इतिहास:जब दूध पर भी पुलिस नियंत्रण था उत्तर प्रदेश में

कल्पना कीजिए, आप 1976 में उत्तर प्रदेश से दिल्ली की तरफ जा रहे हैं। आपकी गाड़ी में दूध है। साथ में खोया भी है। रास्ते में पुलिस रोक ले रही है। सामान की तलाशी ली जा रही। दूध और खोया जब्त हो गया। यहां तक कि जिस गाड़ी में दूध ले जा रहे थे, वो भी कब्जे में चली गई।

उत्तर प्रदेश में एक समय सचमुच ऐसा कानून था, जब पुलिस दूध पर नजर रखती थी।

ये सब 1976 में हो रहा था। लेकिन, इसकी बुनियाद दो साल पहले ही रखी जा चुकी थी, उत्तर प्रदेश सरकार गर्मियों में दूध को लेकर सख्त हो चुकी थी। वजह सीधी थी। मई-जून आते ही दूध का उत्पादन कम हो जाता था। पशुओं के चारे और मौसम का असर पड़ता था। दूसरी तरफ शहरों में दूध की मांग बनी रहती थी।

सरकार के सामने समस्या यह थी कि जो दूध पीने के लिए बाजार में आना चाहिए, उसका एक हिस्सा खोया, रबड़ी, पनीर, क्रीम और मिठाइयों में चला जाता था। तब सरकार ने फैसला किया कि पहले पीने का दूध का इंतजाम किया जाए। मिठाई-विठाई बाद में बनेगी।

इसी के चलते 2 अप्रैल 1974 को सख्त आदेश आया। तब मुख्यमंत्री कांग्रेस के हेमवती नंदन बहुगुणा थे। आदेश लखनऊ, बाराबंकी, रायबरेली, हरदोई, सीतापुर, सुल्तानपुर, इटावा, फतेहपुर, देहरादून और मुरादाबाद जैसे जिलों में लागू हुआ। अदालत के रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि इस कदम का मकसद गर्मियों में जनता को पीने लायक दूध पहुंचाना था।

अब देखिए सरकार ने क्या किया। दूध से खोया बनाने पर रोक लगा दी गई। रबड़ी नहीं बना सकते थे। पनीर बनाना तो सरकार की नजर में दूध की सबसे बड़ी बर्बादी थी। क्रीम बनाने पर रोक भी थी। ऐसी तमाम मिठाइयां बनाने और बेचने पर भी पाबंदी आयद थी, जिनमें दूध या दूध से बना कोई उत्पाद इस्तेमाल होता हो।

अब सवाल उठता है कि फिर कुल्फी का क्या हुआ होगा? चूंकि मौसम गर्मियों का था, तो सरकार ने कुल्फी के मामले में थोड़ी रहमदिली दिखाई। आइसक्रीम, कुल्फी और कुल्फा बनाया और बेचा जा सकता था। बस शर्त थी कि उनमें खोया, रबड़ी या क्रीम का इस्तेमाल न हो।

हलवाई चुप नहीं बैठे।

मुरादाबाद के कुछ हलवाई और खोया बनाने वाले लोग इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंच गए। उन्होंने कहा कि सरकार उनके कारोबार पर रोक लगा रही है। कोई खोया बनाता था, कोई रबड़ी, कोई पनीर और कोई दूध की मलाई से मक्खन और घी का कारोबार करता था।

अदालत में भी बहस हुई कि खोया और रबड़ी पर रोक है, तो कुल्फी को क्यों छोड़ा गया। सरकार की दलील थी कि कुल्फी या आइसक्रीम को सीधे तरल दूध का विकल्प माना जा सकता है। इसलिए उन पर रहम दिखाया गया। लेकिन, खोया और दूसरी चीजें बनाने में पीने लायक ज्यादा दूध लग जाता है।

अदालत के सामने भी काफी दिलचस्प सवाल था। क्या सरकार सिर्फ इसलिए किसी का कारोबार रोक सकती है कि आम लोगों के पीने के लिए दूध बचाया जा सके?

हाई कोर्ट ने सरकार के तर्क को स्वीकार किया। फैसले में कहा गया कि भारत में बहुत से लोगों के लिए दूध प्रोटीन का अहम जरिया है। बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर लोगों के लिए भी पीने लायक दूध जरूरी है। गर्मियों में दूध का उत्पादन घटता है। अगर वही दूध बड़ी मात्रा में दूसरे उत्पादों में बदल दिया जाए तो बाजार में तरल दूध की कमी बढ़ सकती है।

लेकिन असली ‘दूध पर पुलिस का पहरा’ वाला दौर 1976 में और ज्यादा सख्त रूप में सामने आया।

इस बार उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री कांग्रेस के ही नारायण दत्त तिवारी थे। समय भी असाधारण ही था। देश में आपातकाल चल रहा था। 1976 में उत्तर प्रदेश दूध अधिनियम बनाया गया। इसके जरिए सरकार ने दूध के उत्पादन से लेकर सप्लाई और मिठाई तक को कंट्रोल करने लिए स्थायी कानूनी ढांचा तैयार किया।

इसके कुछ महीने बाद 23 अगस्त 1976 को एक और आदेश आया। नाम था… उत्तर प्रदेश मिल्क एंड मिल्क प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट कंट्रोल ऑर्डर। नाम भले लंबा था, लेकिन मतलब आसान था। उत्तर प्रदेश का दूध बाहर ले जाना है तो सरकार की इजाजत चाहिए। खोया और दूसरे दूध उत्पाद भी बिना परमिट बाहर नहीं ले जा सकते थे।

सरकार की चिंता थी कि राज्य में तरल दूध की आपूर्ति बनी रहे। साथ ही वो लोगों को उचित दाम पर उपलब्ध हो। इसलिए उत्तर प्रदेश की सीमा के पास आठ किलोमीटर तक के पूरे इलाके को ‘बॉर्डर एरिया’ मान लिया गया। बाहर से दूध उत्पाद लेकर इस क्षेत्र में जाना भी बिना परमिट स्मगलिंग जितना मुश्किल हो सकता था।

और यहीं से पुलिस की एंट्री होती है। सब-इंस्पेक्टर या उससे ऊपर का पुलिस अधिकारी किसी व्यक्ति को रोक सकता था। नाव की तलाशी ले सकता था। मोटर या दूसरी गाड़ी की तलाशी ले सकता था। दूध के डिब्बे की जांच कर सकता था। अगर किसी जगह दूध जमा होने या दूध से प्रतिबंधित चीजें बनने का शक है, तो परिसर की तलाशी भी ली जा सकती थी।

दूध जब्त हो सकता था। दूध से बने उत्पाद जब्त हो सकते थे। उनके पैकेट और डिब्बे भी जब्त हो सकते थे। इतना ही नहीं, जिस गाड़ी, नाव या दूसरे साधन से दूध ले जाया जा रहा हो, उसे भी जब्त किया जा सकता था। मतलब कि गजब का ही दौर था।

कानून पढ़ते-पढ़ते एक दिलचस्प बात सामने आती है। सरकार ने यह भी समझा था कि हर यात्री दूध लेकर सीमा पार करे तो उसे तस्कर नहीं माना जा सकता। इसलिए नियम में निजी इस्तेमाल के लिए छूट दी गई। एक यात्री 10 किलो तक दूध ले जा सकता था। 5 किलो तक घी ले जा सकता था। 1 किलो तक मक्खन ले जा सकता था। अगर कोई अपने साथ दूध से बना प्रसाद ले जा रहा है, तो 5 किलो तक की छूट थी।

मतलब कल्पना कीजिए उस दौर की स्थिति।

आपके पास 9 किलो दूध है तो शायद निजी इस्तेमाल का सामान माना जाएगा। लेकिन उससे ज्यादा हुआ तो अधिकारी सवाल पूछ सकता था। आपके पास मंदिर का प्रसाद है तो उसकी भी वजन सीमा थी। और यह सब किसी राशन कार्ड की बात नहीं थी। दूध की बात थी।

दिलचस्प बात यह है कि सरकार खुद भी मानती थी कि हर दूध का कारोबार बंद नहीं किया जा सकता। इसलिए सरकारी डेयरियों और कुछ पंजीकृत संस्थाओं को छूट दी गई। केंद्र या राज्य सरकार से जुड़ी डेयरियां अलग नियमों के तहत काम कर सकती थीं।

इससे उस दौर की व्यवस्था का एक दिलचस्प चेहरा सामने आता है। एक तरफ दूध की कमी थी। दूसरी तरफ सरकार चाहती थी कि दूध का उद्योग भी चले। तीसरी तरफ आम आदमी को पीने का दूध चाहिए था। और चौथी तरफ हलवाई का कारोबार था।

इसलिए सरकार ने दूध को सिर्फ बाजार के भरोसे नहीं छोड़ा। उसने तय किया कि कौन दूध ले जाएगा, कौन नहीं। कहां जाएगा। कितना जाएगा। किस चीज में बदलेगा। और जरूरत पड़ी तो पुलिस रोककर जांच करेगी।

ये कहानी सिर्फ सरकारी सख्ती की नहीं है। इसके पीछे उस दौर की अर्थव्यवस्था भी है।

आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है। लेकिन 1970 के दशक का भारत वैसा नहीं था। ऑपरेशन फ्लड शुरू तो हो चुका था। मगर दूध उत्पादन और सप्लाई का ढांचा अभी उस स्तर पर नहीं पहुंचा था, जहां आज है। शहरों में पीने लायक दूध की नियमित सप्लाई अपने आप में बड़ी चुनौती थी।

उत्तर प्रदेश में वो सचमुच ऐसा दौर था, जब सड़क पर पुलिस के सामने सिर्फ यह सवाल नहीं था कि गाड़ी में शराब है, हथियार है या तस्करी का सामान। कभी-कभी सवाल यह भी था… इसमें दूध कितना है?

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