21 के पहले लिव-इन सुरक्षित नहीं, “मेरी मर्जी” काफी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Allahabad High Court Verdic: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. कोर्ट ने कहा कि  पुरुष की आयु 21 वर्ष से कम है, तो उसे कानूनी सुरक्षा नहीं मिल सकती.

21 की उम्र से पहले लिव-इन को नहीं देंगे प्रोटेक्शन, सिर्फ मर्जी काफी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

हिंदू लड़के की आयु 21 वर्ष से कम, तो लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी संरक्षण नहीं :इलाहाबाद हाईकोर्ट 
बिजनौर के अंतरधार्मिक युगल की याचिका में कोर्ट ने लड़के की आयु 19 वर्ष होने से दिया फैसला
कोर्ट ने कहा- शादी की विधिक आयु पूरी न होने पर आपसी सहमति के आधार पर रिश्ता वैध नहीं माना जाएगा

प्रयागराज 15 मई 2026। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक बहुत ही दो-टूक फैसला सुनाया है. कोर्ट ने साफ कह दिया है कि अगर किसी रिश्ते में लड़के की उम्र शादी के लिए तय कानूनी उम्र यानी 21 साल से कम है, तो ऐसे जोड़े को अदालत की तरफ से कोई सुरक्षा या संरक्षण नहीं दिया जा सकता. जस्टिस गरिमा प्रसाद की सिंगल बेंच ने बिजनौर के एक प्रेमी जोड़े की याचिका को खारिज करते हुए यह बात कही. बता दें कि यह मामला बिजनौर के एक अंतरधार्मिक जोड़े का था, जिसमें 20 साल की मुस्लिम लड़की और 19 साल का हिंदू लड़का साथ रह रहे थे. इन दोनों ने कोर्ट में अर्जी लगाकर सुरक्षा की मांग की थी. उनका कहना था कि वे अपनी मर्जी से साथ हैं, लेकिन लड़की के परिवार वाले उन्हें धमकियां दे रहे हैं और उनके रिश्ते के खिलाफ हैं. उन्होंने मांग की थी कि पुलिस उन्हें सुरक्षा दे और उनके परिवार को हस्तक्षेप से रोका जाए.

कोर्ट ने क्यों किया इनकार?

मामला सुनवाई के लिए आया, तो कोर्ट का ध्यान  लड़के की आयु पर गया. कानूनन शादी को लड़के की आयु 21 वर्ष होनी चाहिए, जबकि यहां लड़का अभी 19 वर्ष का ही था.

कोर्ट ने कठोर शब्दों में कहा कि जब कानून किसी को शादी के योग्य ही नहीं मानता, तो सिर्फ ‘आपसी सहमति’ के नाम पर ऐसे रिश्ते को विधिक सुरक्षा नहीं दी जा सकती.
कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि जैसे 18 वर्ष से कम आयु की लड़की की ‘सहमति’ का कोई विधिक अर्थ नहीं होता, वैसे ही 21 से कम आयु के लड़के के मामले में भी कानून दृष्टिविगत नहीं किया जा सकता.

आजादी है, लेकिन कानून से ऊपर नहीं
अदालत ने यह जरूर माना कि हर इंसान को अपनी मर्जी से जीने और अपनी पसंद का साथी चुनने की आजादी है, लेकिन इस आजादी का प्रयोग कानून कमजोर करने को नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने साफ किया कि उसकी शक्तियों का इस्तेमाल किसी अवैध स्थिति को वैध बनाने को नहीं होगा. अगर लड़के की आयु 21 वर्ष नहीं है, तो वह रिश्ता कानून की नजर में ‘मैच्योर’ नहीं माना जाएगा.

खतरा होने पर क्या करें?
भले ही कोर्ट ने इस रिश्ते को संरक्षण देने से मना कर दिया, लेकिन यह भी साफ किया कि अगर किसी को अपनी जान का डर है या कोई हिंसा होती है, तो वे मदद को पुलिस के पास जा सकते हैं. सुरक्षा का अधिकार हर नागरिक को है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि माता-पिता या कानून को अपनी उचित कार्रवाई करने से रोक दिया जाए. चूंकि इस मामले में न तो खतरे के कोई ठोस सबूत थे और न ही लड़के की आयु पूरी थी, इसलिए कोर्ट ने उनकी याचिका को सिरे से निरस्त कर दिया.

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