अक्षय तृतीया:जामदग्नि राम प्राकट्य दिवस,गंगा अवतरण
वैशाख मास शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि
सौर-चान्द्र वर्ष के समन्वय में महत्वपूर्ण तिथि रही है।
याजुष् ज्योतिष का श्लोक है-
विषुवन्तं द्विरभ्यस्तं रूपोनं षड्गुणीकृतम् ।
पक्षा यदर्धं पक्षाणां तिथिः स विषुवान् स्मृतः ॥
माघ शुक्ल प्रतिपदा में पूरे तीन सौर मास जोड़ने पर युग की प्रथम विषुव तिथि प्राप्त होती है (वैशाख शुक्ल तृतीया ).
अर्थात् आज से ३६०० वर्ष पहले यह व्यवस्था थी।
काल के इस घटक को लोक सम्बद्ध कर पुण्यलाभ प्रकरण जोड़ दिया गया ताकि ‘विधि’ लोकस्मृति में बनी रहे।
हम सभी जानते हैं कि वर्तमान में वैशाख शुक्ल तृतीया का वसन्त विषुव से तालमेल नहीं रह गया, इसका कारण है भूतकाल में किया गया पञ्चाङ्ग समायोजन ।
तिथि अक्षय है,इसे श्रीविष्णु अवतार जामदग्नि राम के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाये जाने की परम्परा है।
अन्यायी एवं अन्याय का प्रतिकार अत्यावश्यक है यही प्रेरणा रेणुका-जमदग्नि सुत के चरित्र से ग्रहण करनी चाहिये।
पृथिवी पर गंगाजी का अवतरण अक्षय तृतीया को हुआ था । अवतरण तिथि पर गङ्गास्नान विशेष फलदायक माना जाता है ।
✍🏻अत्रि विक्रमार्क अन्तर्वेदी
परशुराम – महाकाव्य से पुराण गाथा तक
अक्षय तृतीया, आखा तीज तपोबल के धनी परशुराम का आविर्भाव दिवस माना गया है। महाभारत और पुराणों में भार्गवों का जो प्रभाव लक्षित होता है, उनमें परशुराम के पराक्रम के आख्यान मिलते हैं। वायुपुराण की तरह ही रचे गए ब्रह्माण्डपुराण के मध्यभाग के तीसरे उपोद्घात में भार्गव चरित में सुंदर ढंग से परशुरामचरित्र आया है।
कार्तवीर्य संहार बाद पृथ्वी क्षत्रियों से विहीन करने के आख्यान में हठी और अवांछित आचरणकर्ता को परशुराम ने अपने पराक्रम से परांगमुख किया। श्रीकृष्ण ने उनको वरदान दिया था कि वे पिता का वैर शोधनकर पृथ्वी पर शासन करें, वह अंशावेश युक्त होकर कर्ता, हर्ता और स्वयंप्रभु होकर विचरण कर्ता हुए –
साधयित्वा पितुर्वैरं कुरु नि:क्षत्रियां महीम्।
मम चक्रावतारो हि कार्त्तवीर्यो धरातले।
कृतकार्यो द्विजश्रेष्ठ तं समापय मानद।।
अद्य प्रभृति लोके अस्मिन्नंशावेशेन मे भवान्।
चरिष्यति यथाकालं कर्त्ता हर्त्ता स्वयंप्रभु।। (ब्रह्मांड पुराण मध्यभाग 3, 37, 27-29)
परशुराम आख्यान अन्यत्र भी रोचक रूप में आया है। अवतारों में परशुराम, राम और बलराम- ये तीन राम हैं। वे भार्गवराम के नाम से ख्याति लब्ध हुए। भार्गवों के आख्यान महाभारत के आदिपर्व, आरण्यकपर्व, उद्योगपर्व, शांतिपर्व, अश्वमेधपर्व में भरे हैं। जमदग्नि और परशुराम जन्मकथा चार बार लिखी गई है। महाभारतकार परशुराम पर इतना मुग्ध हुआ कि पृथ्वी को 21 बार क्षत्रियविहीन करने का प्रसंग दस बार किया। सूतों ने तब ‘त्रिसप्तकृत्व: पृथ्वी कुता नि:क्षत्रिया पुरा’ मुहावरा मानो रट ही लिया था। कारण ये था कि शौनक जिनको उग्रश्रवा सूत ने भारताख्यान सुनाया, वे खुद भार्गव थे। इसीलिए भरतवंश से पूर्व अपने वंश की कथा सुनने की इच्छा प्रकट की थी- तत्र वंशमहं पूर्वं श्राेेतुमिच्छामि भार्गवम्। (आदिपर्व 5, 3)
परशुराम नाम से अवदान रूप में परशुराम कल्पसूत्र तो ख्यातिलब्ध है ही, विष्णुधर्मोत्तर पुराण विशेष महत्व का है जिसे भारतीय संस्कृति और सभ्यता का विश्वकोश कहा जाता है। यह उपपुराण परशुराम-पुष्कर संवाद रूप में 24 हजार श्लोकों में है। इसका अनुवाद करते समय पदै-पदै मुझे इस विभूति के विचारों पर आत्मगौरव होता रहा। पश्चिमी भारत में परशुराम के आख्यान से जुडे कई स्थल हैं, स्थाणुतीर्थ से लेकर अरावली की पहाडियों और नदियों के प्रवाह क्षेत्र में उनकी स्मृतियों के पड़ाव मिलते हैं, क्यों… यही तो विचारणीय है।
✍🏻श्रीकृष्ण जुगनु
यूं तो भगवान रेणुकानंदन का भ्रमण क्षेत्र पूरा भारत रहा यहां भारत से मतलब वर्तमान भारत नही बल्कि प्राचीन अखंड भारत जिसकी सीमायें अफगानिस्तान से लेकर ब्रह्म देश वर्तमान म्यामांर तक थीं जिसमे भारत के समीपस्थ महाचीन यानि वर्तमान तिब्बत भी था
पर सबसे अधिक उन का परिभ्रमण कहें या लीला क्षेत्र कोकंण से लेकर केरल का इलाका रहा।
सुनते हैं कि अपने लिये यह रत्न सरीखी धरती उनने समुद्र से मांगी और सीमा निर्धारण को परशु फेंका और वहां तक की सीमा रत्नाकर ने उनके लिये छोड़ दी । यह कथा लगभग सभी लोगो को पता है।
पर वहां भगवान परशुराम ने सप्त मुक्तिक्षेत्रों की स्थापना की या कहें संस्कार किया जिनमे से सबसे मुख्य हैं-
श्री मूकांबिका, कुल्लूर
रजताद्री यानि वर्तमान उडपि
मूकांबिका में स्वर्णरेखांकित सांब सदाशिव लिंग का सरंक्षण या संस्कार उनने किया जिसे बाद में भगवत्पाद शंकर ने भगवति मूकांबिका की उत्सव मूर्ति स्थापित करक और अधिक महिमासंपन्न कर दिया। मंगलौर की प्रसिद्ध मंगला देवी की प्रतिमा भगवान ने ही समुद्र गर्भ से निकाल कर वहां स्थापित की। वे इस दिव्य भूमि के संस्कार और धर्म प्रवर्तन हेतु मिथिला या तिरहुत से ब्राह्मणों के परिवार लेकर आये और उनको इस भूमि पर बसाया।
ये ब्राह्मण अपने साथ अपनी कुलदेवी शांतादूर्गा का विग्रह साथ लेकर आये थे जो अभी भी गोवा में स्थापित हैं।
ऐसे अनेकानेक तीर्थो का प्रवर्तन,संस्कार और सरंक्षण भगवान ने किया । समुद्री दस्युओं से रक्षा हेतु विलक्षण युद्ध कला कल्लरि का अविष्कार किया, यह तो सब जानते हैं पर वह कल्लरी जिस सूक्ष्मातिसूक्ष्म शरीर विज्ञान या कला का स्थूल रूप है उसे बहुत कम लोग जानते हैं और जानते भी हैं तो केवल एक मूवी तक ही सीमित है।
शरीर के बहुत सूक्ष्म अध्ययन शास्त्र जिसमें हर तरह की नाड़ी ,नसों की बारीक से बारीक जानकारी भरी थी।
जिसका जानकार उस ज्ञान से किसी व्यक्ति को स्वस्थ भी कर सकता था और अपंग भी यहां तक की मृत्युसरीखा महादान भी दे सकता था।
वह दिव्य कला थी “मर्म भेदन” जो मुख्य रूप से चिकित्सा शास्त्र की पद्धति थी। केरल से लेकर रत्नागिरी , कोंकण और गोवा तक इनकी प्रशस्ति गाते कई स्थान हैं।
इस युद्ध कला का प्रिय शस्त्र था “उर्मि”रस्सी की तरह लचकदार और लंबी तलवार जिसे कोड़े की तरह घुमाया जाता था।
और ये भी देखें कि यहां बिलकुल विपरीत दिशा में हिमाचल में तिब्बत सीमा से बिलकुल सटा के “नृमुण्ड” नामक पहाड़ी कस्बे में एक गुफा में स्थापित भगवान परशुराम की षोडशभुजी प्रतिमा स्थापित है जिसे स्थानीय पहाड़ी जन “कालकाम परशुराम “कहते हैं। उनके आयुधों में यही “उर्मि”नामक तलवार है और इस तीर्थ के पुजारी स्थानीय किरात मतलब पहाड़ी हैं जिसका प्रचलन उत्तर में ना के बराबर रहा या शायद जो भी रहा वह मराठे लाये।
लाते भी क्यों नही,मराठे जिन बाजीराव पेशवा को इसको चलाने का निष्णांत माना जाता है वे “चितपावन”ब्राह्मण थे कोकंण”के। उस चित्पावन ब्राह्मणों की उत्पत्ति परशुराम के कमंडल के मंत्रपूत जल से मानी गई है।
यहां पर ध्यान दीजिये, अर्बुद गिरी पर विशिष्ठ गोत्रिय विष्णु अवतार अजिनबुद्ध द्वारा यज्ञकुंड से चार क्षत्रिय कुलोत्पत्ति प्रसंग। समानता देखकर अनुमान लगाये कि यहां क्या कहा जा रहा है रूपक में छिपाकर।
एक बार हम अपने जैन मित्र के साथ उनके तीर्थ केसराय पाटण गये । वहां जाकर पता लगा कि यह जैनतीर्थ नही सनातनियों का तीर्थ है उत्तर वैदिक काल से।
जिन महाराज रंतिदेव के यज्ञपशुओं के चर्म यदाकदा जिसमें बहते ही रहते थे और इसी कारण उस महानदी की नाम चर्मण्यवती पड़ा उसके किनारे उनके स्थापित चतुर्भुज विष्णु प्रतिमा और श्वेतवर्णीय योगमुद्रासीन नारायण की प्रतिमा के नाम पर ही इस तीर्थ का नाम केसराय पाटण नही केशवराव पाटण था पर इस जगह का सर्वाधिक प्राचीन स्थान था भगवान परशुराम का स्थापित “जम्बूमार्गेश्वर लिंग”जिसके प्रति श्रद्धा का भाव आसपास की भीलों में बहुत ज्यादा है।
चंबल किनारे यह स्थान शायद विस्मृत ही हो गया है लोक मन से लेकिन वनवासियों ने इसे जागृत बना रखा है।
विदर्भ और मराठवाड़ा में यही प्रतापी और उग्र तेज संपन्न व्यक्तित्व का रूपांतरण अत्यधिक तेजस्विनी और तपःपूत माता के स्नेहिल पुत्र में हो जाता है।
आजकल के नव्यसभ्य और वाम , प्रगतिशील समुदाय ने जिस प्रकरण पर सबसे ज्यादा उंगली उठाई उसे कौन समझ सका
यहां से प्रवेश होता है चतुर्थ महाविद्या प्रचंड चंडिका छिन्नमस्ता का
इनके विलक्षण साधको में हिरण्याकश्यिपु, प्रहलाद पुत्र वैरोचन , परशुराम और मध्यकाल में श्री गोरख नाथ और चौरासी सिद्धों में अनन्यतम कनखलापा और मेखलापा रहीं।
भगवती रेणुका भगवती छिन्नमस्ता की उपविद्या हो गईं
रक्त पंचमी, रेणुका शबरी, के नाम से इनका अपना विलक्षण पटल पद्धति है
पूरे मराठवाड़ा और विदर्भ की इष्ट सच्चे अर्थो में लोक माता जिनके पूजा अर्चन में केवल और केवल ब्राह्मण अर्चकों का अधिकार नही। अति साधारण ग्रामीण ,अनपढ़, वनवासियों की भाव भरे अनगढ़ अर्घ्यो से संतुष्ट सर्वस्व प्रदाता जगदंबा वासुदेवानंद सरस्वती और दतिया स्वामी दोनों ने इस विलक्षण देवी स्वरूप के ऊपर बहुत लिखा।
भगवान पर ब्राह्मणवाद को फैलाने वाले लोगो के लिये यह अनुपम सूचना है कि वे “परशुराम तंत्र “का अवलोकन करें यदि उनको मिल सके तो जिसमें परशुराम गायत्री का पूर्ण प्रयोग दिये गये हैं ( और उसका अधिकार बर्बर ,खस, यवन ,इत्यादी सभी को दिया है ) कोष्ठक में लिखा गया वाक्य गलत है सो क्षमा प्रार्थी हैं उसे सही करने को अत्रि विक्रमार्क का धन्यवाद।
✍🏻अविनाश भारद्वाज
‘परशु’ प्रतीक है पराक्रम का। ‘राम’ पर्याय है सत्य सनातन का। इस प्रकार परशुराम का अर्थ हुआ पराक्रम के कारक और सत्य के धारक। शास्त्रोक्त मान्यता है कि परशुराम भगवान विष्णु के छठे अवतार हैं, अतः उनमें आपादमस्तक विष्णु ही प्रतिबिंबित होते हैं, एक व्याख्या यह है कि ‘परशु’ में भगवान शिव समाहित हैं और ‘राम’ में भगवान विष्णु। इसलिए परशुराम अवतार
भले ही विष्णु के हों, किंतु व्यवहार में समन्वित स्वरूप
शिव और विष्णु का है। इसलिए परशुराम ‘हरिहर’ स्वरूप हैं। पिता जमदग्नि और माता रेणुका ने तो अपने पाँचवें पुत्र का नाम ‘राम’ ही रखा था, लेकिन तपस्या के बल पर भगवान शिव को प्रसन्न करके उनके दिव्य अस्त्र ‘परशु’ (फरसा या कुठार) प्राप्त करने के कारण वे राम से परशुराम हो गए। ‘परशु’ प्राप्त किया गया शिव से। शिव संहार के देवता हैं। परशु संहारक है, क्योंकि परशु ‘शस्त्र’ है। राम प्रतीक हैं विष्णु के।
विष्णु पोषण के देवता हैं अर्थात् राम यानी पोषण/रक्षण का शास्त्र। शस्त्र से ध्वनित होती है शक्ति। शास्त्र से प्रतिबिंबित होती है शांति। शस्त्र की शक्ति यानी संहार। शास्त्र की शांति अर्थात् संस्कार। परशुराम वस्तुतः ‘परशु’ के रूप में शस्त्र और ‘राम’ के रूप में शास्त्र का प्रतीक हैं। एक वाक्य में कहूँ तो परशुराम शस्त्र और शास्त्र के समन्वय का नाम है, संतुलन जिसका काम है ।
अक्षय तृतीया को जन्मे हैं, इसलिए परशुराम की शस्त्रशक्ति भी अक्षय है और शास्त्र संपदा भी अनंत है। विश्वकर्मा के अभिमंत्रित दो दिव्य धनुषों की प्रत्यंचा पर केवल परशुराम ही बाण चढ़ा सकते थे। यह उनकी अक्षय शक्ति का प्रतीक था, यानी शस्त्रशक्ति का। पिता जमदग्नि की आज्ञा से अपनी माता रेणुका का उन्होंने वध किया। यह पढ़कर, सुनकर हम अचकचा जाते हैं, अनमने हो जाते हैं, लेकिन इसके मूल में छिपे रहस्य को/सत्य को जानने की कोशिश नहीं करते। यह तो स्वाभाविक बात है कि कोई भी पुत्र अपने पिता के आदेश पर अपनी माता का वध नहीं करेगा। फिर परशुराम ने ऐसा क्यों किया? इस प्रश्न का उत्तर हमें परशुराम के ‘परशु’ में नहीं परशुराम के ‘राम’ में मिलता है।
आरंभ में ही ‘राम’ की व्याख्या करते हुए कहा जा चुका है कि ‘राम’ पर्याय है सत्य सनातन का। सत्य का अर्थ है सदा नैतिक। सत्य का अभिप्राय है दिव्यता। सत्य का आशय है सतत् सात्विक सत्ता।
परशुराम वास्तव में ‘राम’ के रूप में सत्य के संस्करण हैं, इसलिए नैतिक-युक्ति का अवतरण हैं। यह परशुराम का तेज, ओज और शौर्य ही था कि आततायी कार्तवीर्य सहस्रार्जुन का वध करके उन्होंने अराजकता समाप्त की तथा नैतिकता और न्याय का ध्वजारोहण किया। परशुराम का क्रोध रचनात्मक क्रोध है। जैसे माता अपने शिशु पर क्रोध करती है। परशुराम ने अन्याय का संहार और न्याय का सृजन किया।
✍🏻अत्रि विक्रमार्क
अक्षय तृतीया-
वैशाख शुक्ल तृतीया को अक्षय तृतीया कहते हैं। इसके महत्त्व के बारे में कई लोगों ने बहुत लिखा है तथा बहुत से प्रसंग इसके साथ जोड़ दिये हैं। कई स्थानों पर देखा कि ब्रह्मा के पुत्र अक्षय कुमार का जन्म इसी दिन हुआ था। वह ब्रह्मा का नहीं, रावण का पुत्र था तथा उसका अक्षय तृतीया से कोई सम्बन्ध नहीं है। इसके कुछ महत्त्व हैं-
(१) वैशाख मास का अर्थ है कि इस मास की पूर्णिमा को चन्द्रमा विशाखा नक्षत्र में होगा। अतः उससे १२ दिन पूर्व तृतीया को रोहिणी नक्षत्र (४० से ५३ १/३ अंश) में रहेगा जो चन्द्र का उच्च स्थान (३३ अंश) राशि अनुसार है। इसी प्रकार मेष संक्रान्ति वाला अमान्त मास को चैत्र कहते हैं। मेष १० अंश पर सूर्य उच्च का होता है, अतः अमावास्या के ३ दिन बाद प्रायः उच्च का ही रहेगा। यहां उच्च का अर्थ है अच्छा फल देने वाला, कक्षा का उच्च स्थान नहीं है। कुछ लोगों ने लिखा है कि अन्य तिथि का क्षय हो सकता है, इस तिथि का नहीं। किसी भी तिथि का क्षय हो सकता है। यदि कोई तिथि २४ घण्टा (६० दण्ड) से कम अवधि की है तो संसार के किसी न किसी भाग में उसका क्षय अवश्य होगा, जहां इस तिथि में कोई सूर्योदय नहीं होगा।
(२) युगारम्भ तिथि-गणना के अनुसार हर युग पूर्ण सौर वर्षों का है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से गणना करने पर हर युग उसी मास से आरम्भ होगा, चान्द्र तिथि में २९ दिन तक का अन्तर हो सकता है। युगों के गुण के अनुसार युगादि तिथि का आरम्भ हो सकता है। महाभारत, शान्ति पर्व, अध्याय २३२-
त्रेतायुगे विधिस्त्वेष यज्ञानां न कृते युगे। द्वापरे विप्लवं यान्ति यज्ञाः कलियुगे तथा॥३२॥
अपृथग्धर्मिणो मर्त्या ऋक्सामानि यजूंषि च। काम्या इष्टीः पृथग् दृष्ट्वा तपोभिस्तप एव च॥३३॥
त्रेतायां तु समस्ता ये प्रादुरासन् महाबलाः। संयन्तारः स्थावराणां जङ्गमानां च सर्वशः॥३४॥
त्रेतायांसंहता वेदा यज्ञा वर्णाश्रमस्तथा। संरोधादायुषस्त्वेते भ्रश्यन्ते द्वापरे युगे॥३५॥
दृश्यन्ते न च दृश्यन्ते वेदाः कलियुगे ऽखिलाः। उत्सीदन्ते सयज्ञाश्च केवलाधर्मपीड़िताः॥३६॥
पुराणों के अनुसार युगादि तिथियां हैं-सत्य युग-कार्त्तिक शुक्ल नवमी, त्रेता-वैशाख शुक्ल तृतीया, द्वापर-माघ पूर्णिमा, कलि-भाद्र कृष्ण त्रयोदशी।
वर्तमान कलियुग का आरम्भ १७-२-३१०२ ई.पू. उज्जैन अर्धरात्रि से मानते हैं जब सूर्य-चन्द्र एक मेष के शून्य अंश पर थे, अर्थात् उसके बाद सूर्योदय से चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का आरम्भ हुआ। (स्पष्ट ग्रह के अनुसार २ दिन बाद) त्रेता में यज्ञ प्रमुख है। सभी यज्ञों का मूल कृषि यज्ञ है जिस पर मानव सभ्यता निर्भर है। इसी शब्दावली में यज्ञ की परिभाषा गीता में है-
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्न सम्भवः। यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥ (गीता, ३/१४)
अक्षय तृतीया से इस कृषि यज्ञ का आरम्भ होता है, अतः यही तिथि वास्तविक त्रेता का आरम्भ है। युगादि तथा मन्वन्तर तिथियों के आरम्भ के उद्धरण नीचे दिये जाते हैं।
अग्नि पुराण, अध्याय २०९-
नवम्यां शुक्ल पक्षस्य कार्त्तिके निरगात् कृतम्। त्रेतासित तृतीयायां वैशाखे द्वापरं युगम्॥१४॥
दर्शे तु माघ मासस्य त्रयोदश्यां नभस्यके। कृष्णे कलिं विजानीयाज्ज्ञेया मन्वन्तरादयः॥१५॥
मत्स्य पुराण, अध्याय १७-
वैशाखस्य तृतीया या नवमी कार्त्तिकस्य च। पञ्चदशी च माघस्य नभस्ये च त्रयोदशी॥४॥
युगादयः स्मृता ह्येता दत्तस्याक्षयकारिका। तथा मन्वन्तरादौ च देयं श्राद्धं विजानता॥५॥
अश्वयुक् शुक्ल नवमी द्वादशी कार्त्तिके तथा। तृतीया चैत्रमासस्य तथा भाद्रपदस्य च॥६॥
फाल्गुनस्य ह्यमावास्या पौषस्यैकादशी तथा। आषाढस्यापि दशमी माघमासस्य सप्तमी॥७॥
श्रावणस्याष्टमी कृष्णा तथाषाढी च पूर्णिमा। कार्तिकी फाल्गुनी चैत्री ज्येष्ठपञ्चदशी सिता।
मन्वन्तरादयश्चैता दत्तस्याक्षयकारिका॥८॥
= वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया), कार्तिक शुक्ल नवमी (अक्षय नवमी), माघ पूर्णिमा, भाद्र शुक्ल त्रयोदशी-ये युगादि तिथियां हैं। इनमें किया गया श्राद्ध अक्षय फल देता है।
आश्विन शुक्ल नवमी, कार्तिक शुक्ल द्वादशी, चैत्र शुक्ल तृतीया, भाद्र शुक्ल तृतीया, फाल्गुन अमावास्या, पौष शुल एकादशी, आषाढ शुक्ल दशमी, माघ शुक्ल सप्तमी, श्रावण कृष्णाष्टमी, आषाढ पूर्णिमा, कार्तिक, फाल्गुन, चैत्र, ज्येष्ठ की पूर्णिमा-ये १४ मन्वन्तरों की आदि तिथियां हैं।
स्कन्द पुराण, माहेश्वर खण्ड, कौमारिका खण्ड, अध्याय ५-
नवमी कार्तिके शुक्ला कृतादिः परिकीर्तिता॥।१२१॥
वैशाखस्य तृतीयाया शुक्ला त्रेतादिरुच्यते। माघे पञ्चदशी नाम द्वापरादि स्मृता बुधैः॥१२२॥
त्रयोदशी नभस्ये च कृष्णा सा हि कलेः स्मृता।
(२) गङ्गा अवतरण-गंगा के अवतरण या जन्म की कई तिथियां हैं। स्वर्ग से भूमि पर गङ्गा का अवतरण ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को हुआ, अर्थात् हरिद्वार से निकली। हिमालय क्षेत्र स्वर्ग है। जह्नु से जन्म हुआ वैशाख शुक्ल सप्तमी को, इसे दशहरा इसलिए कहते हैं कि इस दिन गङ्गा स्नान १० पापों को हरता है। उससे पहले कैलास पर्वत से अक्षय तृतीया को निकली।
नारद पुराण (२/४०/२१)-गंगा अवतरण का काल-
ज्येष्ठे मासि क्षितिसुतदिने शुक्लपक्षे दशम्यां हस्ते शैलादवतरदसौ जाह्नवी मर्त्यलोकम्।
पापान्यस्यां हरति हि तिथौ सा दशैषाद्यगङ्गा पुण्यं दद्यादपि शतगुणं वाजिमेधक्रतोश्च ॥
नारद पुराण (१/११९/७-९)-ज्येष्ठ शुक्ल दशमी, दशहरा लग्न हेतु दश योग, दस पाप हरण से दशहरा नाम, जाह्नवी में स्नान का महत्त्व-
ज्येष्ठे शुक्लदशम्यां तु जाह्नवी सरितां वरा। समायाता धरां स्वर्गात्तस्मात्सा पुण्यदा स्मृता॥७॥
ज्येष्ठः शुक्लदलं हस्तो बुधश्च दशमी तिथिः। गरानन्दव्यतीपाताः कन्येंदुवृषभास्कराः॥८॥
दशयोगः समाख्यातो महापुण्यतमो द्विज। हरते दश पापानि तस्माद्दशहरः स्मृतः॥९॥
पद्म पुराण, खण्ड ५ (पाताल खण्ड), अध्याय ८५- जह्नु से जन्म-
वैशाख शुक्ल सप्तम्यां जाह्नवी जह्नुना पुरा। क्रोधात्पीता पुनस्त्यक्ता कर्णरंध्रात्तु दक्षिणात्॥४९॥
नारद पुराण (१/११६/११)-
वैशाखशुक्लसप्तम्यां जह्नुना जाह्नवी स्वयम्। क्रोधात्पीता पुनस्त्यक्ता कर्णरंध्रात्तु दक्षिणात्॥११॥
वैशाखशुक्लपक्षे तु तृतीयायां जनार्दनः। यवानुत्पादयामास युगं चारब्धवान् कृतम्। ब्रह्मलोकात्त्रिपथगां पृथिव्यामवातारयत्॥ ब्रह्मपुराणम् (वाचस्पत्यम् तथा शब्द कल्पद्रुम में गङ्गा शब्द के अर्थ में)
यहां अक्षय तृतीया से यव उत्पादन तथा कृषि आरम्भ का संकेत है। इस दिन ब्रह्मलोक से पृथ्वी पर अर्थात् कैलास पर्वत पर गंगा आयी।
(३) परशुराम जयन्ती-निर्णय सिन्धु, द्वितीय परिच्छेद के वैशाख मास वर्णन में भार्गवार्चन दीपिका को उद्धृत कर कहा है कि स्कन्द पुराण तथा भविष्य पुराण में परशुराम जन्म तिथि दी गयी है। स्कन्द पुराण में परशुराम जन्म के विषय में अध्याय (६.१६६) में उल्लेख है। वहां संक्षेप में उनके पिता जमदग्नि के जन्म समय का उल्लेख श्लोक ४४ में है, पर उसके बाद परशुराम जन्म की ग्रह स्थिति या तिथि का वर्णन नहीं है। सम्भवतः यह कमलाकर भट्ट के समय के स्कन्द पुराण में था।
स्कन्द पुराण-वैशाखस्य सिते पक्षे तृतीयायां पुनर्वसौ। निशायाः प्रथमे यामे रामाख्यः समये हरिः। स्वोच्चगैः षड्ग्रहैर्युक्ते मिथुने राहु संस्थिते। रेणुकायास्तु यो गर्भादवतीर्णो हरिः स्वयम्॥
भविष्य पुराण-शुक्ला तृतीया वैशाखे शुद्धोपोष्या दिनद्वये। निशायाः पूर्वयामे चेदुत्तरान्यत्र पूर्विका॥
लक्ष्मीनारायण संहिता (१/२६८)-
वैशाखस्य सिते पक्षे तृतीयायां पुनर्वसौ। जमदग्नि गृहे प्रादुरासीत् परशुधृक् हरिः॥२२॥
यहां समस्या है कि वैशाख शुक्ल ३ को पुनर्वसु नक्षत्र सम्भव है या नहीं। तृतीया के दिन सूर्य चन्द्र का अन्तर ३६ अंश से कम होगा। शुक्ल प्रतिपदा से अमावास्या के बीच सूर्य का वृष राशि में प्रवेश होना चाहिये अर्थात् ३० अंश पर होना चाहिये। यदि प्रतिपदा दिन ही वृष संक्रान्ति है तो उस दिन चन्द्र ४२ अंश तक होना चाहिये। तृतीया अन्त तक सूर्य ३३ अंश पर तथा चन्द्र ८२ अंश तक हो सकता है। ८० से ९००२०’ तक पुनर्वसु होने से तृतीया दिन रात्रि में जब गणित के अनुसार चतुर्थी का आधा भाग बीत चुका हो, पुनर्वसु नक्षत्र आरम्भ हो जायेगा।
माथुर चतुर्वेदी ब्राह्मणों के इतिहास-लेखक, श्रीबाल मुकुंद चतुर्वेदी के अनुसार भगवान परशुराम का जन्म ५१४२ वि.पू. वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन-रात्रि के प्रथम प्रहर में हुआ था। इनका जन्म समय सतयुग और त्रेता का संधिकाल माना जाता है। ५१४२ विक्रमपूर्व (५१९९ ई.पू.) वैशाख शुक्ल ३, सन्ध्या ८ बजे-लग्न तुला, सूर्य मेष १०अंश, चन्द्र-पुनर्वसु नक्षत्र, मंगल २९८ अंश, बुध १६५ अंश, गुरु ९५ अंश, शुक्र ३५७ अंश, शनि २०० अंश०। यहां बुध उच्च का नहीं हो सकता क्योंकि वह सूर्य से २७ अंश से अधिक दूर नहीं हो सकता। परशुराम के बाद कलम्ब वर्ष आरम्भ हुआ था जो केरल में आज भी प्रचलित है।
✍🏻अरुण उपाध्याय
