मौलाना साजिद रशीदी,मजहबी बेचैनी में विदेश नीति पै बिन मांगी सलाह

मौलाना साजिद रशीदी अपने विवादित बयानों को अक्सर चर्चा में रहते हैं। भारत और ईरान के बीच किसी सीधे युद्ध की स्थिति तो नहीं रही है, लेकिन इजरायल-हमास/ईरान संघर्ष और भारत के रुख पर उनके कुछ बयान सोशल मीडिया और समाचारों में देखे गए हैं।
​हाल के संदर्भों में उनके बयानों का सार कुछ इस प्रकार रहा है:
​1. भारत के रुख पर टिप्पणी
​जब ईरान और इजरायल के बीच तनाव बढ़ा, तो मौलाना रशीदी ने सोशल मीडिया और इंटरव्यूज में यह तर्क दिया था कि भारत को ईरान के साथ अपने ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंधों को प्राथमिकता देनी चाहिए। उनका मानना था कि पश्चिम एशिया में स्थिरता के लिए ईरान एक महत्वपूर्ण पक्ष है।
​2. मुस्लिम जगत की एकजुटता
​वे अक्सर इस बात पर जोर देते हैं कि यदि किसी मुस्लिम देश पर हमला होता है, तो पूरी दुनिया के मुसलमानों की सहानुभूति उसके साथ होती है। ईरान और इजरायल के संदर्भ में भी उन्होंने इसी तरह की ‘धार्मिक एकजुटता’ वाली भाषा का प्रयोग किया था, जिसे कई बार कट्टरपंथी रुख के रूप में देखा गया।
​3. ‘भारत में युद्ध’ जैसे भ्रामक दावे
​सोशल मीडिया पर कई बार मौलाना रशीदी के पुराने वीडियो को गलत संदर्भ (Context) में काटकर फैलाया जाता है। कुछ समय पहले एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें वे भारत के आंतरिक हालातों पर टिप्पणी कर रहे थे, जिसे भ्रामक तरीके से विदेशी युद्धों से जोड़कर पेश किया गया।
​महत्वपूर्ण बिंदु:
मौलाना साजिद रशीदी के अधिकांश बयान धार्मिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण प्रेरित होते हैं। उनके बयानों पर अक्सर कानूनी आपत्तियां भी की जाती हैं । वे कई बार भारत की विदेश नीति या आंतरिक सुरक्षा पर उत्तेजक टिप्पणी करते हैं।

मौलाना साजिद रशीदी का भारत-ईरान युद्ध को लेकर जो बयान सोशल मीडिया पर चर्चा में है, वह पूरी तरह सच नहीं है, बल्कि उनके एक इंटरव्यू का छोटे सा हिस्सा गलत संदर्भ (out of context) में दिया जा रहा है।
इस के मुख्य बिंदु  हैं:
​1. बयान का असली संदर्भ
​मार्च 2026 के शुरु में मौलाना रशीदी ने ईरान-इजरायल संघर्ष में भारत सरकार के रुख पर इंटरव्यू दिया। उन्होंने युद्ध की चेतावनी देते हुए कहा, “कल उसने (दुश्मन ने) भारत पर हमला कर दिया, तो आपके साथ कौन खड़ा होगा?” यहाँ उनका इशारा भारत की विदेश नीति और रणनीतिक स्वायत्तता की ओर था, न कि वह स्वयं भारत और ईरान के बीच युद्ध की बात कर रहे थे।
​2. भ्रामक दावे (Fact Check)
​सोशल मीडिया पर कुछ वीडियो ऐसे फैलाए जा रहे हैं जिनमें दावा किया गया कि रशीदी भारत और ईरान में युद्ध की भविष्यवाणी कर रहा है।
सच्चाई: रशीदी ने वास्तव में भारत सरकार से सवाल किया था कि यदि वैश्विक तनाव (Global Tension) बढ़ता है और भारत किसी संकट में आता है, तो उसके पास कितने मित्र देश होंगे?
​उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को सलाह दी थी कि भारत को ईरान से संबंध संतुलित रखने चाहिए क्योंकि तेल की आपूर्ति और सामरिक दृष्टि से ईरान महत्वपूर्ण है।
​3. अन्य विवादित टिप्पणियाँ
​रशीदी के बयानों को लेकर भ्रम इसलिए भी बढ़ता है क्योंकि वे अक्सर अन्य विषयों पर तीखी प्रतिक्रिया देते हैं, जैसे:
​वंदे मातरम विवाद (फरवरी 2026): उन्होंने कहा कि “सिर कट जाएगा लेकिन वंदे मातरम नहीं गाएंगे” क्योंकि इसकी कुछ पंक्तियाँ उनकी आस्था के विरुद्ध हैं।
​मजहबी एकजुटता: वे अक्सर कहते हैं कि ईरान या किसी भी मुस्लिम देश पर संकट आने पर भारत के मुसलमानों की सहानुभूति उनके साथ होती है।
निष्कर्ष: मौलाना रशीदी ने भारत-ईरान के बीच युद्ध होने का कोई आधिकारिक या तथ्यात्मक बयान नहीं दिया। उनके बयानों का उद्देश्य भारत की विदेश नीति की आलोचना करना और ईरान के प्रति समर्थन जुटाना था।

​1. बयान क्या था?
​रशीदी ने सीधे तौर पर यह नहीं कहा कि भारत और ईरान में युद्ध होगा। उन्होंने ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव पर टिप्पणी करते हुए भारत सरकार से सवाल किया था:
​”अगर कल को हालात बिगड़ते हैं और कोई दुश्मन देश भारत पर हमला कर देता है, तो आपके पास कितने ऐसे दोस्त होंगे जो मजबूती से साथ खड़े हों? ईरान हमारा पुराना दोस्त है, हमें उसे नाराज नहीं करना चाहिए।”
​2. विवाद की वजह (Contextual Misinterpretation)
​सोशल मीडिया पर इस बयान को “भारत-ईरान युद्ध की भविष्यवाणी” या “धमकी” के रूप में पेश किया गया। इसके पीछे दो मुख्य कारण रहे:
​कटा संदर्भ: उनके वीडियो के उस हिस्से को काट दिया गया जहाँ वे कूटनीति (Diplomacy) की बात कर रहे थे, जिससे ऐसा लगा कि वे भारत को डरा रहे हैं।
​मजहबी दृष्टिकोण: उन्होंने यह भी कहा कि अगर ईरान (एक मुस्लिम देश) पर संकट आता है, तो दुनिया भर के मुसलमानों की भावनाएं उसके साथ होंगी। इसे भारत की आंतरिक सुरक्षा में ‘उकसावा’ माना गया।
​3. रशीदी के दावों का विश्लेषण

4. ताजा स्थिति
​भारत और ईरान के संबंध ऐतिहासिक रूप से मजबूत रहे हैं (जैसे चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट)। सरकार की आधिकारिक नीति दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाए रखने की है। मौलाना रशीदी जैसे निजी व्यक्तियों के बयान भारत की आधिकारिक विदेश नीति का हिस्सा नहीं होते और न ही वे जमीनी हकीकत को पूरी तरह दर्शाते हैं।
निष्कर्ष: यह कहना कि उन्होंने युद्ध का ऐलान किया, गलत (Fake News) है। लेकिन यह सच है कि उन्होंने भारत सरकार को ईरान के साथ खड़े रहने की “नसीहत” दी थी, जिसे विवादित तरीके से पेश किया गया।
​भारत सरकार और विदेश मंत्रालय (MEA) का मौलाना साजिद रशीदी जैसे निजी व्यक्तियों के बयानों पर कोई सीधा जवाब नहीं आता है, क्योंकि सरकार केवल आधिकारिक संस्थाओं या विदेशी सरकारों के बयानों पर प्रतिक्रिया देती है।
​हालांकि, भारत और ईरान के बीच वर्तमान संबंधों और युद्ध जैसी स्थिति पर भारत का आधिकारिक रुख इन 3 बिंदुओं से समझा जा सकता है:
​1. रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy)
​भारत की आधिकारिक नीति यह है कि वह किसी एक देश के पक्ष में खड़े होकर दूसरे से रिश्ते खराब नहीं करता। भारत ने स्पष्ट किया है कि:
​ईरान से हमारे संबंध चाबहार बंदरगाह (Chabahar Port) और ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) को बेहद महत्वपूर्ण हैं।
​वहीं, इजरायल से रक्षा और तकनीक (Defense & Tech) के क्षेत्र में गहरी साझेदारी है।
भारत का रुख हमेशा ‘युद्ध नहीं, संवाद’ का रहा है।
​2. क्षेत्रीय स्थिरता पर चिंता
​विदेश मंत्रालय ने हाल के महीनों में कई बार कहा है कि पश्चिम एशिया (West Asia) में तनाव बढ़ना भारत के हितों के खिलाफ है।
​वहां 90 लाख भारतीय रहते और काम करते हैं। किसी भी युद्ध स्थिति में भारत की पहली प्राथमिकता अपने नागरिकों को सुरक्षित निकालना और तेल कीमतों को स्थिर रखना होती है।
​3. भ्रामक सूचनाओं (Fake News) के विरुद्ध चेतावनी
​भारत सरकार का सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (I&B Ministry) अक्सर सोशल मीडिया हैंडल्स को चेतावनी देता रहता है कि ऐसे उत्तेजक वीडियो या बयान न फैलाएं जिनसे दो देशों के बीच या देश के भीतर सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़े।
निष्कर्ष: मौलाना रशीदी का बयान एक राजनीतिक और धार्मिक राय मात्र है। भारत और ईरान बीच युद्ध की कोई आशंका नहीं है; बल्कि दोनों देश व्यापारिक रिश्तों को और मजबूत करने पर काम कर रहे हैं।
​एक दिलचस्प जानकारी: भारत और ईरान ने हाल ही में 10 साल को चाबहार पोर्ट को संचालन समझौता किया है, जो सिद्ध करता है कि दोनों देशों के बीच युद्ध तो दूर, सहयोग के नए रास्ते खुल रहे हैं।

भारत और ईरान के बीच चाबहार बंदरगाह (Chabahar Port) का समझौता भारत की विदेश नीति की एक बहुत बड़ी जीत माना जाता है। यह केवल एक व्यापारिक समझौता नहीं है, बल्कि पाकिस्तान और चीन की घेराबंदी तोड़ने का एक मास्टरस्ट्रोक भी है।
​यहाँ इसकी मुख्य बातें दी गई हैं:
​1. पाकिस्तान हुआ किनारे
​भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया (Central Asia) तक पहुँचने को पाकिस्तान के रास्ते की जरूरत पड़ती थी, जिसे पाकिस्तान अक्सर रोक देता था। चाबहार से भारत अब सीधे समुद्र के रास्ते ईरान है और वहां से अफगानिस्तान जा सकता है।
​2. चीन के ‘ग्वादर पोर्ट’ का जवाब
​चीन ने पाकिस्तान में ग्वादर पोर्ट बनाया है ताकि वह अरब सागर पर नजर पाये। चाबहार बंदरगाह ग्वादर से 170 किलोमीटर की दूरी पर है। इससे भारत को उस क्षेत्र में रणनीतिक बढ़त (Strategic Edge) मिलती है।
​3. 10 साल का ऐतिहासिक समझौता (मई 2024 – वर्तमान)
​मई 2024 में भारत और ईरान ने चाबहार के शहीद बेहश्ती टर्मिनल को विकसित करने को 10 साल के पूर्ण अनुबंध पर हस्ताक्षर किए थे।
निवेश: भारत इसमें 120 मिलियन डॉलर का निवेश कर रहा है।
​क्रेडिट लाइन: भारत ने ईरान को बंदरगाह संबंधित बुनियादी ढांचे को 250 मिलियन डॉलर की क्रेडिट लाइन (ऋण सुविधा) भी दी है।
​4. INSTC कॉरिडोर का हिस्सा
​चाबहार बंदरगाह ‘इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर’ (INSTC) का मुख्य द्वार है। यह भारत को रूस और यूरोप से जोड़ने का सबसे छोटा और सस्ता रास्ता बनेगा। इससे माल भेजने का समय 40% और खर्च 30% तक घट जाएगा।
निष्कर्ष
​मौलाना साजिद रशीदी जैसे लोग भले युद्ध या तनाव की बातें करें, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि भारत और ईरान के आर्थिक हित एक-दूसरे से मजबूती से जुड़े हैं। भारत को ईरान एक ‘गेटवे’ (प्रवेश द्वार) की तरह है।

चाबहार बंदरगाह के जरिए भारत, अफगानिस्तान और रूस के साथ अपने व्यापारिक और रणनीतिक रिश्तों को एक नई ऊंचाई पर ले जा रहा है। इसके मुख्य लाभ नीचे दिए गए हैं:
​1. अफगानिस्तान के साथ सीधा संपर्क
​पाकिस्तान अक्सर भारत से अफगानिस्तान जाने वाले ट्रकों और सामान को अपने रास्ते से जाने की अनुमति नहीं देता था। चाबहार ने इस समस्या को हमेशा को खत्म कर दिया है:
​मानवीय सहायता: भारत ने चाबहार के रास्ते ही अफगानिस्तान को हजारों टन गेहूँ और दवाइयाँ भेजी हैं।
​व्यापारिक मार्ग: अफगानिस्तान अब अपने ड्राई फ्रूट्स और अन्य सामान सीधे भारत भेज सकता है और भारत से अपनी जरूरत का सामान मंगा सकता है, जिससे उसकी पाकिस्तान पर निर्भरता घट गई है।
​2. रूस और यूरोप के लिए सबसे छोटा रास्ता (INSTC)
​चाबहार बंदरगाह इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) का शुरुआती बिंदु है। यह मार्ग भारत के मुंबई बंदरगाह से शुरू होकर ईरान के चाबहार, फिर वहां से अजरबैजान होते हुए रूस के सेंट पीटर्सबर्ग तक जाता है।
​समय की बचत: स्वेज नहर (Suez Canal) के रास्ते रूस जाने में लगभग 45 से 60 दिन लगते हैं, जबकि चाबहार के रास्ते यह यात्रा केवल 20 से 25 दिन में पूरी हो जाती है।
​खर्च में कमी: इस नए रास्ते से परिवहन लागत में  30% की कमी आती है, जिससे भारतीय उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में सस्ते और प्रतिस्पर्धी हो जाते हैं।
​3. मध्य एशियाई देशों (Central Asia) तक पहुंच
​कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान जैसे देश चारों तरफ से जमीन से घिरे (Landlocked) हैं। चाबहार इन देशों के लिए समुद्र तक पहुँचने का सबसे आसान रास्ता है।
​भारत इन देशों के साथ यूरेनियम, प्राकृतिक गैस और खनिजों का व्यापार बढ़ा रहा है।
​चुनौतियां और भारत का रुख
​हालांकि अमेरिका ने ईरान पर कई प्रतिबंध (Sanctions) लगाए हैं, लेकिन भारत ने अपनी कूटनीति के दम पर चाबहार प्रोजेक्ट को इन प्रतिबंधों से बाहर रखा है। भारत ने अमेरिका को यह समझाने में सफलता पाई है कि यह बंदरगाह अफगानिस्तान की स्थिरता के लिए जरूरी है।
निष्कर्ष: चाबहार केवल एक पोर्ट नहीं, बल्कि भारत की ‘कनेक्टिविटी’ की चाबी है जो उसे यूरेशिया के केंद्र तक ले जाती है।
​चाबहार बंदरगाह भारत के पश्चिमी तट पर स्थित प्रमुख बंदरगाहों, विशेष रूप से कांडला (दीनदयाल पोर्ट, गुजरात) और मुंबई (JNPT) से सीधे जुड़ा हुआ है।
​नीचे दिए गए बिंदुओं से आप इस समुद्री मार्ग और इसके महत्व को आसानी से समझ सकते हैं:
​1. समुद्री मार्ग और दूरी
​मुंबई से चाबहार: जलमार्ग से इसकी दूरी लगभग 930 नॉटिकल मील (करीब 1,720 किलोमीटर) है।
​कांडला से चाबहार: यह दूरी और भी कम है, लगभग 550 नॉटिकल मील (करीब 1,000 किलोमी)।
​एक मालवाहक जहाज (Cargo Ship) को मुंबई से चाबहार पहुँचने में केवल 2-3 दिन का समय लगता है।
​2. भारत के किन बंदरगाहों को फायदा?
​भारत सरकार ने चाबहार परियोजना को मुख्य रूप से इन तीन बंदरगाहों से जोड़ने पर ध्यान केंद्रित किया है:
​कांडला पोर्ट (गुजरात): यहाँ से अनाज और भारी मशीनरी का निर्यात सबसे अधिक होता है।
​मुंबई / JNPT: भारत का सबसे बड़ा कंटेनर पोर्ट होने के नाते, यहाँ से औद्योगिक उत्पाद और इलेक्ट्रॉनिक सामान चाबहार भेजे जाते हैं।
​मुंद्रा पोर्ट (गुजरात): निजी क्षेत्र का यह बंदरगाह भी चाबहार के साथ व्यापार में बड़ी भूमिका निभाता है।
​3. चाबहार से आगे का रास्ता (The Map View)
​जहाज जब चाबहार पहुँचता है, तो वहां से सामान को सड़क और रेल मार्ग से आगे भेजा जाता है:
​चाबहार से जाहेदान (Zahedan): यहाँ भारत एक रेलवे लाइन विकास में मदद कर रहा है।
​जाहेदान से जरंज (Zaranj): यह अफगानिस्तान की सीमा पर है।
​डेलाराम-जरंज हाईवे: यह 218 किलोमीटर लंबा हाईवे भारत ने खुद बनाया है, जो अफगानिस्तान के प्रमुख शहरों (काबुल, कंधार, हेरात) को चाबहार से जोड़ता है।
​4. चीन के ‘ग्वादर’ बनाम भारत का ‘चाबहार’

​रोचक तथ्य: चाबहार बंदरगाह का नाम ‘चाह’ (Chah – कुआं) और ‘बहार’ (Bahar – बसंत) से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है वह स्थान जहाँ चारों तरफ हमेशा ‘बसंत’ (Spring) रहता हो।

अफगानिस्तान में डेलाराम-जरंज हाईवे (NH 606) का निर्माण भारत की इंजीनियरिंग और साहस की एक अद्भुत मिसाल है। इसे ‘सड़क नहीं, अफगानिस्तान की जीवन रेखा’ कहा जाता है।
​इसे पूरा करने की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं है:
​1. प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य
​भारत ने यह 218 किलोमीटर लंबी सड़क इसलिए बनाई ताकि अफगानिस्तान की पाकिस्तान के कराची बंदरगाह पर निर्भरता खत्म हो जाए। यह सड़क बनने के बाद, भारतीय सामान चाबहार बंदरगाह से ईरान के रास्ते सीधा अफगानिस्तान के मुख्य शहरों (काबुल, कंधार, हेरात) तक पहुँचने लगा।
​2. ‘मौत के साये में’ निर्माण
​इस हाईवे को बनाना दुनिया के सबसे खतरनाक कामों में से एक था। इसे भारत के सीमा सड़क संगठन (BRO) ने बनाया था।
​तालिबान का विरोध: तब तालिबान ने इस प्रोजेक्ट को रोकने को कई हमले किए।
बलिदान: यह सड़क बनाते 6 भारतीय कर्मियों (जिसमें BRO के इंजीनियर्स और ITBP के जवान शामिल थे) और 129 अफगान सुरक्षाकर्मियों ने अपनी जान गंवाई।
सुरक्षा: भारत ने अपने कामगारों की सुरक्षा को ITBP (Indo -Tibetan Border Police) के 400 जवान वहां लगाये थे।
​3. कठिन भौगोलिक परिस्थितियाँ
​यह इलाका पूरी तरह से रेगिस्तानी और बेहद गर्म है। गर्मियों में तापमान 50°C तक पहुँच जाता था और धूल भरी आंधियां चलती थीं। इसके बावजूद भारतीय इंजीनियरों ने रिकॉर्ड समय में इसे पूरा किया।
​4. भारत को क्या मिला?
​रणनीतिक जीत: इस सड़क ने पाकिस्तान के उस ‘वीटो’ को खत्म कर दिया जिसके जरिए वह भारत को मध्य एशिया से दूर रखना चाहता था।
​सॉफ्ट पावर: इस सड़क ने अफगान लोगों के दिलों में भारत के लिए बहुत सम्मान पैदा किया, क्योंकि यह उनके व्यापार और विकास को बनाई गई थी।
लागत: भारत ने इस पर लगभग $150 मिलियन (करीब 1100 करोड़ रुपये) खर्च किए और 2009 में इसे अफगानिस्तान को सौंप दिया।
​वर्तमान स्थिति (2026)
​आज भी यह हाईवे उतना ही महत्वपूर्ण है। भले ही अफगानिस्तान में सत्ता परिवर्तन हुआ हो, लेकिन चाबहार बंदरगाह और इस हाईवे का इस्तेमाल व्यापार को लगातार हो रहा है, क्योंकि यह अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे सस्ता रास्ता है।

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