एससी एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट का सुनवाई से “ना”
SC-ST एक्ट में बिना जांच FIR और गिरफ्तारी पर सवाल, सुप्रीम कोर्ट ने क्या दलीलें देकर किया सुनवाई से इनकार
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अगर कानून के प्रावधानों का दुरुपयोग होता है, तो अदालत अपने न्यायिक अधिकारों का इस्तेमाल करके ऐसे मामलों से निपट सकती है. इसका मतलब यह नहीं है कि पूरा कानून ही गलत या खराब है.
सुप्रीम कोर्ट में अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति (SC/ST) एक्ट की कई धाराओं की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए याचिका दाखिल की गई थी. इस कानून को संविधान का उल्लंघन बताते हुए है कि इसपर रोक लगाने की मांग की गई थी. याचिकाकर्ता की ओर से विष्णु जैन ने कहा कि इस कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है. इसमें सजा की दर बहुत कम है. जबकि गलत केस पर करोडों मुआवजा भी दिया गया है.
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि साल 2020 में इस कानून के कुछ धाराओं को निरस्त किए जाने के बाद संसद से इसे दोबारा लागू कर दिया था. इसके बाद इस कानून को 2020 में तीन जजों की बेंच बरकरार रख चुकी है और ऐसी ही याचिकाओं को खारिज भी कर चुकी है.
कोर्ट ने कहा कि जिन लोगों को इस कानून का इस्तेमाल कर गलत तरीके से फंसाया गया है कि उनके लिए कानून में पहले से ही पर्याप्त सेफगार्ड मौजूद हैं.
न्यायाधीशों ने याचिका खारिज करते हुए क्या कहा?
जस्टिस बागची ने कहा, “किसी एक व्यक्ति के साथ हुई घटना या कथित गलत इस्तेमाल के आधार पर उस कानून की दोबारा समीक्षा नहीं की जा सकती, जिसे पहले ही तीन जजों की बेंच सही ठहरा चुकी है. जब तीन जज उस कानून को मंजूरी दे चुके हैं, तो सिर्फ पांच साल के भीतर उसे फिर से क्यों परखा जाए?”
वहीं, मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अगर कानून के प्रावधानों का दुरुपयोग होता है, तो अदालत अपने न्यायिक अधिकारों का इस्तेमाल करके ऐसे मामलों से निपट सकती है. इसका मतलब यह नहीं है कि पूरा कानून ही गलत या खराब है.
इस बीच वकील हरि शंकर जैन ने संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि एससी/एसटी एक्ट के आरोपियों को अग्रिम जमानत का लाभ क्यों नहीं मिलना चाहिए.
इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि यह फैसला कानून बनाने वाली संसद (विधायिका) की समझ और नीति का हिस्सा है.
उन्होंने कहा, “ऐसे कई कानून हैं जिनमें सजा सात साल तक हो सकती है, लेकिन फिर भी जमानत पर खास पाबंदियां लगाई गई हैं, जैसे यूएपीए (UAPA) और पीएमएलए (PMLA). ये अहम सवाल हैं, लेकिन हम जज कानून बनाने वालों की जगह बैठकर यह तय नहीं कर सकते कि कानून कैसा होना चाहिए. विधायिका ने अपनी समझ के अनुसार ये प्रावधान बनाए हैं.”
रिवर्स भेदभाव के दावे पर क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?
वकील जैन ने दलील दी कि एससी/एसटी एक्ट में किया गया संशोधन ‘रिवर्स भेदभाव’ है और इससे समाज में और ज्यादा विभाजन पैदा हो रहा है. इस पर जस्टिस मोहाना ने कहा कि 2020 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में इन सभी आशंकाओं पर पहले ही विचार किया जा चुका है.
उन्होंने यह भी बताया कि एससी/एसटी एक्ट की धारा 18A लागू होने के बावजूद,अगर किसी मामले में आरोप प्रथम दृष्टया सही नहीं लगते,तो अदालत एफआईआर निरस्त कर सकती है.
जस्टिस बागची ने भी सुप्रीम कोर्ट के एक ताजा फैसले का संदर्भ देते हुए कहा कि सिर्फ एफआईआर में एससी/एसटी एक्ट का जिक्र होने भर से अग्रिम जमानत से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता.अदालत जांच कर सकती है कि आरोपों के समर्थन में पहली नजर में कोई मामला बनता है या नहीं.
इसके बाद जैन ने दावा किया कि पीड़ितों को 493 करोड़ रुपये का मुआवजा बांटना नियमों के खिलाफ है और इससे लोगों को एफआईआर कराने को प्रोत्साहन मिल रहा है. इस टिप्पणी पर जस्टिस बागची ने नाराजगी जताते हुए कहा, ‘यह बहुत कठोर बात है.”
SC-ST एक्ट में बंटे 493 करोड़ मुआवजे से FIR को प्रेरित हो रहे लोग; सुप्रीम कोर्ट ने कहा कठोर बात
वकील विष्णु जैन ने कहा कि इस कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि इसमें सजा की दर बहुत कम है, जबकि गलत केस पर करोड़ों मुआवजा भी दिया गया है.
सुप्रीम कोर्ट में अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के कुछ प्रावधानों के खिलाफ अर्जी दाखिल की गई. इस जनहित याचिका में एक्ट के कई प्रावधानों को समानता के अधिकार के खिलाफ बताया गया और उनमें बदलाव की मांग हुई. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से ही इनकार कर दिया. बेंच ने कहा कि इस कानून को 2020 में तीन जजों की बेंच बरकरार रख चुकी है. इसके अलावा इस कानून में पहले से ही कई सेफगार्ड मौजूद हैं. इनके माध्यम से लोगों के हितों की रक्षा की जा सकती है, जिन्हें चिंता है कि गलत मुकदमा दर्ज हुआ है.
इस दौरान विष्णु जैन ने एक दलील यह भी दी कि इस कानून के तहत अब रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन यानी उलटा भेदभाव हो रहा है. उन्होंने इसमें पीड़ितों को दिए जाने वाले मुआवजे की व्यवस्था पर भी सवाल उठाए. जैन ने अदालत को बताया कि इस व्यवस्था के तहत 493 करोड़ रुपये का मुआवजा वितरित किया जा चुका है. उन्होंने दलील दी कि यह योजना लोगों को FIR दर्ज कराने के लिए प्रेरित कर रही है. इस मामले में अर्जी दाखिल करने वालों का पक्ष रखते हुए वकील विष्णु जैन ने कहा कि इस कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है.
उन्होंने कहा कि इसमें सजा की दर बहुत कम है,जबकि गलत केस पर करोड़ों मुआवजा भी दिया गया है.वकील विष्णु शंकर जैन के माध्यम से बृजभूषण सैनी और 18 अन्य याचिकाकर्ताओं ने दायर याचिका में अधिनियम की धारा 3(1),3(2)(i),3(2)(v),4,8,18,18-A और 19 को चुनौती देते हुए दावा किया कि इन प्रावधानों में से कुछ संविधान के अनुच्छेद 14,21 और 22 में दिए गए समानता,जीने एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा कानूनी प्रक्रिया के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं.
याचिकाकर्ताओं ने पुलिस को एससी/एसटी एक्ट में एफआई आर लिखने और गिरफ्तारी की प्रक्रिया के संबंध में दिशा-निर्देश जारी करने की भी मांग की है.इस अर्जी मुख्य तौर पर धारा 18-A को लेकर चुनौती दी गई.याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस प्रावधान में एफआईआर दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच की आवश्यकता नहीं है और गिरफ्तारी को पूर्व अनुमति भी जरूरी नहीं है. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है और पुलिस को आरोपों की प्रारंभिक जांच के बिना कार्रवाई करनी पड़ सकती है.
अग्रिम जमानत और गिरफ्तारी पर भी सवाल
याचिकाकर्ताओं ने 2018 के संशोधन से धारा 18-A जोड़े जाने को सुप्रीम कोर्ट के 2018 के सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र राज्य फैसले के संदर्भ में चुनौती दी है.उनका कहना है कि संसद ने न्यायालय के निर्देशों को प्रभावहीन करने को यह प्रावधान बनाया. याचिका में धारा 18 को भी चुनौती दी गई है. याचिका के अनुसार यह प्रावधान एससी/एसटी एक्ट के मामलों में अग्रिम जमानत के रास्ते को प्रतिबंधित करता है और इससे झूठे या दुर्भावनापूर्ण आरोपों के मामले में व्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है.
अनुमान से जुड़े प्रावधानों पर भी जताई गई आपत्ति
इसी तरह धारा 8 में कुछ परिस्थितियों में आरोपित के खिलाफ अनुमान से जुड़े प्रावधानों को निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के विरुद्ध बताया गया है. वहीं धारा 19 के तहत अधिनियम के तहत दोषसिद्ध मामलों में परिवीक्षा संबंधी राहत उपलब्ध नहीं होने को भी चुनौती दी गई है. याचिकाकर्ताओं ने दावा किया है कि कानून के कुछ प्रावधानों के दुरुपयोग से निर्दोष लोगों की गिरफ्तारी और लंबे समय तक मुकदमे की स्थिति पैदा हो सकती है. इसके अलावा अंतरिम राहत की मांग भी की गई.

