ज्ञान:लेंसकार्ट विवाद,कंपनियां कार्मिकों के धर्म और मान्यताओं पर रोक लगा सकती हैं? कानूनी स्थिति
Newslegal:Lenskart Controversy – Can Companies Ban Employees Religion Know The Law And Fundamental Rights?
लेंसकार्ट विवाद: क्या कंपनियां कर्मचारियों के धर्म और व्यक्तिगत मान्यताओं पर रोक लगा सकती हैं? क्या कहते हैं कानून
लेंसकार्ट कंपनी की एक लीक आंतरिक नीति के अनुसार कर्मचारियों के बिंदी और हिंदू पहचान से जुड़े चिह्न पहनना मना था। मामले में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 और 25 के प्रावधानों के उल्लंघन के आरोप लग रहे हैं।
नई दिल्ली 22 अप्रैल 2026 : पिछले दिनों सोशल मीडिया पर भारत की एक चश्मा बनाने वाली कंपनी की नीतियों को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया। लेंसकार्ट कंपनी की एक लीक आंतरिक नीति प्रपत्र के अनुसार कर्मचारियों के धार्मिक प्रतिबंधों विशेषकर बिंदी और हिंदू पहचान से जुड़े चिह्न पहनने की मनाही थी। इस विधिक विश्लेषण से समझेंगें कि क्या कोई कंपनी अपने कर्मचारियों को उनकी धार्मिक मान्यताओं या पहचान के चिह्न प्रयोग करने पर रोक लगा सकती है। साथ ही यह भी जानेंगें कि कर्मचारियों और कंपनियों के अधिकारों की सीमाएं क्या हैं?
1. विवाद की पृष्ठभूमि और कारण
लेंसकार्ट विवाद तब सामने आया जब कंपनी के कुछ कर्मचारियों ने आरोप लगाया कि कंपनी की नीतियां उनका व्यक्तिगत और धार्मिक व्यवहार प्रभावित करती हैं। साथ ही कंपनी की “स्टाफ़ यूनिफ़ॉर्म और ग्रूमिंग गाइड” नीति का एक प्रपत्र सोशल मीडिया पर लीक हो गया। आरोप लगे कि इस प्रपत्र में हिंदू धार्मिक प्रतीकों जैसे बिंदी, तिलक और कलावा पर रोक लगाई गई थी, जबकि हिजाब और पगड़ी जैसे अन्य धार्मिक पहनावे की अनुमति दी गई थी। हालांकि कंपनी ने इन आरोपों पर अपनी स्थिति स्पष्ट कर कहा कि उसकी नीतियां पुरानी हैं, जो कार्यस्थल पर अनुशासन और ब्रांड इमेज बनाए रखने को थीं, जिसे अब बदल दिया गया है।
2. धार्मिक स्वतंत्रता बनाम निजी रोजगार पर संविधान में क्या है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 सभी नागरिकों को धर्म की स्वतंत्रता देता है—जिसमें धर्म का पालन, प्रचार और प्रसार शामिल है। लेकिन यह अधिकार पूर्ण (absolute) नहीं है। अनुच्छेद 25 में यह स्वतंत्रता “सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य” के अधीन है। इसके अलावा, यह मुख्य रूप से राज्य (सरकार) के खिलाफ लागू होता है, न कि निजी कंपनियों के खिलाफ। ऐसे में यदि कोई निजी कंपनी अपने कर्मचारियों के लिए कुछ नियम बनाती है, तो यह सीधे-सीधे अनुच्छेद 25 का उल्लंघन नहीं माना जाएगा—जब तक कि इसमें भेदभाव या उत्पीड़न का स्पष्ट मामला न हो।
Bharat ke Samvidhan me 25
अनुच्छेद 25 – नागरिकों को धर्म की स्वतंत्रता
3. कब बनता है मामला?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 जिसमें समानता और भेदभाव निषेध की बातें है, को कहा जा सकता है कि भारत में भेदभाव विरोधी कानून को उल्लिखित करते हैं। औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 (Industrial Disputes Act) भी कर्मचारियों के साथ अनुचित व्यवहार पर रोक लगाता है। इसमें यदि कोई कर्मचारी यह सिद्ध कर देता है कि कंपनी अपनी श्रम कानून और HR नीतियों से उसे उसके धर्म के कारण अलग तरीके से ट्रीट कर रही है तो यह “अप्रत्यक्ष भेदभाव” (Indirect Discrimination) माना जा सकता है। उदाहरण को, यदि कोई कंपनी सभी कर्मचारियों को एक समान ड्रेस कोड या आचरण कोड लागू करती है, तो यह वैध हो सकता है। लेकिन यदि ड्रेस कोड किसी खास संप्रदाय के कर्मचारी के धर्म के ही पालन को असंभव बनाता है, तो यह गलत होगा और विवाद पैदा करेगा।
4. क्या औद्योगिक कंपनियां ड्रेस कोड और आचरण तय कर सकती हैं?
भारत में रोजगार अनुबंध से कंपनियों को अपने कर्मचारियों के लिए ड्रेस कोड और कार्यस्थल व्यवहार से जुड़े नियम बनाने का अधिकार मिला हुआ है। कर्मचारी कंपनी से जु़ड़ता है, तो वह कंपनी की नीतियां व नियम स्वीकार करता है। कई मामलों में व्यावसायिक आवश्यकता के साथ कंपनी का ब्रांड इमेज बनाए रखना जरूरी होता है। सुरक्षा और अनुशासन की दृष्टि से भी कई संस्थाओं में विशेष ड्रेस कोड अनिवार्य होते हैं। लेकिन यह भी एक पक्ष है कि ऐसे नियम “तर्कसंगत” (reasonable) और “गैर-भेदभावपूर्ण” (non-discriminatory) होने चाहिए। कंपनी की ऐसी नीति विशेष धर्म को निशाना बनाती है, तो यह कानूनी चुनौती और विवाद का आधार बन सकती है। लेंसकार्ट मामले में ऐसा ही माना जा रहा है।
5. अदालतों का रुख
भारतीय अदालतों ने कई मामलों में यह स्पष्ट किया है कि कार्यस्थल पर अनुशासन बनाए रखना जरूरी है, लेकिन कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों का सम्मान भी होना चाहिए। कुछ मामलों में अदालतों ने कंपनियों का ड्रेस कोड सही ठहराया है, खासकर तब, जब वह “व्यावसायिक आवश्यकता” आधारित हो। हालांकि, जहां धार्मिक स्वतंत्रता पर अत्यधिक प्रतिबंध लगाया गया, वहां अदालतों ने कर्मचारियों के पक्ष में भी फैसले दिए हैं। इसलिए, हर मामला “फैक्ट-आधारित” होता है, यानी परिस्थितियों के आधार पर तय किया जाता है।
क्या है समाधान?
लेंसकार्ट विवाद ने एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है, कंपनियों के अधिकार बनाम कर्मचारियों की स्वतंत्रता में किसकी महत्ता अधिक है। कानून का स्पष्ट रुख यह है कि कंपनियां अपनी नीतियां बना सकती हैं लेकिन वे किसी सूरत में मनमानी नहीं कर सकतीं। कंपनियों को हर हाल कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों का सम्मान करना होगा, दूसरी ओर, कर्मचारियों को भी यह समझना होगा कि निजी क्षेत्र में काम करते समय कुछ पेशेवर सीमाएं भी होती हैं। ऐसे में बीच का रास्ता यानि संतुलित नीतियों सै ही ऐसे विवाद खत्म हो सकते हैं।

