भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में इतनी देरी क्यों? ट्रंप से मिले सर्जियो गोर ने बताई अंदर की बात

What Is Delaying The India us Trade Deal Us Ambassador To India Sergio Gor Explains
भारत-अमेरिका व्यापार समझौता में इतनी देरी क्यों हो रही? ट्रंप से मिलने के बाद सर्जियो गोर ने बताई अंदर की पूरी बात
भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने कहा है कि दोनों देश द्विपक्षीय व्यापार समझौते के करीब पहुंच गए हैं। इसमें बस कुछ ही मुद्दे सुलझाने बाकी हैं और पक्षों इस समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले कानूनी भाषा को अंतिम रूप देने पर फोकस कर रहे हैं।

नई दिल्लीः भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने कहा है कि भारत और अमेरिका एक द्विपक्षीय व्यापार समझौते के करीब पहुंच गए हैं। इसमें बस कुछ ही मुद्दे सुलझाने बाकी हैं और पक्षों इस समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले कानूनी भाषा को अंतिम रूप देने पर ध्यान दे रहे हैं।

व्हाइट हाउस में न्यूज एजेंसी आईएएनएस के साथ इंटरव्यू में, अमेरिकी राजदूत गोर ने भरोसा जताया कि यह एग्रीमेंट आने वाले हफ्तों या महीनों में पूरा हो जाएगा। उन्होंने कहा कि कई दूसरे बड़े व्यापार समझौतों के मुकाबले बातचीत पहले ही बहुत तेजी से आगे बढ़ चुकी है।

करार के मसौदा पर काम जारीः गोर
द्विपक्षीय व्यापार समझौते की शेष कार्यप्रणाली का उल्लेख करते हुए गोर ने कहा, ‘समझौते के मसौदे की भाषाई रूपरेखा पर अभी काम होना बाकी है। करीब 48 घंटे पहले दिल्ली में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि राजदूत जैमीसन ग्रीर के साथ मैं उन बैठकों में शामिल था, जहां हमने वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल से मुलाकात की। वे मेरे बहुत अच्छे मित्र हैं। यह वार्ता बेहद सार्थक रही। हालांकि, कुछ मुद्दों पर अभी भी सहमति बनना बाकी है। अब बहुत कुछ उस अंतिम मसौदे की भाषा पर निर्भर करेगा, जिस पर दोनों पक्ष हस्ताक्षर करेंगे। हमें पूरा विश्वास है कि अगले कुछ हफ्तों या महीनों में इस प्रक्रिया को अंतिम रूप दे दिया जाएगा।’

गोर बोले-बातचीत को सही नजरिए से देखना चाहिए
गोर ने कहा कि बातचीत को सही नजरिए से देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित भारत-अमेरिका समझौते पर सिर्फ लगभग 18 महीने से चर्चा चल रही थी।

देखिए, इसे सही नजरिए से देखें तो, हम इस समझौते पर डेढ़ साल से काम कर रहे हैं। यूरोपीय संघ समझौता, जो अभी भी पूरी नहीं हुई है, उसे 20 साल हो गए हैं। हर कोई कहता है, इसमें इतना समय क्यों लग रहा है? हम इसे पूरा करने की दिशा में एक शानदार रास्ते पर हैं।
सर्जियो गोर, भारत में अमेरिका के राजदूत

प्रस्तावित समझौते के कंटेंट को लेकर बात करने से इनकार करते हुए, अमेरिकी राजदूत गोर ने कहा कि दोनों सरकारें ऐसे नतीजे की ओर काम कर रही हैं जिससे दोनों पक्षों को फायदा हो।

गोर ने कहा, ‘मैं ज्यादा कुछ नहीं बताना चाहता। आपको इंतजार करना होगा और देखना होगा। यह उन चीजों में से एक है जब आपको कॉमन ग्राउंड मिलता है और हम उन चीजों की पहचान कर पाते हैं जो दोनों पक्षों के लिए अच्छी हैं, तभी डील होती है।’

ट्रंप भारत आने के लिए उत्सुक
अमेरिकी राजदूत ने यह भी बताया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप फ्रांस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपनी हालिया मीटिंग के बाद भी भारत आने के लिए उत्सुक हैं।

गोर ने कहा, ‘मेरे पास अभी पक्की तारीखें नहीं हैं। मैं अभी राष्ट्रपति से मिला हूं। मैं उनके साथ ओवल ऑफिस में कई घंटे रहा। राष्ट्रपति ने जो बातें पूछी, उनमें से एक यह थी, ‘तो मैं कब आ रहा हूं?’ वह आने के लिए बहुत उत्सुक हैं। प्रधानमंत्री ने उन्हें बुलाया है। मुझे लगता है कि यह किसी समय होगा।’

भारत-अमेरिका ट्रेड डील का मकसद क्या है?
भारत और अमेरिका एक द्विपक्षीय व्यापार समझौते के पहले चरण को लेकर बातचीत कर रहे हैं, जिसका मकसद मार्केट एक्सेस बढ़ाना, टैरिफ की रुकावटें कम करना और आर्थिक सहयोग को मजबूत करना है।
दोनों सरकारों ने बार-बार इस समझौते को अपनी प्राथमिकता बताया है और एक बड़े ट्रेड फ्रेमवर्क पर जाने से पहले एक शुरुआती समझौते को पूरा करने के लिए काम कर रही हैं।
व्यापार, भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी के सबसे तेजी से बढ़ते स्तंभ में से एक बनकर उभरा है, जिसमें रक्षा, तकनीक, जरूरी और नई तकनीक, ऊर्जा, शिक्षा और लोगों के बीच संबंध भी शामिल हैं।
दोनों देशों ने हिंद-प्रशांत में अपने बढ़ते सहयोग के साथ-साथ आर्थिक इंटीग्रेशन को भी गहरा करने की कोशिश की है।

‘भारत अभी नहीं करेगा साइन…’ India-US ट्रेड डील पर पीयूष गोयल का बड़ा बयान
भारत और अमेरिका के बीच डील बेहद करीब पहुंच गई है.कभी भी दोनों देशों के बीच डील साइन हो सकती है.इस बीच,पीयूष गोयल का बड़ा बयान सामने आया है. अमेरिकी अधिकारी बार-बार संकेत दे रहे हैं कि डील जल्‍द ही साइन हो सकती है, लेकिन भारत इस डील पर अभी साइन करने को तैयार नहीं है. वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने गुरुवार को लंदन में कहा कि बातचीत लगभग पूरी हो चुकी है. दोनों पक्ष 6 फरवरी से डील फाइनल करने में जुटे हुए हैं, लेकिन जो बात अभी तक अनसुलझी है, वह एक महत्वपूर्ण शर्त है. भारत को औपचारिक गारंटी चाहिए कि उसके निर्यात को अमेरिकी बाजार में बाकी देशों की तुलना में टैरिफ का लाभ मिलेगा. गोयल ने रॉयटर्स को बताया कि जिस दिन अमेरिका हमें ये गारंटी देने को रास्‍ता तलाश लेगा, उस दिन यह डील पक्‍की हो जाएगी.

भारत की क्‍या है मांग?
इस देरी के पीछे एक बड़ा कारण दिखाई देता है. भारत चाहता है कि अमेरिका को निर्यात की जाने वाली वस्‍तुएं वस्‍त्र, दवाइयां या इंजीनियरिंग उत्‍पाद, वियतनाम या बांग्‍लादेश जैसे प्रतिद्वंद्वी निर्यातकों की समान वस्तुओं की तुलना में कम आयात शुल्क परिधि में आएं. अगर भारतीय उत्पादों पर भी प्रतिस्पर्धियों के समान शुल्क लगता है, तो भारतीय व्यवसायों को इस समझौते का आर्थिक महत्व काफी कम हो जाएगा.

गोयल ने शर्त बताई है कि जब तक भारत को टैरिफ में लाभ नहीं मिलेगा, तब तक डील पर साइन नहीं होगी. जब तक तुलनात्मक लाभ ढांचे को अंतिम रूप नहीं दिया जाता, हम अमेरिका से कोई समझौता नहीं कर सकते. दोनों देश उस रास्‍ते की तलाश कर रहे हैं, जिसमें अमेरिका भारत को टैरिफ में कटौती कर सकता है.

अब ठीक नहीं है 18 प्रतिशत टैरिफ
भारत और अमेरिका के बीच पहले हुए समझौते में भारतीय वस्‍तुओं पर 18 प्रतिशत टैरिफ रेट तय हुआ था. हालांकि, गोयल ने यह भी कहा कि यह आंकड़ा हमेशा से भारत को मिलने वाले लाभ के आधार पर था, न कि सभी व्‍यापारिक साझेदारों पर समान तौर से लागू होने वाली एक समान दर पर. जब भारत ने अमेरिका के साथ 18% टैरिफ दर पर सहमति जताई थी, तो यह तुलनात्‍मक लाभ में था.

लेकिन अगर बाकी देशों को समान या बेहतर टैरिफ व्‍यवस्‍था मिलने लगे तो वह समझौता प्रभावी तरीके से समाप्‍त हो जाता है, जिससे लाभ समाप्‍त हो जाता है, इस कारण बेसिक रेट भारत को स्‍वीकार्य थी.

क्‍या हैं इस डील के मायने
प्रस्तावित समझौते में टैरिफ, मूल नियमों, निवेश प्रावधानों और कई क्षेत्रों में बेहतर सहयोग को शामिल किए जाने की उम्मीद है. दुनिया की सबसे बड़ी और पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में इस समझौते से भारतीय निर्यातकों को नए बाजारों तक पहुंच के महत्वपूर्ण द्वार खुलेंगे और दोनों सरकारों के सार्वजनिक रूप से सुदृढ़ किए जाने वाले आर्थिक संबंधों को और मजबूती मिलेगी.

डील में सनसेट क्लॉज क्या है? व्यापार समझौते में भारत कर सकता है अमेरिका से मांग

नई दिल्ली और वाशिंगटन में प्रस्तावित अंतरिम द्विपक्षीय व्यापार समझौते में एक ‘सनसेट क्लॉज’ को शामिल करने पर बातचीत हो सकती है. दोनों पक्षों के अधिकारियों ने संकेत दे दिया है कि बातचीत अंतिम चरण में है और समझौते के फ्रेमवर्क पर सहमति बन चुकी है. आइए समझें कि इस प्रावधान का क्या मतलब है?

भारत और अमेरिका एक ऐतिहासिक व्यापार समझौते के बेहद करीब पहुंच रहे हैं. इस बीच नई दिल्ली को लेकर ऐ खबर है कि अमेरिकी व्यापार नीति में भविष्य में होने वाले बदलावों से खुद को सुरक्षित रखने को इस समझौते में सनसेट क्लॉज (Sunset Clause) शामिल करने का दबाव बना सकती है. भारत और अमेरिका अपने सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक समझौतों में से एक को अंतिम रूप देने के बहुत करीब हैं. लेकिन हालिया रिपोर्ट्स से संकेत मिलता है कि नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच प्रस्तावित अंतरिम द्विपक्षीय व्यापार समझौते में ‘सनसेट क्लॉज’ को शामिल करने पर बातचीत हो सकती है. दोनों पक्षों के अधिकारियों ने संकेत दिया है कि बातचीत अंतिम चरण में है और समझौते के बड़े हिस्से यानी फ्रेमवर्क पर सहमति बन चुकी है. आइए समझें कि इस प्रावधान का क्या मतलब है? भारत इसकी मांग क्यों कर रहा है और यह द्विपक्षीय व्यापार और बाजार पहुंच को कैसे प्रभावित कर सकता है?
क्या होता है सनसेट क्लॉज?
सनसेट क्लॉज ऐसा कानूनी प्रावधान है जो किसी समझौते की समाप्ति की तारीख तय करता है. बशर्ते कि उसमें शामिल सभी पक्ष सर्वसम्मति से उसकी अवधि बढ़ाने का फैसला ना करें. किसी संधि को स्थायी रूप से लागू रखने की बजाय यह व्यवस्था सरकारों को एक निश्चित अवधि के बाद समझौते की समीक्षा का अवसर देती है. इसमें यह तय किया जाता है कि समझौते को आगे बढ़ाया जाए या उसमें बदलाव किए जाएं या फिर उसे समाप्त होने दिया जाए.
पिछले कई दशकों से अधिकांश मुक्त व्यापार समझौते स्थायित्व को ध्यान में रखकर तैयार किए जाते थे. सरकारें और कारोबारी स्थायी व्यवस्था पसंद करते थे क्योंकि पूर्वानुमान से निवेश फैसले लेने, सप्लाई चेन योजना बनाने और बाजार विस्तार करने में मदद मिलती थी. लेकिन सनसेट क्लॉज इस बुनियादी धारणा को बदलकर रख देता है.

व्यापार समझौते को एक स्थायी प्रतिबद्धता मानने की बजाय यह प्रावधान इसे एक ऐसी व्यवस्था में बदल देता है जिसे समय-समय पर अपने ठोस नतीजों के आधार पर खुद को सही साबित करना होता है. इसके समर्थकों का तर्क है कि ऐसे प्रावधान तेजी से बदलते आर्थिक वातावरण में सरकारों को थोड़ा सा लचीलापन देते हैं. वहीं दूसरी तरफ आलोचकों का मानना है कि इससे उन व्यवसायों को अनिश्चितता हो सकती है जो स्थिर बाजार पहुंच के भरोसे काम करते हैं.

यह व्यवस्था अब केवल एक सैद्धांतिक विचार नहीं रह गई है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण ‘यूनाइटेड स्टेट्स-मेक्सिको-कनाडा एग्रीमेंट’ (USMCA) है, जिसने नाफ्टा (NAFTA) की जगह ली है. इस समझौते में 16 साल का सनसेट प्रावधान है और हर 6 साल में इसकी अनिवार्य समीक्षा की शर्त है. इस व्यवस्था में पहली बड़ी समीक्षा 1 जुलाई 2026 को होगी.
हाल ही में यूरोपीय संघ ने भी वाशिंगटन से अपने व्यापार समझौते में इसी तरह का रुख अपनाया है. यूरोपीय संसद  से अनुमोदित इस समझौते में एक प्रावधान शामिल है, जिसमें टैरिफ प्राथमिकताओं की अवधि 31 दिसंबर, 2029 को समाप्त हो जाएगी. बशर्ते दोनों पक्ष इसे रिन्यू करने पर सहमत ना हों. यूरोपीय सांसदों ने इस व्यवस्था में स्टील, एल्युमीनियम डेरिवेटिव, इंडस्ट्री और कृषि जैसे सेक्टर कवर करने वाले सुरक्षा उपाय भी जोड़े हैं.
भारत को ये सभी उदाहरण दिखाते हैं कि बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अब ऐसे तंत्र की तलाश कर रही हैं जो आर्थिक या राजनीतिक परिस्थितियां बदलने पर उन्हें व्यापार से जुड़ी अपनी प्रतिबद्धताओं का पुनर्मूल्यांकन करने की अनुमति दें. अब सवाल है कि भारत अब इस समीक्षा तंत्र पर जोर क्यों दे रहा है? सनसेट क्लॉज में भारत की रुचि का समय पिछले एक साल में अमेरिका में हुए घटनाक्रमों से गहराई से जुड़ा हुआ है.

सामान्य रूप से व्यापार को लेकर होने वाली वार्ताएं बाजार पहुंच, टैरिफ दरों और नियामक (रेगुलेटरी) शर्तों की धारणाओं पर आधारित होती हैं. हालांकि जब नीतियां बार-बार बदलती हैं या उन्हें चुनौती दी जाती हैं, तो ये धारणाएं कमजोर पड़ जाती हैं. भारतीय नीति निर्माताओं ने देखा है कि कैसे अमेरिका में टैरिफ की घोषणाओं, बदलावों, निलंबनों और कानूनी विवादों ने व्यापारिक सिनेरियो को बदलकर रख दिया है. नतीजतन नई दिल्ली अब केवल इस भरोसे पर रहने को तैयार नहीं दिखती कि समझौते की पूरी अवधि में मौजूदा स्थितियां वैसी ही बनी रहेंगी.
असल चिंता खुद व्यापार समझौते को लेकर नहीं है, बल्कि इस बात की है कि भारत की तरफ से बड़ी कमिटमेंट जताने के बाद परिस्थितियां बदल सकती हैं. एक सनसेट क्लॉज दोनों देशों को एक संस्थागत तंत्र देगा,जिससे अगर वह आर्थिक आधार ही बदल जाए जिस पर बातचीत हुई थी,तो वे समझौते की समीक्षा कर सकें.व्यावहारिक रूप से यह प्रावधान भविष्य के नीतिगत झटकों के खिलाफ एक सुरक्षा कवच यानी सेफगार्ड का काम करेगा.

अमेरिकी व्यापार नीति बदलाव से भारत की चिंता कैसे बढ़ी?
भारत की सोच प्रभावित करने वाला एक सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम 20 फरवरी को हुआ जब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के 6-3 के बहुमत से सुनाये फैसले ने अमेरिका में टैरिफ तय करने के अधिकार से जुड़ा कानूनी ढांचा बदल दिया. अदालत ने नतीजा निकाला कि जिन कार्यकारी कानूनों के भरोसे कुछ पारस्परिक द्विपक्षीय टैरिफ लगाए गए थे, वे अधिकृत नहीं थे. इस फैसले ने टैरिफ तय करने की शक्ति प्रभावी रूप से वापस अमेरिकी कांग्रेस संसद को सौंप दी.
इस फैसले के बड़े मायने थे क्योंकि इसने उन धारणाओं को बदल दिया जो पहले व्यापार वार्ताओं का आधार थीं. इस फैसले के बाद अपेक्षाकृत अनुमानित टैरिफ ढांचे की उम्मीदें अनिश्चित हो गईं. इसके बाद अमेरिका एक अलग टैरिफ ढांचे की तरफ बढ़ गया, जबकि वह विभिन्न तरीके के व्यापार एनफोर्समेंट मैकेनिज्म पर निर्भर रहा. इनमें सबसे महत्वपूर्ण ‘सेक्शन 301’ की जांच है, जो अमेरिकी व्यापार नीति का एक ऐक्टिव हथियार बनी हुई है.
भारत को यह स्थिति अनिश्चितताजनक है. भले ही आज टैरिफ में छूट पर सहमति बन जाए लेकिन भविष्य में जांच या फिर अन्य नीतिगत फैसलों से पैदा होने वाले कदम इन छूटों के व्यावसायिक मूल्य बदल सकते हैं. इन जांचों से जुड़ी जनसुनवाई 7 जुलाई को होनी तय है, जो यह दर्शाती है कि व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद भी टैरिफ का परिदृश्य बदल सकता है. सनसेट क्लॉज अमेरिका को अपने घरेलू व्यापार कानूनों का उपयोग करने से नहीं रोकेगा लेकिन यह भारत को एक औपचारिक अवसर जरूर देगा कि अगर मूल आर्थिक सौदा काफी हद तक बदल जाता है, तो वह अपनी कमिटमेंट की समीक्षा कर सके.

मौजूदा भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता में क्या दांव पर है?
टैरिफ के मोर्चे पर बातचीत भारतीय निर्यात प्रभावित करने वाले शुल्कों को कम करने और साथ ही भारतीय मार्केट में अमेरिकी प्रोडक्ट्स की पहुंच बढ़ाने पर केंद्रित रही है. अमेरिका ट्री नट्स यानी सूखे मेवे, ताजे फल, सोयाबीन तेल और ज्वार जैसे पशु चारे को बड़े अवसरों की तलाश कर रहा है. दूसरी ओर भारत ने गेहूं, चावल और डेयरी जैसे राजनीतिक और आर्थिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों को सुरक्षा उपाय बनाए रखने का प्रयास किया है.
यह बातचीत पारंपरिक वस्तुओं के व्यापार से भी आगे तक जाती है. एनर्जी और टेक्नोलॉजी इस चर्चा के बड़े हिस्से बने हैं. वाशिंगटन अमेरिकी ऊर्जा प्रोडक्ट्स का निर्यात बढ़ाने की उम्मीद कर रहा है. इसके साथ ही डेटा-सेंटर हार्डवेयर और ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (GPUs) सहित उन्नत तकनीकी उपकरणों की भारतीय बाजार में पहुंच सुरक्षित करना चाहता है. बदले में भारत से इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स, विमान के पुर्जों और फार्मास्युटिकल्स जैसे प्रोडक्ट्स पर फीस कम करके अमेरिकी प्रौद्योगिकी आपूर्ति सीरीज में अपना समन्वय मजबूत करने की उम्मीद है.

हालांकि इन अवसरों के साथ कुछ बाध्यताएं भी आती हैं. इससे जुड़ी रिपोर्ट्स से संकेत मिलता है कि भारत पांच साल की अवधि में 500 अरब डॉलर मूल्य के अमेरिकी सामान खरीदने को लेकर प्रतिबद्धता दे सकता है. इस तरह की कमिटमेंट्स को बड़े समय की योजना और खरीद के पैटर्न में बड़े बदलावों की जरूरत होगी, जिसमें रूसी कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता धीरे-धीरे घटाना शामिल हो सकता है. यही एक मुख्य कारण है कि भारत सुरक्षा के सेफगार्ड्स मांग रहा है.
क्या इस समझौते से भारतीय उद्योग होंगे प्रभावित?
इस बारे में चिंता का एक क्षेत्र अमेरिका के इंडस्ट्रियल सामानों, उन्नत मशीनरी, सूचना और संचार प्रौद्योगिकी, हार्डवेयर और मेडिकल डिवाइसेस को भारत के बाजार खुलना है. इसमें कई लोगों का तर्क है कि अधिक क्वालिटी वाले उपकरणों तक बेहतर पहुंच से उत्पादकता में सुधार हो सकता है. औद्योगिक आधुनिकीकरण को बढ़ावा मिल सकता है और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ सकती है. हालांकि उन भारतीय निर्माताओं पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर भी चिंताएं हैं जो वर्तमान में सरकार समर्थित औद्योगिक कार्यक्रमों में अपना विस्तार कर रहे हैं.
क्या इससे भारत को प्रतिस्पर्धी देशों पर बढ़त मिलेगी?
खबरों के अनुसार भारत की सोच यह है कि वो अमेरिकी बाजार में ऐसी पहुंच हासिल चाहता है जो उसे एशिया की प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्थाओं पर बढ़त दिला सके. यह उद्देश्य कपड़ा (टेक्सटाइल), चमड़ा (लेदर), इंजीनियरिंग उत्पाद, रसायन और फूड प्रोसेसिंग जैसे क्षेत्रों को विशेषत: महत्वपूर्ण है. ये उद्योग अक्सर बहुत कम मुनाफे पर काम करते हैं, जिसका मतलब है कि टैरिफ में मामूली अंतर भी खरीदारों के फैसलों और ठेके हासिल करने वाले सप्लायर्स को प्रभावित कर सकता है.
इससे जुड़ी रिपोर्ट्स के अनुसार नई दिल्ली ने ऐसी शर्तें मांगी हैं जो भारतीय निर्यातकों को वियतनाम और कई आसियान अर्थव्यवस्थाओं सहित क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धियों की तुलना में अधिक मजबूत स्थिति में ला सकें. अब चिंता इस बात की है कि अगर कल अमेरिका अन्य देशों को अधिक अनुकूल छूट दे देता है तो आज किया गया यह व्यापार समझौता अपना मूल्य खो सकता है.
इस बारे में सामने आ रही रिपोर्ट्स से संकेत मिलता है कि वाशिंगटन ने व्यापार की प्रक्रियाओं में विभिन्न विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को अलग-अलग टैरिफ कैटिगरी पर विचार किया है. भारत को कथित तौर पर कुछ ढांचों में 12.5 प्रतिशत के प्रस्तावित अतिरिक्त शुल्क की संभावना का सामना करना पड़ रहा है, जबकि इंडोनेशिया और पाकिस्तान जैसे देशों को 10 प्रतिशत की कैटिगरी से जोड़ा गया है.
भारतीय निर्यातकों को इस तरह के अंतर के गंभीर व्यावसायिक नतीजे हो सकते हैं. सनसेट क्लॉज प्रतिस्पर्धा खत्म नहीं करेगा लेकिन यह सुनिश्चित करेगा कि अगर प्रतिस्पर्धी देश आखिरकार अमेरिकी बाजार तक काफी बेहतर पहुंच सुरक्षित कर लेते हैं तो भारत के पास समझौते की समीक्षा करने का एक औपचारिक और कॉन्ट्रैक्चुअल मौका जरूर हो.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *