हुआ तो उन्होंने अपनी ख्रीस्त दृष्टि में रंगकर और भीषण अतिरंजना तथा गप्पबाजी में रंगते हुये लिखा। 19वीं शताब्दी ईस्वी से अपने परिश्रम के कारण उन्हें अच्छी जानकारी मिलने लगी और 20वीं शताब्दी ईस्वी में जाकर उनकी जानकारी उल्लेखनीय हो सकी हैं। परंतु अपनी इन सीमाओं के बावजूद उन्होेंने दुनियाभर के प्राचीन समाजों के जो लोग उनसे संवाद के लिये खुल सकें, उनसे टूटी-फूटी बातचीत करके या बहुत कुछ इशारों में बात करके तथा जो लोग उन्हें अनुवाद के लिये पैसा लेकर तैयार हुये, उन अल्पपठित लोगों से भ्रष्ट या गलत या भ्रामक अनुवाद करवाकर उसमें अपना रंग हर जगह डालते हुये उनके बारे में लिखा और ऐसा प्रयास किया कि दुनिया के विषय में उनका यह विकलांग, विकृत, भ्रष्ट, गप्पों से भरा, अटकलपच्चू और झूठा लेखन ही प्रमाण मान लिया जाये। कहीं वे सफल हुये जैसे भारत में, कहीं असफल जैसे अमेरिका में। भारत में सफल इसलिये हुये कि युद्ध के संयोगो का लाभ उठाकर तथा अनिश्चिय की दशा में अपने चेलों को भारत में पावर का ट्रांसफर अपनी शर्तों पर करने में वे सफल हुये। इसलिये यहां उनके मिथ्या लेखन को ही प्रामाणित प्रचारित किया जाने लगा। ऐसा इसलिये नहीं कि जवाहर लाल नेहरू उनके कोई अनुयायी थे। नेहरू को उनका अनुयायी मानना बहुत बड़ा झूठ है। नेहरू अत्यंत चतुर और महत्वाकांक्षी राजनेता थे और समकालीन विश्व में उन्हें नेशन स्टेट का महत्व समझ में आ गया तथा विश्व में नेशन स्टेट पर काबिज होने वाले लोग क्या-क्या धूर्तता और बलप्रयोग करते हैं, यह वे जानते थे तथा भारत में बलप्रयोग यहां की जाति-व्यवस्था, खाप पंचायतों, मठों-मंदिरों के प्रति वीर हिन्दुओं की श्रद्धा और अत्यंत प्राचीन लोकतांत्रिक परंपरा के कारण बलप्रयोग उलटा बैठेगा, यह भी वे जानते थे, इसलिये वे बड़ी सावधानी से चले और बड़ी चतुराई से उन्होंने शिक्षा और संचार माध्यमों पर एकाधिकार का रास्ता अपनाकर शिक्षा के नाम पर भारत के लोगों की श्रद्धा देखकर शिक्षा के ही द्वारा उन्हें सम्मोहित करने और धीरे-धीरे अपने और अपने मत के लिये अनुकूलित करने का मार्ग चुना। यह सदा स्मरण रखना चाहिये कि नेहरू से बड़ा कोई नेता विगत 75 वर्षों में नहीं हुआ है और स्वयं श्री नरेन्द्र मोदी वस्तुतः नेहरू की ही कार्यशैली का अनुसरण कर रहे हैं। दोनों में जो आधारभूत अंतर दिखता है वह बदले हुये युग का है। नेहरू के समय बहुत बड़े हिस्से में समाजवाद का सम्मोहन था, मोदी जी के समय उतने ही बड़े हिस्से में हिन्दुत्व और भारतीयता का सम्मोहन फैला है। यहां वस्तुतः यदि तुलना की जाये तो मोदी इस विषय में नेहरू से कमतर सिद्ध होंगे। क्योंकि नेहरू ने समाजवाद के परिवेश का लाभ उठाकर भारत में समाजवाद का कचरा बुरी तरह थोप दिया और स्वयं बहुत बड़े नेता बनकर उभरे। मोदी जी को हिन्दुओं ने अपनी सांस्कृतिक और राजनैतिक आवश्यकता के कारण बहुत बड़ा नेता बनाया है परंतु वे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दुत्व के पक्ष में फैले हुये परिवेश का वैसा लाभ राष्ट्र को दिलाने में झिझक रहे हैं। यद्यपि भविष्य उनका ही है। क्योंकि भविष्य हिन्दुत्व का है।
पश्चिमी यूरोप के लोगों ने मेहनत के द्वारा और छल तथा कूटनीति के द्वारा अंतर्राष्ट्रीय संस्थायें रचकर राष्ट्रराज्यों को अनेक मामलों में नियंत्रित कर रखा है और स्कॉलरशिप का एक अंतर्राष्ट्रीय प्रतिमान बना दिया है जिसके शिकंजे में लगभग पूरा विश्व है। इसलिये पहले से ही यूरोपीय विचारों के प्रति समर्पित नवशिक्षित हिन्दुओं में स्वतंत्र चेतना तभी आ सकती है, जब या तो मोदी जी या भविष्य में कोई अधिक बुद्धिमान और समर्थ राष्ट्रनेता इसके लिये बहुत परिश्रम करें।
दूसरी ओर मुस्लिम समुदायों में राजनैतिक प्रोपेगंडा के लिये जो भी लेखन हुआ है, वह मुख्यतः यूरोपीय लोगों के द्वारा लिखे गये प्रोपेगंडा की कहीं भद्दी नकल है और कहीं दयनीय नकल है। उनके लेखन में गप्प इतनी खुलकर दिख जाती है कि केवल बेहोश लोग ही उस पर भरोसा कर सकते हैं।
अब बाबर के संदर्भ में इन दोनों बातों को देखते हैं। बाबर के बारे में बाबर के समय ना तो भारत में कुछ भी लिखा गया और ना ही दुनिया में कहीं कुछ लिखा गया। ईस्ट इंडिया कंपनी के एक कर्मचारी हेनरी मायर्स इलियट 19 वर्ष की उम्र में कंपनी में भर्ती होकर कंपनी द्वारा राजस्व वसूली के लिये तैनात बरेली के कलेक्टर (राजस्व संग्राहक) के निजी सहायक बनकर 1826 ईस्वी में आये। वे जॉन इलियट नामक एक चर्च कर्मचारी के 15 बच्चों में से तीसरा बच्चा थे। यहां उन्हांेने बरेली और मुरादाबाद में सहायक का काम किया और कंपनी कर्मचारियों की सुविधा के लिये बरेली और मुरादाबाद इलाके के ब्राह्मणों और राजपूतों द्वारा बोले जाने वाले प्रमुख शब्दों की एक सूची अर्थसहित तैयार की ताकि ब्राह्मणों और राजपूतों के कथनों का अर्थ कर्मचारी समझ सकें क्योंकि ये लोग ही उस इलाके में प्रभावी थे। इनकी भाषा का असली अर्थ समझना आवश्यक था। कंपनी कर्मचारियों को वे शब्द अबूझ लगते थे।
बाद में कंपनी कर्मचारियों ने बताया कि बंगाल के हिन्दू कर्मचारी कंपनी द्वारा किये गये बंगाल के उत्पीड़न और कंगाली तथा बदहाली से पीड़ित होकर कंपनी में नौकरी तो कर लेते हैं पर वे दिन रात अपने हिन्दू राजाओं और रानियों की प्रशंसा करते रहते हैं। विशेषकर रानी भवानी जिन्होंने तारापीठ में और काशी में मंदिर बनवाये थे तथा अनेक यज्ञ कराये थे और रानी रासमणि जिन्होंने कंपनी के द्वारा बंगाल के मछुआरों से जबरन फिरौती वसूलने को रोक दिया था और मछुआरों की आजीविका बहाल की थी, जिस पर कमीने फिरगिंयो ने यह आरोप लगाया था कि रानी रासमणि बंगाल की शांति भंग कर रही हैं, उनकी रात-दिन प्रशंसा करते हैं।
उल्लेखनीय है कि ये वही कैवर्त जाति की रानी रासमणि हैं, जिन्होने श्रीरामकृष्ण परमहंस को पूरी श्रद्धा से अपने यहां पुजारी रखा था, जिन्होंने दक्षिणेश्वर में मंदिर बनवाया था, जिन्होंने कोलकाता में गंगातट पर बाबूघाट और नीमतल्ला घाट बनवाया, जिन्होंने सुवर्ण रेखा नदी से पुरी तक सड़क बनवाई, श्रीरामेश्वरम् से श्रीलंका के मंदिरों तक के लिये बड़ी नौकायें और जहाज चलवाये, जिन्होंने हावड़ा का गंगानदी पर पुल बनवाया, जिन्होंने ढाका के नवाब द्वारा बंदी किये गये 2000 हिन्दुओं को छुड़वाया, जिन्होंने दुर्गापूजा यात्रा बंद करने की कंपनी के कमीने कर्मचारियों की कमीनगी को विफल कर दिया, जिन्होंने राष्ट्रीय पुस्तकालय के लिये कोलकाता में जगह दी और हिन्दू कॉलेज के लिये भी जमीन दी। जिन्होंने काशी में अनेक मंदिरों को दान दिया, जिन्होंने श्रीनगर में शंकराचार्य मंदिर का पुनरूद्धार कराया तथा अन्य अनेक पुण्य कर्म किये। ऐसी श्रेष्ठ रानियों और श्रेष्ठ राजाओं की प्रशंसा कंपनी में काम करने जाने वाले हिन्दू कर्मचारी रात-दिन करते हैं जिससे हमारी कंपनी के कर्मचारी बहुत दबते हैं, इसलिये हमें मुसलमानों के द्वारा हिन्दुओं को बारम्बार पीटे जाने और पराजित किये जाने की कथा रचनी है, इस संकल्प के साथ हेनरी मायर्स इलियट ने कंपनी की सेवा के लिये लिखना शुरू किया और पर्याप्त सामग्री ना मिलने पर अपने मन से कई जाली रचनायंे की, उनमें से ही एक है बाबरनामा, जिसके बारे में हम आगे और विवरण देंगे।
यहां मुख्य प्रश्न यह है कि रानी भवानी और रानी रासमणि सहित बंगाल के श्रेष्ठ दनुजमर्दन राजाओं के द्वारा किये गये कामों और लिखे गये इतिहास को ना पढ़कर जो लोग 75 वर्षों में कांग्रेस द्वारा अलगाववादी मुसलमानों और देशद्रोही कम्युनिस्टों के द्वारा रची गई गप्पों को ही इतिहास कहकर कांग्रेसी राज में पढ़ाये जाने का तथ्य जानते हैं, वे भी जब हेनरी इलियट और जॉन डाउसन तथा उनके भारतीय चेलों की गप्पों के आधार पर ही बाबर की सफलता की कहानी लिखते हैं तो इससे सत्ता का अधर्म आधारित बल और सामान्य भारतीयों का प्रमादपूर्ण बौद्धिक जीवन ही सामने आता है।
लेखक : रामेश्वर मिश्र पंकज
रानी रासमणि
भारतीय महिला परोपकारी (1793-1861)
रानी रासमणि ( 28 सितंबर – 19 फ़रवरी, 1861) बंगाल में, नवजागरण काल की एक महान नारी थीं। वे एक सामाजिक कार्यकर्ता, एवं कोलकाता के जानबाजार की जनहितैषी ज़मीनदार के रूप में प्रसिद्ध थीं। वे दक्षिणेश्वर काली मंदिर की संस्थापिका थीं, एवं नवजागरण काल के प्रसिद्ध दार्शनिक एवं धर्मगुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस की मुख्य पृष्ठपोषिका भी हुआ करती थी। प्रचलित लोककथा के अनुसार, उन्हें एक स्वप्न में हिन्दू देवी काली ने भवतारिणी रूप में दर्शन दिया था, जिसके बाद, उन्होंने उत्तर कोलकाता में, हुगली नदी के किनारे देवी भवतारिणी के भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था।
रानी रासमणि
রানী রাসমণি
कोलकाता के कर्ज़न पार्क में रानी रासमणि की प्रतिमा, उनको “रानीमाँ” कह कर संबोधित किया गया है, और नीचे उन्हें “लोकमाता रानी रासमणि” कहा गया है।
जन्म – 28 सितंबर,
हाली शहर, ब्रिटिश भारत
मृत्यु -19 फ़रवरी, 1861
जाति -बंगाली
प्रसिद्धि का कारण-सामाजिक कार्यकर्ता, जनबाज़ार की जमीनदार, दक्षिणेश्वर मंदिर की संस्थापिका
धर्म-हिन्दू
रानी रासमणि ने अपने विभिन्न जनहितैषी कार्यों से प्रसिद्धि पाई थी। उन्होंने तीर्थयात्रियों की सुविधा हेतु, कलकत्ता से पूर्व पश्चिम की ओर स्थित, सुवर्णरेखा नदी से जगन्नाथ पुरी तक एक सड़क का निर्माण करवाया था। इसके अलावा, कलकत्ता के निवासियों के लिए, गङ्गास्नान की सुविधा हेतु उन्होंने केन्द्रीय और उत्तर कलकत्ता में हुगली के किनारे बाबुघट, अहेरिटोला घाट और नीमताल घाट का निर्माण करवाया था, जो आज भी कोलकाता के सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण घाटों में से एक हैं। तथा उन्होंने, स्थापना के दौर में, इम्पीरियल लाइब्रेरी (वर्त्तमान भारतीय राष्ट्रीय पुस्तकालय, कोलकाता) एवं हिन्दू कॉलेज (वर्त्तमान प्रेसिडेन्सी विश्वविद्यालय, कोलकाता) वित्तीय सहायता प्रदान किया था।
रानी रासमणि को अक्सर लोकसंस्कृति में सम्मानजनक रूपसे “लोकमाता” कहा जाता है।
जीवनी
रानी रासमणि का घर, जानबाजार, कोलकाता
रानी रासमणि का जन्म २६ सितंबर १७९३ में, वर्तमान उत्तर चौबीस परगना जिला के हालीशहर के कोना ग्राम के एक कृषिजीवी परिवार में हुआ था। अपने यौवनकाल में वे असामान्य सुन्दरी थीं। मात्र ११ वर्ष की आयु में उनका विवाह, कोलकाता के जनबाज़ार के धनी माहिष्य ज़मीन्दार बाबू रामचन्द्र दास से करवा दिया गया।
जमीन्दारी
पति की मृत्यु के पश्चात, उन्होंने जमीन्दारी का सारा भार उठा लिया एवं अत्यंत दक्षता से अपने दायित्वों का निर्वहन किया। व्यक्तिगत तौर पर, रानी रासमणि, किसी सामान्य धार्मिक बंगाली हिन्दू विधवा के समान सरल जीवनयापन करती थीं। जमीन्दारी की बागडोर संभालने के बाद, उन्होंने सामाजिक एवं लोक कल्याणकारी योजनाओं में कार्य शुरू किया, जिससे लोगों में ज़मींदारी के प्रति समर्थन बढ़ गया।
रानी रासमणि के, तत्कालीन ब्रिटिश शासन से भी कई बार टकराव हुये। तब रानी और ब्रिटिश सरकार में भिड़न्त के क़िस्से जन सामान्य में काफी प्रचलित थे। ब्रिटिश शासन ने तब गंगा नदी में मछली पकडने पर कर लागू किया था। विरोध में रानी रासमणि ने हुगली नदी के एक हिस्से पर अवरोध लगा कर हुगली के महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग रोक दिया था, जिससे अंततः ब्रिटिश सरकार को कर वापस लेना पड़ा था। रानी के पास,गरीब मछुआरों का समर्थन था, जिनकी जीवनयापन पर इस कर से खतरा आ गया था। एक बार, सरकार ने उनके घर की दुर्गा पूजा विसर्जन यात्रा पर रोक के आदेश दिए कि इससे नगर की शांति भंग होती है। रानी रासमणि ने इस आदेश की अवहेलना की । जवाब में सरकार ने उन पर भारी जुर्माना लगाया, मगर जनसामान्य में उनके समर्थन से उठे विरोध और हिंसा से सरकार को जुर्माना वापस लेना पड़ा था।
दक्षिणेश्वर काली मन्दिर
पुराना
१९६५ में सैम्युएल बोर्न द्वारा ली गयी तस्वीर
नया
नदी पर से ली गई वर्तमान समय की तस्वीर
रानी रासमणि ने अपने विभिन्न लोक सेवा कार्यों से प्रसिद्धि अर्जित कर अपनी जनहितैषी ज़मीन्दार की छवि तैयार की थी। उन्होंने तीर्थयात्रियों की सुविधा हेतु, कलकत्ता से पश्चिम की ओर स्थित, सुवर्णरेखा नदी से पुरी तक सड़क निर्माण करवाया था। इसके अलावा, कलकत्ता के निवासियों के लिए, गङ्गास्नान सुविधा हेतु उन्होंने केन्द्रीय और उत्तर कलकत्ता में हुगली के किनारे बाबुघट, अहेरिटोला घाट और नीमताल घाट निर्मित करवाया था, जो आज भी कोलकाता के सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण घाटों में से एक हैं। उन्होंने इम्पीरियल लाइब्रेरी (वर्त्तमान भारतीय राष्ट्रीय पुस्तकालय, कोलकाता) एवं हिन्दू कॉलेज (वर्त्तमान प्रेसिडेन्सी विश्वविद्यालय, कोलकाता) को वित्तीय सहायता दी थी।
प्रचलित लोककथन के अनुसार, उन्हें एक स्वप्न में हिन्दू देवी काली ने भवतारिणी रूप में दर्शन दिया तो उन्होंने उत्तर कोलकाता में, हुगली नदी के किनारे देवी भवतारिणी भव्य मंदिर निर्माण करवाया, जिसे आज दक्षिणेश्वर काली मंदिर के नाम से जाना जाता है। रामकुमार चट्टोपाध्याय इस मन्दिर के प्रधानपुरोहित नियुक्त किये गये, जोकि गदाधर चट्टोपाध्याय (बाद में रामकृष्ण परमहंस) के बड़े भाई थे। गदाधर चट्टोपाध्याय को बाद में अपने बड़े भाई के पद पर नियुक्त किया गया । इस मन्दिर में रहते वे स्वयं स्वामी रामकृष्ण परमहंस के रूप में एक विख्यात दार्शनिक, योगसाधक और धर्मगुरु स्थापित हुए। रानी रासमणि ने ही उन्हें प्रधानपुरोहित पद पर नियुक्त किया था। वे रामकृष्ण परमहंस की पितृपोषक भी बनीं।
अत्यंत धार्मिक और समाजसेवी प्रवृत्ति पर भी , समाज के कुछ तापक, शूद्र परिवार में जन्म से, उनसे भेदभाव का व्यवहार करते थे। रामकृष्ण परमहंस ने अपने लेखों में उस घटना का भी ज़िक्र किया था, जब उनके जन्मना शुद्र होने से कोई भी ब्राह्मण दक्षिणेश्वर मंदिर में पुरोहित बनने को तैयार नही था। लेकिन स्वामी रामकृष्ण परमहंस, रानी रासमणि को देवी दुर्गा के अष्टनायिकाओं में से एक मानते थे।
देहान्त-२१ फ़रवरी १८६१ में कलकत्ता में ६७ वर्ष की आयु में रानी रासमणि का निधन हो गया।
स्मारक एवं प्रचलित लोकसंस्कृति में प्रदर्शन
दक्षिणेश्वर मन्दिर के परिसर में रानी रासमणि का मन्दिर
केन्द्रीय कोलकाता के रानी रासमणि ऍवेन्यू पर रानी रासमणि की प्रतिमा
वर्ष १९५५ में रानी रासमणि की जीवन पर बंगला भाषा में एक जीवनचरित्र फ़िल्म बनाई गई थी, जिसके निर्देशक कालीप्रसाद घोष थे। रानी रासमणि का मुख्य चरित्र मशहूर अभिनेत्री मोलिना देवी ने निभाया था।
रानी रासमणि को साहित्य, पुस्तकों, अखबारों, धार्मिक समुदाय, श्रद्धालुओं और प्रचलित लोकसंस्कृति में “लोकमाता” और “रानीमाँ” जैसी उपाधियों से सम्मानित किया जाता था।
रानी रासमणि के सम्मान में कोलकाता में कई स्थानों पर उनकी प्रतिमाएँ हैं। दक्षिणेश्वर काली मंदिर के मुख्य प्रांगण के प्रवेशद्वार पर रानी रासमणि का मन्दिर है। इसके अलावा केन्द्रीय कोलकाता के कर्ज़न पार्क में, जिसमें कोलकाता, बंगाल एवं भारत के महानतम व्यक्तित्वों की प्रतिमाएँ हैं, उसमें रानी रासमणि की भी प्रतिमा है, जिसमें वें “रानीमाँ” नाम से संबोधित हैं। कोलकाता के विभिन्न क्षेत्रों में रानी रासमणि के सम्मान में अनेक सड़कों और अन्य सार्वजनिक स्थानों के नाम है:
कोलकाता के धर्मतला(एस्प्लनेड) में रानी रासमणि के नाम से रानी रासमणि ऍवेन्यू है, जिसके किनारे उनकी एक प्रतिमा भी है।
कोलकाता के जानबाजार में उनकी पैतृक निवास के पास वाली सड़क का नाम रानी रासमणि रोड है।
इसके अलावा, विवेकानन्द सेतु के मोड़ से दक्षिणेश्वर मंदिर तक जाने वाली सड़क का नाम भी रानी रासमणि मार्ग किया गया है।
१९९३ में भारतीय डाक विभाग ने रानी रासमणि की द्विशत वर्षगांठ पर एक विशेष स्टाम्प जारी किया था।
दक्षिणेश्वर मन्दिर के निकट फेरी घाट का नाम भी रानी रासमणि घाट है।
भारत सरकार ने कोस्टगार्ड समर्पित अपनी पाँचवीं एवं आखिरी फास्ट पैट्रोल वेसेल (FPV) का नाम रानी रासमणि रखा है।


