एससी-एसटी कानून का दुरुपयोग:गाजियाबाद में 8.90 लाख की वसूली

Allahabad High Court Concern Over Misuse Of Sc/st Act 8.9 Lakh Recovered In Ghaziabad
उत्तर प्रदेश में SC-ST एक्ट के बढ़ते दुरुपयोग पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जताई चिंता, गाजियाबाद में 890000 की हुई रिकवरी
उत्तर प्रदेश में एससी-एसटी एक्ट के बढ़ते दुरुपयोग पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चिंता जताई है। गाजियाबाद में एससी-एसटी एक्ट में 15 से ज्यादा मामले फर्जी पाए गए हैं और इनमें दी गई 890000 रुपये की सहायता राशि वापस ले ली गई है।

गाजियाबाद 21 सितंबर 2026 : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश में एससी-एसटी एक्ट के बढ़ते दुरुपयोग पर चिंता जताई है। साथ ही कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को कठोर निर्देश जारी कर पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता और गहन भौतिक सत्यापन सुनिश्चित करने को कहा है। गाजियाबाद में पिछले डेढ़ साल में एससी-एसटी एक्ट के 15 से अधिक मामले फर्जी पाए गए हैं और इनमें दी गई सहायता राशि वापस ले ली गई है। यह रिकवरी 8 लाख 90 हजार रुपये की है।
Misuse of SC ST Act
एससी-एसटी एक्ट का दुरुपयोग (एआई इमेज)

इसके अलावा अप्रैल 2025 से अब तक जिले का समाज कल्याण विभाग कुल 186 मामले में दो करोड़ रुपये से अधिक की सहायता राशि दे चुका है। झांसी में एक ही परिवार के कई मामलों में लाखों रुपये की राहत राशि लेने की घटना के संज्ञान में आने के बाद हाईकोर्ट ने कठोर मॉनिटरिंग के निर्देश जारी किए हैं। इसके बाद गाजियाबाद में समाज कल्याण विभाग और जिला समितियों ने ऐसे क्लेम की जांच तेज की।

झूठे दावेदारों के खिलाफ विधिक कार्रवाई शुरू
जांच में पाया कि 15 से 16 मामलों में गलत तथ्यों या झूठी शिकायतों के आधार पर मदद ली गई थी। हाईकोर्ट के आदेश के बाद गाजियाबाद में ऐसे मामलों की जांच तेज कर दी गई है। अधिकारियों के अनुसार, अनुचित दावेदारों के खिलाफ विधिक कार्रवाई भी चल रही है।

हाईकोर्ट का रुख और सरकार के निर्देश
प्रदेश में एससी-एसटी फंड के दुरुपयोग की आशंकाओं पर हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार को प्रभावी सुपरवाइजरी और रेगुलेटरी तंत्र बनाने के निर्देश दिए हैं। स्पष्ट किया कि राहत राशि केवल पात्र पीड़ितों के पुनर्वास के लिए है, न कि निजी स्वार्थ और कानून का दुरुपयोग करने वालों के लिए। इस पर राज्य सरकार ने जिला स्तरीय कल्याण समितियों को निर्देश दिए हैं कि मामलों की गंभीरता के अनुसार, मुआवजा जारी करने से पहले जांच की जाए। एक ही व्यक्ति या परिवार की बार-बार कराई जा रही एफआईआर और राहत दावों का एक सेंट्रलाइज्ड ट्रैकिंग सिस्टम बनाकर सत्यापन अनिवार्य किया गया है।

दलित फैमिली ने दर्ज करवाई FIR, बदले में मिले 23 लाख, क्या है SC-ST एक्ट का वो प्रावधान?
एससी-एसटी एक्ट में मिलने वाले मुआवजे के दुरुपयोग की आशंका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने झांसी के एक वकील परिवार की जांच करवाने का आदेश दिया है. इस परिवार ने एससी-एसटी एक्ट में करवाए गए मुकदमों के बदले 23 लाख रुपये क्षतिपूर्ति पाई है. ऐसे में जानें कि यह कानून क्या कहता है.

SC/ST Act Compensation Misuse: यह सच है कि देश में दलित समुदाय के साथ भेदभाव होते आया है. आज भी उनके उत्पीड़न की खबरें आती हैं. इस कारण संविधान निर्माताओं ने दलित-आदिवासी समुदायों को बराबर के स्तर पर लाने और देश में जाति के आधार पर भेदभाव और उत्पीड़न  खत्म करने को संविधान में कई खास प्रावधान किए. इन समुदायों के लोगों को विशेष कानूनी अधिकार भी दिए गए. इसी से जुड़ा एक कानून है एसी-एसटी एक्ट. इसमें इन समुदायों के लोगों के साथ भेदभाव करने वाले, उनको प्रताड़ित करने वाले और उनको अवसरों से वंचित करने वालों के खिलाफ बेहद कड़ी सजा के प्रावधान हैं.

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले की जांच के आदेश दिए हैं. फाइल फोटो

लेकिन, ये कानून केवल इतने तक सीमित नहीं हैं. बल्कि संविधान निर्माताओं का मानना था कि देश का दलित और आदिवासी समुदाय उतना सशक्त नहीं है कि वह अपने खिलाफ होने वाली घटनाओं को लेकर पुलिस थाना पहुंचे. यह भी माना गया कि इन समुदायों की आर्थिक स्थिति बहुत खराब रहती है. इस कारण वे मुकदमा करने का खर्च और अपनी जीविका दोनों नहीं चला पाते हैं. इसके लिए संविधान में उनको मुआवजा देने का भी प्रावधान किया गया.
लेकिन, कई बार ऐसी खबरें आईं कि मुआवजा के इस प्रावधान का दुरुपयोग हो रहा है. ऐसी ही एक घटना उत्तर प्रदेश के झांसी में सामने आई है. वहां के एक वकील परिवार ने एससी-एसटी एक्ट के तहत कई मुकदमें दर्ज करवाने की एवज में 23 लाख रुपये का मुआवजा लिया है. अब हाईकोर्ट ने इस मामले की जांच के आदेश दिए हैं.
क्या कहता है SC-ST एक्ट

पहली बात यह समझना जरूरी है कि SC-ST एक्ट के तहत मिलने वाली रकम आरोपी से वसूला गया जुर्माना नहीं होती. यह सरकार की ओर से पीड़ित को दी जाने वाली कानूनी राहत और पुनर्वास सहायता होती है. इसका मकसद यह है कि जातीय अत्याचार का शिकार व्यक्ति मुकदमे के लंबे समय तक चलने का इंतजार किए बिना आर्थिक मदद हासिल कर सके. इस व्यवस्था में अलग-अलग अपराधों के लिए राहत की रकम अलग-अलग तय है. भुगतान भी एक साथ नहीं, बल्कि मामले की स्थिति के हिसाब से अलग-अलग चरणों में किया जाता है. नियमों में FIR होने, आरोपपत्र और दोषसिद्धि जैसे चरणों पर नकद सहायता का प्रावधान है. यानी किसी आरोपित के दोषी साबित होने से पहले भी पीड़ित को सरकारी सहायता मिल सकती है. यही इस व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण बात है.

आखिर सरकार यह पैसा क्यों देती है?
SC-ST एक्ट का उद्देश्य सिर्फ आरोपित को सजा दिलाना नहीं है. कानून पीड़ित को आर्थिक और सामाजिक तौर पर संभालने की भी कोशिश करता है. मान लीजिए किसी दलित या आदिवासी व्यक्ति से गंभीर जातीय अत्याचार हुआ. वह पुलिस शिकायत करता है. इसके बाद जांच, चार्जशीट और कोर्ट की कार्रवाई में कई साल लग सकते हैं. इस बीच पीड़ित को इलाज, दैनिक खर्च, रोजगार के नुकसान या परिवार की जरूरतों को आर्थिक मदद की जरूरत हो सकती है।

इसी से सरकार ने राहत और पुनर्वास की व्यवस्था की है. इस रकम का भुगतान सरकार करती है. राज्य सरकारें इसे लागू करती हैं और केंद्र सरकार भी संबंधित योजना में राज्यों को आर्थिक सहायता देती है. यानी यह पैसा FIR कराने की कीमत नहीं, बल्कि कानून में पात्र पीड़ित को मिलने वाली राहत है.
झांसी में क्या हुआ?
अब आते हैं उस मामले पर जिसने इस पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं. झांसी के वकील संतोष कुमार दोहरे और उनके परिवार के सदस्यों से जुड़े कई आपराधिक मामलों में SC-ST एक्ट के तहत सरकारी राहत दी गई. उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में पेश किए गए रिकॉर्ड के मुताबिक परिवार को अलग-अलग मामलों में कुल 23 लाख 36 हजार 250 रुपये की राहत मिल चुकी थी. मामला यहीं खत्म नहीं हुआ. सरकार ने कोर्ट को बताया कि दोहरे या उनके परिवार के सदस्यों से जुड़े करीब 10 से 12 और मामले ऐसे हैं, जिनमें राहत के दावों पर अभी विचार होना बाकी है.

दरअसल, मामला हाईकोर्ट तक तब पहुंचा जब दोहरे और दूसरे याचिकाकर्ताओं ने शिकायत की कि उन्हें नियम के मुताबिक पूरी राहत नहीं मिली है. झांसी में 2020 में दर्ज दो मामलों में जांच अधिकारियों ने प्रत्येक पीड़ित के लिए 2 लाख रुपये की राहत प्रस्तावित की थी. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि आरोपपत्र चरण में उन्हें 1.5 लाख रुपये मिलने चाहिए थे, लेकिन सिर्फ 75 हजार रुपये दिए गए. इसी रकम को लेकर मामला हाईकोर्ट पहुंचा. लेकिन सुनवाई में सरकार ने परिवार को पहले मिल चुकी 23.36 लाख रुपये की राहत का रिकॉर्ड कोर्ट में रख दिया.

क्या हाईकोर्ट ने 23 लाख को फर्जी मुआवजा माना?
नहीं. यह फर्क समझना बेहद जरूरी है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह नहीं कहा कि दोहरे या उनके परिवार ने 23 लाख रुपये का फर्जी तरीके से भुगतान पाया है. कोर्ट ने सिर्फ यह कहा कि लगातार मामले दर्ज होना और बार-बार राहत के दावे की जांच जरूरी है. कोर्ट के अनुसार केवल बार-बार मुकदमे और राहत लेने से अपने आप दुरुपयोग सिद्ध नहीं होता. लेकिन मामलों की संख्या और परिवार को मिली राहत की रकम इतनी महत्वपूर्ण है कि इसे नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता. इसीलिए कोर्ट ने झांसी के जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को परिवार से जुड़े मामलों और मिली या मांगी गई राहत की निष्पक्ष, विस्तृत और समयबद्ध जांच करने का आदेश दिया है.

मुआवजे के प्रावधान का असली उद्देश्य क्या?
इस व्यवस्था का उद्देश्य बेहद महत्वपूर्ण है. जातीय अत्याचार के शिकार व्यक्ति को सिर्फ कानूनी लड़ाई लड़ने को छोड़ देना पर्याप्त नहीं है. कई पीड़ित आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं. ऐसे में सरकार की ओर से तत्काल आर्थिक सहायता उन्हें इलाज, पुनर्वास और रोजमर्रा की जरूरतों में मदद दे सकती है. इसीलिए कानून ने राहत का प्रावधान किया है. लेकिन इस व्यवस्था के साथ एक दूसरी चुनौती भी है. अगर कोई व्यक्ति झूठे या बार-बार के मामलों के जरिए सरकारी राहत हासिल करने की कोशिश करता है, तो इससे न सिर्फ सरकारी पैसे का नुकसान होता है, बल्कि वास्तविक पीड़ितों के अधिकार पर भी सवाल खड़ा होता है. यही वजह है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक तरफ वास्तविक पीड़ितों को मिलने वाली वैधानिक राहत सुनिश्चित करने की बात कही है, तो दूसरी तरफ व्यवस्था के दुरुपयोग की आशंका की जांच का भी आदेश दिया है.

 

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SC-ST एक्ट राहत राशि के दुरुपयोग पर इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, पूरे प्रदेश में जांच के आदेश
By Suresh pandey
Edited By: Brijesh Srivastava
Published: Thu, 03 Sep 2026 04:38 PM (IST)
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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने SC-ST एक्ट के तहत मिलने वाली राहत राशि के संभावित दुरुपयोग पर पूरे प्रदेश में जांच के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने झांसी के मामलों की सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया।

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इलाहाबाद हाई कोर्ट।
इलाहाबाद हाई कोर्ट।

HighLights
झांसी के अरविंद कुमार व दो अन्य और संतोष कुमार धोहरे की आपराधिक अपीलों की सुनवाई

दोनों मामले झांसी की विशेष अदालत के 23 जुलाई 2024 के फैसले के खिलाफ दाखिल हुए थे

विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत पीड़ितों को दी जाने वाली आर्थिक राहत राशि से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए न सिर्फ पीड़ितों के अधिकारों की पुष्टि की, बल्कि इस बहुचर्चित योजना के संभावित दुरुपयोग को लेकर पूरे उत्तर प्रदेश में जांच के आदेश भी दिए हैं।

 

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झांसी के अरविंद कुमार व दो अन्य और संतोष कुमार धोहरे की आपराधिक अपीलों की सुनवाई करते हुए अदालत ने यह आदेश दिया है। दोनों मामले झांसी की विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट, अत्याचार निवारण) अदालत के 23 जुलाई 2024 के फैसले के खिलाफ दाखिल किए गए थे। पहला मामला थाना कोतवाली में आईपीसी की धारा 170, 323, 504, 506, एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r), 3(1)(s), 3(2)(va) और आईटी एक्ट की धारा 67 के तहत दर्ज है। दूसरा मामला थाना सिपरी बाजार में दर्ज केस से संबंधित है।

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अपीलकर्ताओं का कहना था कि विवेचक द्वारा प्रत्येक पीड़ित को 2 लाख रुपये की राहत राशि का प्रस्ताव भेजा गया था, जिसके तहत चार्जशीट दाखिल होने तक 75 प्रतिशत यानी 1,50,000 रुपये मिलने चाहिए थे। लेकिन जिला समाज कल्याण अधिकारी, झांसी ने मनमाने ढंग से केवल 37.5 प्रतिशत यानी 75,000 रुपये ही जारी किए। बार-बार प्रत्यावेदन देने के बावजूद बकाया राशि नहीं दी गई, जिसके बाद अपीलकर्ताओं ने नियम 12(4) और 12(7) में विशेष न्यायाधीश की अदालत में आवेदन दिया, जिसे निचली अदालत ने खारिज कर दिया था।

न्यायमूर्ति संतोष राय की एकलपीठ ने पाया कि निचली अदालत ने नियम 12(7) की व्याख्या में गलती की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह नियम विशेष न्यायालय को केवल औपचारिकता निभाने वाला निकाय नहीं बनाता, बल्कि उसे यह अधिकार भी देता है कि वह जांच करे कि पीड़ित को समय पर पर्याप्त राहत मिली या नहीं, और यदि नहीं मिली तो बकाया राशि के भुगतान का आदेश दे। कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत का यह मानना गलत था कि उसे अपराध की प्रकृति तय करने या राशि बढ़ाने का अधिकार नहीं है । यह व्याख्या नियम के मूल उद्देश्य के विपरीत है।

इस पर कोर्ट ने कहा कि बार-बार मामले दर्ज कराना अपने आप में दुरुपयोग साबित नहीं करता, लेकिन इतनी बड़ी संख्या और राशि को अनदेखा भी नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने इसे “जांच योग्य” पैटर्न बताया। हाई कोर्ट ने आदेश पारित किया कि झांसी के जिलाधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के साथ मिलकर संतोष कुमार धोहरे और उनके परिवार द्वारा दर्ज कराए गए मामलों और प्राप्त राहत राशि की तीन महीने में निष्पक्ष जांच पूरी करेंगे।यदि जांच में योजना के दुरुपयोग की पुष्टि होती है, तो दोषी व्यक्तियों के साथ-साथ जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी।

कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट और नियमावली 1995 के तहत बार-बार दावा करने वालों के मामलों की प्रदेश व्यापी व्यापक जांच कर एक प्रभावी नियामक तंत्र और निगरानी व्यवस्था विकसित करने का निर्देश दिया गया। हर जिले के विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) को सतर्क रहने को कहा गया है कि यह योजना वास्तविक पीड़ितों तक ही सीमित रहे, हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि किसी वास्तविक दावे को पूर्वाग्रह से देखा जाए।

दोनों मामलों में झांसी की विशेष अदालत को छह सप्ताह के भीतर आवेदनों पर नए सिरे से निर्णय लेने का आदेश दिया गया, यह तय करते हुए कि पीड़ितों को 1 लाख या 2 लाख रुपये की राहत राशि में से कौन सी दर लागू होगी। यह स्पष्ट किया गया कि यह आदेश धोहरे या पीड़ितों के दावों के गुण-दोष पर कोई राय नहीं है, और जांच स्वतंत्र रूप से अपने आधार पर चलेगी।

कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि एससी/एसटी एक्ट के तहत राहत योजना अत्याचार के वास्तविक पीड़ितों के पुनर्वास के लिए एक कल्याणकारी प्रावधान है, और इसकी पवित्रता बनाए रखना जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि बार-बार आपराधिक मामले दर्ज कराकर सरकारी खजाने से धन प्राप्त करने के लिए इस योजना का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

रजिस्ट्रार जनरल को आदेश दिया गया कि इस फैसले की प्रति दस दिनों के भीतर प्रदेश के सभी जिलों के जिला एवं सत्र न्यायाधीश, जिलाधिकारी, एसएसपी/एसपी, पुलिस आयुक्त, विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट), मुख्य सचिव, गृह विभाग के प्रमुख सचिव और विधि/न्याय विभाग के प्रमुख सचिव को भेजी जाए। अपीलकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता ब्रज मोहन सिंह और राज्य की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता राजेश कुमार शुक्ल तथा शिखर टंडन पेश हुए।

 

त्वरित प्रश्नोत्तर 
झांसी के वकील परिवार को SC-ST एक्ट में कितना मुआवजा मिला और इस पर हाईकोर्ट ने क्या आदेश दिया?
उत्तर प्रदेश के झांसी में एक वकील परिवार को SC-ST एक्ट के तहत दर्ज विभिन्न मामलों में कुल 23 लाख 36 हजार 250 रुपये की राहत राशि मिली है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसे धोखाधड़ी नहीं माना है, लेकिन लगातार मामले दर्ज होने और बार-बार राहत राशि के दावों को देखते हुए झांसी के जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को इस मामले की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच करने का आदेश दिया है.

SC-ST एक्ट में मिलने वाला मुआवजा क्या आरोपी से वसूला जाने वाला जुर्माना है?
नहीं, SC-ST एक्ट में मिलने वाली राशि आरोपी से वसूला जाने वाला जुर्माना नहीं है. यह सरकार द्वारा पीड़ित को दी जाने वाली कानूनी राहत और पुनर्वास सहायता है, ताकि जातिगत उत्पीड़न के शिकार व्यक्ति को लंबे मुकदमे का इंतजार किए बिना तुरंत वित्तीय मदद मिल सके. यह राशि सरकारी फंड से दी जाती है.

SC-ST एक्ट में पीड़ित को राहत राशि या मुआवजा किस आधार पर और किन चरणों में दिया जाता है?
इस कानून में अलग-अलग अपराधों के लिए राहत राशि तय होती है, जो एक बार में नहीं बल्कि मामले की स्थिति के अनुसार चरणों में दी जाती है. नियमों के मुताबिक, एफआईआर (FIR) दर्ज होने, चार्जशीट दाखिल होने और आरोपी को सजा मिलने जैसे विभिन्न चरणों में यह राशि जारी करने का प्रावधान है, जिससे पीड़ित को आरोपित के दोषी सिद्ध होने से पहले भी मदद मिल सके.

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