मसूरी
राजपुर से मसूरी तक का यह ऐतिहासिक पैदल मार्ग देहरादून के पुराने राजपुर गाँव से शुरू होता था और मसूरी के झड़ीपानी पर जाकर खत्म होता था। यात्रा के शुरुआती बिंदु यानी राजपुर का उस दौर में बहुत बड़ा व्यावसायिक और राजनीतिक महत्व था। ब्रिटिश काल में राजपुर एक प्रमुख कमर्शियल हब और इस पहाड़ी यात्रा का मुख्य बेस कैंप हुआ करता था। मैदानी इलाकों से आने वाले सभी यात्री, ब्रिटिश अधिकारी और व्यापारी सबसे पहले राजपुर ही पहुँचते थे। राजनीतिक रूप से भी यह क्षेत्र प्रशासनिक गतिविधियों का केंद्र था क्योंकि यहीं से मसूरी की पूरी रसद, डाक और सरकारी सामान को ऊपर भेजने की व्यवस्था संभाली जाती थी। यहाँ कई होटल, अस्तबल और धर्मशालाएं थीं, जहाँ लोग पहाड़ों की रानी की चढ़ाई शुरू करने से पहले अपनी तैयारी करते थे और यहीं से आगे की यात्रा के लिए घोड़े, खच्चर या पालकी,डांडी किराए पर लिए जाते थे।
राजपुर से शुरू होकर यह पथरीला और संकरा मार्ग जंगलों के बीच से होते हुए ऊपर की ओर बढ़ता है। चूंकि यह शुद्ध रूप से एक पैदल और घोड़ों का मार्ग था, इसलिए इस पर किसी भी तरह के पहिये वाले वाहन का जाना पूरी तरह वर्जित और असंभव था। रास्ते में आज भी सिटी बोर्ड द्वारा लगाए गए पुराने लाल रंग के लोहे के टोल बोर्ड देखे जा सकते हैं, जो इस मार्ग की ऐतिहासिक पहचान हैं। इन लाल बोर्ड्स पर आना और पाई में उस दौर की कर दरें टोल रेट्सलिखी हुई हैं, जो यह बताती हैं कि यहाँ से गुजरने वाले इंसानों, सामान ढोने वाले जानवरों और यहाँ तक कि पालतू कुत्तों तक से टैक्स लिया जाता था।
आगे बढ़ने पर यह मार्ग हाफवे हाउस से होकर गुजरता है, जो चढ़ाई के ठीक बीच में स्थित एक बेहद व्यस्त आरामगाह था जहाँ यात्रियों के सुस्ताने और घोड़ों व खच्चरों को बदलने के लिए अस्तबल की व्यवस्था थी। इसके बाद यह रास्ता घने ओक और चीड़ के जंगलों से गुजरते हुए ऐतिहासिक ओक ग्रोव स्कूल के पास पहुँचता है, जिसे 1888 में रेलवे अधिकारियों के बच्चों के लिए बनाया गया था। इस प्राकृतिक रास्ते और खड़ी चढ़ाई को पार करते हुए अंततः यह यात्रा मसूरी के झड़ीपानी पर जाकर समाप्त होती है, जहाँ पहुँचकर दून घाटी का एक अद्भुत नजारा दिखाई देता है।
#रवींद्र सिंह गुसाई की फेसबुक वॉल से
