इतिहास लेखन में दृष्टि
इतिहास का सच केवल वह नहीं,
जो हमारे निष्कर्ष की पुष्टि करे!
माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति विजय मनोहर तिवारी का एक तथाकथित खुला ‘पत्र’ आजकल चर्चा में है। यह एक जरूरी बहस उठाता है, लेकिन जिस इतिहास-दृष्टि की आलोचना करते हुए वह शुरू होता है, अंततः उसी प्रकार की दूसरी इतिहास-दृष्टि निर्मित कर देता है। फर्क केवल वैचारिक दिशा का है। यदि इरफान हबीब और रोमिला थापर पर आरोप है कि उन्होंने चुनिंदा तथ्यों से इतिहास बनाया, तो उनका प्रत्याख्यान भी चुनिंदा तथ्यों से नहीं किया जा सकता।
पत्र की बुनियादी ऐतिहासिक समस्या यह घोषणा है कि बरनी, मिनहाज-उस-सिराज, इब्न बतूता, अमीर खुसरो आदि के विवरणों में “कोई मिलावट नहीं”, क्योंकि उन्होंने जो देखा, वही लिख दिया। इतिहास-शास्त्र प्राथमिक स्रोत को इस तरह नहीं पढ़ता। बरनी की अपनी राजनीतिक और धार्मिक अवधारणाएं थीं, अमीर खुसरो सत्ता-प्रतिष्ठान से जुड़े थे, मिनहाज दरबारी संसार का हिस्सा थे और इब्न बतूता प्रत्यक्षदर्शी होने के साथ कथाकार भी था। इसलिए प्राथमिक स्रोत प्रमाण है, अंतिम फैसला नहीं। इतिहासकार का काम स्रोत को उद्धृत करना भर नहीं, उसकी उत्पत्ति, उद्देश्य, भाषा, मौन और अतिशयोक्ति की जांच करना भी है।
हबीब और थापर की वैचारिकता पर प्रश्न उठाना पूरी तरह उचित है। इरफान हबीब मार्क्सवादी इतिहास-परंपरा से जुड़े रहे हैं और उनके विश्लेषण में वर्ग, उत्पादन संबंध, कृषि व्यवस्था, भूमि-राजस्व और भौतिक परिस्थितियां महत्वपूर्ण हैं। रोमिला थापर ने प्राचीन भारत को सामाजिक संरचनाओं, राज्य-निर्माण, पुराण-परंपरा, अभिलेखों, पुरातत्त्व और ग्रंथ-समीक्षा के आधार पर पढ़ा है। उनकी व्याख्याओं से असहमति हो सकती है और हुई भी है। यह भी पूछा जाना चाहिए कि स्वतंत्र भारत के विश्वविद्यालयों और पाठ्यक्रमों में कुछ इतिहास-दृष्टियों को अधिक संस्थागत प्रभाव क्यों मिला और क्या वैकल्पिक दृष्टियों को पर्याप्त स्थान मिला। लेकिन वैचारिकता अपने आप में प्रमाणों की जालसाजी का प्रमाण नहीं होती। किसी इतिहासकार की आलोचना उसके वास्तविक पाठ, स्रोतों, चयन और निष्कर्षों के आधार पर होनी चाहिए।
पत्र की दूसरी समस्या यह है कि नालंदा, विक्रमशिला, मंदिर-विध्वंस, दासता, युद्ध और धार्मिक हिंसा जैसी अलग-अलग घटनाओं को “इस्लामी आतंक” के एक ही अखंड खांचे में रख दिया गया है। मध्यकाल में मंदिर तोड़े गए, लोग गुलाम बनाए गए, धार्मिक उत्पीड़न हुआ और आबादियां उजड़ीं। इन्हें छिपाना इतिहास के साथ अन्याय होगा। लेकिन महमूद गजनवी से बहादुरशाह ज़फ़र तक लगभग आठ शताब्दियों को आईएसआईएस और तालिबान का एक लंबा संस्करण मान लेना भी ऐतिहासिक सरलीकरण है।
सबसे कमजोर निष्कर्ष वह है जहां गुलाम बनाई गई हिंदू स्त्रियों से आज के भारतीय, पाकिस्तानी या बांग्लादेशी मुसलमानों की वंशावली अनुमानित की जाती है। इसके समर्थन में पत्र कोई जनसांख्यिकीय, आनुवंशिक या वंशावली प्रमाण प्रस्तुत नहीं करता। नामों के आधार पर किसी समुदाय का मातृवंश तय करना इतिहास नहीं हो सकता।
इसी तरह ज्योतिर्लिंगों, बौद्ध स्मारकों और व्यापक धार्मिक भूगोल के उदाहरण भारत की प्राचीन सांस्कृतिक अंतर्संबद्धता को अवश्य प्रमाणित करते हैं। यह अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है और भारतीय इतिहास-लेखन में इसे पर्याप्त गंभीरता मिलनी चाहिए। लेकिन सांस्कृतिक एकता और आधुनिक अर्थों में राजनीतिक राष्ट्र-राज्य दो अलग ऐतिहासिक श्रेणियां हैं।
यहां तिवारी जी की वर्तमान भूमिका इस बहस को और गंभीर बनाती है। वे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलगुरु हैं। किसी लेखक या पत्रकार को तीखी वैचारिक राय रखने का पूरा अधिकार है, लेकिन विश्वविद्यालय के अकादमिक नेतृत्व के साथ बौद्धिक उत्तरदायित्व भी बढ़ जाता है। जब किसी इतिहासकार को “गाली”, उसके लेखन को “आपराधिक मिलावट” और विश्वविद्यालयों के इतिहास विभागों को “उजाड़ कब्रिस्तान” कहा जाता है, तब सवाल केवल भाषा का नहीं रहता। सवाल यह भी होता है कि पत्रकारिता के विद्यार्थियों को क्या सिखाया जा रहा है, प्रमाण से असहमति या प्रतिपक्ष का नैतिक अवमूल्यन?
पत्रकारिता के शिक्षण में वैचारिकता अपने आप में दोष नहीं है। राष्ट्रवादी, मार्क्सवादी, उदारवादी, गांधीवादी या आंबेडकरवादी दृष्टि विद्यार्थी के सामने नए प्रश्न खोल सकती है। समस्या तब शुरू होती है जब दृष्टिकोण पद्धति का स्थान ले लेता है। पत्रकारिता की शिक्षा का मूल उद्देश्य स्रोत-समीक्षा, तथ्य-जांच, बहुस्रोत सत्यापन, विरोधी पक्ष को सुनना और तथ्य तथा मत के बीच भेद करना होना चाहिए। यदि किसी एक विचारधारा के निष्कर्ष पहले तय कर दिए जाएं और फिर उनके समर्थन में सामग्री चुनी जाए, तो पत्रकार नहीं, पक्षधर तैयार होते हैं। लेकिन यदि तिवारी जी की वैचारिकता विद्यार्थियों को हबीब और थापर को मूल रूप में पढ़ने, उनके आलोचकों को पढ़ने, फारसी तवारीखों और अन्य प्राथमिक स्रोतों की जांच करने तथा स्वयं निष्कर्ष निकालने के लिए प्रेरित करती है, तो वह उपयोगी बौद्धिक चुनौती बन सकती है।
यही कसौटी हबीब और थापर पर भी लागू होनी चाहिए। उनकी प्रतिष्ठा उनके हर निष्कर्ष को सत्य नहीं बनाती, जैसे उनकी सार्वजनिक आलोचना दशकों के शोध को स्वतः असत्य नहीं कर देती। इतिहासकार की विश्वसनीयता इस बात से तय होगी कि वह स्रोतों को कितनी ईमानदारी से प्रस्तुत करता है, विरोधी प्रमाणों से कैसे निपटता है और तथ्य तथा व्याख्या के बीच कितनी स्पष्टता रखता है।
इंटरनेट ने स्रोतों तक पहुंच आसान कर दी है, लेकिन स्रोत-समीक्षा की आवश्यकता समाप्त नहीं की। किसी फारसी तवारीख का अनुवाद मोबाइल स्क्रीन पर मिल जाना इतिहासकार के प्रशिक्षण को अप्रासंगिक नहीं करता। बल्कि स्रोत जितने अधिक उपलब्ध हुए हैं, उनकी प्रामाणिकता और पारस्परिक पुष्टि की जरूरत उतनी ही बढ़ी है।
इतिहास का भगवाकरण उतना ही अनुचित है जितना उसका वामपंथीकरण। मध्यकाल को रूमानी बनाना गलत था, तो उसे आठ सौ वर्षों का अखंड धार्मिक आतंक बनाना भी गलत होगा। हबीब और थापर को देवता मानने की आवश्यकता नहीं, लेकिन उन्हें खलनायक बनाकर भी इतिहास नहीं लिखा जा सकता।
असली चुनौती यह है कि बरनी भी मेज पर हों और अभिलेख भी, फारसी तवारीख भी और संस्कृत तथा क्षेत्रीय स्रोत भी, पुरातत्त्व भी और सिक्के-शिलालेख भी, हबीब और थापर भी और उनके गंभीर आलोचक भी। फिर प्रमाणों को बोलने दिया जाए। क्योंकि इतिहास में सबसे खतरनाक मिलावट वह है, जिसमें फैसला पहले लिख लिया जाता है और स्रोत बाद में तलाशे जाते हैं।
(तथाकथित पत्र तिवारी जी की वॉल पर और अन्यत्र सहजता से पढ़ा जा सकता है.)
मिथक, पूर्ण सत्य, अर्धसत्य और अतिशयोक्ति
इतिहास के बारे में सबसे लोकप्रिय धारणा यह है कि अतीत में जो कुछ हुआ, वही इतिहास है। मान लिया जाता है कि तथ्य कहीं सुरक्षित रखे हुए हैं और इतिहासकार का काम केवल उन्हें खोजकर पाठक के सामने रख देना है। इस धारणा में कुछ सच्चाई है, क्योंकि बिना प्रमाण और सत्यापन योग्य तथ्यों के इतिहास संभव नहीं। लेकिन इतिहास केवल तिथियों, पत्रों, भाषणों और घटनाओं का ढेर भी नहीं है।
अतीत में अनगिनत घटनाएँ घटती हैं। उनमें से बहुत कम का अभिलेख बनता है, उससे भी कम सामग्री सुरक्षित रहती है और सुरक्षित सामग्री का एक छोटा हिस्सा इतिहासकार के सामने पहुँचता है। फिर इतिहासकार तय करता है कि कौन सा प्रश्न पूछा जाए, किन स्रोतों को साथ पढ़ा जाए, किस घटना को कारण और किसे परिणाम माना जाए तथा किसी निर्णय का महत्व कैसे समझा जाए। इसलिए इतिहास न तो कल्पना है, न तथ्यों की निर्जीव सूची। वह प्रमाणों से नियंत्रित व्याख्या है। ई. एच. कार ने इतिहासकार और तथ्यों के संबंध को संवाद के रूप में समझने पर जोर दिया था, जबकि रिचर्ड जे. इवांस ने इस बात का बचाव किया कि व्याख्याओं की बहुलता के बावजूद अतीत के बारे में अधिक और कम विश्वसनीय कथनों के बीच अंतर किया जा सकता है।
“मिथक” शब्द सुनते ही प्रायः ऐसी कहानी का ध्यान आता है जो पूरी तरह काल्पनिक हो। धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भों में मिथक का अर्थ इससे कहीं अधिक व्यापक है। मिथक किसी समाज को संसार, उत्पत्ति, नायकत्व, नैतिकता और सामूहिक पहचान का अर्थ देता है। राजनीतिक जीवन में भी मिथक केवल झूठ नहीं होता। वह ऐसी कथा होता है जो किसी समुदाय को अपने अतीत और वर्तमान को समझने का सरल ढाँचा देती है। राजनीतिक मिथक पर विचार करते हुए किआरा बोत्तिची ने उसे एक स्थिर झूठ के बजाय ऐसी कथा-प्रक्रिया के रूप में समझा है जिस पर समय के साथ लगातार काम होता रहता है और जो राजनीति को अर्थ तथा महत्व प्रदान करती है। इनमें कुछ ऐतिहासिक तथ्य शामिल होते हैं, लेकिन कथा उन्हें इस तरह व्यवस्थित करती है कि एक व्यक्ति राष्ट्र की संपूर्ण सफलता या विफलता का प्रतीक बन जाता है।
मिथक से आशय ऐसे व्यापक रूप से प्रसारित दावे या आख्यान से है जो ऐतिहासिक व्यक्ति, घटना अथवा नीति के बारे में सरल और प्रभावशाली निष्कर्ष प्रस्तुत करता है, लेकिन जिसकी प्रमाण-आधारित जाँच आवश्यक है। इस परिभाषा में मिथक का असत्य होना पहले से तय नहीं माना जाएगा। किसी लोकप्रिय कथा की जाँच के बाद वह असत्य, प्रमाणहीन, भ्रामक, अर्धसत्य, संदर्भविहीन, विवादित, मुख्यतः सत्य या प्रमाणित सिद्ध होती है। “मिथक” शब्द केवल यह संकेत देगा कि दावा सार्वजनिक स्मृति में पर्याप्त प्रभावशाली हो चुका है और अब उसे स्रोतों की कसौटी पर परखना आवश्यक है। इस सावधानी का कारण सरल है। यदि किसी दावे को जाँच से पहले ही मिथक कहकर असत्य घोषित कर दिया जाए, तो शोध निष्कर्ष की खोज नहीं, पहले से तय फैसला सिद्ध करने की प्रक्रिया बन जाएगा।
राजनीतिक मिथक की शक्ति उसके विवरण में नहीं, उसकी संरचना में होती है। वह जटिल घटनाओं को पहचानने योग्य पात्रों और नैतिक भूमिकाओं में बाँट देता है। कोई नायक होता है, कोई खलनायक, कोई पीड़ित और कोई विश्वासघाती। विभाजन जैसी बहुस्तरीय ऐतिहासिक प्रक्रिया में ब्रिटिश साम्राज्य, कांग्रेस, मुस्लिम लीग, प्रांतीय राजनीति, सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व, युद्धोत्तर संकट, हिंसा और प्रशासनिक विघटन जैसे अनेक तत्व थे। राजनीतिक मिथक इन सबको हटाकर एक व्यक्ति की सत्ता-लालसा को कारण बना सकता है। दूसरी ओर प्रशंसात्मक मिथक उसी जटिलता को हटाकर यह कहता है कि लोकतंत्र एक व्यक्ति ने बचाया, वैज्ञानिक संस्थाएँ एक व्यक्ति ने बनाईं और आधुनिक भारत एक व्यक्ति की कल्पना से पैदा हुआ। दोनों कथाओं में पाठक को स्पष्ट नैतिक संतोष मिलता है। एक में दोषी मिल जाता है, दूसरी में उद्धारक। इतिहास इस संतोष को असुविधाजनक प्रश्नों से बाधित करता है।
पूर्ण असत्य अपेक्षाकृत सरल श्रेणी है। यदि किसी कथित पत्र का कोई मूल उपलब्ध नहीं, उसका लेटरहेड गलत है, प्रयुक्त पद उस तारीख को अस्तित्व में नहीं था और उसके शब्द किसी बहुत बाद की पुस्तक से उठाए गए हैं, तो उसे फर्जी कहा जा सकता है। यदि किसी तस्वीर में नेहरू के साथ दिखाई देने वाली महिला वास्तव में उनकी बहन है और वायरल संदेश उसे विदेशी प्रेमिका बताता है, तो परिचय असत्य है। यदि कोई उद्धरण उनके नाम से प्रसारित हो रहा है, लेकिन उनके भाषणों, पत्रों, पुस्तकों और समकालीन समाचारपत्रों में उसका कोई स्रोत नहीं मिलता, तो उसे प्रमाणहीन कहा जाएगा। पूर्ण असत्य की पहचान के लिए भी शोध चाहिए, पर निष्कर्ष का स्वरूप स्पष्ट होता है। दस्तावेज या तो उस समय का है अथवा नहीं, चित्र में व्यक्ति की पहचान सही है अथवा गलत, उद्धरण का प्रमाण उपलब्ध है अथवा अनुपलब्ध।
अर्धसत्य अधिक कठिन और अधिक प्रभावशाली होता है। उसमें इतना सत्य अवश्य होता है कि कथा विश्वसनीय लगे। उदाहरण के लिए, नेहरू समृद्ध परिवार से आते थे, अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त थे और उनकी जीवनशैली सामान्य भारतीय से अलग थी। ये तथ्य सही हैं। इनसे यह कथा बनाई जा सकती है कि वे भारतीय समाज को जानते ही नहीं थे, अंग्रेजों के सांस्कृतिक प्रतिनिधि थे और स्वतंत्रता आंदोलन में उनका संघर्ष केवल दिखावा था। यहाँ मूल तथ्य असत्य नहीं, लेकिन उनसे निकाला गया व्यापक निष्कर्ष उस सामग्री को हटा देता है जो कथा में व्यवधान डालती है। किसानों के बीच उनकी राजनीति, जेल-अवधियाँ, औपनिवेशिक निगरानी, साम्राज्यवाद-विरोधी लेखन और ब्रिटिश सरकार से टकराव को हटाए बिना कहानी उतनी सरल नहीं रह जाती। अर्धसत्य का यही स्वभाव है। वह झूठ की तरह बाहर से नहीं आता, बल्कि सत्य के भीतर चयन करके नया अर्थ बनाता है।
अर्धसत्य की पहचान के लिए यह पूछना उपयोगी होगा कि दावे में क्या बताया गया है और क्या छिपाया गया है। यदि कहा जाता है कि नेहरू जेल में पुस्तकें लिखते थे, तो कथन सही है। उन्होंने जेल में व्यापक अध्ययन और लेखन किया। लेकिन यदि इससे यह निष्कर्ष निकाला जाए कि उनका जेल जीवन आराम और राजकीय संरक्षण का प्रमाण था, तो उन जेलों की अवधि, स्वतंत्रता का अभाव, पारिवारिक वियोग, बीमारी, औपनिवेशिक नियम और अन्य राजनीतिक बंदियों के अनुभवों को भी देखना होगा। इसी तरह यह कहना सही होता है कि गांधी ने 1946 में नेहरू के नेतृत्व का समर्थन किया। लेकिन यदि इस तथ्य को इस रूप में प्रस्तुत किया जाए कि पटेल औपचारिक रूप से प्रधानमंत्री निर्वाचित हो चुके थे और गांधी ने चुनाव परिणाम पलट दिया, तो कांग्रेस अध्यक्ष के नामांकन, अंतरिम सरकार की संरचना और प्रधानमंत्री पद के तत्कालीन चयन की वास्तविक प्रक्रिया को छिपा दिया जाता है। अर्धसत्य अक्सर उस बात से पहचाना जाता है जिसे वह कहता नहीं है।
अतिशयोक्ति तथ्य को पूरी तरह नष्ट नहीं करती। वह उसके आकार, महत्व, उद्देश्य या परिणाम को इतना बढ़ा देती है कि पाठक को विकृत चित्र दिखाई देने लगता है। राजनीति में यह तकनीक अत्यंत उपयोगी है, क्योंकि सामान्य तथ्य कम उत्तेजक होता है। यदि कहा जाए कि नेहरू की जेल स्थितियाँ कुछ अन्य कैदियों की तुलना में बेहतर होती थीं, तो पाठक पूछेगा कि राजनीतिक कैदियों की श्रेणियाँ क्या थीं, वर्ग और सामाजिक प्रतिष्ठा का कितना प्रभाव था तथा अन्य नेताओं को क्या सुविधाएँ मिलती थीं। यदि कहा जाए कि नेहरू महल जैसी जेलों में रहते थे, तो जटिल प्रश्न की जगह तुरंत एक दृश्य बन जाता है। उसी दृश्य में पेरिस भेजे गए कपड़े और विशेष विमान से मँगाई गई सिगरेट जोड़ दी जाए, तो कथा तथ्य की तुलना में अधिक यादगार हो जाती है।
अतिशयोक्ति केवल विरोधियों का उपकरण नहीं। प्रशंसात्मक स्मृति भी इसका उपयोग करती है। किसी संस्था की स्थापना में प्रधानमंत्री की राजनीतिक स्वीकृति और संरक्षण महत्वपूर्ण होता है। लेकिन इस भूमिका को “उन्होंने संस्था बनाई” कहने पर वैज्ञानिकों, मंत्रियों, समितियों, प्रशासकों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का योगदान गायब हो जाता है। समय के साथ “उन्होंने स्थापना का समर्थन किया” बदलकर “वह संस्था उनकी देन है” और फिर “उन्होंने अकेले आधुनिक भारत बनाया” होता है। भाषा का छोटा परिवर्तन ऐतिहासिक श्रेय का पूरा ढाँचा बदल देता है। इसलिए इस पुस्तक में “स्थापित किया”, “आरंभ किया”, “स्वीकृति दी”, “राजनीतिक संरक्षण दिया”, “परिकल्पना की” और “निर्माण किया” जैसे शब्दों को परस्पर पर्याय नहीं माना जाना चाहिए। ऐतिहासिक उत्तरदायित्व की तरह ऐतिहासिक श्रेय भी सटीक क्रियाओं की माँग करता है।
अतिशयोक्ति का एक और रूप संख्याओं और समय-अवधियों में दिखाई देता है। किसी नीति का प्रभाव कई दशकों में बना होता है, लेकिन उसे एक प्रधानमंत्री के पूरे शासनकाल का तात्कालिक परिणाम बताया जाता है। कालक्रम को सिकोड़ देना अतिशयोक्ति को विश्वसनीय बनाने का प्रभावी साधन है।
(मेरी लिखी जा रही एक पुस्तक का अंश)



