विष्णु तिवारी: झूठे SC/ST एक्ट आरोप से जेल में बीते 20 साल, खत्म हुआ परिवार, गलत सजा और न्याय में देरी
Sc St Act And Vishnu Tiwari Case What The Allahabad High Court Actually Held
विष्णु तिवारी: झूठे SC/ST एक्ट आरोप से जेल में बीते 20 साल, खत्म हुआ परिवार, गलत सजा और न्याय में देरी की पूरी कहानी
Vishnu Tiwari Case : उत्तर प्रदेश के ललितपुर के विष्णु तिवारी की कहानी भारतीय न्याय व्यवस्था में गलत सजा और न्यायिक देरी की एक बेहद गंभीर मिसाल है। झूठे SC/ST एक्ट में क्या सिर्फ ब्राह्मण होने की वजह से विष्णु तिवारी ने खोया अपना सब कुछ ?
Authored by: मनीष राज
Updated: 26 Aug 2026, 8:40 am IST|नवभारतटाइम्स.कॉम
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नई दिल्ली : विष्णु तिवारी की कहानी .. भारत की संसद से पास SC/ST Act की धाराओं के गलत उपयोग की मिसाल है। उत्तर प्रदेश के ललितपुर के जाति से ब्राह्मण विष्णु तिवारी, जब सिर्फ 23 साल के थे तो साल 2000 में SC/ST Act के एक आरोप में जेल में डाल दिए गए। और मार्च 2021 में जब वे आगरा सेंट्रल जेल से बाहर निकले, तब वे 43 वर्ष के हो चुके थे। दो दशकों में उनकी जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण दौर जेल में गुजर चुका था। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक इस दौरान उनके माता-पिता और दोनों भाइयों की मृत्यु हो गई, परिवार की जमीन बिक गई और रिहाई के बाद उनके सामने फिर से जिंदगी शुरू करने का सवाल खड़ा था।
SC/ST Act and Vishnu Tiwari Case
SC/ST एक्ट से उम्रकैद, 20 साल बाद बरी: क्या हुआ था विष्णु तिवारी केस में?
लेकिन विष्णु तिवारी की कहानी को केवल 20 साल जेल के दर्द के रूप में देखना अधूरा होगा। असली सवाल यह है कि ट्रायल कोर्ट ने किस आधार पर सजा दी, SC/ST Act की धाराएं कैसे लागू हुईं, हाईकोर्ट ने फिर क्यों बरी कर दिया और किन सबूतों को निर्णायक माना और उनकी अपील 16 साल तक क्यों आगे नहीं बढ़ सकी? यही वे कानूनी तथ्य हैं जो इस मामले को गलत सजा और आपराधिक न्याय प्रणाली में देरी के बड़े उदाहरण के तौर पर सामने लाते हैं।
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सितंबर 2000 की तथाकथित घटना और SC/ST Act में विष्णु तिवारी पर लगे आरोप
इस मामले में हाईकोर्ट के फैसले में दर्ज अभियोजन की कहानी के अनुसार, 16 सितंबर 2000 को शिकायतकर्ता महिला खेतों की ओर जा रही थी। आरोप था कि विष्णु तिवारी ने झाड़ियों के पास उसे पकड़कर बलात्कार किया, जातिसूचक गालियां दी, और शिकायत करने पर जान से मारने की धमकी दी।
इस तथाकथित घटना के तीन दिन बाद, 19 सितंबर को स्थानीय थाने में शिकायत दर्ज हुई। तब विष्णु तिवारी पर भारतीय दंड संहिता की IPC की धारा 376 (बलात्कार) और 506 (आपराधिक धमकी) के अलावा SC/ST Act की धारा 3(1)(xii) और 3(2)(v) लगाई गई थीं।
उस समय लागू प्रावधानों के तहत मामला इसलिए भी गंभीर हो गया था क्योंकि अभियोजन ने जानबूझ कर पीड़िता के अनुसूचित जाति से होने को SC/ST Act की धाराओं के आरोपों से जोड़ा था।
लेकिन विष्णु तिवारी ने खुद को निर्दोष बताया और आरोपों से इनकार किया। पर SC/ST Act के कड़े प्रावधानों की वजह से उनकी नहीं सुनी गई। बचाव पक्ष ने बाद में अदालत में यह भी बताया कि गांव की एक जमीन को लेकर दोनों पक्षों के बीच भूमि विवाद था और इसी वजह से उन्हें मामले में फंसाया गया। लेकिन सारे तर्क निरर्थक साबित हुए… युवा विष्णु तिवारी का भविष्य अंधेरे में डूब गया।
Key Legal Facts in Vishnu Tiwari Case and sc st act<br>
ट्रायल कोर्ट ने विष्णु तिवारी को दी सजा
24 फरवरी 2003 को ललितपुर के सेशन जज ने विष्णु को IPC की धारा 376 के तहत दोषी ठहराकर 10 साल की सश्रम कैद और ₹2,000 जुर्माना लगाया। इसके अलावा SC/ST Act की धारा 3(2)(v), साथ में धारा 3(1)(xii), के तहत उम्रकैद और ₹2,000 जुर्माना लगाया गया। अदालत ने सभी सजाओं को साथ-साथ चलाने का आदेश दिया था।
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यहां एक लीगल एंगल समझना होगा। दरअसल, विष्णु को 20 साल की SC/ST Act की सजा नहीं मिली थी। उन्हें SC/ST Act के तहत उम्रकैद मिली थी, जबकि बलात्कार के आरोप में 10 साल की सजा थी और दोनों साथ चलनी थीं। लेकिन वह लगभग 20 साल जेल में रहे क्योंकि उनकी उम्र कैद की दोषसिद्धि बाद में हाईकोर्ट ने पलट दी। बाद में हाई कोर्ट में कानून की कसौटी पर विष्णु तिवारी पर लगे दोनों आरोप झूठे पाए गए।
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इलाहाबाद हाई कोर्ट में मामला और अदालत का तथ्यों पर जोर
इलाहाबाद हाई कोर्ट में, ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ विष्णु के परिवार वालों ने बड़ी मुश्किल से अपील कर विष्णु को निर्दोष बताते हुए जेल से रिहा करने की गुहार लगाई। लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक यह अपील Defective matter के रूप में करीब 16 साल तक आगे नहीं बढ़ सकी। और विष्णु जेल में उस गुनाह की सजा काटते रहे जो उन्होेने किया ही नहीं। फिर जब हाई कोर्ट ने मामले पर सुनवाई शुरु की तो उसने मामले के तथ्यों पर गौर करना शुरु किया ….
1 .मेडिकल रिपोर्ट ने केस की दिशा कैसे बदली?
हाईकोर्ट ने मेडिकल साक्ष्य को भी महत्वपूर्ण माना। अदालत के सामने मौजूद मेडिकल रिकॉर्ड में डॉक्टर ने जबरन यौन संबंध के स्पष्ट संकेत नहीं पाए थे। रिपोर्ट में शुक्राणु नहीं मिला था और डॉक्टर ने बलात्कार के बारे में कोई निश्चित राय नहीं दी थी। हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि कथित घटना के बावजूद शरीर पर ऐसे मेडिकल संकेत नहीं थे जो अभियोजन की कहानी से मेल खाते हों। अदालत ने साफ कहा कि IPC की धारा 376 के तहत दोषसिद्धि बनाए रखने के लिए उपलब्ध मेडिकल और मौखिक साक्ष्य को समग्र रूप से देखना होगा। इसके साथ ही अदालत ने अभियोजन के गवाहों के बयानों में कई विरोधाभास भी नोट किए।
2. SC/ST Act की धारा 3(2)(v) पर हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
दरअसल, यही इस केस का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू है। धारा 3(2)(v) के तहत गंभीर अपराध को SC/ST Act का अपराध बनाने के लिए केवल यह तथ्य पर्याप्त नहीं था कि पीड़ित व्यक्ति अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से है। उस समय लागू प्रावधान की कानूनी कसौटी में अपराध का उस व्यक्ति के SC/ST समुदाय से संबंधित होने के कारण किया जाना महत्वपूर्ण था। विष्णु की अपील में इसी बिंदु पर सुप्रीम कोर्ट के Sadashiv Ramrao Hadbe v. State of Maharashtra के फैसलों पर भरोसा किया गया। बचाव पक्ष ने कहा कि रिकॉर्ड में यह साबित नहीं था कि अपराध पीड़िता की जाति के कारण किया गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल जज ने केवल इस आधार पर SC/ST Act की धारा 3(2)(v) के तहत दोषसिद्धि कर दी कि पीड़िता अनुसूचित जाति की थी। हाईकोर्ट ने इस तर्क को रिकॉर्ड के विपरीत और अस्थिर माना।
3. FIR में तीन दिन की देरी और गवाहों के बयान भी बने अहम तथ्य
घटना 16 सितंबर 2000 की बताई गई थी, जबकि FIR 19 सितंबर को दर्ज हुई। हाईकोर्ट ने इस तीन दिन की देरी को भी रिकॉर्ड में मौजूद एक महत्वपूर्ण परिस्थिति के रूप में देखा। इसके अलावा अदालत ने गवाहों के क्रॉस एक्जाम में कई विसंगतियां औऱ विरोधाभास पाये गए। इन विरोधाभासों को मेडिकल साक्ष्य और अन्य परिस्थितियों के साथ जोड़कर अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि दोषसिद्धि सुरक्षित नहीं रखी जा सकती। हालांकि बचाव पक्ष शुरु से कह रहा था कि दोनों पक्षों के बीच भूमि विवाद था और शिकायतकर्ता पक्ष ने इसी विवाद के कारण विष्णु तिवारी को फंसाया गया। हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद परिस्थितियों को देखते हुए इस संभावित मकसद को खास माना।
4. हाई कोर्ट ने विष्णु तिवारी को किया बरी
28 जनवरी 2021 को जस्टिस डॉ. कौशल जयेंद्र ठाकेर और जस्टिस गौतम चौधरी की पीठ ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट दिया और विष्णु तिवारी को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि यदि किसी अन्य मामले में उनकी जरूरत नहीं है तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए।
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संरक्षणकारी कानून के अस्तित्व और उसके दुरुपयोग पर सवाल
विष्णु तिवारी की कहानी को यह कहकर खत्म करना आसान है कि SC/ST Act ने उनकी जवानी के 20 साल खा लिए। 2021 में रिहाई तक मीडिया रिपोर्टों के अनुसार तब तक दुखों के गम के बोझ से उनके माता-पिता और दोनों भाई नहीं रहे थे और परिवार की जमीन भी बिक चुकी थी। इस मामले की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि दोषसिद्धि पलटने में लगभग दो दशक लग गए। इसलिए विष्णु तिवारी केस का सबसे सटीक कानूनी सबक है..किसी संरक्षणकारी कानून का अस्तित्व और उसका दुरुपयोग, दो अलग अलग सवाल हैं; और किसी व्यक्ति को गलत तरीके से दोषी ठहराए जाने की कीमत सिर्फ उसकी जेल की अवधि नहीं होती, बल्कि वह समय, परिवार और जीवन भी हो सकता है जो वापस नहीं आता।

