द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान 🇯🇵 के लेफ्टिनेंट हीरू ओनोदा को क्यों याद किया जाता है?

🌍⚔️ दुनिया भर की फौज का एक अलिखित कानून होता है— “जब तक जिस्म में जान है, दुश्मन के आगे झुकना नहीं।” 🫡
लेकिन जापान 🇯🇵 के लेफ्टिनेंट हीरू ओनोदा ने इस कानून को ऐसी मिसाल बना दिया कि आज दुनिया के बड़े-बड़े योद्धा इसके आगे सिर झुकाते हैं 🙏
जापान के इस योद्धा की कहानी इस फ़ौजी कोड पर डटे रहने की अविश्वसनीय मिसाल है 🔥

🌎 दूसरा विश्वयुद्ध चल रहा था. तेईस साल के हीरू को फ़ौज में भरती हुए तीन बरस हो चुके थे ⏳ बचपन में तलवारबाजी ⚔️ के गुर सीख चुके पांच फुट चार इंच लम्बे इस सिपाही को गुप्तचर गतिविधियों की ट्रेनिंग मिली थी 🕵️‍♂️ दिसंबर 1944 के शुरू में उसे आदेश मिला कि उसकी ड्यूटी फिलिपीन्स 🇵🇭 की राजधानी मनीला के नज़दीक लुबांग नाम के द्वीप 🏝️ में लगाई गयी है जहाँ उसका काम था अमेरिकी जहाज़ों ✈️🚢 को न उतरने देने के लिए हरसंभव प्रयास करना. कुछ ही दिनों में वह लुबांग में था

💥 28 फरवरी 1945 को अमेरिकी फौजों ने जब इस द्वीप पर हवाई आक्रमण किया ✈️🔥, तमाम जापानी सैनिक या तो मारे गए ⚰️ या वहां से भागने की जुगत में लग गए 🏃‍♂️ उधर जंगल 🌳 में छिपे लेफ्टिनेंट हीरू ओनोदा को उसके अधिकारी मेजर योशिमी तानीगुची 📜 का लिखित आदेश मिला –
“जहाँ हो वहां खड़े रहकर लड़ते रहो ⚔️ हो सकता है इस युद्ध में तीन साल लग जाएँ या हो सकता है पांच साल लग जाएँ ⏳ कुछ भी हो जाय हम तुम्हें वापस ले जाने ज़रूर आएँगे”

💊 मेजर का यह वादा हीरू ओनोदा के लिए जीवनदायी औषधि साबित हुआ और उसने अपने तीन साथियों 👥 के साथ जंगल में अपनी ड्यूटी निभाना जारी रखा 🌲🫡

☢️ उधर हिरोशिमा-नागासाकी 💥 के बाद सितम्बर 1945 में जापान 🇯🇵 ने अमेरिका 🇺🇸 के सामने हथियार डाल दिए 🏳️ इस के बाद हज़ारों जापानी सैनिक चीन, दक्षिण-पूर्व एशिया और पश्चिमी पैसिफिक जैसे इलाकों में बिखर गए 🌏 इनमें से कईयों को गिरफ्तार कर वापस देश भेजा गया 🚢 सैकड़ों ने आत्महत्या कर ली 😔, कई सारे बीमारी 🤒 और भूख 🍞 से मारे गए. जापान के हार जाने की खबरें लगातार रेडियो 📻 पर प्रसारित की जाती रहीं और इस आशय के पर्चे ✉️ हवाई जहाजों से गिराए जाते रहे

📄 लेफ्टिनेंट हीरू ओनोदा और उसके तीन साथियों को भी ऐसे पर्चे मिले लेकिन उन्होंने उन पर लिखे शब्दों पर यकीन नहीं किया ❌ उन्होंने सोचा कि यह दुश्मन के गलत प्रचार का हिस्सा था 🎭

🌳 चारों सैनिक प्रशिक्षण प्राप्त गुरिल्ले थे 🪖 और कठिन से कठिन परिस्थितियों में जीना जानते थे 💪 जंगल में करीब दस माह रहने के बाद उन्हें इस बात का अहसास हो गया था कि लड़ाई लम्बी चलने वाली है ⏳ उन्होंने अपने तम्बुओं की बगल में बांस की झोपड़ियां 🛖 बनाईं और पेट भरने के लिए आसपास के गाँवों 🏡 से चावल 🍚 और मांस 🍖 की चोरी करना शुरू किया जंगल में बेतहाशा गर्मी ☀️ पड़ती थी और मच्छरों 🦟 और चूहों 🐀 के कारण रहना बहुत मुश्किल होता था

🪡 धीरे-धीरे उनकी वर्दियां फटने लगीं 👕 उन्होंने तार के टुकड़ों को सीधा कर सुईयां बनाईं और पौधों 🌿 के रेशों से धागों का काम लिया तम्बुओं के टुकड़े फाड़कर वर्दियों की तब तक मरम्मत की जब तक कि वे तार-तार नहीं हो गईं 😢

🔫 कभी-कभी कोई अभागा ग्रामीण उनकी चौकी की तरफ आ निकलता तो उनकी गोलियों का शिकार बन जाता 😔 फिलीपीनी सेना की टुकड़ियां 🚔 भी गश्त करती रहती थीं उन्हें चकमा देना भी बड़ी मुश्किल का काम होता था ⚠️

⏳ पांच साल बीतने पर बुरी तरह आजिज़ आ गए हीरू ओनोदा के एक साथी सैनिक ने फिलीपीनी सेना के आगे आत्मसमर्पण कर दिया 🏳️ यह बेहद निराशा पैदा करने वाली घटना थी 😞 लेकिन बचे हुए सैनिकों ने हिम्मत नहीं खोई 💪 और किसी तरह जीवित रहे 🌿 चार साल और बीते जब विद्रोहियों की तलाश में निकली स्थानीय पुलिस 🚓 के हाथों उनमें से एक की मौत हो गई ⚰️

📅 1954 से लेकर 1972 तक लेफ्टिनेंट हीरू ओनोदा और उसका साथी किनशीची कोजूका 👥 ने अगले अठारह साल साथ बिताये 🫡 इस बीच 1959 में जापानी सेना ने दोनों को आधिकारिक रूप से मृत घोषित कर दिया था 📜⚰️ 1972 में कोजूका भी पुलिस के हाथों मारा गया 💔

🌲 जंगलों में छिपा हीरू ओनोदा उस समय तक पचास साल का हो चुका था 🎂 इन पचास में से सत्ताईस साल उसने ड्यूटी पर रहते हुए काटे थे ⏳ उसने अभी दो साल और इसी तरह काटने थे

🎓 1970 के दशक में टोक्यो यूनीवर्सिटी 🏫 में शोध कर रहे नोरियो सुजुकी 👨‍🎓 नाम के एक सनकी छात्र को यकीन था कि जापान के कुछ सिपाही फिलीपींस में छिपे मिल सकते हैं 🔍 इस सिलसिले में वह अनेक इत्तफाकों के चलते 1973 के आख़िरी महीनों में में हीरू ओनोदा से मिल सका 🤝

🤫 कई गुप्त मुलाकातों के बाद ही वह उसका विश्वास जीत सका ✨ उसने उससे कहा वापस जापान चले 🇯🇵 हीरू ने उत्तर दिया कि वह अपने अधिकारियों के आदेशों का इंतज़ार करेगा 🫡

👨‍👦 कुछ समय बाद सुजुकी लेफ्टिनेंट हीरू ओनोदा के सगे भाई और एक सरकारी प्रतिनिधिमंडल 🏛️ के साथ वापस लौटा इसके बावजूद हीरू ओनोदा नहीं माना ❌ और उसने सुजुकी से कहा कि जब तक उसका कमांडर आदेश नहीं देगा वह अपनी पोस्ट से नहीं हिलेगा ⚔️

👴 आखिरकार उसी बूढ़े मेजर योशिमी तानीगुची को लुबांग द्वीप 🏝️ लाया गया जिसने दिसम्बर 1944 में हीरू को लड़ाई जारी रखने का आदेश दिया था 📜 मेजर साहब तब तक रिटायर हो चुके थे 👴 और अपने गृहनगर में किताबों की दुकान 📚 चला रहे थे

🫡 मेजर को देखते ही ओनोदा उन्हें पहचान गया 👀 उसने उन्हें सैल्यूट किया 🎖️ आँखों में आंसू भरे 😢 मेजर बोले,
“लेफ्टिनेट हीरू ओनोदा, तुम अपनी ड्यूटी छोड़ सकते हो! जापान युद्ध हार गया है!” 💔

📸 साथ लगी तस्वीर में अपने मेजर का आदेश सुनते लेफ्टिनेंट हीरू ओनोदा को देखा जा सकता है 👀 उनकी वर्दी में लगी एक-एक थेगली और एक-एक टांका अपनी दास्तान कह रहे हैं 🪡 उनकी आँखों की चमक में क्या इबारत लिखी हुई है बताने की जरूरत नहीं ✨

🏯 बहुत बाद में पूरी तरह बदले हुए अपने देश जापान पहुँचने के बाद 🇯🇵, जहाँ उसका स्वागत करने को हर नगर में हज़ारों-हज़ार लोग सडकों पर खड़े थे 👏🎉, एक पत्रकार ने उससे पूछा,
“जंगल में इस तरह तीस साल रहते हुए आपके मन में कौन सी बात रहती थी?” 🤔

🫡 हीरू ओनोदा का जवाब था,
“इस बात के सिवा कुछ ख़ास नहीं कि मुझे अपनी ड्यूटी निभानी थी” ⚔️

🕯️ 16 जनवरी 2014 को बयानवे साल की आयु में मरने से पहले इस बहादुर सामुराई ⚔️ को दूसरे विश्वयुद्ध के इकलौते जापानी महानायक के तौर पर जाना जाने लगा था 🌟

📖 उनकी जीवनी जापान में बेस्टसेलर बनी 🏆 और मेरे फेवरेट फिल्म निर्देशक वर्नर हर्ज़ोग 🎬 ने पिछले ही साल उनकी बायोपिक रिलीज की है 🎥

📺 आज जब डिस्कवरी जैसे चैनलों में दो-चार रात जंगल में अकेले रह जाने वालों को सर्वाइवल एक्सपर्ट 🌲 कहकर प्रचारित किया जाता है, हीरू ओनोदा के लगभग तीस साल यानी दस हज़ार दिनों ⏳ के अकल्पनीय संघर्ष को परिभाषित करने के लिए शायद ही किसी शब्दकोश में कोई विशेषण मिले 📚

😢 9 मार्च 1974 की उस दोपहर मेजर का आदेश सुनने के after चीथड़े पहने हुए हीरू ओनोदा ने अपनी बंदूक जमीन पर रखी 🔫 और फूट-फूट कर रोने लगा 💔
वह तीस सालों में पहली बार रो रहा था 😭

🗣️ बाद में जब किसी पत्रकार ने पूछा कि इतने साल आपने कैसे काटे? तो हीरू ने बस एक ही बात कही—
“मुझे बस अपनी ड्यूटी निभानी थी।” 🫡

💭 दोस्तों, आज हम छोटी-छोटी मुश्किलों में अपने वादे तोड़ देते हैं 💔, अपनों का साथ छोड़ देते हैं 😔। लेकिन हीरू ओनोदा ने सिखाया कि ‘जुबान की कीमत’ क्या होती है ✨
🫡🇮🇳🇯🇵

📌 नोटिस / Disclaimer

यह जानकारी विभिन्न मीडिया स्रोतों, ऐतिहासिक लेखों, पुस्तकों और इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारियों के आधार पर तैयार की गई है। इसका उद्देश्य केवल ऐतिहासिक घटनाओं और प्रेरणादायक प्रसंगों को साझा करना है। 📚🌍🙏

द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान के लेफ्टिनेंट हीरू ओनोडा को इसलिए याद किया जाता है क्योंकि उन्होंने 1945 में युद्ध समाप्त होने के बाद भी आत्मसमर्पण करने से इनकार कर दिया था。 वह लगभग 29 वर्षों तक फिलीपींस के जंगलों में छिपे रहे और गुरिल्ला युद्ध लड़ते रहे。 उन्होंने 1974 में अपने पूर्व कमांडर के आधिकारिक आदेश के बाद ही हथियार डाले。
हीरू ओनोडा की यह असाधारण कहानी दुनिया भर में क्यों प्रसिद्ध है, इसके मुख्य बिंदु नीचे दिए गए हैं:
कमांडो प्रशिक्षण: ओनोडा को जापानी खुफिया स्कूल में प्रशिक्षित किया गया था, जहाँ उन्हें निर्देश दिया गया था कि वे हर हाल में जीवित रहें, कभी आत्मसमर्पण न करें और पीछे से दुश्मन पर हमले जारी रखें。
29 वर्षों तक संघर्ष: द्वितीय विश्व युद्ध 1945 में समाप्त हो गया था, लेकिन ओनोडा को इस बात का बिल्कुल यकीन नहीं था。 वह 1974 तक फिलीपींस के लुबांग द्वीप के जंगलों में छिपे रहे और जापानी सम्राट के प्रति अपनी वफादारी निभाते हुए वहां की स्थानीय पुलिस और सेना से लड़ते रहे。

सच्चाई का पता चलना: 1974 में एक जापानी यात्री नोरिओ सुजुकी ने जंगल में खोजबीन कर ओनोडा को खोज निकाला。 लेकिन इसके बावजूद ओनोडा ने तब तक हथियार छोड़ने से मना कर दिया, जब तक कि उनके पूर्व सैन्य कमांडर (जो तब तक एक बुकसेलर बन चुके थे) ने व्यक्तिगत रूप से मौके पर आकर उन्हें युद्ध खत्म होने का आधिकारिक आदेश नहीं दिया。
आत्मसमर्पण और माफी: अपने कमांडर के आदेश के बाद, 9 मार्च 1974 को उन्होंने फिलीपींस के तत्कालीन राष्ट्रपति फर्डिनेंड मार्कोस के सामने अपनी तलवार सौंप दी。 उनके असाधारण साहस और कर्तव्यनिष्ठा को देखते हुए फिलीपींस सरकार ने उन्हें युद्ध अपराधों के लिए क्षमा कर दिया。
जापान लौटने पर उनका एक राष्ट्रीय नायक की तरह भव्य स्वागत किया गया। उनका जीवन अटूट अनुशासन, देशभक्ति और सैन्य आज्ञाकारिता का एक अद्वितीय ऐतिहासिक उदाहरण माना जाता है。

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