नीति और व्यवहार,परिवर्तन क्या है?: यूपीए से क्या सीखकर आगे बढ़ा राजग 2014 के बाद?
भारत में 2004 से 2014 (UPA कार्यकाल) और 2014 के बाद (NDA कार्यकाल) के विकास कार्यों की तुलना अक्सर नीतिगत प्राथमिकताओं और कार्यान्वयन गति आधार पर की जाती है। जहाँ UPA का जोर ‘अधिकार-आधारित’ कल्याणकारी योजनाओं पर था, वहीं 2014 बाद ‘लाभार्थी-आधारित’ और बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के बड़े बदलावों पर ध्यान केंद्रित किया गया।
प्रमुख क्षेत्रों में एक तुलनात्मक विश्लेषण :
1. बुनियादी ढांचा और परिवहन (Infrastructure & Transport)
बुनियादी ढांचे के विकास में 2014 के बाद उल्लेखनीय गति देखी गई है, विशेषकर राष्ट्रीय राजमार्गों और रेलवे के आधुनिकीकरण में।
सड़क निर्माण: UPA के समय सड़क निर्माण की औसत गति लगभग 12 किलोमीटर प्रति दिन थी, जो 2014 के बाद बढ़कर 28-37 किलोमीटर प्रति दिन तक पहुँच गई।
रेलवे: 2014 के बाद ‘वंदे भारत’ जैसी सेमी-हाई स्पीड ट्रेनों की शुरुआत, रेलवे लाइनों का 100% विद्युतीकरण और स्टेशनों के पुनर्विकास पर जोर दिया गया।
हवाई अड्डे: ‘उड़ान’ (UDAN) योजना के माध्यम से छोटे शहरों को जोड़ना और हवाई अड्डों की संख्या को 74 (2014) से बढ़ाकर 140+ (2024 तक) करना एक बड़ी उपलब्धि रही।
2. डिजिटल अर्थव्यवस्था और वित्तीय समावेशन
डिजिटल क्रांति ने भारत के विकास के मॉडल को पूरी तरह बदल दिया है।
UPI और डिजिटल भुगतान: 2014 के बाद ‘डिजिटल इंडिया’ अभियान में UPI ने भारत को दुनिया में डिजिटल लेनदेन में शीर्ष पर पहुँचाया।
जन धन योजना: वित्तीय समावेशन को करोड़ों शून्य-बैलेंस खाते खोले गए, जिससे सरकारी सब्सिडी सीधे बैंक खातों (DBT) में पहुँचने लगी। UPA के समय ‘आधार’ की नींव रखी गई थी, लेकिन इसका व्यापक उपयोग (JAM ट्रिनिटी – जन धन, आधार, मोबाइल) 2014 के बाद प्रभावी हुआ।
3. सामाजिक कल्याण और लाभार्थी योजनाएं
दोनों सरकारों ने गरीबी उन्मूलन पर ध्यान दिया, लेकिन उनके तरीके अलग थे।
4. अर्थव्यवस्था और नीतिगत सुधार
GST: UPA ने GST का प्रस्ताव रखा था, लेकिन इसे 2017 में लागू किया गया, जिसने देश को ‘एक राष्ट्र, एक कर’ की दिशा में आगे बढ़ाया।
Ease of Doing Business: 2014 के बाद व्यापार सुगमता की रैंकिंग में भारत ने लंबी छलांग लगाई। ‘मेक इन इंडिया’ और PLI स्कीम के जरिए मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने की कोशिश की गई।
मुद्रास्फीति (Inflation) : UPA-2 के दौरान महंगाई दर काफी अधिक (दोहरे अंकों में) थी, जबकि 2014 के बाद के अधिकांश वर्षों में इसे नियंत्रित करने के प्रयास किए गए, हालांकि वैश्विक संकटों (जैसे कोविड और रूस-यूक्रेन युद्ध) ने हाल के वर्षों में दबाव डाला है।
निष्कर्ष
UPA का कार्यकाल सामाजिक सुरक्षा कानूनों (जैसे शिक्षा का अधिकार, सूचना का अधिकार, भोजन का अधिकार) को जाना जाता है। वहीं, 2014 के बाद का समय बड़े पैमाने पर मौलिक ढांचा निर्माण, डिजिटल गवर्नेंस और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) से योजनाओं की अंतिम छोर तक पहुँच सुनिश्चित करने को पहचाना जाता है।
रक्षा (Defense) के क्षेत्र में 2004-2014 (UPA) और 2014 के बाद (NDA) के बीच का अंतर मुख्य रूप से स्वदेशीकरण (Indigenisation), रक्षा निर्यात (Defense Exports) और रणनीतिक सुधारों में देखा जा सकता है।
दोनों कालखंडों का तुलनात्मक विवरण :
1. रक्षा बजट और खर्च
UPA कार्यकाल: रक्षा बजट में क्रमिक वृद्धि हुई, लेकिन बजट का एक बड़ा हिस्सा पेंशन और वेतन (Revenue Expenditure) में चला जाता था। आधुनिकीकरण को पूंजीगत व्यय (Capital Outlay) सीमित था।
2014 के बाद : रक्षा बजट में महत्वपूर्ण वृद्धि की गई। 2024-25 के बजट में रक्षा को ₹6.21 लाख करोड़ रुपये आवंटित हुए। अब बजट का एक बड़ा हिस्सा ‘पूंजीगत अधिग्रहण’ को सुरक्षित रखा जाता है, जिसमें से एक निश्चित प्रतिशत केवल घरेलू कंपनियों से खरीद को आरक्षित है।
2. ‘मेक इन इंडिया’ और स्वदेशीकरण
यह सबसे बड़ा बदलाव है। पहले भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक (Importer) था, अब वह निर्माता बनने की ओर अग्रसर है।
हथियारों की सूची: सरकार ने ‘सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची’ (Positive Indigenisation Lists) जारी की है, जिसमें सैकड़ों रक्षा उपकरणों के आयात पर रोक लगा दी गई है ताकि उन्हें भारत में ही बनाया जा सके।
तेजस और विमान: UPA के समय तेजस (LCA) परियोजना धीमी थी। 2014 के बाद इसे वायुसेना में शामिल किया गया और बड़े ऑर्डर दिए गए। साथ ही, INS विक्रांत (स्वदेशी विमानवाहक पोत) को नौसेना में कमीशन किया गया।


रक्षा गलियारे (Defense Corridors): उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में दो रक्षा औद्योगिक गलियारे स्थापित हुए हैं।
3. रक्षा निर्यात (Defense Exports)
भारत ने रक्षा उत्पादों के खरीदार से विक्रेता बनने तक का सफर तय किया है।
UPA काल: रक्षा निर्यात नगण्य था और मुख्य रूप से छोटे पुर्जों तक सीमित था।
2014 के बाद: भारत अब ब्रह्मोस मिसाइल (फिलिपींस को), पिनाका रॉकेट सिस्टम (आर्मेनिया को) और ध्रुव हेलीकॉप्टर जैसे उन्नत सिस्टम निर्यात कर रहा है। वित्त वर्ष 2023-24 में भारत का रक्षा निर्यात रिकॉर्ड ₹21,083 करोड़ तक पहुँच गया।
4. रणनीतिक और संस्थागत सुधार
CDS की नियुक्ति: दशकों से लंबित चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) पद सृजन हुआ ताकि थल, जल और नभ सेना में बेहतर समन्वय (Synergy) हो सके।
अग्निवीर योजना: सैन्य भर्ती प्रक्रिया में बदलाव को ‘अग्निपथ योजना’ शुरू की गई, जिसका उद्देश्य सेना की प्रोफाइल युवा बनाना है।
ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड (OFB) का पुनर्गठन: दशकों पुराना OFB भंग कर 7 नई सरकारी रक्षा कंपनियों (DPSUs) में बदला गया ताकि कार्यक्षमता और लाभप्रदता बढ़े।
5. सीमा मौलिक ढांचा (Border Infrastructure)
BRO की सक्रियता: सीमा सड़क संगठन (BRO) के बजट में भारी वृद्धि हुई। लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश जैसे क्षेत्रों में अटल टनल, सेला टनल और रणनीतिक पुलों का निर्माण युद्ध स्तर पर हुआ, जिससे सेना की पहुँच चीन सीमा तक आसान हुई है।

रक्षा क्षेत्र में ‘राफेल’ सौदा और हाल के वर्षों में हुए प्रमुख रक्षा सौदों की तुलना, आधुनिकीकरण की दिशा में भारत का बदलता रुख स्पष्ट करती है।
राफेल बनाम पुराने जेट्स और हाल के प्रमुख रक्षा समझौतों का विस्तृत विवरण :
1. राफेल बनाम पुराने लड़ाकू विमान (Mirage/MiG/Sukhoi)
UPA के समय भारतीय वायुसेना मुख्य रूप से MiG-21 (जिन्हें ‘फ्लाइंग कॉफिन’ कहा जाने लगा था), Mirage-2000 और Sukhoi-30 MKI पर निर्भर थी।
राफेल के आने से “गेम-चेंजर” बदलाव आए:
पीढ़ी का अंतर: राफेल एक 4.5 जनरेशन का मल्टी-रोल लड़ाकू विमान है। पुराने विमानों (जैसे MiG-21) की तुलना में इसकी मारक क्षमता, रडार और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम कहीं अधिक उन्नत हैं।
मिसाइल तकनीक (Meteor & Scalp): राफेल की Meteor मिसाइल की रेंज 150 किलोमीटर से अधिक है, जो इसे दुश्मन के विमान को देखे बिना ही मार गिराने की क्षमता देती है। कारगिल युद्ध के समय हमारे पास ऐसी तकनीक की कमी थी।
हथियार ले जाने की क्षमता: राफेल अपने वजन से लगभग डेढ़ गुना अधिक भार (हथियार और ईंधन) लेकर उड़ सकता है, जो पुराने विमानों में असंभव था।
खरीद प्रक्रिया: राफेल सौदे को लेकर राजनीतिक विवाद रहे, लेकिन रणनीतिक रूप से इसे Inter-Governmental Agreement (IGA) द्वारा तेजी से सेना में शामिल किया गया, जबकि UPA के समय MMRCA की टेंडर प्रक्रिया 10 साल तक खिंचती रही थी।
2. हाल के प्रमुख रक्षा सौदे (Major Defense Deals Post-2014)
2014 के बाद की नीति केवल “खरीद” तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें ‘तकनीकी हस्तांतरण’ (Transfer of Technology) पर जोर दिया गया है:
S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम (रूस): यह दुनिया का सबसे उन्नत एयर डिफेंस सिस्टम है। भारत ने इसे चीन और पाकिस्तान की सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए खरीदा।
GE-F414 जेट इंजन (अमेरिका): यह एक ऐतिहासिक समझौता है। अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी भारत में ही लड़ाकू विमानों के इंजन बनाने को 80% तकनीक साझा करने पर सहमत हुई है। यह भारत के Tejas Mk2 प्रोजेक्ट को संजीवनी है।
MQ-9B प्रीडेटर ड्रोन (अमेरिका): उच्च ऊंचाई पर लंबे समय तक निगरानी और सटीक हमले करने वाले इन ड्रोन्स के लिए हाल ही में समझौता हुआ है, जो हिंद महासागर और हिमालयी सीमाओं पर भारत की नजर को और पैनी करेगा।
C-295 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट (स्पेन/टाटा): एयरबस से हुए इस सौदे में विमान गुजरात के वडोदरा में निजी क्षेत्र (टाटा) बना रहा हैं। यह पहली बार है जब भारत में निजी क्षेत्र पूरा सैन्य विमान बना रहा है।
3. सौदों के तरीके में अंतर (Modality of Deals)
जहाँ पुराने समय में रक्षा सौदे अक्सर भ्रष्टाचार के आरोपों और देरी (Delay) के कारण चर्चा में रहते थे, वहीं वर्तमान दौर में जोर हार्डवेयर के साथ-साथ ‘इकोसिस्टम’ बनाने पर है। भारत अब रूस पर अपनी 70% से अधिक निर्भरता को कम कर अमेरिका, फ्रांस और इजरायल के साथ संतुलन बना रहा है और साथ ही स्वदेशी कंपनियों को खड़ा कर रहा है।
भारत में लड़ाकू विमानों (Fighter Jets) के संदर्भ में UPA और NDA कार्यकाल के बीच की तुलना भारतीय वायुसेना (IAF) की युद्धक क्षमता और आधुनिकीकरण गति समझने को महत्वपूर्ण है।
प्रमुख लड़ाकू विमानों और उनके विकास कार्यों का तुलनात्मक विवरण दिया गया है:
1. राफेल (Rafale) और MMRCA की कहानी
UPA कार्यकाल: 2007 में 126 मीडियम मल्टी-रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (MMRCA) की प्रक्रिया शुरू हुई थी। राफेल को चुना गया, लेकिन कीमत और तकनीक हस्तांतरण के मुद्दों पर बातचीत सालों तक अटकी रही और 2014 तक कोई अंतिम समझौता नहीं हो सका।
2014 के बाद: सरकार ने पुरानी प्रक्रिया को रद्द कर फ्रांस के साथ सीधे सरकारी स्तर (G-2G) पर 36 राफेल विमानों का सौदा किया। आज ये सभी 36 विमान भारतीय वायुसेना के बेड़े में शामिल होकर अंबाला और हाशिमारा बेस पर तैनात हैं।
2. स्वदेशी तेजस (LCA Tejas) का उत्थान
UPA कार्यकाल: तेजस परियोजना को गति देने में देरी हुई और विमान को शुरुआती परिचालन मंजूरी (IOC) मिलने में काफी समय लगा। वायुसेना की ओर से इसके ऑर्डर भी सीमित थे।
2014 के बाद: ‘आत्मनिर्भर भारत’ के तहत तेजस मार्क-1A के 83 विमानों का बड़ा ऑर्डर दिया गया। इसके अलावा, अधिक शक्तिशाली तेजस मार्क-2 और पांचवीं पीढ़ी के AMCA (Advanced Medium Combat Aircraft) प्रोजेक्ट को मंजूरी देकर तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है।
3. पुराने विमानों की विदाई (Phasing out of MiGs)
चुनौती: वायुसेना के पास ‘मिग-21’ जैसे पुराने विमान लंबे समय तक सेवा में रहे, जिन्हें ‘फ्लाइंग कॉफिन’ कहा जाने लगा था।
NDA की नीति: मिग-21 की स्क्वाड्रनों को तेजी से रिटायर किया जा रहा है। उनकी जगह स्वदेशी तेजस और भविष्य में आने वाले बहुउद्देशीय विमानों (MRFA) से भरने की योजना है।
4. तकनीकी श्रेष्ठता में अंतर

5. जेट इंजन तकनीक (ऐतिहासिक बदलाव)
लड़ाकू विमानों के मामले में सबसे बड़ी बाधा इंजन की रही है।
हाल ही में अमेरिका के साथ GE-F414 इंजन के भारत में निर्माण का समझौता हुआ है। यह तकनीक पहले अमेरिका किसी गैर-नाटो देश को नहीं देता था। यह भारत के भविष्य के लड़ाकू विमानों (तेजस Mk-2) के लिए मील का पत्थर साबित होगा।
निष्कर्ष: जहाँ UPA काल में लड़ाकू विमानों की खरीद प्रक्रिया लंबी और जटिल टेंडर प्रक्रियाओं में उलझी रही, वहीं 2014 के बाद “इमरजेंसी परचेज” (राफेल) और “स्वदेशी निर्माण” (तेजस) के हाइब्रिड मॉडल को अपनाकर वायुसेना की गिरती स्क्वाड्रन संख्या को रोकने का प्रयास किया गया है।
“रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और उसमें निजी क्षेत्र की भूमिका”
रक्षा क्षेत्र में निजी क्षेत्र (Private Sector) की भागीदारी और लड़ाकू विमानों के स्वदेशी निर्माण की दिशा में हुए बदलाव आधुनिक भारत की आर्थिक और रणनीतिक कहानी है।
2014 के बाद सरकार ने ‘रक्षा उत्पादन का लोकतांत्रीकरण’ किया है, जहाँ पहले केवल सरकारी उपक्रमों (PSUs) का एकाधिकार था।
1. रक्षा क्षेत्र में निजी दिग्गजों का प्रवेश
अब भारत की बड़ी निजी कंपनियाँ केवल कलपुर्जे नहीं, बल्कि पूरी प्रणालियाँ बना रही हैं:
TATA (टाटा समूह): एयरबस से मिलकर C-295 परिवहन विमान निर्माण गुजरात (वडोदरा) में कर रहा है। यह भारत के इतिहास में पहली बार है कि कोई निजी कंपनी पूरा सैन्य विमान बना रही है। इसके अलावा, टाटा बोइंग से मिलकर ‘अपाचे’ हेलीकॉप्टर के फ्यूजलेज (ढांचे) भी बना रहा है।
L&T (लार्सन एंड टुब्रो): इन्होंने K-9 वज्र (सेल्फ-प्रोपेल्ड तोप) निर्मित कर सेना को सौंपी है। यह ‘मेक इन इंडिया’ का एक सफल उदाहरण है।
Adani Defence : यह कंपनी इजरायल के साथ मिलकर ‘हर्मिस’ (Hermes) जैसे उन्नत ड्रोन्स का निर्माण भारत में कर रही है।
राफेल सौदे में डसॉल्ट एविएशन के साथ मिलकर नागपुर में विमानों के कुछ हिस्सों का निर्माण शुरू किया गया।
2. लड़ाकू विमानों के लिए ‘रणनीतिक साझेदारी’ (Strategic Partnership)
सरकार ने एक नई नीति अपनाई है जिसमें विदेशी कंपनियां (जैसे लॉकहीड मार्टिन या साब) भारत की किसी निजी कंपनी के साथ साझेदारी करके यहाँ लड़ाकू विमान बनाएंगी।
MRFA (114 लड़ाकू विमानों का सौदा): इस बड़े सौदे में निजी क्षेत्र की भूमिका मुख्य होगी। इसमें विदेशी कंपनियां भारत में ही लड़ाकू विमानों की फैक्ट्री लगाने का प्रस्ताव दे रही हैं।
तेजस (LCA) में निजी भागीदारी: एचएएल (HAL) अब तेजस के निर्माण के लिए सैकड़ों निजी छोटी-मझोली कंपनियों (MSMEs) से पुर्जे ले रहा है, जिससे एक पूरा ‘डिफेंस इकोसिस्टम’ तैयार हो रहा है।
3. UPA बनाम NDA: निजी क्षेत्र की भूमिका

4. सरकार स्टार्टअप्स को रक्षा तकनीक बनाने को करोड़ों के ग्रांट दे रही है।
उत्तर प्रदेश डिफेंस कॉरिडोर: झाँसी, कानपुर और अलीगढ़ जैसे शहरों में रक्षा निर्माण की इकाइयां लग रही हैं, जो क्षेत्रीय विकास का बड़ा केंद्र बन सकती हैं।
निष्कर्ष: लड़ाकू विमानों का निर्माण अब केवल “असेंबली” नहीं है, बल्कि यह भारत को Global Supply Chain का हिस्सा बना रहा है। आज भारत में बने विमानों के पंख और इंजन के हिस्से अमेरिका और यूरोप के विमानों में लग रहे हैं।
युद्धपोत (Warships) और पनडुब्बियों (Submarines) के मामले में 2004-2014 और 2014 के बाद के भारत में एक बुनियादी बदलाव आया है: ‘खरीदार’ से ‘निर्माता’ बनने की दिशा में कदम।
जहाँ पहले हम रूस या पश्चिमी देशों के पुराने जहाजों को अपग्रेड करके चलाते थे, अब भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में है जो अपने विमानवाहक पोत और परमाणु पनडुब्बियां खुद बना रहा है।
1. विमानवाहक पोत (Aircraft Carriers)
UPA कार्यकाल: इस दौरान भारत मुख्य रूप से INS विक्रमादित्य (रूस से खरीदा गया) पर निर्भर था। स्वदेशी विमानवाहक पोत (IAC-1) की नींव रखी गई थी, लेकिन काम की गति धीमी थी।
2014 के बाद: भारत ने अपना पहला पूरी तरह स्वदेशी विमानवाहक पोत INS विक्रांत (2022) कमीशन किया। यह भारत के समुद्री इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धि है। अब तीसरे विमानवाहक पोत (IAC-2) की योजना पर काम चल रहा है।
2. पनडुब्बी निर्माण (Submarines)
भारत की पनडुब्बी शक्ति में ‘साइलेंट’ क्रांति आई है:
कलवरी क्लास (Scorpene): UPA काल में फ्रांसीसी तकनीक के साथ प्रोजेक्ट-75 शुरू हुआ था। 2014 के बाद इसमें तेजी आई और अब तक 6 कलवरी क्लास पनडुब्बियां (कलवरी, खांडेरी, करंज, वेला, वागीर, वाग्शीर) नौसेना में शामिल हो चुकी हैं।
परमाणु पनडुब्बियां (SSBN): भारत की ‘न्यूक्लियर ट्रायड’ (जमीन, हवा और पानी से परमाणु हमला करने की क्षमता) 2014 के बाद पूरी हुई। INS अरिहंत को पूरी तरह सक्रिय किया गया और दूसरी परमाणु पनडुब्बी INS अरिघात को भी बेड़े में शामिल किया गया।
प्रोजेक्ट-75I: अब सरकार ₹45,000 करोड़ की लागत से अत्याधुनिक पनडुब्बियां भारत में ही (निजी क्षेत्र के सहयोग से) बनाने की प्रक्रिया में है।
3. गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर और फ्रिगेट
विशाखापत्तनम क्लास : 2014 के बाद भारत ने ‘विशाखापत्तनम क्लास’ के घातक डिस्ट्रॉयर्स को तैनात किया है। ये जहाज ‘बिल्कुल नहीं दिखने’ (Stealth) की तकनीक और ब्रह्मोस मिसाइलों से लैस हैं।
नीलगिरी क्लास (Project 17A): सात अत्याधुनिक स्वदेशी फ्रिगेट्स का निर्माण मझगांव डॉक और गार्डन रीच (GRSE) में युद्ध स्तर पर चल रहा है। इनमें से कई को लॉन्च किया जा चुका है।
4. तुलनात्मक विश्लेषण

5. हिंद महासागर में दबदबा (Blue Water Navy)
2014 के बाद भारत ने अपनी समुद्री नीति को “Security and Growth for All in the Region” (SAGAR) के तहत बदला है। आज भारतीय नौसेना केवल अपनी सीमाओं की रक्षा नहीं कर रही, बल्कि:
लाल सागर में समुद्री लुटेरों से विदेशी जहाजों को बचा रही है।
श्रीलंका, मॉरीशस और मालदीव जैसे देशों को सुरक्षा सहयोग दे रही है।
चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ (भारत को घेरने की नीति) का मुकाबला करने के लिए गहरे समुद्र में गश्त बढ़ा दी है।
नौसेना के कई महत्वपूर्ण अंगों और रडार प्रणालियों का निर्माण उत्तराखंड की BEL (कोटद्वार) जैसी इकाइयों में होता है, जो उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य के योगदान को भी दर्शाता है।
IRDE (देहरादून): यह संस्थान नाइट विजन उपकरणों और रडार प्रणालियों पर विश्व स्तरीय शोध कर रहा है।
डील (DEAL, देहरादून): संचार प्रणालियों (SDR – Software Defined Radio) में इनका काम भारतीय सेना की रीढ़ की हड्डी जैसा है।
उत्तराखंड के कई क्षेत्रों में उच्च-ऊंचाई वाले निगरानी केंद्र और रडार प्रणालियाँ अंतरिक्ष डेटा का उपयोग करती हैं।
नैनीताल (ARIES): यहाँ स्थित वेधशालाओं का उपयोग अंतरिक्ष मलबे (Space Debris) और उपग्रहों की निगरानी में वैज्ञानिक स्तर पर किया जाता है, जो अप्रत्यक्ष रूप से स्पेस डिफेंस में सहायक है।
निष्कर्ष: 2014 के बाद की नीति का सार यह है कि “हम युद्ध टालना चाहते हैं, लेकिन यदि युद्ध होता है, तो वह जमीन, पानी और हवा के अलावा अंतरिक्ष और साइबर स्पेस में भी लड़ा जाएगा।” भारत की शोध इकाइयाँ अब इसी 5-आयामी युद्ध (5-Dimensional Warfare) की तैयारी कर रही हैं।
निष्कर्ष: भारतीय रक्षा शोध अब केवल “अनुकरण” (Imitation) नहीं, बल्कि “नवाचार” (Innovation) पर आधारित है। भारत अब ऐसी तकनीकें बना रहा है जो दुनिया में पहले कभी नहीं देखी गईं।
ब्रह्मोस (BrahMos) मिसाइल भारत की रक्षा शक्ति का वह स्तंभ है जिसने युद्ध की परिभाषा बदल दी है। यह न केवल एक हथियार है, बल्कि भारत की ‘स्ट्राइक पावर’ और ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ का प्रतीक है।
यहाँ ब्रह्मोस की क्षमताओं और 2014 के बाद इसमें आए बड़े बदलावों का विवरण दिया गया है:
1. दुनिया की सबसे तेज़ सुपरसोनिक मिसाइल
ब्रह्मोस की सबसे बड़ी ताकत इसकी गति (Speed) है। यह ध्वनि की गति से लगभग 3 गुना (2.8 Mach) तेज़ चलती है।
अजेय क्षमता: इसकी गति इतनी अधिक है कि वर्तमान में दुनिया का कोई भी मिसाइल डिफेंस सिस्टम (यहां तक कि चीन या पाकिस्तान के पास मौजूद सिस्टम भी) इसे समय रहते ट्रैक करके मार गिराने में लगभग असमर्थ है।
काइनेटिक एनर्जी: अपनी तेज़ गति के कारण, यह लक्ष्य से टकराते ही इतना जबरदस्त प्रहार करती है कि बिना विस्फोटक के भी बड़े जहाज को दो टुकड़ों में काट सकती है।
2. “लैंड, एयर और सी” – मारक विविधता
ब्रह्मोस दुनिया की उन चुनिंदा मिसाइलों में से है जिसे तीनों सेनाओं द्वारा इस्तेमाल किया जा सकता है:
नौसेना: युद्धपोतों और पनडुब्बियों से समुद्र में कोई भी लक्ष्य नष्ट करने को।
वायुसेना: सुखोई-30 MKI लड़ाकू विमानों से इसे लॉन्च किया जा सकता है। यह भारत की लंबी दूरी की मारक क्षमता को अचूक बनाता है।
थल सेना: मोबाइल लॉन्चर से इसे सीमा पर कहीं भी तैनात किया जा सकता है।
3. 2014 के बाद ब्रह्मोस में बड़े बदलाव
2014 के बाद ‘ब्रह्मोस’ परियोजना में तीन क्रांतिकारी मोड़ आए हैं:
रेंज में वृद्धि (MTCR के बाद): 2016 में भारत के MTCR (Missile Technology Control Regime) का सदस्य बनने के बाद, ब्रह्मोस की रेंज की पाबंदी खत्म हो गई। पहले यह केवल 290 किमी तक मार कर सकती थी, अब इसके 450 किमी से 600 किमी तक के उन्नत संस्करणों का सफल परीक्षण हो चुका है।
स्वदेशीकरण (Indigenisation): पहले ब्रह्मोस में रूसी पुर्जों का हिस्सा अधिक था। अब इसका बूस्टर, एयरफ्रेम और सीकर (Seeker) जैसे महत्वपूर्ण हिस्से भारत में ही बन रहे हैं। स्वदेशी सामग्री को 50% से बढ़ाकर 75% से अधिक कर दिया गया है।
निर्यात (Export): जनवरी 2022 में भारत ने फिलीपींस के साथ $375 मिलियन (करीब ₹3100 करोड़) का ऐतिहासिक समझौता किया। यह भारत का अब तक का सबसे बड़ा एकल रक्षा निर्यात ऑर्डर है।
4. तकनीकी विशिष्टताएँ (Technical Specs)

5. रणनीतिक महत्व: ‘गेम चेंजर’ क्यों?
ब्रह्मोस के महत्व को इन तीन बिंदुओं से समझा जा सकता है:
प्रतिरोध (Deterrence): ब्रह्मोस की तैनाती ने हिंद महासागर में चीन की नौसेना और सीमाओं पर पाकिस्तान की आक्रामकता को संतुलित किया है।
आत्मनिर्भरता : यह रूस और भारत के संयुक्त उद्यम (Joint Venture) की सफलता का उदाहरण है, जो अब ‘मेक इन इंडिया’ का वैश्विक चेहरा बन गया है।
अर्थव्यवस्था: फिलीपींस के बाद अब वियतनाम, इंडोनेशिया और कई खाड़ी देश ब्रह्मोस खरीदने में रुचि दिखा रहे हैं, जिससे भारत की ‘डिफेंस एक्सपोर्टर’ की छवि मजबूत हुई है।
ब्रह्मोस-NG (Next Generation):
वर्तमान में सरकार ब्रह्मोस-NG पर काम कर रही है, जो वर्तमान मिसाइल से काफी हल्की और छोटी होगी। इसे तेजस जैसे हल्के लड़ाकू विमानों पर भी तैनात किया जा सकेगा, जिससे भारत की हवाई ताकत कई गुना बढ़ जाएगी।
भारतीय रक्षा क्षेत्र में शोध और आविष्कार (R&D and Innovation) का परिदृश्य पिछले दशक में मौलिक रूप से बदला है। जहाँ पहले शोध का पूरा जिम्मा केवल सरकारी संस्थाओं (DRDO) पर था, वहीं अब इसमें स्टार्टअप्स, निजी क्षेत्र और शैक्षणिक संस्थानों की भागीदारी को अनिवार्य बना दिया गया है।
यहाँ भारतीय रक्षा शोध और नवाचार की प्रमुख दिशाओं का विश्लेषण दिया गया है:
1. iDEX (Innovations for Defence Excellence)
2018 में शुरू किया गया ‘iDEX’ वर्तमान सरकार का सबसे क्रांतिकारी कदम माना जाता है।
उद्देश्य: रक्षा क्षेत्र में स्टार्टअप्स, व्यक्तिगत आविष्कारकों और MSMEs को जोड़ना।
प्रभाव: इसमें ‘डिस्क’ (DISC – Defence India Startup Challenge) जैसी प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। अब तक सैकड़ों स्टार्टअप्स को करोड़ों रुपये की ग्रांट दी जा चुकी है ताकि वे अत्याधुनिक तकनीक (जैसे रोबोटिक्स, AI, और क्वांटम कंप्यूटिंग) पर काम कर सकें।
2. DRDO का बदलता स्वरूप और ‘यंग साइंटिस्ट लैब्स’
DRDO ने अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करते हुए युवा प्रतिभाओं को मौका देना शुरू किया है:
DYSL (DRDO Young Scientist Laboratories): विशेष रूप से 35 वर्ष से कम आयु के वैज्ञानिकों के लिए 5 नई प्रयोगशालाएं खोली गई हैं। ये लैब्स भविष्य की तकनीकों पर केंद्रित हैं:
Artificial Intelligence (बेंगलुरु)
Quantum Technologies (मुंबई)
Cognitive Technologies (चेन्नई)
Asymmetric Technologies (कोलकाता)
Smart Materials (हैदराबाद)
3. प्रमुख तकनीकी आविष्कार और शोध क्षेत्र
क्वांटम कंप्यूटिंग और संचार: भारत ने ‘क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन’ (QKD) तकनीक का सफल परीक्षण किया है, जो सेना के संचार को इतना सुरक्षित बना देती है कि उसे हैक करना लगभग असंभव है।
हाइपरसोनिक तकनीक: भारत ने HSTDV (Hypersonic Technology Demonstrator Vehicle) का सफल परीक्षण किया है। इससे भारत उन चुनिंदा देशों (रूस, चीन, अमेरिका) की कतार में आ गया है जिनके पास ध्वनि से 6 गुना तेज़ मिसाइल बनाने की तकनीक है।
डायरेक्टेड एनर्जी वेपन्स (DEWs): लेजर और माइक्रोवेव हथियारों पर शोध चल रहा है (जैसे ‘दुर्गा-2’ प्रोजेक्ट), जो बिना गोली चलाए दुश्मन के ड्रोन या मिसाइल को आसमान में ही जला सकते हैं।
एंटी-ड्रोन सिस्टम: सीमा पर बढ़ते ड्रोन खतरों को देखते हुए DRDO और भारतीय स्टार्टअप्स ने स्वदेशी ‘D-4’ सिस्टम विकसित किया है, जो दुश्मन के ड्रोन को जाम कर सकता है या नष्ट कर सकता है।
4. टीडीएसी (TDAC) और अकादमिक जुड़ाव
अब रक्षा शोध केवल लैब तक सीमित नहीं है, बल्कि आईआईटी (IITs) और विश्वविद्यालयों तक पहुँच गया है:
IIT दिल्ली और मद्रास में विशेष ‘डिफेंस टेक्नोलॉजी सेंटर्स’ स्थापित किए गए हैं।
TDF (Technology Development Fund): यह फंड निजी उद्योगों को रक्षा तकनीक विकसित करने के लिए लागत का 90% तक सरकारी सहायता प्रदान करता है।
5. तुलनात्मक प्रगति: शोध का आधार

रक्षा क्षेत्र के भविष्य को निर्धारित करने वाले इन दो स्तंभों—आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और स्पेस डिफेंस (अंतरिक्ष रक्षा)—पर भारत का काम अब प्रोटोटाइप से निकलकर सक्रिय तैनाती की ओर बढ़ रहा है।
यहाँ इन दोनों क्षेत्रों में हुए शोध और आविष्कारों का विवरण दिया गया है:
1. युद्ध में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI in Warfare)
भारतीय रक्षा मंत्रालय ने AI के महत्व को देखते हुए ‘Defence AI Council’ (DAIC) का गठन किया है। इसका उद्देश्य सेना को “डेटा-संचालित” (Data-driven) बनाना है।
AI-पावर्ड सर्विलांस: नियंत्रण रेखा (LoC) और वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर ऐसे कैमरों और सेंसरों का उपयोग किया जा रहा है जो AI की मदद से घुसपैठियों की पहचान खुद कर लेते हैं और अलर्ट जारी करते हैं।
स्वायत्त हथियार (Autonomous Weapons): भारत ‘ऑटोनॉमस अनमैन्ड ग्राउंड व्हीकल्स’ (UGVs) पर काम कर रहा है जो बिना किसी सैनिक के ऊबड़-खाबड़ इलाकों में रसद पहुँचा सकते हैं या निगरानी कर सकते हैं।
प्रोजेक्ट ‘नयन’ (Project Nayan): यह दुश्मन की संचार भाषा को तुरंत अनुवाद (Translate) करने और उनके कोड तोड़ने के लिए AI का उपयोग करता है।
स्वार्म ड्रोन तकनीक (Swarm Drone Technology): भारत ने हाल ही में 50 से अधिक ड्रोन्स के एक साथ ‘झुंड’ में हमला करने की क्षमता का प्रदर्शन किया है। ये ड्रोन AI के जरिए आपस में बात करते हैं और एक ही लक्ष्य पर विभिन्न दिशाओं से हमला करते हैं।
2. स्पेस डिफेंस और ‘मिशन शक्ति’ (Space Defense)
2014 के बाद भारत ने अंतरिक्ष को केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि एक “युद्ध क्षेत्र” (War Domain) के रूप में मान्यता दी है।
मिशन शक्ति (A-SAT): मार्च 2019 में भारत ने अपनी ‘एंटी-सैटेलाइट’ मिसाइल का सफल परीक्षण किया। इसने अंतरिक्ष में एक लाइव सैटेलाइट को मार गिराया। इसके साथ ही भारत अमेरिका, रूस और चीन के बाद ऐसा करने वाला दुनिया का चौथा देश बन गया।
Defence Space Agency (DSA): तीनों सेनाओं के अंतरिक्ष संपत्तियों (सैटेलाइट्स) के बीच समन्वय के लिए एक समर्पित एजेंसी बनाई गई है। यह एजेंसी अंतरिक्ष में भारत के उपग्रहों को दुश्मन के हमलों या लेजर से बचाने का काम करती है।
GSAT-7 सीरीज (रुक्मिणी): ये विशेष रूप से नौसेना और वायुसेना के लिए समर्पित मिलिट्री सैटेलाइट्स हैं। 2014 के बाद इन सैटेलाइट्स की लॉन्चिंग में तेजी आई है, जिससे समुद्र और हवा में “नेटवर्क सेंट्रिक वारफेयर” संभव हुआ है।
स्पेस इन्वेन्टरी (IndSpaceEx): भारत ने अपना पहला ‘स्पेस वारफेयर’ सिम्युलेशन (IndSpaceEx) आयोजित किया, ताकि यह समझा जा सके कि यदि भविष्य में अंतरिक्ष में युद्ध होता है, तो भारत अपनी रक्षा कैसे करेगा।
3. भविष्य की योजनाएँ और आविष्कार

तीन प्रमुख क्षेत्रों (सबमरीन, लड़ाकू विमान और रूस से युद्धपोत) वर्तमान स्थिति (2026 के संदर्भ में) इस प्रकार है:
1. सबमरीन (Submarines): ‘खरीद’ से ‘निर्माण’ तक का सफर
भारत अपनी पनडुब्बी क्षमता को दो स्तरों पर बढ़ा रहा है:
कलवरी क्लास (Project-75): UPA के समय शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट अब पूरा हो चुका है। स्कॉर्पीन श्रेणी की सभी 6 पनडुब्बियां (जैसे INS वागीर, वाक्शीर) नौसेना में शामिल हैं। अब सरकार अतिरिक्त 3 स्कॉर्पीन पनडुब्बियों के निर्माण पर विचार कर रही है।
परमाणु पनडुब्बियां (SSBN/SSN): भारत ने INS अरिघात के बाद अब और अधिक परमाणु संपन्न पनडुब्बियों पर ध्यान केंद्रित किया है। रूस से लीज पर आने वाली INS चक्र-III (अकुला क्लास) की डिलीवरी को लेकर बातचीत अंतिम चरण में है, जो 2025-26 के आसपास अपेक्षित थी।
Project-75I: यह भविष्य का बड़ा प्रोजेक्ट है जिसके तहत 6 नई आधुनिक पनडुब्बियां भारत में ही बनाई जानी हैं।
2. लड़ाकू विमान (Fighter Jets): राफेल और स्वदेशी ‘तेजस’
विमानों की कमी को दूर करने के लिए दोहरी रणनीति अपनाई गई है:
राफेल (Rafale): 36 विमानों की सफल तैनाती के बाद, अब 114 MRFA (Multi-Role Fighter Aircraft) सौदे पर चर्चा चल रही है। 2026 के शुरुआती अपडेट्स के अनुसार, सरकार इन विमानों को ‘मेक इन इंडिया’ के तहत भारत में ही बनाने के लिए डसॉल्ट (Dassault) के साथ बातचीत को अंतिम रूप दे रही है।
तेजस MK1A: हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) द्वारा निर्मित स्वदेशी तेजस विमानों की डिलीवरी अब तेज हो गई है। वायुसेना ने लगभग 83 और विमानों का ऑर्डर दिया है ताकि पुराने मिग-21 की कमी पूरी हो सके।
AMCA (5th Gen Jet): भारत के अपने पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान (AMCA) के डिजाइन और प्रोटोटाइप पर काम तेजी से चल रहा है।
3. रूस से युद्धपोत (Russian Frigates): तलवार क्लास का विस्तार
रूस के साथ चल रहे ‘तलवार क्लास’ (Krivak-III) प्रोजेक्ट की ताजा स्थिति यह है:
INS तुशिल और तमाल: ये दो युद्धपोत रूस के कैलिनिनग्राद में बने हैं। INS तुशिल दिसंबर 2024 में नौसेना में शामिल हो चुका है और INS तमाल के 2025 के अंत या 2026 की शुरुआत तक आने की संभावना है।
मेक इन इंडिया (Goa Shipyard): इस सौदे की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि बाकी दो युद्धपोत (त्रिपट और तपस्या) भारत के गोवा शिपयार्ड में रूस की तकनीक के साथ बनाए जा रहे हैं। ‘तपस्या’ को मार्च 2025 में लॉन्च किया गया था और इसके 2026 के अंत तक नौसेना को मिलने की उम्मीद है।
मिसाइलें: इन जहाजों के लिए भारत ने हाल ही में (मार्च 2026) रूस के साथ Shtil-1 एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइलों का एक बड़ा सौदा भी किया है।
विशेष नोट: रूस-यूक्रेन संघर्ष के कारण बीच में कुछ देरी जरूर हुई (विशेषकर इंजन को लेकर जो यूक्रेन से आने थे), लेकिन भारत ने सीधे तौर पर रूस और यूक्रेन से समन्वय कर इस प्रोजेक्ट को पटरी पर बनाए रखा।
रूस के साथ भारत का युद्धपोत (Warship) सौदा वर्तमान में तलवार क्लास (Talwar-class) या क्रिवक-III (Krivak-III class) श्रेणी के चार फ्रिगेट्स (Frigates) पर केंद्रित है। हालिया अपडेट्स और रक्षा विवरणों के आधार पर इसकी पूरी जानकारी नीचे दी गई है:
1. सौदे की मुख्य बातें
यह सौदा 2018 में हुआ था, जिसके तहत चार ‘स्टील्थ फ्रिगेट्स’ (Stealth Frigates) भारतीय नौसेना के बेड़े में शामिल होने हैं। इनकी सबसे बड़ी विशेषता इनका रडार से बच निकलने (Stealth capability) का गुण है।
2. युद्धपोतों के नाम और स्थिति
इन चार जहाजों में से दो रूस में बने हैं और दो भारत में:
INS तुशिल (Tushil): यह रूस के यांतर शिपयार्ड (Yantar Shipyard) में बनकर तैयार हुआ है। परीक्षणों के बाद इसे 2024 के अंत में भारतीय नौसेना को सौंपा गया। ‘तुशिल’ का संस्कृत में अर्थ है ‘रक्षक कवच’।
INS तमाल (Tamal): यह रूस में बन रहा दूसरा जहाज है। रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण इसकी डिलीवरी में कुछ देरी हुई, लेकिन अब यह 2025 के अंत या 2026 की शुरुआत तक भारत पहुंचने की उम्मीद है।
INS त्रिपट (Triput) और INS तपस्या (Tapasya): इन दोनों जहाजों का निर्माण गोवा शिपयार्ड (GSL) में रूस के तकनीकी सहयोग से हो रहा है। INS त्रिपट को जुलाई 2024 में लॉन्च किया गया था। यह ‘मेक इन इंडिया’ के तहत एक बड़ी उपलब्धि है।
3. तकनीकी विशेषताएं और मारक क्षमता
इन युद्धपोतों को आधुनिक युद्ध की जरूरतों के हिसाब से लैस किया गया है:
ब्रह्मोस मिसाइल (BrahMos): इन सभी जहाजों पर भारत की सबसे शक्तिशाली सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ‘ब्रह्मोस’ तैनात होगी।
एंटी-सबमरीन हथियार: ये जहाज पनडुब्बियों को खोजने और उन्हें नष्ट करने के लिए आधुनिक टॉरपीडो और रॉकेट लॉन्चर से लैस हैं।
Shtil-1 डिफेंस सिस्टम: हवा से होने वाले हमलों (मिसाइल या विमान) को रोकने के लिए इनमें रूस की आधुनिक एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइल प्रणाली लगी है।
इंजन का पेच: इन जहाजों में लगने वाले ‘गैस टर्बाइन इंजन’ मूल रूप से यूक्रेन के थे। रूस-यूक्रेन संघर्ष के बावजूद, भारत ने सीधे यूक्रेन से इंजन खरीदकर उन्हें रूस भेजा ताकि जहाजों का निर्माण पूरा हो सके।
4. सामरिक महत्व
हिंद महासागर में दबदबा: ये जहाज हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में चीन की बढ़ती सक्रियता को नियंत्रित करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।
पुराने बेड़े का नवीनीकरण: ये नए फ्रिगेट्स भारतीय नौसेना के पुराने हो रहे जहाजों की जगह लेंगे, जिससे नौसेना की कुल मारक क्षमता और ‘ब्लू वाटर नेवी’ (गहरे समुद्र में लड़ने की क्षमता) का सपना मजबूत होगा।
भारतीय नौसेना के ‘विशाखापत्तनम क्लास’ (P-15B) डिस्ट्रॉयर्स और रूस से खरीदे जा रहे ‘तलवार क्लास’ फ्रिगेट्स की तुलना काफी दिलचस्प है, क्योंकि ये दोनों अलग-अलग भूमिकाओं के लिए बने हैं।
यहाँ इनका मुख्य अंतर और सामरिक महत्व दिया गया है:
1. आकार और शक्ति (Size & Power)
विशाखापत्तनम क्लास (Destroyer): यह एक ‘विनाशक’ (Destroyer) है। इसका वजन लगभग 7,400 टन है। यह आकार में बड़ा है और इसमें अधिक हथियार ले जाने की क्षमता है। इसे ‘मिनी-विमानवाहक पोत’ की तरह सुरक्षा प्रदान करने के लिए बनाया गया है।
तलवार क्लास (Frigate): यह एक ‘फ्रिगेट’ है, जिसका वजन लगभग 4,000 टन है। यह छोटा और अधिक फुर्तीला है। इसका मुख्य काम गश्ती करना, एस्कॉर्ट करना और दुश्मन की पनडुब्बियों का शिकार करना है।
2. मारक क्षमता (Weaponry)
ब्रह्मोस का अंतर: विशाखापत्तनम क्लास में 16 ब्रह्मोस मिसाइलें होती हैं, जबकि तलवार क्लास में 8 ब्रह्मोस मिसाइलें लगाई जाती हैं।
स्वदेशी तकनीक: विशाखापत्तनम क्लास लगभग 75% स्वदेशी है, जिसमें भारत का अपना ‘कवच’ (Decoy System) और ‘मैरीटाइम थियेटर कमांड’ के अनुकूल रडार लगे हैं। तलवार क्लास रूसी डिजाइन पर आधारित है, हालांकि अब इसमें भारतीय इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम फिट किए जा रहे हैं।
3. रडार और निगरानी
विशाखापत्तनम क्लास: इसमें दुनिया का सबसे आधुनिक MF-STAR रडार लगा है, जो एक साथ कई दिशाओं से आने वाली सैकड़ों मिसाइलों को ट्रैक कर सकता है।
तलवार क्लास: इसमें रूसी ‘श्टिल’ (Shtil) सिस्टम है, जो कम दूरी और मध्यम दूरी के खतरों के लिए सटीक है, लेकिन यह विशाखापत्तनम क्लास जितना व्यापक नहीं है।
तुलना तालिका (Quick View)
निष्कर्ष (Strategic View)
2014 के बाद की रणनीति यह रही है कि विशाखापत्तनम क्लास जैसे भारी जहाजों से हम समुद्र में अपनी धाक (Power Projection) जमाते हैं, जबकि तलवार क्लास के जहाज हमारी समुद्री सीमाओं की चौबीसों घंटे सुरक्षा (Constant Vigilance) सुनिश्चित करते हैं। रूस से इन जहाजों को खरीदने का एक बड़ा कारण यह भी था कि भारतीय शिपयार्ड्स पहले से ही बड़े प्रोजेक्ट्स (जैसे INS विक्रांत और P-15B) में व्यस्त थे, और हमें तुरंत संख्या बल बढ़ाने की जरूरत थी।
क्या आप इन जहाजों की हिंद महासागर (Indian Ocean) में चीन के ‘टाइप 054’ फ्रिगेट्स के मुकाबले स्थिति के बारे में जानना चाहेंगे?
UPA सरकार के दौरान रूस से खरीदा गया ‘पुराना युद्धपोत’ दरअसल विमानवाहक पोत (Aircraft Carrier) ‘एडमिरल गोर्शकोव’ था, जिसे भारत में INS विक्रमादित्य के नाम से जाना जाता है। इस सौदे का अनुभव भारतीय रक्षा इतिहास में सबसे चर्चित और विवादित रहा है।
इसका विस्तृत संदर्भ और अनुभव इस प्रकार है:
1. सौदे का संदर्भ (The Background)
शुरुआत: 2004 में UPA-1 के समय रूस के साथ यह समझौता हुआ। रूस ने जहाज की मूल संरचना (Hull) ‘मुफ्त’ देने की पेशकश की थी, लेकिन इसकी पूरी मरम्मत और आधुनिकीकरण (Refit) के लिए भारत को 974 मिलियन डॉलर देने थे।
इतिहास: यह मूल रूप से सोवियत संघ का ‘बाकू’ (Baku) नामक युद्धपोत था, जिसे 1987 में कमीशन किया गया था और 1996 में रूस ने बजट की कमी के कारण सेवा से बाहर कर दिया था।
2. कड़वा अनुभव: लागत और समय की बढ़ोत्तरी (Cost & Time Overrun)
इस सौदे को भारतीय रक्षा विशेषज्ञों ने अक्सर ‘रूस द्वारा ब्लैकमेल’ के उदाहरण के रूप में देखा:
लागत में भारी उछाल: जैसे-जैसे मरम्मत का काम बढ़ा, रूस ने अतिरिक्त पैसों की मांग शुरू कर दी। अंततः, जो सौदा $974 मिलियन में होना था, उसकी कीमत बढ़कर लगभग $2.33 बिलियन (करीब तीन गुना) हो गई।
अत्यधिक देरी: जहाज को 2008 तक भारत आ जाना चाहिए था, लेकिन रूस के शिपयार्ड (Sevmash) की अक्षमता और तकनीकी समस्याओं के कारण यह 5 साल की देरी से नवंबर 2013 में भारत को मिला।
तकनीकी विफलता: 2012 के समुद्री परीक्षणों (Sea Trials) के दौरान इसके 8 बॉयलरों में से 7 खराब हो गए, जिससे डिलीवरी में और देरी हुई।
3. सीएजी (CAG) की तीखी आलोचना
भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) ने अपनी रिपोर्ट में इस सौदे पर गंभीर सवाल उठाए थे:
सेकंड हैंड बनाम नया: रिपोर्ट में कहा गया कि भारत एक पुराने जहाज के लिए इतनी भारी कीमत चुका रहा था, जिससे लगभग एक नया स्वदेशी विमानवाहक पोत बनाया जा सकता था।
सीमित जीवनकाल: एक पुराने जहाज को नया रूप देने के बावजूद उसका जीवनकाल नए जहाज की तुलना में कम होता है।
4. आज की स्थिति और सीख
शक्ति का आधार: तमाम विवादों के बावजूद, आज INS विक्रमादित्य भारतीय नौसेना की रीढ़ है। इसने भारत को हिंद महासागर में ‘शक्ति प्रदर्शन’ (Power Projection) की क्षमता दी।
बदली हुई रणनीति: इस कड़वे अनुभव से सबक लेते हुए ही बाद की सरकारों ने स्वदेशी विमानवाहक पोत (जैसे INS विक्रांत) के निर्माण पर जोर दिया और रूस के साथ रक्षा सौदों में ‘पेनल्टी क्लॉज’ (देरी होने पर जुर्माना) को सख्ती से लागू करना शुरू किया।
निष्कर्ष: INS विक्रमादित्य का अनुभव “महंगा सौदा और कूटनीतिक मजबूरी” का मिश्रण रहा। इसने सिखाया कि पुराने विदेशी प्लेटफार्मों पर निर्भर रहने के बजाय अपनी स्वदेशी क्षमता विकसित करना ही बेहतर दीर्घकालिक रणनीति है।
यह तुलना वास्तव में यह समझने को सबसे अच्छी है कि भारतीय नौसेना ने एक “पुराने रूसी जहाज” के अनुभव से सीखकर “स्वदेशी शक्ति” तक का सफर कैसे तय किया। INS विक्रमादित्य (रूस से लिया) और INS विक्रांत (भारत निर्मित) के बीच अंतर केवल जहाजों का नहीं, बल्कि दो अलग-अलग रक्षा युगों का है।
1. डिजाइन और निर्माण (The DNA)
INS विक्रमादित्य: यह मूलत: एक रूसी ‘क्रूजर’ था जिसे विमानवाहक पोत में बदला गया। इसकी बनावट में कई सीमाएं थीं क्योंकि विमान उड़ाने को शुरू से डिजाइन नहीं था।
INS विक्रांत: इसे भारतीय नौसेना के ‘वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो’ ने शून्य से डिजाइन किया है। यह 76% स्वदेशी है। इसमें प्रयुक्त विशेष ‘वारशिप ग्रेड स्टील’ भी भारत (SAIL) में ही बना है, जिसे पहले हम रूस से मंगवाते थे।
2. तकनीक और स्वचालन (Automation & Technology)
विक्रमादित्य में पुराने रूसी सिस्टम और बॉयलर लगे हैं, जिनका रखरखाव (Maintenance) काफी महंगा और जटिल है। रूस-यूक्रेन युद्ध बाद इनके स्पेयर पार्ट्स मिलना भी एक चुनौती रही है।
विक्रांत में अत्याधुनिक ‘गैस टर्बाइन इंजन’ (GE-LM2500) लगे हैं, जो इसे बहुत शांत और तेज बनाते हैं। इसका ऑटोमेशन इतना उन्नत है कि यह बहुत कम क्रू के साथ भी कुशलता से काम कर सकता है।
3. मारक क्षमता और विमान (Air Wing)
दोनों ही जहाज STOBAR तकनीक (Skijump से उड़ान भरना) उपयोग करते हैं।
दोनों पर फिलहाल MiG-29K लड़ाकू विमान तैनात हैं, लेकिन विक्रांत ऐसे बनाया गया है कि यह भविष्य में Rafale-M (फ्रांस) या स्वदेशी TEDBF (Twin Engine Deck Based Fighter) को आसानी से संभाल सके।
तुलना तालिका: एक नजर में

4. अनुभव से मिली सबसे बड़ी सीख
INS विक्रमादित्य के सौदे में जो लागत तीन गुना बढ़ गई थी, उसने भारत को यह अहसास कराया कि “रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy)” केवल स्वदेशी निर्माण से ही संभव है।
विक्रमादित्य के लिए हमें हर छोटी मरम्मत को रूसी विशेषज्ञों पर निर्भर रहना पड़ता था।
विक्रांत मामले में, पूरा इकोसिस्टम (लगभग 500 भारतीय कंपनियां) तैयार हो गया है। अब भारत IAC-2 (एक और स्वदेशी विमानवाहक पोत) बनाने की तैयारी में है, जो विक्रांत से भी बड़ा होगा।
निष्कर्ष: 2014 बाद की रक्षा तैयारियों में विक्रांत का कमीशन होना भारत की “आत्मनिर्भरता” का सबसे बड़ा प्रतीक बना।
इन दो विमानवाहक पोतों के साथ भारत की ‘टू-कैरियर’ (Two-Carrier) रणनीति हिंद महासागर में चीन की घेराबंदी (String of Pearls) को विफल करती है।
भारत की ‘टू-कैरियर’ (Two-Carrier) रणनीति केवल सैन्य मजबूती नहीं, बल्कि हिंद महासागर (IOR) में चीन की ‘मोतियों की माला’ (String of Pearls) रणनीति का सीधा जवाब है। दो सक्रिय विमानवाहक पोतों विक्रमादित्य और विक्रांत से भारत का समुद्री शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल गया है।
मुख्य सामरिक बिंदु :
1. ‘उपलब्धता’ का गणित (The Power of Availability)
समुद्री रणनीति में एक नियम है: “दो का मतलब एक है, और एक का मतलब शून्य है।”
विमानवाहक पोतों को समय-समय पर लंबी मरम्मत (Maintenance) की जरूरत होती है। जब हमारे पास केवल एक जहाज (विक्रमादित्य) था और वह मरम्मत पर होता, तो हमारी समुद्री सीमाएं असुरक्षित हो जाती थीं।
अब दो पोत होने से, भारत पूर्वी तट (बंगाल की खाड़ी) और पश्चिमी तट (अरब सागर) दोनों पर एक साथ मौजूद है। चीन के लिए अब भारत के दोनों दरवाजों पर एक साथ दबाव बनाना असंभव है।
2. मलक्का जलडमरूमध्य (Malacca Strait) की घेराबंदी
चीन का लगभग 80% व्यापार मलक्का जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। इसे चीन का ‘मलक्का डिलेमा’ (Malacca Dilemma) कहा जाता है।
INS विक्रांत की तैनाती अक्सर अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के पास रणनीतिक बढ़त देती है।
अगर युद्ध की स्थिति बनती है, तो भारत अपने विमानवाहक पोतों से चीन की लाइफलाइन (तेल और व्यापार की आपूर्ति) को वहीं रोक सकता है।
3. ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ (String of Pearls) का काट
चीन ने ग्वादर (पाकिस्तान), हंबनटोटा (श्रीलंका) और जिबूती में अपने ठिकाने बनाए हैं।
भारत के विमानवाहक पोत “चलता-फिरता हवाई क्षेत्र” (Floating Airfields) हैं। इन्हें किसी देश की जमीन की जरूरत नहीं है।
ये पोत समुद्र के बीचों-बीच रहकर चीन के इन ठिकानों की निगरानी करते हैं और किसी भी चीनी आक्रामकता का तुरंत जवाब देने की क्षमता रखते हैं।
4. चीन के ‘टाइप 003’ के खिलाफ संतुलन
चीन तेजी से अपने विमानवाहक पोतों (जैसे फुजियान) की संख्या बढ़ा रहा है। 2026 तक चीन की योजना हिंद महासागर में अपनी नियमित गश्त बढ़ाने की है।
भारत की टू-कैरियर रणनीति चीन को यह संदेश देती है कि हिंद महासागर उसका “पिछवाड़ा” नहीं है।
भारत अब IAC-2 (विशाल) पर भी काम कर रहा है, जो 65,000 टन का होगा, ताकि भविष्य में हमारे पास हर समय दो पोत समुद्र में तैनात रहें और एक बैकअप में रहे।
निष्कर्ष: UPA से अब तक का बदलाव
जहाँ UPA के समय हम एक पुराने रूसी जहाज की मरम्मत और उसकी डिलीवरी को संघर्ष कर रहे थे, वहीं आज हम इस स्थिति में हैं कि हम अपनी शर्तों पर समुद्र के दो अलग-अलग कोनों में अपनी वायु सेना (Carrier-based Aviation) तैनात कर सकते हैं। यह भारत को एक ‘क्षेत्रीय सुरक्षा प्रदाता’ (Net Security Provider) के रूप में स्थापित करता है।
रक्षा क्षेत्र में इस ‘स्वदेशीकरण’ (Indigenisation) और ‘दो-कैरियर रणनीति’ का प्रभाव केवल सैन्य नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक भी है।
1. बजट आवंटन: ‘आयात’ से ‘निवेश’ की ओर
2014 के बाद रक्षा बजट के स्वरूप में बड़ा बदलाव आया है। पहले रक्षा बजट का एक बड़ा हिस्सा विदेशी कंपनियों को भुगतान करने में चला जाता था, लेकिन अब:
घरेलू खरीद को आरक्षण: रक्षा बजट (Capital Outlay) का लगभग 75% हिस्सा अब केवल भारतीय कंपनियों से खरीद को आरक्षित है। अरबों रुपये जो पहले रूस, अमेरिका या फ्रांस जाते थे, अब भारतीय उद्योगों (L&T, टाटा, HAL, मँझगांव डॉक) में निवेश हो रहे हैं।
बजट 2024-26 का रुझान: हालिया बजटों में नौसेना के आधुनिकिकरण पर विशेष जोर दिया गया है, क्योंकि हिंद महासागर में चीनी चुनौती बढ़ी है।
2. आर्थिक प्रभाव और रोजगार (The Multiplier Effect)
INS विक्रांत का उदाहरण लें, जिसे बनाने में:
रोजगार: सीधे तौर पर लगभग 2,000 HAL और कोचीन शिपयार्ड के कर्मचारियों को काम मिला, लेकिन परोक्ष रूप से (Indirectly) करीब 40,000 लोगों को रोजगार मिला।
MSME की भागीदारी: इस एक जहाज को बनाने में भारत की 500 से अधिक छोटी-बड़ी कंपनियों (MSMEs) ने पुर्जे और तकनीक सप्लाई की।
टियर-2 और टियर-3 शहरों का विकास: इन कंपनियों में से कई पुणे, कोयंबटूर, जालंधर और बेंगलुरु जैसे शहरों में स्थित हैं, जिससे रक्षा निर्माण का विकेंद्रीकरण हुआ है।
3. ‘नकारात्मक आयात सूची’ (Negative Import List)
सरकार ने लगभग 500 से अधिक रक्षा उपकरणों की ऐसी सूची जारी की है, जिनका अब विदेशों से आयात नहीं किया जा सकता।
इसका सीधा असर यह हुआ कि भारतीय स्टार्ट-अप्स और ‘iDEX’ (Innovation for Defence Excellence) के तहत युवाओं को नए ड्रोन, सेंसर और सॉफ्टवेयर बनाने का मौका मिला।
भारत अब केवल हथियार खरीदने वाला देश नहीं, बल्कि निर्यात (Export) करने वाला देश बन रहा है (जैसे फिलीपींस को ब्रह्मोस बेचना)।
4. महत्वपूर्ण
जहाँ UPA के समय ‘स्कैम’ (जैसे अगस्ता वेस्टलैंड) चर्चा में रहते थे, वहीं अब चर्चा ‘सप्लाई चेन’ और ‘आत्मनिर्भरता’ पर केंद्रित है। हालांकि, एक स्वतंत्र मीडिया पोर्टल के तौर पर इसमें चुनौतियां भी देखी जा सकती हैं:
देरी और गुणवत्ता: क्या भारतीय कंपनियाँ विदेशी गुणवत्ता और समय सीमा (Deadlines) का मुकाबला कर पा रही हैं?
बजट का दबाव: पेंशन और वेतन (Revenue Expenditure) का बढ़ता बोझ, नए हथियारों की खरीद (Capital Outlay) के बजट को कैसे प्रभावित कर रहा है?
निष्कर्ष: सबमरीन हो या युद्धपोत, अब भारत की नीति “खरीदार” से बदलकर “निर्माता” की हो गई है। यह बदलाव न केवल हमारी सीमाओं को सुरक्षित करता है, बल्कि देश के औद्योगिक आधार को भी मजबूत करता है।

