कांग्रेस का दलित दांव: पंजाब से 2029 लोकसभा चुनाव तक को नारे की जरूरत

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कांग्रेस और शुद्धिकरण की राजनीति, मल्लिकार्जुन खरगे के ‘दलित’ मोहरे से राहुल गांधी लगा रहे दूर का चुनावी दांव
कांग्रेस पार्टी उत्तराखंड के हलद्वानी शुद्धिकरण विवाद को भुनाने के लिए जी तोड़ मेहनत कर रही है। कांग्रेस को इसमें सबसे पहले पंजाब में मुख्यमंत्री की कुर्सी नजर आ रही है, जिसका प्रयोग 2029 तक जारी रह सकती है।
नई दिल्ली 01 सितंबर 2026 : उत्तराखंड के हलद्वानी की घटना को जिस तरह से कांग्रेस ने देर तक सोए रहने के बाद जोर-शोर से उठाने की कोशिशें शुरू की हैं, उसके पीछे की राजनीति साफ होती दिख रही है। क्योंकि, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने मानसून सत्र के आखिरी दिन ही हलद्वानी वाला कथित ‘शुद्धिकरण’ बम संसद में फोड़ा था। लेकिन, राहुल गांधी ने इसपर प्रतिक्रिया देते-देते काफी दर कर दी। अब लगा रहा है कि पार्टी के पास इसपर एक रणनीति तैयार है।
दलित वाले दांव से सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने की कांग्रेस ने बनाई रणनीति

मानसून सत्र के आखिरी दिन राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने आरोप लगाया था कि हलद्वानी में उनकी रैली के बाद जगह का कथित ‘शुद्धिकरण’ किया गया, क्योंकि वे दलित हैं। हफ्ते गुजर जाने के बाद राहुल गांधी ने एक प्रेस कांफ्रेंस में इस मुद्दे को उठाया, जिसके लिए पूरी तैयारी की गई थी। अब इसी मामले में राहुल गांधी पर भी एक एफआईआर हो गई है तो कांग्रेस ने इसे अपने सियासी अभियान का बड़ा हिस्सा बना लिया है।

पंजाब चुनाव में कांग्रेस की आखिरी उम्मीद
अगर कांग्रेस की ओर से देर से उठाए जा रहे इस मुद्दे के पीछे की सियासत समझने की कोशिश करें तो लगता है कि उसे इसमें पंजाब विधान सभा चुनाव में डूबते को तिनके का सहारा नजर आ रहा है। इसकी वजह ये है कि पंजाब में दलितों या अनुसूचित जाति की आबादी लगभग 32 प्रतिशत है।

भाजपा-अकाली गठबंधन की अटकलें ने बढ़ाई टेंशन
काफी समय से कांग्रेस के पक्षधर कुछ पॉलिटिकल पंडितों को पंजाब में आम आदमी पार्टी के खिलाफ इस बार पार्टी में काफी दम नजर आ रहा था। क्योंकि, वहां भाजपा शहरी क्षेत्रों के अलावा ग्रामीण इलाकों में अभी तक कुछ खास नहीं कर पाई है। लेकिन, अचानक पिछले कुछ हफ्तों में भाजपा और अकाली दल के शीर्ष नेतृत्व के बीच चुनावी खिचड़ी पकने की अटकलें तेज हो चुकी हैं। यही अटकलें कांग्रेस के रणनीतिकारों के पांवों के नीचे की जमीन खींच रहे हैं।
2022 में फेल कर गया था दलित सीएम वाला कार्ड
2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव दलित वोट बैंक का बड़ा हिस्सा आम आदमी पार्टी के हिस्से में गया। उसकी अप्रत्याशित जीत यह कहानी खुद बयां करती है। चुनाव से कुछ महीने पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह से मुंह मोड़कर कांग्रेस ने चरणजीत सिंह चन्नी का दांव चला था, लेकिन वह पार्टी के लिए खोटे सिक्के ही साबित हुए थे। कांग्रेस के पक्ष में उतना दलित वोट नहीं खींच सके कि आप पर ब्रेक लगा सकें।

‘संविधान खतरे में’ आइडिया भुनाने की  आशा
प्रदेश कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में चरणजीत सिंह चन्नी पहले से ही नाराज बताए जाते हैं। ऐसे में कांग्रेस को लगता है कि ‘दलित खतरे में हैं’,जैसे नारे ही उसे भाजपा-अकाली दल के संभावित गठबंधन के बावजूद भी सत्ता में वापसी की उम्मीदें बनाए रख सकते हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियां ‘संविधान खतरे में’ है कि चुनावी जुमले का काफी स्वाद भी चख चुकी है।

उप्रें  2024 दोहराने के भरोसे में कांग्रेस
लोकसभा चुनाव में’संविधान खतरे में’ का नैरेटिव इंडिया ब्लॉक के हक में सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में काम कर गया था। यहां समाजवादी पार्टी के समर्थक भी यह देखकर हैरान थे कि बड़ी संख्या में जाटव हाथी छोड़कर पंजे और साइकिल पर बटन दबाने जा रहे हैं। कांग्रेस वही उम्मीद ‘दलित खतरे में हैं’ वाले नारे में भी देख रही है। विधानसभा चुनाव  उत्तर प्रदेश  में भी पंजाब के साथ ही होने हैं, जहां करीब 20 प्रतिशत दलित हैं।

बसपा और एएसपी और भाजपा से चुनौती
अलबत्ता, बसपा और चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के रहते उत्तर प्रदेश में दलित वोट बैंक में सेंध लगाना विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और सपा को उतना आसान नहीं होगा। ऊपर से भाजपा ने भी अपनी सरकारों की कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से इस वर्ग में एक मजबूत पकड़ बना रखी है। खासकर गैर-जाटव दलितों में। लेकिन, कांग्रेस को उम्मीद जरूर है कि ‘संविधान खतरे में’ वाला कमाल इस बार यूपी में ‘दलित खतरे में हैं’ नारा भी कर सकता है।
2029 तक को कांग्रेस को नारा मिलने की आशा
अगर राहुल गांधी जैसे नेता वाकई दूर की सोचने लगे हैं तो उनकी नजर यह नैरेटिव 2029 के लोकसभा चुनाव को भी हो सकता है। देश भर में अनुसूचित जाति की आबादी लगभग 16 प्रतिशत है और कांग्रेस को लगता है कि अगर यह दांव काम कर गया तो 2024 में बीजेपी को पूर्ण बहुमत से रोक सकी थी, तो अबकी बार वह खुद सत्ता के करीब भी पहुंच सकती है।

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