भारत में चीनी उत्पादन जितनी ही खपत, त्यौहारों में 10साल बाद आयात
चीनी क्यों हुई महंगी? जितना उत्पादन, उतनी ही खपत… फिर क्या ये खेल!
दुनिया में भारत चीनी का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, लेकिन एक दिक्कत ये है कि भारत में ही लगभग सभी उत्पादन की चीनी खपत हो जाती है. वहीं अब एक छोटी मात्रा इथेनॉल में भी यूज की जा रही है.
इथेनॉल ने बढ़ाए चीनी के दाम?
नई दिल्ली,21 अगस्त 2026,केंद्र सरकार ने बड़ा फैसला लेते हुए 31 अक्टूबर 2026 तक बिना किसी ड्यूटी 10 लाख टन कच्ची चीनी आयात को मंजूरी दी है. चीनी की बढ़ती कीमतें काबू करने को त्योहारी सीजन से पहले ये कदम उठाया गया है. जबकि आलोचकों का कहना है कि इथेनॉल निर्माण से चीनी की कमी हुई है, जिससे चीनी की कीमतें बढ़ी हैं और अब आयात हो रहा है.
चीनी को लेकर राजनीति के जोर पकड़ने से ज्यादातर लोग जानना चाहते हैं कि भारत आखिरी चीनी का उत्पादन कितना करता है, आयात कितना होता है और भारत में इसकी खपत कितनी है । ये रहे सभी आंकड़े
भारत में चीनी का बड़ा उत्पादक
भारत में चीनी का बड़े लेवल पर उत्पादन होता है. यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक देश है. महाराष्ट्र से लेकर उत्तर प्रदेश तक बड़ी मात्रा में शुगर का उत्पादन करते हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत में हर साल एवरेज 300 से 350 लाख मीट्रिक टन (300 से 350 लाख टन) कुल चीनी उत्पादन होता है.
भारत में हर साल चीनी का उत्पादन और इथेनॉल में यूज
इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन और वाणिज्य मंत्रालय के ताजा आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, साल 2023-240 में 340 लाख टन चीनी आयात हुआ था, जिसमें से 22 लाख टन इथेनॉल को यूज किया गया था.
इसी तरह, साल 2024-25 में 297 लाख टन चीनी उत्पादन किया गया था, 17 लाख टन इथेनॉल में डॉयवर्ट किया गया था. वहीं साल 2025-26 में अभी तक 324 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है और 31 लाख टन तक इथेनॉल में यूज किया गया है. ऐसे में देखा जाए तो चीनी उत्पादन का बहुत कम हिस्सा इथेनॉल में यूज किया जा रहा है.
कितना होता है खपत?
भारत एक बड़े लेवल पर चीनी का उत्पादन करता है, लेकिन लगभग उतना ही खपत भी खुद ही कर लेता है. जिस कारण कई बार चीनी का उत्पादन कम होने से उसे दूसरे देशों से आयात करना पड़ता है. भारत में हर साल चीनी की घरेलू खपत लगभग 280 से 285 लाख टन है. वर्तमान सीजन (2025-26) में शुद्ध उत्पादन (279 लाख टन) खपत से मामूली रूप से कम रहने से ही सरकार को आपातकालीन आयात का फैसला लेना पड़ा है.
गन्ना क्षेत्रफल कितना ?
चालू सीजन में भारत लगभग 57.4 लाख हेक्टेयर भूमि पर गन्ने की खेती की है. जिसमें से सबसे ज्यादा गन्ने की खेती उत्तर प्रदेश में हुई है . इसके बाद महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रदेश आते हैं. इन तीनों जगहों को मिला दिया जाए तो भारत का 80 प्रतिशत चीनी का उत्पादन यहीं से होता है.
पिछले 10 साल नहीं हुआ चीनी का आयात
भारत दूसरे देश से चीनी आयात करने पर 100 % ड्यूटी लगाता है, जिससे चीनी आयात ‘शून्य’ हो जाता है. पिछले 10 सालों से भारत ने चीनी का आयात नहीं किया था. उद्योग के आंकड़ों के अनुसार, आखिरी बार साल 2016-17 में चीनी की कीमतों में तेजी के कारण आयात करना पड़ा था, क्योंकि उस साल देश में सूखा पड़ा था और गन्ना उत्पादन बहुत कम हो गया था.
कितनी चीनी निर्यात करता है भारत?
भारत चीनी निर्यात बहुत कम करता है. भारत सरकार ने 2025-26 मार्केटिंग सीजन को 20 लाख टन (2 मिलियन टन) चीनी के निर्यात की अनुमति दी है. यह चीनी प्रमुख तौर पर अफ्रीकी और एशियाई देशों जैसे सोमालिया, सूडान और जिबूती को भेजी जाएगी.
चीनी की कीमत
शुगर की कीमतों में बड़ी तेजी देखने को मिली है. 20 अगस्त तक महाराष्ट्र में चीनी की अधिकतम कीमत 4850 / क्विंटल थी. वहीं असम की मंडी में चीनी की कीमत सबसे ज्यादा 5600 रुपये प्रति क्विंटल रही. जयपुर की मंड़ी में चीनी की कीमत 4475 रुपये प्रति क्विंटल रही. ऐसे में देखा जाए तो चीनी की कीमत पिछले एक महीने में 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ चुकी है.
इथेनॉल से क्या भारत में बढ़ रही है चीनी की क़ीमत
चीनी की बढ़ती क़ीमतों को इथेनॉल को भी ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है
भारत में चीनी के दाम पिछले कुछ महीनों से तेज़ी से बढ़ रहे हैं. समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, केवल इसी महीने भारत में चीनी की क़ीमतों में 20 % की बढ़ोतरी हुई है.
भारत सरकार के उपभोक्ता मामलों के विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार, 20 अगस्त को खुदरा बाज़ार में चीनी की क़ीमत 55.7 रुपए प्रति किलोग्राम थी.
इसी रिपोर्ट के मुताबिक़, एक महीने पहले चीनी की क़ीमत 48.18 रुपये प्रति किलोग्राम थी. 20 अगस्त, 2025 को इसकी क़ीमत 46.3 रुपए प्रति किलोग्राम थी.
बाज़ार के जानकारों का कहना है कि चीनी के दाम इससे पहले कभी इतने ऊंचे नहीं गए. उनका कहना है कि अल नीनो के प्रभाव से मॉनसून कमज़ोर रहा और इससे भी चीनी की क़ीमतें प्रभावित हुई हैं.
हालांकि, केंद्र सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, देश में गन्ने की बुआई पिछले साल के लगभग बराबर ही हुई है. यह पांच वर्षों के औसत बुआई से क़रीब चार लाख हेक्टेयर ज़्यादा है.
जन्माष्टमी से शुरू होने वाला त्योहारों का मौसम क़रीब आ रहा है. ऐसे में चीनी की बढ़ती क़ीमतों पर क़ाबू पाने के लिए सरकार ने चीनी के निर्यात पर रोक लगा दी है. साथ ही, थोक व्यापारियों के पास चीनी का कितना स्टॉक हो सकता है, इस पर स्टॉक लिमिट भी लगा दी गई है.
चीनी के दाम क्यों बढ़ रहे हैं?
दुनिया में चीनी उत्पादन के मामले में ब्राज़ील के बाद भारत दूसरे नंबर पर है. भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार, देश में गन्ने के रस से चीनी बनाने वाली कुल 703 मिलें हैं. इनमें 335 प्राइवेट, 325 सहकारी और 43 सरकारी चीनी मिलें हैं.
भारत में चीनी का उत्पादन वर्ष अक्तूबर से शुरू होकर अगले साल सितंबर में समाप्त होता है. चीनी मिलों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था नेशनल फेडरेशन ऑफ को-ऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज लिमिटेड के उपाध्यक्ष केतन पटेल का कहना है कि 2025-26 के चीनी वर्ष में देश में चीनी उत्पादन 3.2 करोड़ टन (32 अरब किलोग्राम) रहने का अनुमान था, लेकिन वास्तव में यह क़रीब 3 करोड़ टन (30 अरब किलोग्राम) ही रहा।
उन्होंने कहा, कि”पिछले साल बारिश ज़्यादा हुई थी, जिसका गन्ने की फसल पर प्रतिकूल असर पड़ा. इसी तरह अधिक उत्पादन देने वाली सीओ-0238 नाम की गन्ने की किस्म में उत्तर प्रदेश में गेरुआ रोग फैल गया.”
”इन दोनों कारणों से गन्ने का उत्पादन और शुगर रिकवरी रेट यानी 100 किलोग्राम गन्ने से मिलने वाली चीनी का प्रतिशत 12 किलोग्राम से नीचे आ गया. इसलिए चीनी का उत्पादन अनुमान से कम रहा.”
केतन पटेल ने बताया कि भारत में चीनी की खपत 2.6 करोड़ टन से 2.8 करोड़ टन के बीच रहती है और आम तौर पर साल के अंत में 60 से 70 लाख टन चीनी एंडिंग स्टॉक यानी बचा हुआ भंडार के रूप में रह जाती है.
उन्होंने बताया, “2024-25 के साल के अंत में एंडिंग स्टॉक केवल 50 से 50.5 लाख टन था. इस तरह 2025-26 की शुरुआत कम ओपनिंग स्टॉक यानी शुरुआती भंडार से हुई और फिर उत्पादन भी अनुमान से थोड़ा कम रहा. कमज़ोर मॉनसून चीनी के उत्पादन को प्रभावित करने वाला अकेला कारण नहीं है.”
”फिर भी ऐसा लगता है कि लोग पैनिक बाइंग यानी क़ीमतें और बढ़ने की आशंका में तेज़ी से ख़रीदारी कर रहे हैं. एक तरफ़ उपलब्ध स्टॉक थोड़ा कम है, त्योहारों का मौसम है और बारिश को लेकर चिंता है. दूसरी तरफ मांग ज़्यादा है. नतीजतन क़ीमतें बढ़ गई हैं.”
इस बार भारत में मॉनसून भी कमज़ोर रहा है
क्या चीनी की कमी है?
भारत में प्राइवेट चीनी मिलों के संगठन इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (आईएसएमए) की वेबसाइट के अनुसार, भारत में कपड़ा उद्योग के बाद गन्ना आधारित उद्योग देश का दूसरा सबसे बड़ा कृषि आधारित उद्योग है.
आईएसएमए के अनुसार, भारत में हर साल 55 -60 लाख हेक्टेयर में गन्ने की खेती होती है. औसतन 45 करोड़ टन गन्ना उत्पादन होता है और इससे पांच करोड़ लोगों को रोज़गार मिलता है.
चीनी की मौजूदा स्थिति को लेकर सरकार क्या मानती है, यह जानने को हमने केंद्र सरकार के उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग की राज्य मंत्री निमुबेन बंभाणिया से फोन और मैसेज से संपर्क करने की कोशिश की. हालांकि, उनकी ओर से तत्काल कोई जवाब नहीं मिला.
लेकिन 28 जुलाई को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में केंद्र सरकार ने दावा किया था कि देश में चीनी की कोई कमी नहीं है. प्रेस विज्ञप्ति में सरकार ने कहा था, “सरकार के संज्ञान में आया है कि हाल में मिलों के गेट पर चीनी की क़ीमतों में हुई बढ़ोतरी मौजूदा मांग और आपूर्ति की स्थिति के अनुरूप नहीं है.”
”यह भी सामने आया है कि कुछ व्यापारियों, डीलरों और बिचौलियों की जमाखोरी, सट्टेबाजी और मिलों से चीनी की वास्तविक आवाजाही किए बिना कागजों पर किए जाने वाले कारोबार ने बाज़ार में कमी की कृत्रिम तस्वीर बनाने में भूमिका निभाई है. इस तरह के लेनदेन के कारण क़ीमतों में टाली जा सकने वाली अस्थिरता पैदा हुई है और मिलों के गेट के साथ खुदरा बाज़ार में चीनी की क़ीमतें बढ़ी हैं.”
सरकार ने अपनी प्रेस विज्ञप्ति में कहा, “सरकार उपभोक्ताओं को भरोसा दिलाती है कि देश की घरेलू खपत को ज़रूरी चीनी का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है।
चीनी के दाम कब घटेंगे?
केतन पटेल का कहना है कि जुलाई, अगस्त और सितंबर को चीनी उत्पादन का ऑफ सीजन माना जाता है और यह अवधि त्योहारों के समय आती है. इसलिए हर साल इस दौरान बाज़ार में चीनी की क़ीमतें बढ़ती है.
उन्होंने कहा कि, “अभी भले ही क़ीमतें 50 रुपये से ऊपर हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि सीजन में सामान्यत: क़ीमतें 38 से 42 रुपये के बीच रही हैं. उस क़ीमत पर मिलें किसानों को फेयर एंड रिम्यूनरेटिव प्राइस यानी एफ़आरपी भी समय पर नहीं दे पातीं.”
”इसी से कुछ किसान गन्ने की जगह दूसरी फसलों की ओर चले गए हैं, जिनसे तीन या छह महीने में रिटर्न मिल जाता है. बाज़ार भाव बढ़ने का मिलों को फ़ायदा यह है कि उनका स्टॉक बिक जाएगा और वे किसानों को समय पर एफ़आरपी का भुगतान कर पाएंगी.”
उन्होंने आगे कहा,कि “अक्तूबर से नई चीनी बाज़ार में आएगी, इसलिए क़ीमतों में गिरावट देखने को मिलेगी.”
हालांकि, सुरेंद्रनगर के चीनी के प्रमुख व्यापारी धनराज कैला ने कहा, कि “फ़िलहाल बाजार में चीनी की कमी भी नहीं है और बहुत ज़्यादा स्टॉक भी नहीं है. स्थिति हैंड-टू-माउथ यानी ऐसी है कि बाज़ार में जितनी चीनी आ रही है, वह तुरंत बिक जा रही है. इसका कारण यह है कि दुनिया में भी चीनी का स्टॉक कम है. दूसरी ओर, 30 लाख टन चीनी को इथेनॉल बनाने को डायवर्ट की गयी और काफ़ी मात्रा में चीनी का निर्यात भी हुआ है.”
उन्होंने कहा, कि”जब देश में चीनी के डेढ़ अरब उपभोक्ता हों और एक-दो साल सूखा पड़ जाए, तो इथेनॉल ब्लेंडिंग जैसे कार्यक्रम जोखिम भरे हो जाते हैं. लोगों में डर बैठ गया है कि अल नीनो से बारिश नहीं होगी और चीनी और महंगी होगी. नतीजा यह है कि जो लोग पांच किलो चीनी ख़रीदते थे, वे अब 50 किलो ख़रीद रहे हैं और जो 50 किलो ख़रीदते थे, वे अब 100 किलो मांग रहे हैं.”
लोगों में डर बैठ गया है कि अल नीनो के कारण बारिश नहीं होगी और चीनी और महंगी होगी
क्या पेट्रोल में मिलाए जाने वाले इथेनॉल की वजह से चीनी महंगी हुई है?
कच्चे तेल की खपत के मामले में अमेरिका और चीन के बाद भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर है. लेकिन भारत में इस्तेमाल होने वाले कच्चे तेल का 80 % से ज़्यादा हिस्सा विदेशों से आयात किया जाता है.
इस आयात को घटाने, विदेशी मुद्रा बचाने, आत्मनिर्भरता बढ़ाने और प्रदूषण कम करने को केंद्र सरकार ने 2018 में पेट्रोल में मिलाए जाने वाले इथेनॉल की मात्रा 10 % से बढ़ाकर 20 % करने का फ़ैसला किया था. यह लक्ष्य 2030 में हासिल होना था, लेकिन सरकार ने इसे जुलाई 2025 में ही हासिल कर लिया.
भारत में चीनी उद्योग सरकारी नियंत्रण में आता है. चीनी मिलों को किसानों से ख़रीदे गए गन्ने को कितना एफ़आरपी देना होगा, यह केंद्र सरकार तय करती है. सरकार यह भी तय करती है कि कौन-सी चीनी मिल हर महीने कितनी चीनी बेच सकती है और चीनी का निर्यात किया जा सकता है या नहीं.
देश में बड़े पैमाने पर इथेनॉल की ग्राहक भी सरकार ही है और इस तरह इथेनॉल की क़ीमत भी अप्रत्यक्ष रूप से सरकार ही तय करती है.
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2025-26 के चीनी वर्ष में 30 लाख टन चीनी का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने को किया गया. रिपोर्ट के अनुसार, यह देश में चीनी के कुल उत्पादन का क़रीब 10% है.
गन्ने के रस के अलावा चीनी बनाते तैयार होने वाले सिरप, ए-हेवी मोलासिस, बी-हेवी मोलासिस और सी-हेवी मोलासिस से भी इथेनॉल बनाया जा सकता है. एक रिपोर्ट के अनुसार, देश में उत्पादित कुल इथेनॉल का एक-तिहाई हिस्सा गन्ने से तैयार किया गया.
एक बड़ी चीनी मिल के वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा,कि “इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम है और यह चीनी मिलों को नक़दी उपलब्ध कराता है. लेकिन सरकार इस बात को लेकर स्पष्ट रही है कि चीनी का उत्पादन हमेशा पहली प्राथमिकता है.”
उन्होंने कहा, “यह आरोप लगाना आसान है कि सरकार ने इथेनॉल उत्पादन को चीनी को डायवर्ट होने से नहीं रोका. लेकिन यहाँ यह याद रखना ज़रूरी है कि चीनी उत्पादन के शुरुआती अनुमान काफ़ी ज़्यादा थे. समस्या यह है कि गन्ने और चीनी के उत्पादन का सटीक अनुमान लगाने को हमारे पास कोई सटीक तरीक़ा या तकनीक उपलब्ध नहीं है.”
उन्होंने कहा, “हमें यह भी याद रखना चाहिए कि हम चीनी के कितने बड़े बाजार की बात कर रहे हैं. इसलिए यह आरोप नहीं लगाया जा सकता कि इथेनॉल के उत्पादन को डायवर्ट की गई चीनी के कारण अब देश में चीनी की कमी पैदा हो गई है.”
Modi Govt Action: नहीं चलेगी जमाखोरी… चीनी पर सरकार का बड़ा एक्शन, लगा दी स्टॉक लिमिट
केंद्र सरकार ने चीनी कारोबारियों की स्टॉक लिमिट बदली है । इसे 30 दिन से घटाकर अब सिर्फ 15 दिन कर दिया है. चीनी की जमाखोरी रोकने को सरकार ने ये कदम उठाया है.
फेस्टिव सीजन से पहले मोदी सरकार ने चीनी की जमाखोरी पर लगाम लगाने को कमर कस तगड़ा एक्शन ले लिया है. चीनी स्टॉक को लेकर कठोरता से केंद्र ने लिमिट घटा दी है और साफ कहा है कि चीनी का सिर्फ 15 दिन का स्टॉक ही रखा जा सकता है. ये आदेश 1 सितंबर से लागू हो जाएगा. डीलर और कारोबारी महीने में 10 मीट्रिक टन से अधिक चीनी व्यापार करते हैं, वे अब नई लिमिट से ज्यादा स्टॉक जमा करके नहीं रख सकेंगें.
गौरतलब है कि सरकार ने पहली अगस्त को चीनी डीलरशिप को 30 दिनों की स्टॉक लिमिट सेट की थी । अब इसे घटा 15 दिन करने की घोषणा की है. त्योहारी सीजन और लगातार बढ़ती चीनी कीमतों को लेकर इसकी जमाखोरी रोकने को केंद्र सरकार एक्शन मोड में आ रही है. थोक खरीदारों की Sugar Stock Limit घटी है.
30 नवंबर तक लागू, असर कहां-कहां?
नई लिमिट के अनुसार, अब महीने में 10 मीट्रिक टन से ज्यादा चीनी इस्तेमाल करने वाले थोक व्यापारियों और डीलरशिप 15 दिन से ज्यादा का स्टॉक अपने पास नहीं रख सकेंगें. 1 सितंबर से लागू होकर ये नया नियम 30 नवंबर 2026 तक लागू रहेगा. इसके दायरे में कन्फेक्शनरी, सॉफ्ट ड्रिंक निर्माता, फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री, मिठाई विक्रेता शामिल हैं.
सरकार की रहेगी पैनी नजर
चीनी स्टॉक रखने की लिमिट में इस बदलाव के साथ ही सरकार की पैनी नजर व्यापारियों पर रहेगी और इनकी पहचान तमाम मानकों के आधार पर होगी. इनमें पिछले एक साल की औसत मासिक खपत के आधार पर पहचान होगी. तो वहीं चीनी मिलों से Bulk Consumers को सीधे या Dealers से होने वाली बिक्री की निगरानी भी होगी. जीएसटी रिटर्न (GST Returns) और चीनी के HSN Code के आधार पर बिक्री और खपत का वेरिफिकेशन होगा.
चीनी की कीमतों में रिकॉर्ड उछाल
त्योहारी सीजन से पहले उठाया गया केंद्र सरकार का यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है,क्योंकि अगस्त-नवंबर में चीनी की डिमांड में तेज वृद्धि होती है । हाल का ही डेटा देखें,तो Sugar Price रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा है.मात्र एक महीने में चीनी की रिटेल कीमत में 13-14 प्रतिशत की तेजी दिखी है.
चीनी स्टॉक की लिमिट को लेकर किए गए इस बदलाव पर सरकार का उद्देश्य चीनी की जमाखोरी रोकना, उपलब्धता बढ़ाना और कीमतें नियंत्रित रखना है. केंद्र और राज्य सरकार,केंद्र शासित प्रदेशों में मौजूद प्रशासनिक और लोकल संस्थाएं इस आदेश से बाहर रहेंगी।
Sugar Prices Reach Record Level Ahead Of Festive Season Know The Reasons
इथेनॉल, एक्सपोर्ट, कालाबाजारी, जमाखोरी या कुछ और… फेस्टिव सीजन से पहले चीनी में क्यों लगी है आग?
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। भारत दुनिया में चीनी का सबसे बड़ा उपभोक्ता और दूसरे बड़ा उत्पादक है।
देशभर में चीनी की औसत मिल-स्तरीय बिक्री कीमत बढ़कर 5,400-5,500 रुपये प्रति क्विंटल हो गई, जो मार्च में करीब 3,650 रुपये थी। शुक्रवार को चीनी की खुदरा कीमत 58.2 रुपये प्रति किलोग्राम हो गईं। यह एक महीने पहले की तुलना में 20% और एक साल पहले की तुलना में लगभग 26% अधिक हैं। कुछ बाजारों में चीनी की कीमत में काफी तेजी आई है। मसलन, पंजाब में चीनी की खुदरा कीमत लगभग 65 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है, जबकि मुंबई, भोपाल और अन्य बाजारों में यह 58 से 63 रुपये किलो मिल रही है। इसी तरह पश्चिम बंगाल में इसकी कीमत 70 रुपये किलो पहुंच चुकी है।
कीमत में क्यों आया उछाल?
खाद्य मंत्रालय के अनुसार चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी कई कारणों से हुई है। इनमें उम्मीद से कम घरेलू उत्पादन, त्योहारों के मौसम से पहले बढ़ी हुई मांग, मौसम के कारण फसल को नुकसान, वैश्विक स्तर पर सप्लाई में कमी और कुछ लोगों द्वारा सट्टेबाजी और जमाखोरी शामिल हैं। भारत में चीनी की सालाना खपत 29 से 31 मिलियन टन है। सरकार का कहना है कि मौजूदा सीजन (अक्तूबर-सितंबर) में चीनी का उत्पादन लगभग 306 लाख टन रहने का अनुमान है। यह 343 लाख टन के शुरुआती अनुमान से 11% कम है।
देश में अगस्त और नवंबर के बीच चीनी की मांग आम तौर पर बढ़ जाती है क्योंकि इस दौरान गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे त्योहार मनाए जाते हैं। इससे मिठाइयों, बिस्कुट और कन्फेक्शनरी उत्पादों की मांग बढ़ती है। इन उत्पादों के निर्माता त्योहारों के मौसम से पहले ही स्टॉक जमा कर लेते हैं, जिससे चीनी की मांग को और बढ़ावा मिलता है। जानकारों का मानना है कि कीमतें कम से कम अगले तीन महीनों तक ऊंची बनी रहेंगी। चीनी का पेराई सत्र 2026-27 एक अक्टूबर से शुरू होने वाला है।
मौसम की मार
इस बीच, अनियमित बारिश और सूखे मौसम ने गन्ने के उत्पादन पर असर डाला है। अधिकारियों ने बताया कि पिछले साल अक्टूबर में महाराष्ट्र में बहुत ज्यादा बारिश हुई थी। साथ ही यूपी तथा महाराष्ट्र में गन्ने की फसल में ‘रेड रॉट’ और ‘टॉप बोरर’ जैसी बीमारियों की वजह से उत्पादन पर असर पड़ा। साथ ही दुनिया के सबसे बड़े चीनी उत्पादक देश ब्राजील में सप्लाई की बिगड़ती स्थिति ने भी चीनी की कीमतों में भारी उछाल ला दिया है। ब्राजील ने खराब मौसम के कारण फसल की कटाई में देरी की चेतावनी दी है।
अनिश्चितता को और बढ़ाते हुए, ब्राजील ने अपनी हर दो हफ्ते में आने वाली फसल और उत्पादन रिपोर्ट को रोक दिया है। इससे देश की सप्लाई की स्थिति के बारे में जानकारी मिलना मुश्किल हो गया है। इस बीच, इथेनॉल की ओर झुकाव चीनी की संभावित कमी को लेकर चिंताएं बढ़ा रहा है। जून में, ब्राजील के 58% गन्ने के रस का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने में किया गया। इससे चीनी की तुलना में बेहतर मुनाफा मिलने की उम्मीद है। ब्राजील ने जुलाई में इथेनॉल मिलाने के अनिवार्य लक्ष्य को जून के 30% से बढ़ाकर 32% कर दिया।
इस बीच सरकार ने 10 साल के अंतराल के बाद जीरो ड्यूटी पर 1 मिलियन टन कच्ची चीनी के आयात की अनुमति दे दी है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि चीनी निर्यात की अनुमति देकर सरकार ने बड़ी गलती की थी। नवंबर 2025 में केंद्र ने पहले 1.5 मिलियन टन चीनी के निर्यात की अनुमति दी। बाद में इसे बढ़ाकर 2 मिलियन टन कर दिया गया। उद्योग के अनुमानों के अनुसार, निर्यात पर रोक लगने से पहले इसमें से लगभग 8 लाख टन चीनी देश से बाहर भेजी जा चुकी थी।
इथेनॉल पर सवाल
उद्योग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि फरवरी 2026 तक पहले से स्वीकृत 1.5 मिलियन टन के अलावा 0.5 मिलियन टन अतिरिक्त निर्यात कोटे की अनुमति दी गई थी। आपूर्ति का संकट मार्च से ही शुरू हो गया था, जब मिलें अपने मासिक घरेलू बिक्री कोटे को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रही थीं। जब कीमतें धीरे-धीरे बढ़ रही थीं, तभी खतरे की घंटी बज जानी चाहिए थी।
भारत में कच्ची चीनी के आयात पर 100 प्रतिशत टैरिफ है। उद्योग के सूत्रों के अनुसार भारत ने पिछली बार 2016-17 सीजन में कच्ची चीनी के आयात की अनुमति दी थी। कुछ अनुमानों के अनुसार 2.4 मिलियन टन चीनी इथेनॉल के लिए भेजे जाने के कारण चीनी की कीमत में तेजी आई है। लेकिन सरकार ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि इसमें इस्तेमाल होने वाली चीनी का हिस्सा 2022-23 में लगभग 12% से घटकर 2025-26 में लगभग 9% रह गया। इथेनॉल का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाज से आता है।
आयात की जरूरत
कम उत्पादन के कारण इस बार 1 अक्टूबर को चीनी का शुरुआती स्टॉक घटकर लगभग 33-34 लाख टन रहने की उम्मीद है, जो एक साल पहले 50 लाख टन था। जानकारों का कहना है कि भारत के पास 6 मिलियन टन का स्टैंडर्ड क्लोजिंग स्टॉक होना चाहिए, जो तीन महीने की खपत के बराबर है। मगर मौजूदा स्थिति से पता चलता है कि 1 अक्टूबर से शुरू होने वाले 2026-27 सीजन की शुरुआत में स्टॉक का स्तर जरूरत से कम हो सकता है। यही वजह है कि देश को आयात की जरूरत पड़ रही है।
सूत्रों का कहना है कि सरकार ने मिलों को क्रशिंग जल्दी शुरू करने की सलाह दी है ताकि उपलब्धता बनी रहे, लेकिन हो सकता है कि यह कमी को पूरा करने के लिए काफी न हो। यही वजह है कि इंपोर्ट करना जरूरी हो गया है। सवाल यह है कि क्या 1 मिलियन टन चीनी के संभावित इंपोर्ट से कीमतों में बड़ी गिरावट आएगी?
सूत्रों की मानें तो ऐसा शायद न हो। उनका कहना है कि कीमतें ज्यादा से ज्यादा मौजूदा स्तर से 500 रुपये प्रति क्विंटल तक कम हो सकती हैं। इंटरनेशनल बेंचमार्क इंडेक्स न्यूयॉर्क में कच्ची चीनी की कीमतें कुछ दिन पहले 14 महीने के उच्चतम स्तर 17.47 सेंट प्रति पाउंड के करीब पहुंच गईं। एक अधिकारी ने कहा कि बिना किसी ड्यूटी के लैंडेड प्राइस 3,840 रुपये प्रति क्विंटल होगा। इसका मतलब है कि इंपोर्ट करने में काफी अच्छा मार्जिन मिल सकता है।
क्या है रॉ शुगर?
रॉ शुगर यानी कच्ची चीनी गन्ने की पहली पेराई से बनती है जिसे बहुत कम प्रोसेस किया जाता है। इसमें थोड़ी मात्रा में मोलासेस मौजूद रहता है। इसमें पूरी तरह से रिफाइन की गई सफेद टेबल शुगर की तुलना में हल्का कैरमल जैसा स्वाद मिलता है। कच्ची चीनी को रिफाइन करने के लिए उस पर से मोलासेस की परत को धोकर हटा दिया जाता है। चीनी के क्रिस्टलों को पिघलाकर सिरप बनाया जाता है और अशुद्धियों को छानकर अलग कर दिया जाता है। सिरप को फिर से उबालकर शुद्ध सफेद चीनी के क्रिस्टल बनाए जाते हैं।


