रुस्तम सोहराब नागरवाला कांड: तब ऐसे चलते थे बैंक अपने भारत में
● वो 20 मिनट
एक बार किसी पार्क में एक दूसरे से अंजान लड़का-लड़की की आँखें चार हुई और उन्होंने तुरंत शादी करने का फैसला कर लिया। उन्होंने तभी उनके परिजनों को फोन करके उन्हें उस पार्क में बुला लिया। इस काम में 18 मिनट लग चुके थे। 19 वें मिनट में उस पार्क में ही उनके फेरे हो गये और 20 वें मिनट में ही उस नयी-नवेली दुल्हन ने वहीं पर एक सुंदर से बच्चे को जन्म भी दे दिया।
क्या हमने कभी कहीं ऐसा देखा है?
क्या कभी किसी फिल्म या किसी टीवी सीरियल में ऐसा देखा है?
क्या किसी समाचार पत्र और/या किसी पत्रिका में ऐसा पढ़ा है?
नहीं ना?
अजी किसी समय में ऐसा ही कुछ हुआ था।
तो प्रस्तुत है आपके सामने वह घटना क्रम।
वे 20 मिनट
एक अभियुक्त को अदालत में पहली बार पेश कर दिया गया।
उन 20 मिनटों में ही
चार्च शीट पेश कर दी गयी।
उस चार्च शीट के साथ सबूत भी पेशकर दिये गये।
अभियुक्त पर आरोप तयकर दिये गये।
दोनों पक्षों के वकीलों में जमकर बहसबाजी भी हो गयी।
और
और
और
उस 20वें मिनट में अदालत ने उस अभियुक्त को तीन साल की सजा सुनाकर उसे जेल भी भेज दिया।
यह पढ़कर आप हैरान तो हो ही रहे होंगे।
तो चलो मैं आपको सारी बात बताता हूँ।
1971 में पूरे देश में सनसनी फैला देने वाला नागरवाला कांड किस-किस को याद है?
इस कांड के अभियुक्त रुस्तम सोहराबजी नागरवाला की पहली पेशी पर ही केवल 20 मिनट की अदालती कारवाई में ही यानी चार्जशीट, अभियोजन दलीलें, गवाही, बचाव की दलीलें और बहस आदि निपटा कर सजा भी सुना दी गयी थी।
उसके कुछ समय के बाद समाचार पत्रों में छपा था कि नागरवाला ने मरने से दो दिन पहले जेल में एक कैदी को कहा थाः’यदि वह अपना मुंह खोल दे तो यह सरकार ताश के पत्तों की तरह से गिर जाएगी।’
इसके तीसरे दिन ही समाचार पत्रों में उसकी “हार्ट अटैक से हुई मृत्यु” के समाचार छपे थे।
पूरा मामला यह था।
स्थान
भारतीय स्टेट बैंक की शाखा
संसद मार्ग
नयी दिल्ली
14 मई 1971 सुबह 11 बजे
तभी उस बैंक की शाखा के टेलीफोन की घंटी बजती है और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी तथाकथित रूप से वहाँ के हैड कैशियर वेद प्रकाश मलहोत्रा को यह संदेश देती हैंः
‘कुछ ही देर में तुम्हारे पास नागरवाला नाम का एक आदमी आयेगा और वह तुम्हें ……… कोड बतायेगा,तुम्हे…….. कोड बोलना है । फिर तुम उसे 60 लाख रुपये नकद दे देना।’
लो जी उसके कुछ मिनटों के बाद वे नागरवाला साहब बैंक की उस शाखा में पहुँच भी गये और वे हैड कैशियर मलहोत्रा से दो बैग में पहले से भरकर रखे गये 60 लाख रु लेकर चले भी गये थे।
😝 आज यदि मैं बाजार या पार्क में घूमने गया हूँ और कोई अनजान आदमी मेरे घर पर पहुँचकर मेरी पत्नी से यह कहेः
‘शर्मा जी ने 100 रु मंगवाये हैं।’
फिर क्या होगा?
क्या मेरी पत्नी उसे 100 रु का नोट दे देगी?
अजी 100 रु तो छोड़िये वह उस अनजान आदमी को 10 रु का नोट भी ना दे।
और 250-300 रुपल्ली तनख्वाह पाने वाले उस बैंक के हैड कैशियर मल्होत्रा ने केवल टेलीफोन पर प्रधानमंत्री की एक सच्ची/झूठी बात सुनकर उस नितांत अनजान आदमी को 60 लाख रु दे दिये। कमाल है।
जब यह बात उसके अगले दिन लीक होकर अखबारों में छप गयी थी तो पुलिस को मजबूरी में नागरवाला के खिलाफ एक्शन लेना पड़ा और उसे उस घटना के तीसरे दिन ही ओल्ड राजेंद्र नगर, दिल्ली के एक मकान से 59 लाख 95 हजार रुपयों के साथ गिरफ्तार कर लिया था।
1971 मतलब आज से 55 साल पहले के 60 लाख रु! आज उतने रुपयों की कीमत 300-400 करोड़ रु तो बैठती ही होगी।
बाप रे 🤔
और हाँ, पुराने लोग बतातें हैं जब जिन भी पुलिस ऑफीसर्स को जाँच सौंपी वे सभी सड़क दुर्घटनाओं में मारे गये थे।
■ आप गूगल पर नागरवाला कांड या nagarwala scamp खोजकर पढे़ंगे तो आप की आँखें खुली की खुली रह जायेंगी।
✍️ अनिल
जब नागरवाला ने इंदिरा गांधी की आवाज़ बना SBI से ठगे साठ लाख रुपए
इंदिरा गांधी
24 मई, 1971 की सुबह स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया की संसद मार्ग ब्रांच में कोई ख़ास गहमागहमी नहीं थी.
दिन के बारह बजने वाले थे. बैंक के चीफ़ कैशियर वेद प्रकाश मल्होत्रा के सामने रखे फ़ोन की घंटी बजी.
फ़ोन के दूसरे छोर पर एक व्यक्ति ने अपना परिचय देते हुए कहा कि वो प्रधानमंत्री कार्यालय से प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पीएन हक्सर बोल रहे हैं.
“प्रधानमंत्री को बांग्लादेश में एक गुप्त अभियान को 60 लाख रुपये चाहिए. उन्होंने मल्होत्रा को निर्देश दिए कि वो बैंक से 60 लाख रुपये निकालें और संसद मार्ग पर ही बाइबल भवन के पास खड़े एक व्यक्ति को पकड़ा दे. ये सारी रकम सौ रुपये के नोटों में होनी चाहिए. मल्होत्रा ये सब सुन कर थोड़े परेशान से हो गए.”
इंदिरा गांधी के साथ पीएन हक्सर
तभी प्रधानमंत्री कार्यालय से बोलने वाले व्यक्ति ने मल्होत्रा से कहा कि लीजिए प्रधानमंत्री से ही बात कर लीजिए.
इसके कुछ सेकेंडों बाद एक महिला ने मल्होत्रा से कहा कि ‘आप ये रुपये ले कर खुद बाइबिल भवन पर आइए. वहाँ एक शख़्स आपसे मिलेगा और एक कोड कहेगा, ‘बांग्लादेश का बाबू.’ आपको इसके जवाब में कहना होगा ‘बार एट लॉ.’ इसके बाद आप वो रकम उनके हवाले कर दीजिएगा और इस मामले को पूरी तरह से गुप्त रखिएगा.’
कोडवर्ड बोल कर पैसे लिए
इसके बाद मल्होत्रा ने उप मुख्य कैशियर राम प्रकाश बत्रा से एक कैश बॉक्स में 60 लाख रुपये रखने के लिए कहा.बत्रा साढ़े 12 बजे स्ट्रॉन्ग रूम में घुसे और रुपये निकाल लाए.
मौजूदा समय में संसद मार्ग स्थित बैंक की ब्रांच
इमेज स्रोत,Social Media
बत्रा और उनके एक और साथी एच आर खन्ना ने वो रुपये कैश बॉक्स में रखे.डिप्टी हेड कैशियर रुहेल सिंह ने रजिस्टर में हुई एंट्री पर अपने दस्तख़त किए और पेमेंट वाउचर बनवाया. वाउचर पर मल्होत्रा ने अपने दस्तख़त किए.
इसके बाद दो चपरासियों ने उस कैश ट्रंक को बैंक की गाड़ी (डीएलए 760) में लोड किया और मल्होत्रा खुद उसे चला कर बाइबल हाउज़ के पास ले गए.कार रुकने पर एक लंबे-गोरे व्यक्ति ने आ कर वो कोड वर्ड बोला.
फिर वो व्यक्ति बैंक की ही कार में बैठ गया और मल्होत्रा और वो सरदार पटेल मार्ग और पंचशील मार्ग के जंक्शन के टैक्सी स्टैंड पर पहुंचे.वहाँ पर उस व्यक्ति ने वो ट्रंक उतारा और मल्होत्रा से कहा कि वो प्रधानमंत्री निवास पर जा कर इस रकम का वाउचर ले लें.
पीएन हक्सर
हक्सर ने फ़ोन करने से किया इनकार
इंदिरा गांधी की जीवनी लिखने वाली कैथरीन फ़्रैंक लिखती हैं, “मल्होत्रा ने वैसा ही किया जैसा उनसे कहा गया था. बाद में पता चला कि उस व्यक्ति का नाम रुस्तम सोहराब नागरवाला है. वो कुछ समय पहले भारतीय सेना में कैप्टन था और तब भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के लिए काम कर रहा था.”
कैथरीन फ्रैंक की किताब
मल्होत्रा जब प्रधानमंत्री निवास पहुंचे तो उन्हें बतलाया गया कि इंदिरा गाँधी संसद में हैं. वो तुरंत संसद भवन पहुंचे. वहाँ वें इंदिरा गाँधी से तो नहींहिल पाये. प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव परमेश्वर नारायण हक्सर उनसे ज़रूर मिले. मल्होत्रा ने हक्सर को सारी बात बताई तो हक्सर के पैरों तले ज़मीन निकल गई. उन्होंने मल्होत्रा से कहा कि किसी ने आपको ठग लिया है.प्रधानमंत्री कार्यालय से हमने इस तरह का कोई फ़ोन नहीं किया. आप तुरंत पुलिस स्टेशन जार इसकी रिपोर्ट करिए. इस बीच बैंक के डिप्टी हेड कैशियर रुहेल सिंह ने आरबी बत्रा से दो-तीन बार उन 60 लाख रुपयों के वाउचर के बारे में पूछा. बत्रा ने उन्हें आश्वासन दिया कि उन्हें वाउचर जल्द मिल जाएंगे.लेकिन जब उन्हें काफ़ी देर तक वाउचर नहीं मिले और मल्होत्रा भी वापस नहीं लौटे तो उन्होंने इस मामले की रिपोर्ट अपने उच्चाधिकारियों से की. फिर उनके कहने पर उन्होंने संसद मार्ग थाने पर इस पूरे मामले की एफ़आईआर लिखवाई. पुलिस ने मामला सामने आते ही जाँच शुरू कर दी.
अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के साथ भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी
नागरवाला की गिरफ़्तारी
पुलिस हरकत में आ गई और रात पौने दस बजे नागरवाला को दिल्ली गेट के पास पारसी धर्मशाला से पकड़ डिफेंस कॉलोनी में उसके एक मित्र के घर ए – 277 से 59 लाख 95 हज़ार रुपये ढूंढ लिए. पूरे अभियान को ‘ऑपरेशन तूफ़ान’ नाम दिया गया.
इंदिरा गांधी
उसी दिन आधी रात को दिल्ली पुलिस ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर बताया कि मामला हल कर लिया गया है, पुलिस ने बताया कि टैक्सी स्टैंड से नागरवाला राजेंदर नगर के घर गया. वहाँ उसने एक सूटकेस लिया. फिर पुरानी दिल्ली के निकलसन रोड गया. वहाँ उसने ड्राइवर के सामने ट्रंक से निकाल कर सारे पैसे सूटकेस में रखे.
ड्राइवर को ये रहस्य अपने तक रखने को उसने 500 रुपये टिप भी दी. तब संसद सत्र चल रहा था.
इंदर मल्होत्रा इंदिरा गांधी की जीवनी ‘इंदिरा गांधी अ पर्सनल एंड पोलिटिकल बायोग्राफ़ी’ में लिखते हैं, “जैसी कि उम्मीद थी संसद में इस पर जम कर हंगामा हुआ. कुछ ऐसे सवाल थे जिनके जवाब नहीं थे. जैसे क्या इससे पहले भी कभी प्रधानमंत्री ने मल्होत्रा से बात की थी? नहीं, तो उसने इंदिरा गाँधी की आवाज़ कैसे पहचानी ? क्या बैंक का कैशियर सिर्फ़ ज़ुबानी आदेश पर बैंक से इतनी बड़ी रकम निकाल सकता था? और सबसे बड़ी बात ये पैसा था किसका ?”
इंदिरा गांधी
नागरवाला को चार साल की सज़ा
27 मई, 1971 को नागरवाला ने अदालत में अपना अपराध मान लिया.
उसी दिन पुलिस ने न्यायिक मजिस्ट्रेट के पी खन्ना की अदालत में नागरवाला पर मुकदमा किया.शायद भारत के न्यायिक इतिहास में ये पहली बार हुआ कि किसी व्यक्ति को गिरफ़्तार किए जाने के तीन दिन में उस पर मुकदमा चला सज़ा भी सुना दी गई.
रुस्तम नागलवाला को चार साल के सश्रम कारावास और 1000 रुपये जुर्माना भी किया गया. लेकिन घटना की तह तक कोई नहीं पहुंच पाया.
नागरवाला ने अदालत में ये माना कि उसने बांग्लादेश अभियान का बहाना बना मल्होत्रा को बेवकूफ़ बनाया था. लेकिन बाद में बयान बदल दिया और फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील कर दी. उसकी माँग थी कि मुकदमे की सुनवाई फिर से हो लेकिन 28 अक्तूबर, 1971 को नागरवाला की ये माँग ठुकरा दी गई.
इंदिरा गांधी के साथ महाराज कृष्ण रस्गोत्रा
जाँचकर्ता पुलिस अधिकारी की कार दुर्घटना में मौत
इस केस में एक रहस्यमय मोड़ तब आया जब 20 नवंबर, 1971 को केस के जांचकर्ता एएसपी डी के कश्यप की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई. वे तब अपने हनीमून को जा रहे थे.
इस बीच नागरवाला ने मशहूर साप्ताहिक अख़बार करेंट के संपादक डी एफ़ कराका को पत्र लिख कर कहा कि वो उन्हें इंटरव्यू देना चाहते हैं.
कराका अस्वस्थ थे. उन्होंने अपना असिस्टेंट इंटरव्यू लेने भेजा. लेकिन नागरवाला ने उसे इंटरव्यू देने से मना कर दिया. फ़रवरी 1972 शुरू में नागरवाला को तिहाड़ जेल अस्पताल लाया गया. वहाँ से उसे 21 फ़रवरी को जीबी पंत अस्पताल ले गये जहाँ 2 मार्च को हालत खराब हो गई और 2 बजकर 15 मिनट पर दिल के दौरे से नागरवाला का देहांत हो गया.
सागरिका घोष
उसी दिन वह 51 वर्ष का हुआ था । प्रकरण से इंदिरा गाँधी बहुत बदनाम हुई थी.
बाद में सागारिका घोष ने ‘इंदिरा गाँधी की जीवनी इंदिरा – इंडियाज़ मोस्ट पॉवरफ़ुल प्राइम मिनिस्टर’ में लिखा, “क्या नागरवाला की प्रधानमंत्री की आवाज़ की नकल करने की हिम्मत पड़ती अगर उसे ताक़तवर लोगों का समर्थन नहीं होता? मल्होत्रा ने पीएम हाउज़ से मात्र एक फ़ोन कॉल से बैंक से इतनी बड़ी रकम क्यों निकाली?”
इंदिरा गांधी
जाँच को जगनमोहन रेड्डी आयोग का गठन
1977 में जनता पार्टी की सरकार सत्ता में आई तो उसने नागरवाला की मौत की परिस्थितियों के जाँच आदेश दिए.
इसको जगनमोहन रेड्डी आयोग बना. लेकिन इस जाँच में कुछ भी नया सामने नहीं आया और नागरवाला की मौत में कुछ भी असामान्य नहीं मिला.
लेकिन सवाल ये उठा कि इस तरह का भुगतान करना भी था तो बैंक मैनेजर के स्थान चीफ़ कैशियर से क्यों संपर्क किया गया? क्या स्टेट बैंक को बिना चेक और वाउचर इतनी बड़ी रकम देने का अधिकार था?
रॉ के पहले निदेशक आरएन काव इंदिरा गांधी के प्रधान सचिव पीएन धर के साथ.
सीआईए का ऑपरेशन?
बाद में अख़बारों में इस तरह की अपुष्ट ख़बरें छपीं कि ये पैसा रॉ के कहने पर बांग्लादेश ऑप्रेशन को निकलवाया गया था. रॉ पर एक किताब ‘मिशन आरएंड डब्लू’ लिखने वाले आर के यादव लिखते हैं कि “उन्होंने इस संबंध में रॉ के पूर्व प्रमुख रामनाथ काव और उनके नंबर दो के संकरन नायर से पूछा था और दोनों ने इस बात का ज़ोरदार खंडन किया था कि रॉ का इस केस से कोई लेनादेना था.”उन अधिकारियों ने इस बात का भी खंडन किया था कि रॉ का स्टेट बैंक में कोई गुप्त खाता था.
इंदिरा गांधी की मौत के दो साल बाद हिंदुस्तान टाइम्स के 11 और 12 नवंबर के अंक में आरोप लगाया गया कि नागरवाला रॉ नहीं बल्कि सीआईए के लिए काम करता था और इस पूरे प्रकरण का मुख्य उद्देश्य इंदिरा गाँधी को बदनाम करना था, ख़ासतौर से तब जब उनकी बांग्लादेश नीति निक्सन प्रशासन को बहुत नागवार लग रही थी.
इंदिरा गांधी इमेज स्रोत,NIXON LIBRARY
लेकिन इस आरोप के समर्थन में कोई साक्ष्य नहीं पेश किए गए और इस सवाल का कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया था कि एक बैंक कैशियर ने बिना किसी प्रपत्र इतनी बड़ी रकम किसी अज्ञात को कैसे सौंप दी थी.
हालांकि ठगी के बाद 5 हज़ार रुपये छोड़ कर पूरे 59 लाख 95 हज़ार रुपये मिल गए थे । वो 5 हज़ार रुपये भी मल्होत्रा ने अपनी जेब से भरे थे. बैंक को इससे कोई माली नुकसान नहीं पहुंचा लेकिन इससे उसकी ख़राब हुई छवि के कारण स्टेट बैंक ने मल्होत्रा को डिपार्टमेंटल इनक्वाएरी कर नौकरी से निकाल दिया था.
दिलचस्प बात ये है कि 10 साल बाद भारत में मारुति उद्योग स्थापित हुआ तो तत्कालीन सरकार ने वेद प्रकाश मल्होत्रा को इस कंपनी का चीफ़ अकाउंट्स ऑफ़िसर बना दिया था.
