जेएनयू वामपंथियों का अंतिम अड्डा?
“पढ़ाई देश के लिए नहीं, बल्कि 40 की उम्र तक फ्री की रोटियां तोड़ने और अड्डा जमाने का साधन है!”
आपने भी पढ़ाई की होगी, और आपके बच्चे भी पढ़ रहे होंगे। एक आम परिवार का इरादा साफ़ होता है—पढ़-लिखकर नौकरी करेंगे, बिज़नेस करेंगे, या रिसर्च करके समाज और देश का भला करेंगे।
लेकिन हमारे देश में कुछ परजीवी ऐसे भी हैं जिन्होंने पढ़ाई को ही अपनी ‘लाइफटाइम पेंशन’ और ऐश काटने का जरिया बना रखा है! दाढ़ी के बाल पक जाते हैं, जवानी ढल जाती है, लेकिन साहब ‘स्टूडेंट’ ही बने रहते हैं।
ज़रा इन महान ‘रिसर्चर्स’ के ज्ञान और इनके अजब-ग़ज़ब विषयों पर गौर फरमाइए:
👉 1. कन्हैया कुमार:
विषय: दक्षिण अफ्रीका में 1994 से 2015 के बीच हुए सामाजिक बदलावों का अध्ययन!
भारत में टैक्सपेयर्स के पैसों पर हॉस्टल में बैठकर भाई साहब अफ्रीका के समाज पर कई सालों तक थीसिस रगड़ते रहे। अब इस रिसर्च का देश के लिए क्या उपयोग है, यह तो सिर्फ़ वही जाने!
👉 2. नेहा बोरा:
विषय: थिएटर एंड परफॉर्मेंस स्टडीज़ में पीएचडी (रंगमंच, अभिनय और प्रदर्शन कला)।
हालत यह है कि इनसे किसी एक फ़िल्म की ढंग की समीक्षा करवा लो या कथा और पटकथा (story & screenplay) का फ़र्क़ पूछ लो, तो पसीने छूट जाएंगे! पर मैडम रिसर्च कर रही हैं।
👉 3. उमर खालिद:
विषय: झारखंड के आदिवासी समुदायों, सत्ता और व्यवस्था पर रिसर्च।
ज़रा पता करिए कि यह जनाब अपनी ज़िंदगी में कभी झारखंड की ज़मीन पर पैर भी रखे हैं क्या? झारखंड के 10 मूल आदिवासियों के समुदायों के नाम या ‘सरना धर्म’ पर इनसे दो लाइन नहीं बोली जाएगी, लेकिन आदिवासियों के नाम पर कागज़ काले करने में आगे थे!
👉 4. शरजील इमाम (सबसे बड़ा अजूबा):
IIT बॉम्बे से कंप्यूटर साइंस में M.Tech करने के बाद अचानक ज्ञान की प्राप्ति हुई कि कंप्यूटर छोड़ो, अब तो इतिहास पढ़ेंगे!
विषय: बीसवीं सदी के उत्तर भारत में गोहत्या और सांप्रदायिक संघर्ष का इतिहास।
मज़ेदार बात यह कि पूरी 20वीं सदी में ऐसी कोई व्यापक घटना थी ही नहीं—1917 का शाहाबाद मामला भी राजनीतिक आंदोलन से जुड़ा था। यानी जो संघर्ष ज़मीन पर हुआ ही नहीं, उस पर मनगढ़ंत थीसिस लिखकर भाई साहब रिसर्च के नाम पर बैठे थे!
अब ख़ुद सोचिए—ये क्या पढ़ रहे हैं? क्यों पढ़ रहे हैं? और देश के विकास में इस तथाकथित पढ़ाई की रत्ती भर भी कोई उपयोगिता है?
इतने अतरंगी सब्जेक्ट इन्हें कौन सुझाता है?
सीधी और कड़वी बात यही है:
इनका पढ़ाई-लिखाई और ज्ञान से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। यह सिर्फ़ कैंपस को अपना परमानेंट अड्डा बनाकर, लाल झंडे वाले गुरुओं के साथ मिलकर देशविरोधी नैरेटिव और राजनीति चमकाने का खेल है।
आपको एक भी वामपंथी ऐसा नहीं मिलेगा जिसने किसी वास्तविक या देश के काम आने वाले ठोस विषय पर रिसर्च की हो। इनका पूरा ज्ञान उसी लेवल का है जैसे कोई कह दे कि—”मुग़ल ही भारत में पहली बार आइसक्रीम लेकर आए थे!” 🍦🤣
टैक्सपेयर्स के खून-पसीने की कमाई पर ऐश करने वाले इन ‘सदाबहार छात्रों’ का असली खेल अब जनता समझ चुकी है!
👇 क्या ऐसे कथित रिसर्चर्स पर देश का पैसा बर्बाद होना बंद नहीं होना चाहिए? ✍️🔥
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय यानी JNU की पहचान लंबे समय से वामपंथी राजनीति के एक मजबूत केंद्र के तौर पर रही है। इसे इस रूप में देखे जाने के पीछे संस्थान का इतिहास, इसकी दाखिला प्रणाली, अकादमिक ढांचा और देश का बदलता राजनीतिक परिदृश्य जैसे कई कारण हैं।
स्थापना और शुरुआती फैकल्टी JNU की स्थापना 1969 में एक प्रगतिशील और सामाजिक रूप से जागरूक विश्वविद्यालय के रूप में की गई थी। इसके शुरुआती दौर में देश-विदेश के कई जाने-माने सामाजिक वैज्ञानिक और इतिहासकार यहां पढ़ाने आए, जिनमें से कई का झुकाव मार्क्सवादी या समाजवादी विचारधारा की ओर था। इतिहास, समाजशास्त्र और अंतरराष्ट्रीय अध्ययन जैसे विभागों में सामाजिक विषमता, वर्ग संघर्ष और साम्राज्यवाद विरोधी विमर्श को प्रमुखता मिली।
दाखिला नीति और विविधता विश्वविद्यालय ने देश के पिछड़े और ग्रामीण इलाकों से आने वाले छात्रों के लिए डेप्रिवेशन पॉइंट्स यानी विशेष अंकों की व्यवस्था की। इस नीति की वजह से समाज के हर तबके, खासकर वंचित और हाशिए के वर्गों से बड़ी संख्या में छात्र यहां पहुंचे। इस सामाजिक पृष्ठभूमि ने छात्रों के बीच समानता, अधिकार और राज्य से सवाल पूछने वाली राजनीति को खाद-पानी दिया, जो वामपंथी विचारों के काफी करीब थी।
JNU की पहचान देश के सबसे किफायती उच्च शिक्षण संस्थानों में होती है, जहां कम खर्च में शोध और उच्च शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए सरकारी सब्सिडी पर भारी निर्भरता है।
बजट और फंडिंग JNU एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है, इसलिए इसका अधिकांश खर्च केंद्र सरकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी UGC द्वारा दिए जाने वाले अनुदान से चलता है।
- विश्वविद्यालय का सालाना बजट लगभग ₹400 करोड़ से ₹500 करोड़ के दायरे में रहता है, जिसका बड़ा हिस्सा शिक्षकों व कर्मचारियों के वेतन, पेंशन, प्रयोगशालाओं के रखरखाव और बुनियादी ढांचे पर खर्च होता है।
- छात्रों से मिलने वाली फीस से विश्वविद्यालय की कुल आय का बहुत ही मामूली हिस्सा आता है, बाकी पूरा संचालन सार्वजनिक करदाताओं के पैसे और सरकारी बजट से पूरा किया जाता है।
अकादमिक फीस संरचना पारंपरिक मानविकी, भाषा और सामाजिक विज्ञान के पाठ्यक्रमों में फीस दशकों से लगभग नाममात्र रही है:
- बीए, एमए, एमएससी और पीएचडी जैसे नियमित पाठ्यक्रमों की वार्षिक ट्यूशन फीस लगभग ₹200 से ₹300 के आसपास होती है।
- लाइब्रेरी, खेल, छात्र संघ और परीक्षा शुल्क मिलाकर भी साल भर का कुल अकादमिक खर्च अमूमन ₹500 से ₹1,000 के भीतर सिमट जाता है।
- हालांकि हाल के वर्षों में शुरू किए गए नए तकनीकी और प्रबंधन पाठ्यक्रमों जैसे बीटेक और एमबीए की फीस सामान्य स्व-वित्तपोषित पाठ्यक्रमों की तरह लाखों में रखी गई है।
हॉस्टल और रहने का खर्च JNU में रहने की न्यूनतम लागत ही छात्रों को लंबे शोध कार्यों के दौरान टिके रहने में मदद करती है:
- हॉस्टल का कमरा किराया नाममात्र है, जो डबल सीटर के लिए ₹10 प्रति माह और सिंगल सीटर के लिए ₹20 प्रति माह तय रहा है।
- बिजली, पानी और अन्य बुनियादी हॉस्टल शुल्क मिलाकर एक सेमेस्टर का खर्च बहुत कम बैठता है।
- सबसे मुख्य खर्च मेस का होता है, जो नो-प्रॉफिट नो-लॉस आधार पर छात्र कमेटियों द्वारा संचालित होता है। इसका मासिक बिल अमूमन ₹3,000 से ₹4,000 के बीच आता है।
फीस वृद्धि पर विवाद 2019 में जब प्रशासन ने हॉस्टल नियमावली में संशोधन कर कमरे के किराए, सर्विस चार्ज और यूटिलिटी चार्ज बढ़ाने का प्रस्ताव रखा था, तब परिसर में महीनों लंबा छात्र आंदोलन हुआ था। छात्रों का तर्क था कि फीस बढ़ने से गरीब और वंचित पृष्ठभूमि के छात्र उच्च शिक्षा से बाहर हो जाएंगे, जबकि प्रशासन और आलोचकों का कहना था कि घाटे को पाटने और हॉस्टलों के बेहतर रखरखाव के लिए शुल्क में मामूली बढ़ोतरी जरूरी है।
JNU को वामपंथी विचारों का मजबूत गढ़ बनाने में केवल छात्र ही नहीं, बल्कि यहां के शिक्षक समुदाय और अकादमिक जगत की भी बहुत बड़ी भूमिका रही है। 1970 के दशक से ही JNU के सामाजिक विज्ञान, इतिहास और अर्थशास्त्र विभागों में ऐसे प्रोफेसर रहे जिन्होंने मार्क्सवादी और प्रगतिशील नजरिए से भारत के इतिहास, समाज और अर्थव्यवस्था का विश्लेषण किया।
इतिहास विभाग
बिपिन चंद्र आधुनिक भारत के इतिहासकार और राष्ट्रीय आंदोलन के मार्क्सवादी विश्लेषण के प्रमुख पैरोकार। उनकी किताबें लंबे समय तक देश भर में आधुनिक भारत को समझने का मुख्य आधार रहीं। उन्होंने उपनिवेशवाद और सांप्रदायिकता के खिलाफ वर्ग-आधारित और धर्मनिरपेक्ष दृष्टि रखी।
रोमिला थापर प्राचीन भारत की जानी-मानी इतिहासकार। उन्होंने प्राचीन भारतीय इतिहास को धार्मिक या सांप्रदायिक चश्मे से देखने के बजाय सामाजिक और आर्थिक संरचनाओं के आधार पर विश्लेषित किया। वे सार्वजनिक मंचों पर दक्षिणपंथी इतिहास लेखन की प्रखर आलोचक रही हैं।
सर्वपल्ली गोपाल JNU के सेंटर फॉर हिस्टोरिकल स्टडीज के संस्थापकों में शामिल। वे आधुनिक भारत और पंडित नेहरू के आधिकारिक जीवनी लेखक थे और उन्होंने संस्थान के अकादमिक ढांचे को धर्मनिरपेक्ष व प्रगतिशील दिशा देने में अहम भूमिका निभाई।
अर्थशास्त्र विभाग
प्रभात पटनायक कैम्ब्रिज से पढ़े जाने-माने मार्क्सवादी अर्थशास्त्री। उन्होंने सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग में दशकों तक पढ़ाया। वे नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों, वैश्वीकरण और पूंजीवाद के मुखर आलोचक रहे हैं और केरल राज्य योजना बोर्ड के उपाध्यक्ष भी रहे।
उत्सा पटनायक कृषि अर्थशास्त्र और ग्रामीण विकास की प्रमुख अर्थशास्त्री। उन्होंने भारत में औपनिवेशिक शोषण, लगान व्यवस्था और ग्रामीण वर्ग-विभाजन पर मार्क्सवादी नजरिए से गहरा शोध किया।
सी. पी. चंद्रशेखर और जयती घोष विकास अर्थशास्त्र, वित्तीय संकट और सार्वजनिक खर्च पर लिखने वाले अर्थशास्त्री। दोनों ने भारत के बजट, सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण और कॉर्पोरेट-हितैषी नीतियों की लगातार आलोचना की और वामपंथी आर्थिक विमर्श को धार दी।
समाजशास्त्र और राजनीति विज्ञान
ज़ोया हसन राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर और राज्य, अल्पसंख्यक अधिकारों तथा भारतीय राजनीति में जाति-वर्ग समीकरणों पर लिखने वाली प्रमुख आवाज। वे यूपीए सरकार के समय राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की सदस्य भी रहीं।
सी. पी. भाम्भरी भारतीय राज्य, नौकरशाही और वर्ग-संबंधों पर मार्क्सवादी दृष्टिकोण से लिखने वाले प्रमुख राजनीति विज्ञानी।
संगठन और आंदोलन
JNUTA JNU टीचर्स एसोसिएशन में लंबे समय तक वामपंथी और प्रगतिशील विचार रखने वाले शिक्षकों का दबदबा रहा है। पाठ्यक्रम निर्माण से लेकर विश्वविद्यालय की स्वायत्तता, शुल्क वृद्धि और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मुद्दों पर JNUTA हमेशा छात्रों के आंदोलनों के साथ मजबूती से खड़ा दिखा है।
छात्र राजनीति की अनूठी संस्कृति JNU छात्र संघ चुनाव बिना किसी बड़े धनबल और बाहुबल के लड़े जाने के लिए जाने जाते हैं। यहां पोस्टरों को हाथ से बनाना, रात-रात भर चलने वाली आम सभाएं और प्रेसिडेंशियल डिबेट मुख्य आधार रहे हैं। AISA, SFI और DSF जैसे वामपंथी छात्र संगठनों ने दशकों तक इस चुनावी माहौल में मजबूत सांगठनिक पकड़ बनाए रखी और लगातार जीत दर्ज की।
राष्ट्रीय राजनीति में बदलाव और ध्रुवीकरण 1990 के दशक के बाद जब देश में आर्थिक उदारीकरण और फिर दक्षिणपंथी राजनीति का उभार हुआ, तब पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा जैसे राज्यों में वामपंथी राजनीतिक दलों का आधार धीरे-धीरे सिमटने लगा। मुख्यधारा की चुनावी राजनीति में वामपंथ के कमजोर पड़ने के साथ ही JNU जैसी जगहें वैचारिक प्रतिरोध के प्रमुख मंच के तौर पर ज्यादा दिखाई देने लगीं।
मीडिया और सार्वजनिक विमर्श 2016 की घटनाओं और उसके बाद JNU मुख्यधारा के टीवी मीडिया और सोशल मीडिया पर तीखी बहस का केंद्र बन गया। दक्षिणपंथी संगठनों और आलोचकों ने इसे वामपंथी विचारधारा का गढ़ बताते हुए निशाना बनाया, जबकि वामपंथी और उदारवादी तबके ने इसे असहमति और अभिव्यक्ति की आजादी के आखिरी मजबूत मंच के रूप में पेश किया। इस तीखे विमर्श ने इस छवि को जनमानस में और गहरा कर दिया।
हालांकि हाल के वर्षों में परिसर के भीतर भी राजनीतिक गतिशीलता में बदलाव आया है, जहां ABVP जैसे दक्षिणपंथी छात्र संगठन ने अपनी उपस्थिति और वोट शेयर को काफी बढ़ाया है, जिससे अब परिसर की राजनीति में पहले की तुलना में अधिक कड़ा मुकाबला देखने को मिलता है।
JNU की छात्र राजनीति से निकलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाले प्रमुख वामपंथी चेहरे ये रहे हैं:
सीताराम येचुरी CPI(M) के पूर्व महासचिव और भारतीय राजनीति के कद्दावर वामपंथी नेता। वे 1970 के दशक में JNU के छात्र रहे और तीन बार JNU छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गए। आपातकाल के दौरान उनकी सक्रियता और इंदिरा गांधी के सामने विरोध प्रदर्शन का दौर काफी चर्चित रहा।
प्रकाश करात CPI(M) के पूर्व महासचिव करात ने 1970 के दशक में JNU में पढ़ाई की और 1972 से 1973 तक छात्र संघ के अध्यक्ष रहे। वे पार्टी के प्रमुख रणनीतिकार और सैद्धांतिक स्तंभों में गिने जाते रहे हैं।
चंद्रशेखर प्रसाद (चंदू) AISA से जुड़े चंद्रशेखर 1990 के दशक में दो बार JNUSU अध्यक्ष रहे। वे JNU छोड़कर बिहार के सीवान में जमीनी राजनीति करने लौटे, जहां 1997 में एक नुक्कड़ सभा को संबोधित करते वक्त उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। वामपंथी छात्र आंदोलन में वे एक बड़े प्रतीक हैं।
बाबूराम भट्टराई नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री और माओवादी आंदोलन के शीर्ष रणनीतिकार। उन्होंने JNU के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज से पीएचडी पूरी की और यहीं से उनके राजनीतिक विचारों को दिशा मिली।
कन्हैया कुमार 2015 से 2016 के दौरान AISF की तरफ से JNUSU के अध्यक्ष रहे। 2016 के विवाद और उनकी भाषण शैली ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित कर दिया। हालांकि CPI की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में रहने के बाद वे आगे चलकर कांग्रेस में शामिल हो गए।
कविता कृष्णन AISA की पूर्व राष्ट्रीय नेता और JNUSU की संयुक्त सचिव रहीं। वे महिला अधिकारों, लैंगिक न्याय और मानवाधिकार मुद्दों पर वामपंथी खेमे की बेहद मुखर आवाज रही हैं।
आयशा घोष SFI से ताल्लुक रखने वाली आयशा घोष 2019 से 2020 में JNUSU अध्यक्ष रहीं। 2020 में JNU में हुई हिंसा के दौरान वे चर्चा में आईं और बाद में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में CPI(M) की उम्मीदवार भी बनीं।
इनके अलावा डी. रघुनंदन, सुचेता दे और एन. साईं बालाजी जैसे कई अन्य नेता भी इसी परिसर की छात्र राजनीति से निकलकर सक्रिय वामपंथी राजनीति और सामाजिक आंदोलनों में पहुंचे।
### जेएनयू की छवि और उसका वैचारिक इकोसिस्टम: यह बदलाव कैसे आया?
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की छवि को समझने के लिए केवल कुछ नारों, विवादों या छात्र संगठनों को देखना पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे विश्वविद्यालय की स्थापना के समय की वैचारिक दिशा, वामपंथी छात्र राजनीति का विकास, शिक्षकों और अकादमिक संस्थानों का प्रभाव, मंडल-कमंडल दौर की राजनीति, तथा 2010 के दशक में टीवी और सोशल मीडिया पर हुए विवादों की संयुक्त भूमिका रही है।
आपके प्रश्न में दो अलग-अलग बातें हैं, जिन्हें अलग रखकर समझना जरूरी है:
* देश-विरोधी छवि: कुछ छात्र प्रदर्शनों, विवादित नारों और राष्ट्रवाद को लेकर टकराव से बनी सार्वजनिक धारणा।
* सनातन-विरोधी छवि: वामपंथी, मार्क्सवादी, जाति-आधारित और धर्मनिरपेक्ष वैचारिक धाराओं के कुछ हिस्सों द्वारा हिंदू धार्मिक परंपराओं, धार्मिक सत्ता-संरचनाओं या हिंदुत्व की आलोचना।
इन दोनों को पूरे विश्वविद्यालय, उसके सभी शिक्षकों या सभी विद्यार्थियों का एक समान विचार मान लेना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा। लेकिन यह जांचना बिल्कुल उचित है कि किन घटनाओं और संस्थागत प्रक्रियाओं ने ऐसी छवि को जन्म दिया।
### 1\. पहला कारण: स्थापना के बाद वामपंथी विचारधारा का प्रभाव



JNU की स्थापना 1969 में हुई। आगे चलकर इसके परिसर में मार्क्सवादी और वामपंथी छात्र संगठनों ने लंबे समय तक मजबूत राजनीतिक उपस्थिति बनाई। 1980 के दशक तक SFI और AISF जैसे संगठन परिसर की राजनीति में प्रमुख थे। बाद में AISA और अन्य संगठन भी प्रभावशाली हुए।
इसका प्रभाव तीन स्तरों पर समझा जा सकता है:
* छात्र राजनीति: छात्र संघ केवल हॉस्टल, फीस और सुविधाओं तक सीमित नहीं रहा; वह राष्ट्रीय राजनीति, वर्ग-संघर्ष, जाति, साम्राज्यवाद और विदेश नीति पर भी सक्रिय हुआ।
* अकादमिक विमर्श: इतिहास, समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान और अन्य सामाजिक विज्ञानों में मार्क्सवादी तथा आलोचनात्मक दृष्टिकोणों को महत्वपूर्ण स्थान मिला।
* राजनीतिक नेतृत्व का निर्माण: JNU से निकले कई छात्र नेता आगे चलकर राष्ट्रीय राजनीति में पहुंचे।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है: किसी विश्वविद्यालय में वामपंथी विचारधारा का प्रभाव होना अपने-आप में देश-विरोधी होने का प्रमाण नहीं है। सवाल यह है कि उस विचारधारा के भीतर राष्ट्र, भारतीय सभ्यता, धर्म और राजनीतिक असहमति को किस तरह देखा जाता है।
### 2\. वामपंथी वैचारिक ढांचे और सनातन परंपरा के बीच टकराव क्यों हुआ?
यह इस प्रश्न का सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक पहलू है।

मार्क्सवादी दृष्टिकोण
मार्क्सवादी विचारधारा समाज को वर्ग, उत्पादन-संबंधों और आर्थिक शक्ति के आधार पर समझती है। धर्म की सामाजिक भूमिका का विश्लेषण भी इसी दृष्टिकोण से किया जाता है। इसके कुछ अनुयायी धर्म को सत्ता और सामाजिक असमानता बनाए रखने वाली व्यवस्था के रूप में देखते हैं।

सनातन परंपरा
सनातन परंपरा में धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि दर्शन, नैतिकता, कर्म, मोक्ष, जीवन के उद्देश्य, परिवार, समाज और ब्रह्मांड के बारे में विविध चिंतन-परंपराओं का भी विषय है।
जब किसी धार्मिक परंपरा का अध्ययन मुख्यतः जातिगत सत्ता, सामाजिक वर्चस्व और शोषण के संदर्भ में किया जाता है, तो उसके आध्यात्मिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक पक्ष पीछे छूट सकते हैं। इससे परंपरा के समर्थकों को यह महसूस हो सकता है कि उनके धर्म का निष्पक्ष अध्ययन नहीं, बल्कि उसका अवमूल्यन हो रहा है।
इसके विपरीत, जातिगत भेदभाव या धार्मिक संस्थाओं की ऐतिहासिक भूमिका की आलोचना को अपने-आप सनातन-विरोध नहीं कहा जा सकता। इन विषयों पर गंभीर अकादमिक बहस आवश्यक है।
मूल प्रश्न यह है: क्या धार्मिक परंपराओं की आलोचना सभी धर्मों के लिए समान मानदंडों से होती है, या हिंदू परंपराओं पर अधिक कठोर और चुनिंदा दृष्टिकोण अपनाया जाता है? इसका उत्तर विशिष्ट पाठ्यक्रमों, लेखों, व्याख्यानों और घटनाओं की तुलना से निकलेगा—सिर्फ राजनीतिक पहचान से नहीं।
### 3\. फरवरी 2016: जब JNU की छवि राष्ट्रीय विवाद बन गई



9 फरवरी 2016 को संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु की फांसी की बरसी से जुड़ा एक कार्यक्रम हुआ। उसके बाद कथित भारत-विरोधी नारों को लेकर विवाद उठा। तत्कालीन छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार सहित कुछ विद्यार्थियों के विरुद्ध राजद्रोह के आरोपों में कार्रवाई हुई और विश्वविद्यालय राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया।
इस घटना के तीन महत्वपूर्ण पहलू थे:
* कार्यक्रम का राजनीतिक संदेश: अफजल गुरु की फांसी को लेकर आयोजन ने आतंकवाद, न्यायिक प्रक्रिया और कश्मीर के प्रश्न पर विवाद खड़ा किया।
* नारों की प्रामाणिकता और जिम्मेदारी: किसने कौन-से नारे लगाए, कौन आयोजक था और किस व्यक्ति की क्या भूमिका थी—इन प्रश्नों की अलग-अलग जांच जरूरी थी।
* राष्ट्रवाद बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: एक पक्ष ने इसे भारत की संप्रभुता के विरुद्ध गतिविधि माना; दूसरे ने कार्रवाई को विश्वविद्यालयों में असहमति दबाने का प्रयास बताया।
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य भी है। दिल्ली के जिला मजिस्ट्रेट की 2016 की तथ्य-जांच रिपोर्ट के बारे में इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा था कि कन्हैया कुमार के विरुद्ध प्रतिकूल साक्ष्य नहीं मिला और उपलब्ध वीडियो या गवाह उनके विरुद्ध लगाए गए आरोपों की पुष्टि नहीं करते थे। इसका अर्थ यह नहीं कि कार्यक्रम में कोई विवादित नारा लगा ही नहीं था; इसका अर्थ है कि किसी आयोजन के विवाद और किसी खास व्यक्ति की सिद्ध भूमिका को एक नहीं मानना चाहिए।
इस घटना ने JNU की पहले से मौजूद वामपंथी राजनीतिक पहचान को देशव्यापी पहचान में बदलने में बड़ी भूमिका निभाई।
### 4\. इकोसिस्टम कैसे बनता है और अपने प्रभाव को कैसे बनाए रखता है?
किसी विश्वविद्यालय में विचारधारा केवल किताबों से नहीं फैलती। छात्र संगठन, शिक्षक, सेमिनार, छात्रावास, शोध-विषय, राजनीतिक संपर्क और मीडिया—सभी मिलकर वैचारिक वातावरण बनाते हैं।
JNU के संदर्भ में इन पहलुओं को देखना उपयोगी होगा:
छात्र संगठनों की निरंतरता
लंबे समय तक एक ही वैचारिक धारा से जुड़े संगठनों की मजबूत उपस्थिति से उनके मुद्दों, नारों और राजनीतिक भाषा को लगातार मंच मिलता है। JNU में वामपंथी संगठनों का प्रभाव इसी निरंतरता से समझा जा सकता है।
शोध और अकादमिक विमर्श
जिन विषयों को शोध और बहस में प्राथमिकता मिलती है, वे विद्यार्थियों की वैचारिक समझ को प्रभावित करते हैं। यह जांचने के लिए पाठ्यक्रमों, संदर्भ-ग्रंथों और मूल्यांकन के मानदंडों का अध्ययन करना होगा कि कहीं वैचारिक एकरूपता तो नहीं बन रही।
राजनीति में प्रवेश का रास्ता
JNU के कई पूर्व छात्र नेता आगे चलकर राजनीतिक दलों में पहुंचे हैं। कन्हैया कुमार और सैयद नासिर हुसैन इसके उदाहरण हैं। इससे परिसर और राष्ट्रीय राजनीति के बीच संपर्क स्पष्ट होता है, हालांकि इससे किसी संगठित षड्यंत्र का प्रमाण अपने-आप नहीं मिलता।
मीडिया और सार्वजनिक छवि
विवादित घटनाएं सामान्य शैक्षणिक गतिविधियों की तुलना में अधिक सुर्खियां पाती हैं। इससे कुछ घटनाएं पूरे विश्वविद्यालय की पहचान बन सकती हैं। समर्थक इसे असहमति का दमन कहते हैं, आलोचक इसे राष्ट्र-विरोधी राजनीति के प्रति नरमी मानते हैं।
इन प्रक्रियाओं का होना किसी खास राजनीतिक दिशा की स्थायी बढ़त को समझा सकता है। लेकिन यह दावा करने के लिए कि शिक्षकों की नियुक्तियों, पाठ्यक्रमों या किसी बाहरी संस्था के जरिए सुनियोजित वैचारिक कब्जा किया गया, ठोस दस्तावेजी साक्ष्य चाहिए।
### 5\. क्या JNU का विरोध मुख्यतः हिंदुत्व और सनातन से रहा है?
इसमें तीन अलग-अलग वैचारिक धाराओं को पहचानना जरूरी है।
| विचारधारा या दृष्टिकोण | मुख्य रुख |
| ————————- | ————————————————————————– |
| मार्क्सवादी वामपंथ | वर्ग-संघर्ष, आर्थिक असमानता और धर्म की सामाजिक भूमिका का आलोचनात्मक अध्ययन |
| आंबेडकरवादी राजनीति | जातिगत भेदभाव, सामाजिक समानता और संवैधानिक अधिकारों पर जोर |
| हिंदुत्व समर्थक दृष्टिकोण | हिंदू सभ्यता, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय पहचान पर जोर |
इनके बीच टकराव खासकर तब तीखा होता है जब हिंदू धार्मिक परंपराओं को जातिगत वर्चस्व की दृष्टि से देखा जाता है, जबकि उनके समर्थक उन्हें व्यापक दार्शनिक और सांस्कृतिक विरासत मानते हैं।
2015 में भारतीय संस्कृति से जुड़े पाठ्यक्रमों को लेकर JNU में विरोध हुआ था। वामपंथी छात्र संगठनों ने इसे शिक्षा के भगवाकरण की कोशिश माना। दूसरी ओर, ऐसे पाठ्यक्रमों के समर्थकों की दृष्टि से भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं को अकादमिक शिक्षा में स्थान देना उचित था।
यह विवाद एक बुनियादी सवाल उठाता है: क्या भारतीय सभ्यता के अध्ययन को केवल धार्मिक राष्ट्रवाद से जोड़ देना उचित है? और क्या उसकी आलोचना को केवल देश-विरोध या धर्म-विरोध कहना उचित है?
दोनों सवालों का उत्तर पाठ्यक्रम की वास्तविक सामग्री, उसकी अकादमिक गुणवत्ता और अपनाए गए मानदंडों से तय होना चाहिए।
### 6\. क्या JNU का इकोसिस्टम आज भी एकतरफा है?
नहीं, इसे स्थिर या निर्विवाद तथ्य नहीं माना जा सकता। JNU में वामपंथी संगठनों का ऐतिहासिक प्रभाव मजबूत रहा है, लेकिन ABVP जैसे संगठनों ने भी राजनीतिक उपस्थिति बनाई है। छात्र राजनीति में वामपंथी संगठनों के बीच मतभेद और संगठनात्मक विभाजन भी सामने आए हैं।
इसलिए तीन बातों को अलग रखना चाहिए:
* विश्वविद्यालय में किस विचारधारा के छात्र संगठन अधिक प्रभावशाली हैं;
* विश्वविद्यालय के शिक्षकों और शोध का वैचारिक झुकाव क्या है;
* विश्वविद्यालय के विद्यार्थी या संस्थान भारत अथवा सनातन के विरोधी हैं या नहीं।
पहले प्रश्न का उत्तर चुनावी नतीजों से मिल सकता है। दूसरे के लिए पाठ्यक्रमों और शोध का व्यवस्थित अध्ययन चाहिए। तीसरे के लिए विशिष्ट वक्तव्यों, गतिविधियों और संस्थागत निर्णयों का प्रमाण जरूरी है।
### निष्कर्ष
JNU की विवादास्पद छवि के निर्माण में लंबे समय से मौजूद वामपंथी छात्र राजनीति, राष्ट्रवाद और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर वैचारिक संघर्ष, 2016 जैसी चर्चित घटनाओं और उनके व्यापक मीडिया कवरेज की भूमिका रही है।
लेकिन इसे सीधे यह निष्कर्ष बना देना कि पूरा JNU देश और सनातन के विरुद्ध है, उपलब्ध तथ्यों से आगे जाना होगा। अधिक उपयोगी जांच यह है कि किन संगठनों, व्यक्तियों, पाठ्यक्रमों या घटनाओं में ऐसा रुख दिखाई देता है और उसके प्रमाण क्या हैं।
मेरे विचार में, आपके प्रश्न की सबसे उपयोगी अगली कड़ी JNU के वैचारिक विकास की समयरेखा होगी—1969 से 1980, 1980 से 2000, 2000 से 2014 और 2014 से अब तक। इसमें छात्र राजनीति, शिक्षक संगठनों, प्रमुख विवादों, अकादमिक विमर्श और राष्ट्रीय राजनीति से संबंधों को अलग-अलग देखकर समझा जा सकता है कि JNU की छवि कैसे बनी और किन घटनाओं ने उसे बदला।
शरजील इमाम और खालिद बनें राष्ट्रविरोधी और देशविखंडक विचारों के प्रतीक
आपकी बात का एक महत्वपूर्ण आधार है। शरजील इमाम और उमर खालिद के नाम JNU की राजनीति, नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध-प्रदर्शनों और भारत की एकता तथा अखंडता से जुड़े विवादों के कारण राष्ट्रीय बहस में प्रमुखता से आए। लेकिन दोनों के वक्तव्यों, उन पर लगे आरोपों और अदालतों में स्थापित तथ्यों को अलग-अलग देखना जरूरी है।
यहां दो सवाल हैं: पहला, क्या उनके सार्वजनिक वक्तव्यों में भारत की एकता को चुनौती देने वाली विचारधारा दिखाई देती है? दूसरा, क्या उन पर लगे आपराधिक आरोप न्यायिक रूप से सिद्ध हुए हैं? इनका उत्तर एक जैसा होना जरूरी नहीं है।
### 1\. शरजील इमाम: देश की अखंडता से सीधे टकराता वक्तव्य
25 जनवरी 2020 को सामने आए अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के भाषण में शरजील इमाम ने असम और पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्से से काटने की बात कही थी। उन्होंने पांच लाख लोगों को संगठित करने और सड़क तथा रेल यातायात बाधित करने की बात भी की। इस भाषण के संबंध में पुलिस ने मामले दर्ज किए।
इसलिए उनके वक्तव्य को केवल सरकार की सामान्य आलोचना कहना उचित नहीं होगा। देश के एक हिस्से का शेष भारत से संपर्क काटने की बात गंभीर अलगाववादी भाषा है। हालांकि, आपराधिक दायित्व का निर्धारण भाषण के पूरे संदर्भ, साक्ष्यों और न्यायिक निर्णय से होगा।
### 2\. उमर खालिद: आरोपों और न्यायिक स्थिति को समझना
उमर खालिद के मामले में प्रमुख विवाद फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों की कथित व्यापक साजिश से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष ने भाषणों, बैठकों और डिजिटल संवादों के आधार पर उन पर आरोप लगाए हैं। उमर खालिद ने आरोपों का विरोध किया है।
5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं। 30 सितंबर 2026 के दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार, उनकी जमानत अर्जियां फिर खारिज हुईं।
यह कानूनी स्थिति गंभीर है, लेकिन जमानत न मिलना दोषसिद्धि के समान नहीं है। मुकदमे में आरोप सिद्ध होना अलग प्रश्न है।
### 3\. फिर क्या ये दोनों JNU के वैचारिक इकोसिस्टम के प्रतीक बन गए?
यहां आपका प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है। शरजील इमाम JNU के पूर्व शोधार्थी रहे हैं और उमर खालिद भी वहां के पूर्व छात्र रहे हैं। उनके राजनीतिक विचारों और सार्वजनिक गतिविधियों के कारण आलोचकों ने JNU की वामपंथी छात्र राजनीति पर सवाल उठाए हैं।
लेकिन इन दो व्यक्तियों के उदाहरणों से पूरे विश्वविद्यालय की विचारधारा सिद्ध नहीं होती। अधिक ठोस जांच के लिए यह देखना होगा कि:
* उनके वक्तव्यों का छात्र संगठनों और शिक्षकों ने समर्थन किया, विरोध किया या उनसे दूरी बनाई?
* क्या विश्वविद्यालय में भारत की एकता और अखंडता के विरुद्ध विचारों को नियमित मंच मिलता रहा?
* क्या इसी तरह के मानदंड अन्य राजनीतिक और धार्मिक विचारधाराओं पर भी लागू किए गए?
मेरा निष्कर्ष: शरजील इमाम का पूर्वोत्तर भारत को शेष देश से काटने वाला वक्तव्य अलगाववादी राजनीति की गंभीर मिसाल है। उमर खालिद की कथित भूमिका पर गंभीर आपराधिक आरोप हैं, जिनका अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया से होना है। दोनों मामलों ने JNU की सार्वजनिक छवि पर असर डाला है; लेकिन विश्वविद्यालय के व्यापक वैचारिक इकोसिस्टम का मूल्यांकन करने के लिए व्यक्तिगत मामलों के साथ संस्थागत व्यवहार के प्रमाण भी जरूरी हैं।

