बशीर बद्र और जमींदार का कुत्ता

यही दुनिया का एक कड़वा सच है । लोग इस बात पर मायूस हो रहे हैं कि बशीर बद्र साहब के जनाज़े में लोग बहुत कम थे । लोग इस बात पर ग़म कर रहे कि भोपाल जैसी नगरी में भी लोग नही आए । कुछ लोगों को दुःख है कि पद्मश्री प्राप्त शायर और इस हुक़ूमत के पुरखों का दोस्त बिना गॉर्ड ऑफ ऑनर मिट्टी में दफ़न हो गया । हम देखते हैं कि लोगों के दुःख कैसे कैसे है ।

कुछ का कहना है कि जिस तरह कल से ऑनलाइन उनको ट्रिब्यूट दिया गया,ज़मीन पर कंधे उसके मुकाबले उंगलियों की गिनती पर थे । कुछ का कहना है नही,बहुत लोग थे । कोई कह रहा कम तो कोई कह रहा बहुत,मगर भला इसका भी क्या जानना की कितने थे,कितने नही…

सच पूछिए हमें अब भीड़ से फ़र्क़ नही पड़ता । गुंडे मवालियों के यहां लाखों की भीड़ जमा हो जाती है, बस आप ताक़त में हों । सारा खेल उस ताक़त का है, जो लोगों को घर से निकलने को मजबूर कर देती है । अब बहुत कम लोग अपनी रूह की आवाज़ सुनकर आते हैं । अब तो भीड़ अपने फ़ायदे, अपनी ज़रूरत और सामने वाले कि ताक़त पर आती है । यह भीड़ हमेशा आएगी,बस जगह बदलती रहेंगी । जिधर ताक़त,उधर अथाह भीड़…

बशीर बद्र साहब पिछले बहुत से सालों से याददाश्त की कमी से जूझ रहे थे । परिवार और दोस्त,इनका दायरा उनकी ज़िंदगी मे सिमट रहा था । अब न वह किसी को इंटरव्यू देकर उसकी दुकान चला सकते थे और न ही मुशायरों में कहीं जा सकते थे । अड़ोस पड़ोस, दोस्त एहबाब जो पहुँच सकते थे,पहुँचे। वैसे भी एक कलाकार जब कला से दूर हो जाता है, वह उसी दिन ख़त्म हो जाता है । दुनिया भले कहती रहे कि वह ज़िंदा है, उसे तो पता है कि यह जिस्म तुम देख रहे हो,तुम वह नही देख रहे हो जो इस जिस्म को ज़िंदा रखे थी ।

वैसे भी कलाकार,लेखक,शायर,कवि इनकी रचनाएँ ही ज़िंदा रहती हैं । आपके ठीक बग़ल में बैठा लड़का आपको पढ़ रहा होता है मगर जान नही रहा होता । पढ़े जाने का सुख और न पहचाने जाने का दुःख से उपजा जो खट्टा मीठा ज़ायक़ा है, कुल जमा वह ही है ।

मैं बहुत से जनाज़ों में गया,कितने ही लेखक ख़त्म हुए । कहीं भीड़ थी तो कहीं नही थी । कई बार लेखक,शायर का परिवार भी इस दायरे से कट चुका होता है । सही मैसेज,टाइमिंग और जगह का पता नही चल पाता,कुछ लोग चाहकर नही पहुँच पाते ।।यह सब होता है, इसमें बहुत ग़म नही करना चाहिए ।

भीड़ किसके लिए होती,मरने वाला मर गया । अब चाहे लाखों लोग आए,चाहे चार लोग आए । हर एक अपने लिए आता है । कोई अपने दिल का बोझ हल्का करने,कोई अपनी यादों के बोझ तले,तो कोई इसलिए कि चलो,इतना किया है तो आख़िर के दो कदम हम भी इनके पीछे चल दें । मगर इन सबका प्रभाव किस पर पड़ता है, कौन देखता है ।

इस तरह के लोग जो रचते हैं, वह ही जनाज़े के कंधे हैं और वह असंख्य है । भीड़ वहां भले मौजूद न हो मगर भीड़ के ज़हन में तो वह मौजूद हैं । जनाज़े के पीछे की भीड़ उन्हें नही ज़िंदा रखेगी,उन्हें या उनके जैसों को उनकी रचनाएँ ज़िंदा रखेंगी ।

जिसने शेर को मुहावरा बना दिया हो । हर ज़बान पर जिसकी पहुँच हो,जो लोगों के कमज़ोर से कमज़ोर ज़हन में अपना एक मिसरा, एक शेर पैबस्त करवा दे । उसके जनाज़े की भीड़ नही देखी जाती । उसकी याद में दुनिया भर में अफ़सोस करते लोगों को देखिए । अब तो वह हमेशा ही याद किये जाएंगे,शहर शहर उनपर चर्चा होंगी, नस्ले नस्ले उन्हें पढ़ेंगी ।

मुझे भीड़ का दुःख नही होता । एक कहानी बड़ी सच्ची बचपन मे सुन ली थी कि भरी जवानी और ताक़त के दिनों में ज़मींदार साहब का कुत्ता मर गया,तो हजारों की भीड़ उमड़ी अफसोस करने । फिर बुढ़ापे में बेगम ख़त्म हुईं तो सैकड़ों की भीड़ आई अफसोस करने और फिर खुद ज़मींदार साहब ख़त्म हुए तो कुछ रिश्तेदार और कुछ नौकर चाकर ही थे जनाज़े में,यह क्यों हुआ क्योंकि ताक़त नही बची उस चौखट में,जब वह खुद ही नही रहे….

ग़म मत कीजिये, जितना हो सके उनके शेर गुनगुनाइये । वह एक भरपूर ज़िन्दगी जीकर गए । भरपूर ताक़त को जिया । हुक़ूमत को अपने पांव पर झुकते देखा तो कभी हुक़ूमत के सोफों पर पूरी धमक से बैठे । कलम और मंच की धाक को भरपूर जिया,जिसके सर पर हाथ रखा, वह बन गया । जिसके पांव खींचे, उसकी ज़मीन भी निकल गई । भरपूर ताक़त से ज़िन्दगी गुज़ारी इसलिए अब उस भीड़ का क्या हो रोना,जो कल उसी शहर की किसी ताक़तवर शय के पीछे जा बिछेगी….

भीड़ आएगी,जाएगी मगर जो बाद तक रहेगा,वह है काम…और बशीर बद्र उसमें बहुत लंबे वक़्त तक जिंदा रहेंगे…भीड़ ने इधर जिस तरह अपना चरित्र दिखाया है । वह न भी हो तो ग़म नही और हुक़ूमत,उसके बारे में कुछ कहना वक़्त की बर्बादी है…
#hashtag #हैशटैग

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *