उप-राष्ट्रपति राधाकृष्णन ने खिंचाई संवेदनशीलता की फोटो
देहरादून में मंच से उतरकर उपराष्ट्रपति पहुंचे व्हीलचेयर पर बैठे प्रोफेसर के पास, जीत लिया दिल
उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने देहरादून की इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी में एक भावुक क्षण पैदा किया। उन्होंने प्रोटोकॉल तोड़कर व्हीलचेयर पर बैठे प्रोफेसर प्रशांत ढांडा के पास जाकर उनके साथ तस्वीर खिंचवाई, जिससे सभी का दिल जीत लिया।
सरल हृदय की तस्वीर: उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन खुद मंच से उतरे और व्हीलचेयर पर बैठे आइजीएनएफए के अपर प्रोफेसर प्रशांत ढांडा के साथ खिंचवाई तस्वीर। जागरण
सरल हृदय की तस्वीर: उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन खुद मंच से उतरे और व्हीलचेयर पर बैठे आइजीएनएफए के अपर प्रोफेसर प्रशांत ढांडा के साथ खिंचवाई तस्वीर। जागरण
उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन का देहरादून दौरा।
व्हीलचेयर पर बैठे प्रोफेसर से मिले उपराष्ट्रपति।
प्रोटोकॉल तोड़कर मानवीय संवेदनशीलता का प्रदर्शन।
देहरादून। राजकीय कार्यक्रमों की औपचारिकता, व्यस्त कार्यक्रम और प्रोटोकाल के बीच कुछ पल ऐसे भी होते हैं, जो पूरे आयोजन की सबसे खूबसूरत याद बन जाते हैं। देहरादून स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी (आइजीएनएफए) में प्रशिक्षु आइएफएस अधिकारियों को संबोधित करने के कार्यक्रम में बुधवार को भी ऐसा ही एक भावुक और आत्मीय क्षण देखने को मिला, जब उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने प्रोटोकाल से आगे बढ़कर इंसानी संवेदना को महत्व दिया।
संबोधन कार्यक्रम समाप्त होने के बाद शाम करीब पांच बजे प्रशिक्षु भारतीय वन सेवा (आईएफएस) अधिकारियों और अकादमी के फैकल्टी सदस्यों के साथ उपराष्ट्रपति की ग्रुप फोटो प्रस्तावित थी। इसी बीच बारिश शुरू हो गई। उपराष्ट्रपति का कार्यक्रम पहले से ही बेहद व्यस्त था, लिहाजा वर्षा के कारण ग्रुप फोटो का कार्यक्रम टालने पर विचार हुआ।
लेकिन उपराष्ट्रपति ने खुद कहा कि ग्रुप फोटो केवल एक तस्वीर नहीं, बल्कि जीवनभर याद रहने वाला क्षण होता है। इसे टाला नहीं जाना चाहिए। इसके बाद तय हुआ कि खुले में फोटो लेने के बजाय आडिटोरियम में यह यादगार पल दर्ज किया जाएगा।
प्रशिक्षु आइएफएस अधिकारियों, अन्य प्रशिक्षणार्थियों और फैकल्टी सदस्यों को मिलाकर करीब 200 लोग थे। सभी के साथ एक साथ फोटो लेना संभव नहीं था, इसलिए अलग-अलग बैच में फोटो खिंचवाने का सिलसिला शुरू हुआ। उपराष्ट्रपति ने करीब आधे घंटे तक धैर्यपूर्वक सभी के साथ तस्वीरें खिंचवाईं।
लेकिन इस पूरे सिलसिले में एक तस्वीर ऐसी बनी, जिसने कार्यक्रम की बाकी तस्वीरों को पीछे छोड़ दिया।
फोटो सेशन के दौरान उपराष्ट्रपति की नजर मंच के नीचे व्हीलचेयर पर बैठे एक व्यक्ति पर पड़ी। वह मंच पर नहीं आ सके थे। उपराष्ट्रपति ने उनके बारे में पूछा तो पता चला कि वह आइजीएनएफए के अपर प्रोफेसर प्रशांत ढांडा हैं। कुछ वर्ष पहले एक दुर्घटना के बाद से वह खड़े होने में असमर्थ हैं।
इतना सुनते ही उपराष्ट्रपति ने बिना किसी औपचारिकता के खुद मंच से नीचे उतरने का फैसला किया। वह व्हीलचेयर पर बैठे प्रशांत ढांडा के पास पहुंचे और उनके साथ अलग से फोटो खिंचवाई।
यह महज एक तस्वीर नहीं थी। यह उस संवेदनशीलता की तस्वीर थी, जिसमें पद की ऊंचाई से कहीं ज्यादा महत्व इंसान को दिया गया। करीब 200 लोगों के साथ खिंचवाई गई तस्वीरों के बीच शायद यही तस्वीर सबसे ज्यादा याद की जाएगी। क्योंकि इसमें कैमरे के सामने सिर्फ दो व्यक्ति नहीं थे, बल्कि सम्मान, संवेदना और आत्मीयता का एक बेहद खूबसूरत भाव दर्ज हुआ।
उपराष्ट्रपति का यह सहज व्यवहार वहां मौजूद लोगों के लिए भी भावुक कर देने वाला क्षण बन गया। कभी-कभी किसी बड़े पद पर बैठे व्यक्ति की सबसे बड़ी पहचान उसका पद नहीं, बल्कि उसका सरल हृदय होता है।
*वन अधिकारी केवल प्रशासनिक अधिकारी नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रहरी हैं: मुख्यमंत्री*
*इकोलॉजी और इकोनॉमी के बीच संतुलन बनाते हुए विकास को आगे बढ़ाना सरकार की प्राथमिकता*
मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने आज देहरादून में भारतीय वन सेवा के परिवीक्षार्थियों के साथ आयोजित संवाद कार्यक्रम में भारत के उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन एवं उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (से.नि.) गुरमीत सिंह की गरिमामयी उपस्थिति में प्रतिभाग किया। कार्यक्रम में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी, देहरादून के निदेशक डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद खजुरिया, कोर्स निदेशक श्रीमती अजीता लौंगजाम सहित भारतीय वन सेवा के वरिष्ठ अधिकारी एवं परिवीक्षार्थी उपस्थित रहे।
मुख्यमंत्री ने उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन का देवभूमि उत्तराखंड की पावन धरती पर हार्दिक स्वागत एवं अभिनंदन करते हुए कहा कि उनका सार्वजनिक जीवन सादगी, समर्पण, परिश्रम और राष्ट्रसेवा की भावना का प्रेरणादायी उदाहरण है। उन्होंने कहा कि जमीनी स्तर से सार्वजनिक जीवन की शुरुआत कर देश के द्वितीय सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचने की उपराष्ट्रपति जी की यात्रा युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है। राज्यसभा के सभापति के रूप में भी उन्होंने संसदीय परंपराओं और लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
मुख्यमंत्री ने भारतीय वन सेवा में चयनित सभी परिवीक्षार्थियों को बधाई एवं शुभकामनाएं देते हुए कहा कि वन सेवा देश की प्राकृतिक विरासत, जैव विविधता और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड का लगभग 70 प्रतिशत भू-भाग वनों से आच्छादित है और यहां के पर्वत, नदियां, वन एवं समृद्ध जैव विविधता प्रदेश की विशिष्ट पहचान हैं। ऐसे में वनों का संरक्षण केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य से जुड़ा दायित्व भी है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि जलवायु परिवर्तन की वैश्विक चुनौती के दौर में वन अधिकारियों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। उन्होंने परिवीक्षार्थियों का आह्वान किया कि वे आधुनिक तकनीक एवं प्रशासनिक दक्षता का उपयोग करते हुए वन संरक्षण के साथ-साथ वन क्षेत्रों में रहने वाले स्थानीय समुदायों के हितों को भी प्राथमिकता दें। उन्होंने कहा कि वन अधिकारी केवल प्रशासनिक अधिकारी नहीं, बल्कि ‘प्रकृति के प्रहरी’ हैं और उन्हें अपने अधिकारों के साथ अपनी जिम्मेदारियों तथा अपने ज्ञान के साथ संवेदनशीलता को भी सर्वोच्च स्थान देना चाहिए।
मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश ‘विकसित भारत’ के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है और विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी समान महत्व दिया जा रहा है। ‘मिशन LiFE’ और ‘एक पेड़ माँ के नाम’ जैसे अभियानों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण को जनभागीदारी से जोड़ा गया है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड सरकार भी पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन स्थापित करते हुए कार्य कर रही है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में देश के सबसे बड़े अतिक्रमण विरोधी अभियानों में से एक के माध्यम से लगभग 13 हजार एकड़ वन भूमि को अवैध कब्जों से मुक्त कराया गया है। उत्तराखंड देश का पहला राज्य है, जहां समर्पित फॉरेस्ट ड्रोन फोर्स का गठन किया गया है। चारधाम यात्रा मार्ग पर डिजिटल डिपॉजिट रिफंड सिस्टम लागू किया गया है, जिसे शीघ्र ही प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में भी विस्तार दिया जाएगा।
उन्होंने कहा कि सरकार ने यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि विकास परियोजनाएं पर्यावरण की कीमत पर न हों। राजाजी टाइगर रिजर्व से होकर गुजरने वाले दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे पर लगभग 12 किलोमीटर लंबे एलिवेटेड वन्यजीव कॉरिडोर का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह परियोजना आधुनिक बुनियादी ढांचे और वन्यजीव संरक्षण के बीच संतुलन का प्रभावी उदाहरण है।
मुख्यमंत्री ने बताया कि वन उपज के परिवहन को सुगम बनाने के लिए राज्य में नेशनल ट्रांजिट पास सिस्टम लागू किया गया है। मानव-वन्यजीव संघर्ष में होने वाली जनहानि के मामलों में अनुग्रह राशि बढ़ाकर 10 लाख रुपये की गई है। वन पंचायतों को सशक्त बनाने के लिए उत्तराखंड वन पंचायती नियमावली में आवश्यक संशोधन किए गए हैं। साथ ही, वनाग्नि से निपटने वाले फायर वॉचर्स के लिए जीवन बीमा की व्यवस्था तथा पिरुल एकत्रीकरण के माध्यम से ग्रामीणों के लिए रोजगार के अवसर भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए बायोफेंसिंग, त्वरित प्रतिक्रिया दल तथा 24 घंटे सक्रिय वन्यजीव हेल्पलाइन 1926 जैसी व्यवस्थाओं को भी मजबूत किया गया है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार का उद्देश्य वन संरक्षण के साथ-साथ इकोलॉजी और इकोनॉमी के बीच ऐसा संतुलन स्थापित करना है, जिसमें प्रकृति और वन्यजीव सुरक्षित रहें तथा वनों पर निर्भर स्थानीय समुदायों की आजीविका और समृद्धि भी सुनिश्चित हो। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भारतीय वन सेवा के युवा अधिकारी भी इसी संतुलित दृष्टिकोण को अपनी कार्यशैली का हिस्सा बनाकर देश की प्राकृतिक धरोहर के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान देंगे।
मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘विकल्प रहित संकल्प’ के अनुरूप देश में वनों और पर्यावरण के व्यापक संरक्षण के प्रयासों को आगे बढ़ाने में युवा वन अधिकारियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने सभी परिवीक्षार्थियों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए कहा कि वे जहां भी अपनी सेवाएं दें, राष्ट्रहित, पर्यावरण संरक्षण और जनकल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता दें।


