जगतसेठ माणिकचंद फतेहचंद

जगत_सेठ : जिनके उधार से मुकर गये थे अंग्रेज़

#जगत_सेठ एक नाम नहीं, बल्कि पदवी है, जो फ़तेह चंद को मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह ने 1723 में दी थी। इसके बाद यह पूरा परिवार ‘जगत सेठ घराना’ के नाम से मशहूर हुआ।

‘भारत कभी सोने की चिड़िया हुआ करता था’ यह आपने भी किसी न किसी से ज़रूर सुना होगा। लेकिन वे कौन लोग थे, जिनकी अकूत दौलत ने भारत को यह तमग़ा दिलवाया? जिन्हें लूटने के लिए अंग्रेजों को भारत आना पड़ा। अनगिनत लोग और अथाह ख़ज़ाना बताया जाता है। आज हम इन्हीं में से एक ‘जगत सेठ (Jagat Seth)’ के बारे में बताएंगे, जिनके पास इतना पैसा था कि अंग्रेज़ भी उनसे उधार लिया करते थे। व्यापारी बनकर, शासक बनकर नहीं।

असल में ‘जगत सेठ’ एक नाम नहीं, बल्कि पदवी है, जो फ़तेह चंद को मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह ने 1723 में दी थी। इसके बाद यह पूरा परिवार ‘जगत सेठ घराना’ के नाम से मशहूर हुआ। इस घराने का संस्‍थापक, सेठ माणिक चंद को माना जाता है। माणिकचंद न सिर्फ नवाब मुर्शिद क़ुली ख़ां के ख़जांची थे, बल्कि सूबे का लगान भी उनके पास जमा होता था।

दोनों ने मिलकर बंगाल की नई राजधानी मुर्शिदाबाद बसाई। इन्होंने औरंगज़ेब को एक करोड़ तीस लाख की जगह, दो करोड़ का लगान भेजा था। माणिकचंद के बाद, परिवार की बागडोर फ़तेह चंद के हाथ में आई, जिनके समय में यह परिवार बुलंदियों पर पहुंचा।

जगत सेठ घराने के बारे में कहा जाता था कि यह परिवार चाहे तो सोने और चांदी की दीवार बनाकर गंगा की धारा को रोक सकता है। इस घराने ने सबसे अधिक दौलत फतेहचंद के दौर में अर्जित की। उस समय उनकी संपत्ति क़रीब 10,000,000 पाउंड की थी, जो आज के हिसाब से लगभग 1000 बिलियन पाउंड होगी।

ब्रिटिश सरकार के अभिलेखों के अनुसार उनके पास इंग्लैंड के सभी बैंकों की तुलना में अधिक पैसा था, कुछ रिपोर्ट्स का यह भी अनुमान है कि 1720 के दशक में ब्रिटिश अर्थव्यवस्था जगत सेठों की संपत्ति से छोटी थी। लेकिन चढ़ता सूरज एक न एक दिन ढलता भी है। इस घराने के अंत का कारण बना अंग्रेजों का दिया धोखा। जगत सेठ ने अंग्रेजों को काफी बड़ा ऋण दे दिया था, लेकिन बाद में अंग्रेज़ों ने इस बात से साफ मना कर दिया कि ईस्ट इंडिया कंपनी के ऊपर जगत सेठ का कोई ऋण है। यह इस घराने को बहुत बड़ा धक्का था। 1912 ई. तक अंग्रेज इस घराने के सेठों को जगत सेठ की उपाधि के साथ थोड़ी-बहुत पेंशन देते रहे। बाद में यह पेंशन भी बंद हो गई।

#फतेहचंद:

वास्तव में जगतसेठ उस धनवान समुदाय का मुखिया होता था जो बडे-बडे रजवाडों से लेकर गाँव के जमींदार तक को ब्याज पर फाईनेंस करता था। जगतसेठ का मतलब होता हैं- “पुरी दुनिया का सेठ या पुरी दुनिया का बैंकर” , बंगाल में नवाब सिराजुद्दौला के समय मुर्शिदाबाद के जगतसेठ फतेहचंद प्रसिद्ध थे।

भारत पर अंग्रेजी शासन स्थापित होने से पहले यहां अनेक बड़े-बड़े पूंजीपति हुआ करते थे , अकेले बंगाल में ही फतेहचंद सेठ ऐसे बड़े कारोबारी थे, जिसकी व्यापारिक कोठियां देश भर में कायम थीं व जहां से राजसत्ता के संरक्षण में मालगुजारी-वसूली के साथ-साथ मुद्रा की विनिमय-दर निर्धारण भी हुआ करता था। बंगाल के नवाब से लेकर दिल्ली के बादशाह तक ने उसे ‘जगत सेठ’ की उपाधि दे रखी थी। आज दुनिया भर की मुद्राओं की विनिमय-दर निर्धारित करने का जो काम विश्वबैंक व अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा-कोष आदि संस्थाओं के माध्यम से परोक्ष में अमेरिकी पूंजीपति किया करते हैं, सो काम तब यहां के जगत सेठ किया करते थे , चूंकि उन दिनों विश्व-व्यापार में 3०% से भी अधिक भारत की भागीदारी थी व ज्यादातर व्यापार का लेखा-जोखा इन्हीं जगतसेठ के पास रहता था।

बंगाल के धनी बैंकर ‘फ़तेहचंद’ को ‘मुहम्मद शाह’ ने 1723 में जगतसेठ की उपाधि दी थी। 18वीं शताब्दी के मध्य में यह सबसे शक्तिशाली बैंकर थे। इन जगतसेठों के बिजनेस हाउस को माणीखचंद ने बनाया था व इस बिजनेस हाउस का कार्य “बैंक औफ इंग्लैंड” के समतुल्य था।

“सिच्टेर्मन” नाम के एक निर्देशक ने ‘1744’ में लिखा था कि- “जगतसेठ फतेहचंद हिन्दुस्तान के सबसे बडे बैंकर थे , समूचे राज्य में उनका बिजनेस था. वे शासन के काम में हिस्सा नहीं लेते थे फिर भी उनका प्रभाव राज्य के सभी कामों पर दिखता था ”

जगतसेठों के बारे में “आधुनिक भारत का आर्थिक इतिहास” पुस्तक के लेखक ‘धनपति पाण्डेय’ लिखते हैं – राजस्थान के मारवाडियों ने 1750 के बाद महाराष्ट्र में अपना निवास स्थान बनाया व वहां का व्यापार प्रभावित करने लगे , ये कीमती वस्तुओं का व्यापार करते थे , इनमें बंगाल के जगतसेठ प्रमुख थे। पूरे बंगाल का व्यापार इन जगतसेठों के हाथ में था।
ऎसा उल्लेख मिलता हैं कि- “जब अलीवर्दी खाँ बंगाल का नवाब था,  तब इन जगतसेठों के पास 10 करोड की पूँजी थी, मराठों ने उन पर आक्रमण कर उनसे 2 करोड रूपये हथिया लिये थे पर उन पर इस लूट का लेशमात्र भी फ़र्क नही पडा।”
जगतसेठ मारवाड के थे। ये व्यापारी आधुनिक बैंक के सभी काम करते थे। वे रकमें जमा करते थे , ऋण देते थे , और हुण्डिया जारी करते थे। इन व्यापारीयों का संबन्ध सभी राजा-महाराजाओं व बादशाहो से था व अंग्रेजों से तो इनका बडा जोरदार गठबन्धन था।

According to Nick Robins- “The Jagatseths were unrivelled in Northern India for their financial power known as Banker of the World. This Marwari Family had build up forminadable economic resources on the back of its control of the Imperial mint and extensive money lending. They wielded this financial clout at the Bengali Court and were judged to be “The Chief cause of revolutions in Bengal by a French commentator at the time.”

Roben Orme (official Historian Of East India Company ) द्वारा जगतसेठों को Money Changer (मुद्रापरिवर्तक) व “Banker of the known World” कहा जाता था।

इन ग्लोबल व्यापारियों का सदियों पुराना सपना था कि असली राज्यकर्ताओं को हटा कर हम व्यापारी अपने चुने हुए प्यादों से दुनिया पर राज करें।

आगे फतेहचंद व ईस्ट इंडिया कंपनी का षड्यंत्र।
✍🏻

2★ #फतेहचंद/#जगतसेठ/#वर्ल्डबैंक का ईस्ट इंडिया कम्पनी से मिलकर षड्यंत्र :

उद्यमियों के रुप में मारवाड़ियों की प्रतिष्ठा बहुत पुरानी है. इतिहास बताता है कि सत्रहवीं शताब्दी में पहली बार जगत सेठ के पूर्वज और वाराणसी के अग्रवाल मुगल बादशाह के पीछे-पीछे बंगाल पहुंचे थे. राजस्थान से बाहर बंगाल की तत्कालीन राजधानी मुर्शिदाबाद, बर्दवान और असम उनके शुरुआती ठिकाने थे. इन्हीं में से एक व्यापारी थे हीरानंद साहू।
हीरानन्द साहू के सात बेटे थे. उनके सात रत्न जवान होकर व्यापार करने के लिए इधर-उधर बिखर गये. उनके एक बेटे माणिक चन्द ढाका आ गये जो उस जमाने में बंगाल की राजधानी हुआ करता था.
दरअसल माणिक चन्द ही थे जिन्होंने बंगाल के जगत सेठ परिवार की बुनियाद रखी थी. मुर्शिद क़ुली ख़ाँ बंगाल, बिहार और उड़ीसा के सूबेदार और माणिक चंद एक दूसरे के गहरे दोस्त थे. माणिक चंद न सिर्फ नवाब मुर्शिद क़ुली ख़ाँ के ख़जांची थे बल्कि सूबे का लगान भी उनके पास जमा होता था. दोनों ने मिल कर बंगाल की नयी राजधानी मुर्शिदाबाद बसायी थी और औरंगज़ेब को एक करोड़ तीस लाख की मांग की जगह दो करोड़ लगान भेजा. 1715 में मुग़ल सम्राट फ़र्रुख़सियर ने माणिक चंद को सेठ की उपाधि देकर उसकी प्रतिष्ठा में चार चांद लगा दिए. एक बड़े से पन्ने पर ‘जगत सेठ’ खुदवा कर सील बनवाई गयी थी जो दूसरे दुर्लभ उपहारों के साथ शाही दरबार में फतेह चंद को पेश की गयी थी.
नवाब और ईस्ट इण्डिया कम्पनी सेठ माणिक चंद से बड़े-बड़े मामलों पर सलाह लिया करते थे. नवाब ने अपनी टकसाल का काम भी सेठ माणिक चंद पर छोड़ दिया था. बिहार, बंगाल और उड़ीसा में सेठ माणिक चंद के ढाले सिक्के चलते थे. वह अपने ज़माने में देश का सबसे धनवान नागरिक था. अपनी अपार सम्पत्ति की रक्षा को उसने एक निजी सेना बना रखी थी. माना जाता था कि सेठ माणिक चंद के पास सोने और चांदी का इतना बड़ा भण्डार है कि वह उससे गंगा की धारा का रुख़ मोड़ सकता है. गंगा की धारा का रुख़ मोडऩे की कोशिश सेठ माणिक चंद ने कभी नहीं की लेकिन सत्ता का रुख़ ज़रूर कई बार मोड़ा.
सेठ माणिक चंद को नायाब हीरे-जवाहरात जमा करने का भी शौक था लेकिन हरे पत्थर यानी पन्ने के लिए तो उनका ज़ुनून मशहूर था. दूर-दराज़ से पन्ने के व्यापारी उनके लिए कीमती से कीमती पन्ना लाते थे. सेठ माणिक चंद पारदर्शी हरे रंग के दीवाने थे. अच्छे पन्ने के लिए सोने की थैलियाँ खोल देते थे. व्यापारी उनकी इस कमजोरी को अच्छी तरह समझते थे और क़ाहिरा की बाज़ारों से ख़रीदे गये नायाब पन्ने उन्हें मुँहमांगी क़ीमत पर बेचते रहते थे. सेठ माणिक चंद के पास सब कुछ था पर न थी तो कोई संतान , उन्होंने परिवार आगे चलाने के लिए अपने भतीजे “फतेह चंद” को गोद ले लिया था.
उस समय उनकी फर्म की शाखाएं विश्व के कई हिस्सों में थीं , भारत में मुख्य रूप से उनकी शाखाएं हुगली, कोलकाता, बनारस और दिल्ली थीं.

आंकड़ों के मुताबिक, 1718 से 1757 तक ईस्ट इंडिया कंपनी जगत सेठ की फर्म से सालाना चार लाख कर्ज लेती थी। #डच और #फ्रेंच कंपनियों को भी यह फर्म कर्ज देती थी.
जगत सेठ की कोठी से रुपयों का लेन-देन कार्य तो होता ही था साथ साथ वह बंगाल के नवाब के भी कई कार्यों को पूर्ण करने का काम करते थे. प्रान्तीय सरकार की तरफ़ से मालगुज़ारी वसूल करना, शाही खज़ाने को दिल्ली भेजना, सिक्के की विनिमय दर तय करना आदि भी जगत् सेठ की ही ज़िम्मेदारी थी.

सेठ फ़तेह चन्द्र की यह विशेषता थी कि वह बंगाल के नवाब का नज़राना करोड़-दो करोड़ रुपये हुंडी से दिल्ली के बादशाह के पास भेज दिया करते थे.
●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●

जगत सेठ फ़तेहचंद्र के बाद उसका पौत्र ‘महताबचंद्र’ दूसरा जगत् सेठ बना. जब बंगाल के नवाब सरफ़राज़ खान ने उसे अपमानित किया, बंगाल के सूबेदार के साथ बहुत अच्छे संबंध बना कर रखने वाले जगत सेठ और बंगाल के सूबेदार सरफ़राज़ ख़ाँ (1739-40) में कुछ खटक गया था. वजह यह थी कि सरफ़राज़ ख़ाँ बला का अय्याश था. औरतें उसकी कमज़ोरी थीं. किसी ने उसे यह बता दिया था कि जगत सेठ फतेह चंद की बहू अप्सराओं जैसी सुन्दर है. सत्ता और शराब के नशे में चूर सरफ़राज़ ख़ाँ ने यह आदेश दे दिया कि वह जगत सेठ फतेह चंद की बहू को देखना चाहता है. यह आदेश नहीं था, जगत सेठ के मुँह पर तमाचा था. एक ऐसे आदमी का अपमान था जिसका सम्मान दिल्ली दरबार में किया जाता है. जगत सेठ के तन-बदन में आग लग गयी थी. इस अपमान का बदला लेने को जगत सेठ ने बिहार के नायब सूबेदार अलीवर्दी से सम्पर्क साधा। अली वर्दी ख़ाँ बिहार में सरफराज के पिता के समय पर नायब नाज़िम (#वित्त_विभाग का मुख्य अधिकारी) था।

अलीवर्दी ख़ाँ को मौके की तलाश थी.वह बंगाल का सूबेदार बनना चाहता था.जगत सेठ की मदद ने उसकी योजनायें आगे बढ़ा दी.१० अप्रैल १७४० को अलीवर्दी खान ने सरफ़राज़ ख़ाँ पर चढ़ाई कर दी. दोनों की सेनाओं का राजमहल के पास गिरिया के मैदान में आमना-सामना हुआ था. वहां इस लड़ाई में किसी फौजी ने सरफ़राज़ ख़ाँ को गोली मार दी जिससे उसके प्राण गये. उसे जगत सेठ फतेह चंद को अपमानित करने की सज़ा मिल गयी थी। औरंगजेब की मृत्यु के बाद इसके अन्तर्गत विभिन्न प्रांतों में अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। जगतसेठ की मदद से अलवर्दी खाँ ने बंगाल पर अपना अधिकार कर लिया। उन्हें कोई पुत्र नहीं था सिर्फ तीन पुत्रियाँ थी। बड़ी लड़की छसीटी बेगम नि:सन्तान थी। दूसरी और तीसरी से एक- एक पुत्र शौकत और सिराजुद्दौला थे। जगतसेठ ऐसा नवाब चाहते थे जो अलीवर्दी खां के जैसे ही उनके इशारे पर नाचे लेकिन सिराज उनमें से नहीं था। जगतसेठ छसीटी बेगम की बहन के पुत्र व सिराज के मौसेरे भाई शौकत को नवाब बनाना चाहते थे।
●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●

नाना अलीवर्दी ख़ाँ के मरने पर सिराज बंगाल की गद्दी पर तो बैठा लेकिन दिल्ली दरबार से उसे फ़रमान (आदेश) नहीं मिल पाया था. दिल्ली दरबार का हाल बुरा था. बग़ैर लिए दिए कुछ न होता था. पद और जागीरें बिकती थीं. सिराजुद्दौला को अपने लिए फ़रमान हासिल करने को तीन करोड़ रुपये की ज़रूरत थी. रुपया पाने को उसने तत्कालीन जगत सेठ को दरबार में बुलाया और तीन करोड़ कर्ज देने को कहा. जगत सेेठ की बूढ़ी तजुर्बेकार आँखें दूर तक देख रही थीं जबकि सिराजुद्दौला की जवान आँखें अपने आसपास तक महदूद थीं. जगत सेेठ जानते थे कि सिराजुद्दौला बहुत दूर तक दौडऩे वाला घोड़ा नहीं है. उस पर तीन करोड़ का दाँव लगाना घाटे का सौदा होता , जगत सेठ ने दरबार में मजबूरी जाहिर कर दी. इस पर सिराजुद्दौला क्रोधित हो गया . उसने जगत सेठ से अभद्रता की जो जगतसेठ के बर्दाश्त के बाहर थी। जगतसेठ बदला लेने की ठान चुके थे।

कंपनी के लोगों को भी जगतसेठ का संरक्षण था , बंगाल की प्राचीन परम्परा के अनुसार अगर कोई नया नवाब गद्दी पर बैठता था तो उस दिन दरबार लगता था , और उसके अधीन निवास करने वाले राजाओं, अमीरों या विदेशी जातियों के प्रतिनिधियों को दरबार में उपस्थित हो कर उपहार भेट करना पड़ता था कि वे नया नवाब स्वीकार करते हैं परन्तु सिराजुद्दौला के राज्यभिषेक के अवसर पर न तो जगतसेठ और न ही अंग्रेजों का कोई प्रतिनिधि दरबार में आया। ऐसे सिराज (नवाब) और जगतसेठ में ठन गई।
●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●
इस रंजिश में कई घटनाएं हुईं जिनमें शौकत की हत्या , नवाब पक्ष से फ्रांसीसियों की व जगतसेठ पक्ष से अंग्रेजों की किलेबंदी , नवाब का कलकत्ता पर हमला कर अंग्रेजों को दौड़ाना, फिर अंग्रेजों की कलकत्ता वापसी , फ्रांसीसियों पर हमला , नवाब की काली कोठरी की घटना जिसमें 123 अंग्रेज भूखे-प्यासे मरे आदि

इनमें से काली कोठरी की घटना की बात करते हैं जिसकी परिणीति प्लासी के युद्ध में हुई ।
समुद्री लुटेरे अंग्रेजों ने व्यापारिक जहाजों की लूट से हासिल धन की बदौलत समुद्र किनारे कुछ स्थानों पर अपनी कोठियां बना लीं। कम्पनी की वे कोठियां सिर्फ कहने-दिखने को व्यापारिक थीं, वास्तव में वे तो हथियारों के गोदाम तथा भाड़े के दस्युओं और गोरी चमड़ी वाली सुन्दरियों का अड्डा थीं। उन विलायती सुन्दरियों का जिस्म परोस कर अंग्रेज जगतसेठ से सांठ-गांठ कर कंपनी का अवैधानिक सिक्का चलाने लगे। भारत में #जाली_मुद्रा-चलन का वह पहला मामला था, जिसे #अवैध घोषित करते हुए बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला ने कलकत्ता-स्थित कम्पनी की कोठी सील कर १४६ गोरों को एक छोटे से कमरे में बन्द कर दिया था। कम्पनी के इतिहास में वह घटना ‘ब्लैकहोल’ के नाम से जानी जाती है। इस घटना में 123 गोरे मारे गए थे।
●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●

अब जगतसेठ का कंपनी को साथ मिलाकर षड्यंत्र :

हिन्दुस्तानी तारीख़ का शायद पहला दस्तावेजी षडय़ंत्र शुरू हो गया था. ईस्ट इण्डिया कम्पनी, जगत सेठ, मीर जाफर के बीच लिखित समझौता हो गया था. पूरी होशियारी बरती गयी थी कि इस समझौते की भनक भी किसी को न लगे , लेकिन कलकत्ता के एक धनी व्यापारी सेठ अमीचंद (अमीरचंद), जो कम्पनी की तरफ से मुर्शिदाबाद दरबार में प्रतिनिधि था, इसकी भनक पा गया और दस्तावेज़ी षडय़ंत्र में अपना पाँच प्रतिशत का हिस्सा माँगने लगा. उसकी माँग को पूरा करना या उसे चुप कराना आवश्यक था. इसलिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लॉर्ड क्लाइव ने एक फ़र्जी दस्तावेज़ बनाया जिसमें अमीचंद की माँग को स्वीकार किया गया था और भी काफी चीजें थीं , सम्पूर्ण घटनाक्रम के लिए प्लासी के युद्ध का अध्ययन करें।

22 जून 1757 को प्लासी का विख्यात युद्ध वास्तव में हुआ ही नहीं था. सिर्फ ४० मिनट के उस तथाकथित युद्ध में नवाब के अठारह हजार सिपाहियों ने कम्पनी के मात्र तीन सौ लुटेरों के सामने समर्पण कर दिया। वह युद्ध के नाम पर एक बहुत व्यवस्थित नाटक था. सारी तैयारियाँ इस तरह की गयी थीं कि कहीं कोई भूल-चूक न हो. युवा नवाब सिराजुद्दौला के अलावा सभी लोग जानते थे कि युद्ध शुरू होने से पहले ही युद्ध का निर्णय हो चुका है. सिराजुद्दौला के साथ फ्रांसीसी तोपख़ाना था जिसने तोपें दाग़ना शुरू कर दिया था लेकिन सेना के सिपाहसालार आगे नहीं बढ़े. तब सिराजुद्दौला को पता चला कि क्या खेल हो गया है. कहते हैं उसने अपनी पगड़ी मीर जाफर के क़दमों पर रख कर कहा था कि बंगाल, बिहार और उड़ीसा की सूबेदारी तुम्हारे क़दमों पर पड़ी है, इसे बचा लो. लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

इस न लड़े गए युद्घ में वीरता दिखाने के लिए क्लाइव को ‘बैरन ऑफ प्लासी’ की उपाधि दी गयी थी. क्लाइव ने इतना धन लूटा था कि उस जैसे साधारण अंग्रेज की गिनती लन्दन के धनवान लोगों में होने लगी थी. (क्लाइव के धन के बारे में बाद में)।
●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●

इस युद्ध के द्वारा अंग्रेजों को काफी आर्थिक लाभ पहुँचा जिससे कम्पनी की स्थिति काफी मजबूत हो गई।
बंगाल की लूट से उसे काफी धन हाथ लगा। कम्पनी के मठ कर्मचारीयों को साढ़े 12 लाख रुपए मिले। क्लाइव को दो लाख 24 हजार रुपए मिले। अंग्रेजों को पुन: व्यापार करने का अधिकार मिला मीरजाफर ने कम्पनी को 3 करोड़ रुपए प्रदान किए तथा व्यापार से भी अंग्रेजों ने 15 करोड़ का मुनाफा कमाया।

मीर जाफर से #करोड़ों वसूल करने के बाद सिराजुद्दौला के गुप्त खज़ाने से #अमूल्य_हीरे_जवाहरात और #टनों_सोना मिला था जो जगतसेठ व कंपनी मै बंट गया। मुख्य बात यह कि सोने की चिडिय़ा की गर्दन अब कंपनी के हाथ में आ गयी थी. कंपनी अब भारत के सबसे घने भूभाग पर एकछत्र व्यापार करने लगी , बंगाल पर एकाधिकारी व्यापार से इतना धन मिला कि #इंग्लैंड_से_धन_मँगाने_की_जरूरत_नही_रही, इस धन को भारत के अलावा #चीन से हुए #व्यापार मे भी लगाया गया। इसी धन से #सैनिक_शक्ति गठित की गई जिसका प्रयोग #फ्रांस तथा #भारतीय_राज्यों_के_विरूद्ध किया गया।

भारत देश से धन निष्कासन शुरू हुआ जिसका लाभ इंग्लैंड को मिला वहां इस धन के निवेश से ही वहां #ओद्योगिक_क्रांति शुरू हुई थी।

इस घटना से एक नई राजनैतिक शक्ति का उदय हुआ। कम्पनी के हित #राजनीति से जुड़ गए और वह #प्रभुत्व प्राप्ति मे जुट गयी। इस प्रकार इस “जगतसेठ” द्वारा भारत में #ब्रिटिश_साम्राज्य_की_नींव डल गई।

✍🏻
खुशबू सिंह

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *