मुहर्रम जुलूस में जहरीले कैप्सूल बांट 15 हजार की जान लेता फैयाज निसार हुसैन प्रेमजी

मुंबई पुलिस ने मुहर्रम जुलूस में जहरीले कैप्सूल बांटते  फैयाज प्रेमजी को पकड़ा है।  पुलिस के अनुसार आरोपित फैयाज प्रेमजी ‘दर्द से राहत’ के नाम पर लोगों को जिंक फॉस्फाइड भरे कैप्सूल बांट रहा था.

पकड़ा गया आरोपित फैयाज पुणे का है.

मुंबई, 27 जून 2026, मुंबई पुलिस ने मुहर्रम जुलूस में जहरीले कैप्सूल बांटने का षड्यंत्र विफल कर दिया. पुलिस ने इसमें फैयाज निसार हुसैन प्रेमजी को पकड़ा है वह बिना अनुमति ‘दर्द से राहत’ के नाम पर लोगों को कैप्सूल बांट रहा था. मुंबई पुलिस के अनुसार जेजे और भायखला इलाके से मोहर्रम का जुलूस गुजर रहा था, वहां फैयाज लोगों को कैप्सूल बांट रहा था. पुलिस पेट्रोलिंग टीम ने फैयाज को कैप्सूल बांटते देखा. शक होने पर पुलिस ने पूछताछ की और उसके पास मौजूद कैप्सूल छीन लिए.

डीसीपी सेंट्रल रीजन जोन-1 जयंत मीणा ने बताया,कि ‘बीती रात भायखला पुलिस स्टेशन सीमा में मुहर्रम का जुलूस निकल रहा था. जुलूस में एक संदिग्ध लोगों को कैप्सूल बांटता और बेचता दिखाई दिया. संदेह पर मुंबई पुलिस की पेट्रोलिंग टीम ने  पूछताछ की और उससे कैप्सूल का स्टॉक कब्जाया.’ पुलिस का दावा है कि जांच में उसने माना कि उसने खासतौर पर मुहर्रम जुलूस को निशाना बनाया और इसमें शामिल होने वालों को नुकसान पहुंचाना चाहता था.

फैयाज ने 50 KG जिंक फॉस्फाइड मंगाया था

डीसीपी जयंत मीणा ने कहा, कि ‘पूछताछ में आरोपित ने  बताया कि उसने  30 हजार खाली कैप्सूल और 50 किलो जिंक फॉस्फाइड (चूहे मारने वाला जहरीला केमिकल) मंगवाया था.’ पुलिस के  अनुसार आरोपित पुणे का पेंट कारोबारी और बीबीए ग्रेजुएट फैयाज निसार हुसैन प्रेमजी है. पूछताछ में यह भी आया कि उसने कई दिन अपने ठिकाने पर कैप्सूलों में जहर भरा. कैप्सूल लेने वाले सलमान सैयद की तबीयत बिगड़ गई. उसे पेट दर्द और उल्टी की शिकायत पर इलाज को अस्पताल लाया गया.

जहर देने और हत्या के प्रयास का मुकदमा

भायखला पुलिस को आरोपित से 14,900 जहरीले कैप्सूल मिले हैं. प्रत्येक कैप्सूल में एक ग्राम जिंक फॉस्फाइड  था. जांच में यह भी आया कि आरोपित  2025 में ईरान और इराक गया था. पुलिस सभी पक्षों से मामला जांच रही है. उसके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 109, 110 और 123 में जहर दे हत्या के प्रयास का मुकदमा लिखा गया है. फैयाज निसार हुसैन प्रेमजी शिया खोजा मुस्लिम समुदाय से है.

आरोपित एक साल में 19 बार ईरान-इराक गया

फैयाज की बहन ईरान में फिजियोथेरेपिस्ट है, जबकि उसकी मां भी ईरान में हैं. पत्नी से उसका तलाक हो चुका है. जांच में यह भी सामने आया है कि वर्ष 2019 से 2025 के बीच फैयाज कई बार ईरान और इराक यात्रा कर चुका है. पुलिस के अनुसार सालभर में ही वह 19 बार ईरान और इराक गया था. फैयाज प्रेमजी पुणे के विमान नगर इलाके में रहता है, जहां उसका पेंट कारोबार है. मुंबई आ वह डोंगरी इलाके के एक गेस्ट हाउस और डॉरमेट्री में ठहरा था.

पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि उसकी उन यात्राओं का उद्देश्य क्या था और क्या आरोपित किसी के प्रभाव में था या किसी बड़े षड्यंत्र की तैयारी कर रहा था. हालांकि, फिलहाल किसी आतंकी संगठन से उसके संबंध की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और जांच जारी है. फिलहाल पुलिस आरोपित के मोबाइल फोन, डिजिटल रिकॉर्ड, वित्तीय लेनदेन और संपर्कों की गहन जांच कर रही है. साथ ही यह भी पता लगाया जा रहा है कि इस षड्यंत्र में कोई अन्य व्यक्ति या संगठन शामिल था या नहीं.

  ‘मुझे कम से कम 15 हजार लोग मारने थे…’, मुहर्रम जुलूस में दवा के नाम जहर बांटते फैयाज ने माना

मुझे 15 हजार लोगों को मारना था…” मुंबई मुहर्रम जुलूस में ‘इम्यूनिटी बूस्टर’ और चॉकलेट बताकर जहर (जिंक फॉस्फाइड) बांटते BBA ग्रेजुएट फय्याज निसार हुसैन प्रेमजी का पुलिस के सामने खौफनाक कबूलनामा.

मुंबई के भायखला में मुहर्रम के आशूरा जुलूस में दर्द निवारक और इम्यूनिटी बूस्टर के नाम खतरनाक केमिकल ‘जिंक फॉस्फाइड’ बांटते फय्याज निसार हुसैन प्रेमजी ने पुलिस पूछताछ में बेहद चौंकाने वाली बातें बताई हैं. पुलिस सूत्रों के अनुसार,उसने बेहद बेरहमी से अपना गुनाह मान कहा, “मैने कम से कम 15 हजार लोग मारने थे.”फैयाज निसार हुसैन प्रेमजी को पुल‍िस शन‍िवार रात कोर्ट लाई, उसे दो द‍िन के र‍िमांड पर ल‍िया गया है.

भीड़ में चॉकलेट बताकर भी उछाले जहरीले कैप्सूल
जांच सूत्रों के अनुसार, फय्याज निसार हुसैन प्रेमजी मुहर्रम जुलूस में बड़े षडयंत्र में आया था. उसने न सिर्फ महिलाओं को निशाना बनाकर दर्द निवारक और ‘इम्यूनिटी बूस्टर’ कह ये कैप्सूल बांटे, बल्कि भीड़ का फायदा उठाकर कुछ गोलियां ‘चॉकलेट’ बताकर लोगों में उछाली, ताकि अधिकाधिक लोग इसका शिकार बन सकें. इन कैप्सूलों में ‘जिंक फॉस्फाइड’ था, जो घरों में चूहे मारने के काम आता है.

11 लोगों ने खाया,सभी खतरे से बाहर
जुलूस में नासमझी में 11 लोगों के ये जहरीले कैप्सूल खाने की बात आई है.कैप्सूल खाते ही सभी की तबीयत बिगड़ी,जिन्हें तुरंत नजदीकी अस्पताल लाया गया.  समय पर इलाज मिलने से सभी 11 बीमार अब खतरे से बाहर हैं.

क्या है जिंक फॉस्फाइड और यह कितना खतरनाक है?
जिंक फॉस्फाइड अत्यधिक जहरीला रासायनिक पदार्थ है. पेट में जाकर यह रसायन पेट के एसिड (अम्ल) से प्रतिक्रिया करके ‘फॉस्फीन गैस’ बनाता है. यह गैस शरीर को अत्यंत घातक होती है,जो हृदय,फेफड़े,लीवर, किडनी और मस्तिष्क को प्रभावित करती है.इस जहर का कोई विशिष्ट एंटीडोट (काट) नहीं है.जिंक फॉस्फाइड खाने पर मरीज को तुरंत अस्पताल पहुंचाना ही एकमात्र रास्ता है,जहां लक्षणों के आधार और वेंटिलेटर सपोर्ट देकर मरीज की जान बचाई जाती है.

कैसे हुआ षडयंत्र का भंडाफोड़?
पूरा मामला मुंबई के रे रोड रहमताबाद कब्रिस्तान के पास मुहर्रम के ‘आशूरा जुलूस’ में सामने आया.वहाँ एक महिला को मुफ्त में बडी मात्रा में कैप्सूल बांटते लोगों पर शक हुआ.उसने कैप्सूल खोलकर देखा,तो उसमें अजीब सा पाउडर मिला.महिला ने तुरंत सूचना भायखला पुलिस को दी,तत्पर पुलिस ने मुख्य आरोपित फय्याज प्रेमजी दबोच लिया.

50 किलो फॉस्फोरस का दिया था ऑर्डर
पुलिस उपायुक्त (DCP) जयंत मीना ने बताया कि आरोपित के पास ये कैप्सूल रखने या बेचने का कोई लाइसेंस नहीं था.पुलिस को उससे 14,900 जिंक फॉस्फाइड भरे कैप्सूल मिले हैं. जांच में आया कि फय्याज प्रेमजी ने 30,000 खाली कैप्सूल और 50 किलो फॉस्फोरस का ऑर्डर दिया था,जिससे उसका इरादा 15 हजार से भी ज्यादा लोगों को निशाना बनाने की तैयारी का था.

शिया मुस्लिम और शिया खोजा मुस्लिम में नस्ल और सांस्कृतिक भेद

 

शिया मुस्लिम (Shia Muslims) एक व्यापक धार्मिक समुदाय हैं, जबकि शिया खोजा मुस्लिम (Shia Khoja Muslims) उसी शिया समुदाय में एक विशिष्ट नस्लीय और सांस्कृतिक (Ethno-religious) उप-समूह हैं।
​इन दोनों में कोई बुनियादी ‘विवाद’ या दुश्मनी नहीं है, बल्कि पहचान, इतिहास, संस्कृति और संगठनात्मक ढांचे का अंतर है।
​1. मुख्य अंतर: व्यापक समुदाय बनाम विशिष्ट उप-समूह
​शिया मुस्लिम: यह इस्लाम के दो मुख्य संप्रदायों में से एक है (दूसरा सुन्नी है)। जो लोग पैगंबर मोहम्मद के बाद हजरत अली और उनके वंशजों (इमामों) को अपना आध्यात्मिक और राजनीतिक मार्गदर्शक मानते हैं, वे शिया हैं। दुनिया भर में कई नस्लों (इरानी, इराकी, लेबनानी, भारतीय, पाकिस्तानी आदि) के शिया हैं।
​शिया खोजा मुस्लिम: ‘खोजा’ शब्द सिंधी शब्द ‘ख्वाजा’ (यानी मालिक या सम्मानित व्यक्ति) से निकला है। यह उन लोगों का एक विशिष्ट समुदाय है जो मूलत: भारत के गुजरात, कच्छ और सिंध क्षेत्र के थे और जिन्होंने सदियों पहले हिंदू धर्म (मुख्यतः लोहाना जाति) से इस्लाम (शिया मत) अपनाया था।
​2. वैचारिक और ऐतिहासिक विकास
​ऐतिहासिक रूप से, खोजा समुदाय के सभी लोग सीधे आज के शिया (इसना अशरी) नहीं थे। उनके शिया बनने का सफर काफी दिलचस्प है:

3. सामाजिक और संगठनात्मक ढांचा (सबसे बड़ा व्यावहारिक अंतर)
​व्यावहारिक जीवन में खोजा शिया और गैर-खोजा शिया मुस्लिमों में अंतर उनकी जीवनशैली और संगठन में दिखता है:
​मजबूत संगठन (जमात व्यवस्था): शिया खोजा समुदाय दुनिया के सबसे संगठित और संपन्न समुदायों में से है। उनकी अपनी ‘खोजा शिया इसना अशरी जमात’ और वैश्विक संस्था ‘वर्ल्ड फेडरेशन’ है। संस्था समुदाय के लोगों की शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यापार को बेहतरीन काम करती है। आम शिया समाज में इस तरह का केंद्रीय और अत्यधिक व्यवस्थित कम्युनिटी ढांचा नहीं होता।
​रीति-रिवाज और संस्कृति: खोजा शियाओं के विवाह, खान-पान और सामाजिक रीति-रिवाजों में आज भी गुजराती और कच्छी संस्कृति का गहरा प्रभाव है, जो उन्हें ईरान, इराक या उत्तर भारत के शिया मुस्लिमों से सांस्कृतिक रूप से थोड़ा अलग बनाता है।
निष्कर्ष:
धार्मिक रूप से, एक शिया खोजा (इसना अशरी) और एक आम शिया (इसना अशरी) मुस्लिम में कोई अंतर नहीं है। दोनों एक ही अल्लाह, एक ही कुरान, पैगंबर मोहम्मद और उनके बाद 12 इमाम मानते हैं, और इराक के मर्कज (जैसे अयातुल्लाह सिस्तानी) की धार्मिक व्याख्याओं (तकलीद) का पालन करते हैं। उनके बीच अंतर केवल नस्ल, इतिहास और मजबूत सामाजिक ताने-बाने (Community Structure) का है।

19वीं शताब्दी में खोजा समुदाय का दो अलग-अलग शिया विचारधाराओं—इस्माइली (आगाखानी) और इसना अशरी (बारह इमामी)—में बंटना दक्षिण एशिया के धार्मिक और कानूनी इतिहास की एक बेहद अनूठी घटना है।
​इस विभाजन की पूरी कहानी कुछ ऐसे है:
​1. सतपंथ से इस्माइली मत का सफर
​14वीं-15वीं शताब्दी में, ईरान से आए सूफी संत पीर सदरुद्दीन ने गुजरात, सिंध और कच्छ के लोहाना समुदाय के लोगों को इस्लाम की ओर आकर्षित किया। उन्होंने स्थानीय संस्कृति और प्रतीक मिलाकर एक अनूठा ‘सतपंथ’ (सत्य का मार्ग) मार्ग तैयार किया । इस मार्ग को अपनाने वाले लोग ‘खोजा’ कहलाए।
​पीर सदरुद्दीन वास्तव में शियाओं के इस्माइली (निज़ारी) संप्रदाय के इमाम के प्रतिनिधि (दाcontinuous / दाई) थे। इसलिए, खोजा समुदाय अनजाने या सचेत रूप से ईरान में बैठे इस्माइली इमाम को अपना आध्यात्मिक गुरु मानने लगा।
​2. आगा खान प्रथम का भारत आगमन और विवाद
​मोड़ तब आया जब 1840 के दशक में इस्माइली संप्रदाय के 46वें इमाम, आगा खान प्रथम (हसन अली शाह), ईरान से भागकर भारत (पहले सिंध, फिर बॉम्बे) आ गए।
​भारत आ, आगा खान प्रथम ने खोजा समुदाय पर अपना पूर्ण धार्मिक और वित्तीय नियंत्रण स्थापित करना चाहा। उन्होंने मांग की कि:
​समुदाय की सभी संपत्तियां (जमातखाने) उनके नाम की जाएं।
​समुदाय के लोग उन्हें दशम अवतार (आध्यात्मिक और दैवीय प्रकाश) के रूप में पूरी तरह स्वीकार करें और उन्हें ‘दशौंद’ (दशमांश या टैक्स) दें।
​3. विरोध और ‘बॉम्बे हाई कोर्ट’ का ऐतिहासिक फैसला
​खोजा समुदाय का एक बड़ा और प्रभावशाली धड़ा (जिन्हें सुधारवादी या ‘बार भाई’ कहा गया) इससे असहमत था। उनका तर्क था कि वे शुरू से ही एक स्वतंत्र शिया समुदाय रहे और उनकी संपत्तियां कम्युनिटी की हैं, न कि किसी एक व्यक्ति की।
​यह विवाद 1866 में बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंचा, जिसे इतिहास में ‘खोजा केस’ (Khoja Case of 1866) कहा जाता है।
​अदालत का फैसला: जज सर जोसेफ आर्नोल्ड ने आगा खान के पक्ष में फैसला सुनाया। अदालत ने माना कि खोजा समुदाय की उत्पत्ति इस्माइली मत से जुड़ी है, इसलिए आगा खान ही इस समुदाय के आध्यात्मिक और कानूनी प्रमुख हैं।
​4. इसना अशरी (बारह इमामी) शिया मत की स्थापना
​अदालती फैसले के बाद, आगा खान के नेतृत्व को स्वीकार नहीं करने वाले खोजा समुदाय से बाहर कर दिये गये या वे खुद अलग हो गये।
​अलग हुए समूह ने तब इराक के नजफ और कर्बला के मुख्य शिया विद्वानों (जैसे मुल्ला कादिर हुसैन और आयतुल्लाह मजंदरानी) से संपर्क किया। उन्होंने पाया कि उनकी मूल मान्यताएं इसना अशरी (बारह इमामी) शिया मत के ज्यादा करीब थीं, जो पैगंबर के बाद 12 इमामों को मानते हैं (जबकि इस्माइली मत वर्तमान इमाम यानी आगा खान को हाजिर इमाम मानता है)।
परिणामस्वरूप:
​1880 के दशक में बॉम्बे और मुम्बई में पहली ‘खोजा शिया इसना अशरी जमात’ की आधिकारिक स्थापना हुई।
​इन लोगों ने अपने अलग ‘इमामबाड़े’ और मस्जिदें बनाईं।
​संक्षेप में आज की स्थिति
​इस विभाजन के बाद खोजा समुदाय स्पष्ट रूप से दो भागों में बंट गया:
​खोजा इस्माइली (आगाखानी): जो आज भी ‘आगा खान’ (वर्तमान में आगा खान चतुर्थ) को अपना हाजिर इमाम मानते हैं।
​खोजा शिया इसना अशरी: जो आगा खान को नहीं मानते, बल्कि इराक/ईरान के मरजा (जैसे आयतुल्लाह सिस्तानी) के मार्गदर्शन में पारंपरिक 12 इमामों वाले शिया मत का पालन करते हैं।
​इस विभाजन के बावजूद, दोनों ही समूहों ने व्यापारिक सूझबूझ, कड़ी मेहनत और मजबूत सामाजिक ताने-बाने के दम पर आज दुनिया भर में अपनी समृद्ध और सम्मानित पहचान बनाई है।

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