हिंदू हार का ही नही प्रतिरोध का भी है इतिहास

महारानी नायकी देवी का इतिहास भारतीय शौर्यगाथा का वह अध्याय है, जिसे अक्सर मुख्यधारा की पाठ्यपुस्तकों में वह स्थान नहीं मिला जिसका वह हकदार था। उन्होंने दुनिया के सबसे क्रूर आक्रमणकारियों में से एक, मोहम्मद गोरी को धूल चटाई थी।
​यहाँ नायकी देवी और उनके उस ऐतिहासिक युद्ध का विस्तृत विवरण है:
​1. पृष्ठभूमि (Background)
​नायकी देवी गोवा के कदंब राजा परमर्दि की पुत्री थीं। उनका विवाह गुजरात के चालुक्य (सोलंकी) राजा अजयपाल से हुआ था। 1175 ईस्वी में अजयपाल की मृत्यु के बाद, उनके अल्पवयस्क पुत्र मूलराज द्वितीय को सिंहासन पर बिठाया गया। नायकी देवी ने ‘राजमाता’ के रूप में सत्ता की बागडोर अपने हाथों में ली।
​2. मोहम्मद गोरी का आक्रमण (1178 ईस्वी)
​मोहम्मद गोरी ने जब सुना कि गुजरात की गद्दी पर एक बच्चा बैठा है और शासन एक महिला चला रही है, तो उसने इसे स्वर्ण नगरी ‘अनहिलवाड़ा’ (पाटन) को लूटने का सुनहरा अवसर समझा। उसने एक विशाल सेना के साथ रेगिस्तान के रास्ते गुजरात पर हमला कर दिया।
​गोरी ने नायकी देवी को संदेश भेजा कि वह आत्मसमर्पण कर दें और अपनी संपत्ति तथा महिलाओं को उसे सौंप दें। नायकी देवी ने इस अपमानजनक प्रस्ताव का उत्तर युद्ध के मैदान में देने का निर्णय लिया।
​3. कयादरा का युद्ध (Battle of Kayadara)
​नायकी देवी एक कुशल रणनीतिकार थीं। उन्होंने गोरी की विशाल सेना का सामना करने के लिए माउंट आबू की तलहटी में कयादरा (गदर्रघट्टा) के पहाड़ी दर्रों को चुना।
​रणनीति: उन्होंने पहाड़ों की भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाया। ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर गोरी के घुड़सवारों की गति धीमी हो गई।
​युद्ध का नेतृत्व: नायकी देवी ने अपने नन्हे पुत्र मूलराज को अपनी पीठ पर बांधा और स्वयं घोड़े पर सवार होकर दोनों हाथों में तलवार लेकर युद्ध का नेतृत्व किया।
​परिणाम: चालुक्य सेना ने गोरी की सेना पर ऐसा भीषण प्रहार किया कि गोरी के पैर उखड़ गए। गोरी इस युद्ध में बुरी तरह घायल हुआ और अपनी जान बचाकर मुट्ठी भर सैनिकों के साथ वापस गजनी भाग गया।
​4. युद्ध का प्रभाव और महत्व
​दीर्घकालिक शांति: इस हार का मोहम्मद गोरी पर ऐसा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा कि उसने अगले 13-14 वर्षों तक भारत की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखा। उसने अपना मार्ग बदला और बाद में तराइन के युद्ध के लिए पंजाब के रास्ते का चुनाव किया।
​महिला सशक्तिकरण का प्रतीक: नायकी देवी ने यह सिद्ध किया कि नेतृत्व के लिए लिंग (Gender) नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति और वीरता महत्वपूर्ण है।
​नायकी देवी बनाम अन्य समकालीन प्रतिरोध

 

 

 

महारानी नायकी देवी की यह विजय भारतीय इतिहास की सबसे निर्णायक जीतों में से एक है, जिसने गुजरात की संस्कृति और मंदिरों (जैसे सोमनाथ) को अगले कई दशकों तक सुरक्षित रखा।
​क्या आप नायकी देवी की युद्ध नीति के बारे में और बारीकी से जानना चाहेंगे, या हम किसी अन्य योद्धा जैसे ‘लचित बोरफुकन’ या ‘राणा सांगा’ के बारे में चर्चा करें?

 

 

यह बहुत ही बेहतरीन चुनाव है। महारानी नायकी देवी की तरह ही लचित बोरफुकन और राणा सांगा ने भारतीय इतिहास की दिशा बदलने में निर्णायक भूमिका निभाई थी। इन दोनों योद्धाओं ने अपनी मिट्टी की रक्षा के लिए वह कर दिखाया जो असंभव माना जाता था।
​यहाँ इन दोनों महान सेनापतियों का विस्तृत विवरण है:
​1. लचित बोरफुकन (अहोम साम्राज्य, असम)
​लचित बोरफुकन पूर्वोत्तर भारत के वह योद्धा थे जिन्होंने मुगलों के अजेय होने के भ्रम को तोड़ दिया।
​सरायघाट का युद्ध (1671): औरंगजेब ने असम को जीतने के लिए राजा राम सिंह के नेतृत्व में एक विशाल सेना भेजी थी। लचित बोरफुकन जानते थे कि वे मैदानी युद्ध में मुगलों का मुकाबला नहीं कर सकते, इसलिए उन्होंने ब्रह्मपुत्र नदी को युद्ध क्षेत्र के रूप में चुना।
​नौसैनिक रणनीति: उन्होंने छोटी और तेज नावों का उपयोग किया। जब मुगल सेना की भारी नावें नदी में फंसीं, तो अहोम सैनिकों ने उन पर भीषण प्रहार किया। यह इतिहास का सबसे महान नदी-नौसैनिक युद्ध (Naval Battle) माना जाता है।
​राष्ट्र प्रथम: युद्ध के दौरान जब उनके मामा ने किले की दीवार बनाने में ढिलाई बरती, तो लचित ने उनका सिर काट दिया और कहा—”मेरे मामा देश से बड़े नहीं हैं।”
​2. महाराणा सांगा (मेवाड़, राजस्थान)
​महाराणा सांगा (राणा संग्राम सिंह) को ‘हिंदू-पत’ (हिंदुओं का रक्षक) कहा जाता था। उनके शरीर पर युद्ध के 80 घाव थे, एक हाथ, एक पैर और एक आँख खोने के बाद भी वे युद्ध लड़ते रहे।
​संयुक्त हिंदू मोर्चा: सांगा पहले ऐसे राजपूत राजा थे जिन्होंने मुगलों के खिलाफ लगभग सभी राजपूत रियासतों को एक झंडे के नीचे इकट्ठा किया था।
​खातोली और बाड़ी का युद्ध: उन्होंने दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी को दो बार बुरी तरह हराया। मालवा और गुजरात के सुल्तानों को भी उन्होंने धूल चटाई।
​खानवा का युद्ध (1527): बाबर के खिलाफ खानवा के मैदान में उन्होंने वीरता की पराकाष्ठा दिखाई। हालांकि बाबर की तोपों (Artillery) के कारण उनकी हार हुई, लेकिन उनकी वीरता ने राजपूतों को आने वाली सदियों तक मुगलों से लड़ने की प्रेरणा दी।
​तुलनात्मक विश्लेषण: दो अलग रणनीतियाँ

 

 

 

 

 

 

इन योद्धाओं से क्या सीख मिलती है?
​इन दोनों ने यह साबित किया कि यदि रणनीति (Strategy) सही हो और मन में अडिग विश्वास हो, तो संख्या में बड़ी और आधुनिक हथियारों वाली सेना को भी हराया जा सकता है। जहाँ लचित ने भूगोल (Geography) का सहारा लेकर जीत हासिल की, वहीं सांगा ने अदम्य साहस का परिचय दिया।
​क्या आप चाहते हैं कि मैं सरायघाट के युद्ध की उस “नौसैनिक व्यूह-रचना” (Naval Formation) के बारे में और बताऊँ, या आप सांगा के बाद आए ‘महाराणा प्रताप’ के संघर्ष के बारे में जानना चाहेंगे?

सरायघाट का युद्ध (1671 ईस्वी) न केवल भारतीय इतिहास का, बल्कि दुनिया का सबसे महान नदी-नौसैनिक युद्ध (Riverine Naval Battle) माना जाता है। यह युद्ध अहोम साम्राज्य और मुगल साम्राज्य के बीच ब्रह्मपुत्र नदी पर लड़ा गया था।
​यहाँ सरायघाट के युद्ध की उस रणनीतिक व्यूह-रचना और घटनाओं के मुख्य बिंदु दिए गए हैं:
​1. अजेय मुगलों के विरुद्ध अहोम रणनीति
​मुगल सेना का नेतृत्व राजा राम सिंह कर रहे थे, जिनके पास विशाल घुड़सवार सेना और आधुनिक तोपें थीं। इसके विपरीत, अहोम सेनापति लचित बोरफुकन जानते थे कि मैदानी जंग में वे मुगलों से हार जाएंगे।
​नदी का चुनाव: उन्होंने सरायघाट को चुना क्योंकि यहाँ ब्रह्मपुत्र नदी सबसे संकरी है (मात्र 1 किमी चौड़ी)। यहाँ मुगलों की विशाल सेना अपनी पूरी ताकत नहीं दिखा सकती थी।
​मिट्टी की दीवार (Andharubali): रातभर में अहोमों ने ब्रह्मपुत्र के किनारे मिट्टी की एक विशाल सुरक्षा दीवार खड़ी कर दी, जिससे मुगलों का थल मार्ग से प्रवेश रुक गया।
​2. नौसैनिक व्यूह-रचना (Naval Formation)
​जब मुगलों ने नदी के रास्ते आक्रमण किया, तो लचित बोरफुकन की नौसैनिक रणनीति ने उन्हें जाल में फँसा लिया:
​छोटी नावें बनाम बड़े जहाज: मुगलों के पास बड़े और भारी जहाज थे जो नदी के उथले पानी और संकरे मोड़ों पर सुस्त थे। अहोमों ने अपनी छोटी, तेज और हल्की नावों (Bachari) का उपयोग किया।
​छापामार हमला (Guerilla Naval Tactics): अहोम सैनिकों ने नदी के दोनों किनारों पर छिपे रहकर मुगलों पर तीरों और छोटी तोपों से हमला किया।
​धोखे की चाल: अहोमों ने जानबूझकर पीछे हटने का नाटक किया, जिससे मुगल सेना उत्साहित होकर संकरे पानी में अंदर तक चली आई, जहाँ उनकी भारी नावें आपस में टकराने लगीं और फंस गईं।
​3. लचित बोरफुकन का अदम्य साहस
​युद्ध के निर्णायक क्षण में लचित बोरफुकन बहुत बीमार थे। उनके सैनिकों का मनोबल गिर रहा था।
​अंतिम प्रहार: लचित अपनी बीमारी के बावजूद एक छोटी नाव में सवार हुए और अपने सैनिकों से कहा—”यदि तुम भागना चाहते हो, तो भाग जाओ, लेकिन मैं अपने देश की रक्षा करते हुए यहीं मरूँगा।”
​परिणाम: अपने सेनापति को रणभूमि में देखकर अहोम सैनिकों में नया जोश भर गया। उन्होंने मुगलों पर ऐसा भीषण हमला किया कि मुगलों को मानस नदी तक पीछे हटना पड़ा।
​4. सरायघाट युद्ध के परिणाम

 

 

 

 

अहोम साम्राज्य की नौसेना की रीढ़ ‘बचारी’ (Bachari) नावें थीं। इन नावों की बनावट और युद्ध-कौशल इतना सटीक था कि ब्रह्मपुत्र की लहरों पर मुगलों के विशाल जहाज इनके सामने बेबस हो गए।
​सरायघाट के युद्ध में इन नावों की विशिष्टता के मुख्य बिंदु यहाँ दिए गए हैं:
​1. बनावट और संरचना (Design & Structure)
​बचारी नावें सामान्य नावें नहीं थीं, उन्हें विशेष रूप से ब्रह्मपुत्र की भौगोलिक परिस्थितियों के लिए तैयार किया गया था:
​एकल लकड़ी का उपयोग: ये नावें अक्सर एक ही विशाल पेड़ (जैसे ‘होलोंग’ या ‘सोरई’) के तने को खोखला करके बनाई जाती थीं। इससे वे अत्यंत मजबूत और पानी के झटकों को सहने वाली बनती थीं।
​लंबी और संकरी: इनकी बनावट बहुत लंबी और पतली होती थी, जिससे ये पानी को चीरते हुए बहुत तेज गति से चल सकती थीं।
​उथले पानी की क्षमता: मुगलों के भारी जहाजों को गहरे पानी की जरूरत थी, लेकिन बचारी नावें बहुत कम गहरे (उथले) पानी में भी आसानी से मुड़ सकती थीं।
​2. मारक क्षमता (War Capabilities)
​युद्ध के समय इन नावों को एक “तैरते हुए किले” में बदल दिया जाता था:
​तोपों की तैनाती: अहोमों ने इन छोटी नावों के अगले हिस्से (Bow) पर ‘हिला’ (Hila) नाम की छोटी लेकिन शक्तिशाली तोपें लगाई थीं।
​तीरंदाजों का स्थान: नाव के बीच के हिस्से में तीरंदाजों के लिए सुरक्षित स्थान होता था, जहाँ से वे मुगलों के ऊंचे जहाजों पर अचूक निशाना साध सकते थे।
​चप्पू चलाने वालों की गति: एक बड़ी बचारी नाव में 40 से 60 प्रशिक्षित मल्लाह (Rowers) होते थे, जो लचित बोरफुकन के इशारे पर नाव की दिशा पलक झपकते ही बदल देते थे।
​3. युद्ध में ‘बचारी’ की भूमिका (Tactical Usage)
​सरायघाट के युद्ध में इन नावों ने मुगलों के विरुद्ध ‘गुरिल्ला’ रणनीति अपनाई:
​छिपाव और हमला: अहोम सैनिक इन नावों को नदी के किनारे घने जंगलों या ऊंचे घासों में छिपा देते थे और जैसे ही मुगलों का बेड़ा करीब आता, ये बिजली की गति से बाहर निकलकर हमला करती थीं।
​घेराबंदी: संकरी जगहों पर कई बचारी नावें मिलकर मुगलों के एक बड़े जहाज को चारों तरफ से घेर लेती थीं। चूंकि मुगलों की बड़ी तोपें नीचे की ओर ज्यादा झुक नहीं पाती थीं, वे इन छोटी नावों पर निशाना नहीं लगा पाते थे।
​बोर्डिंग ऑपरेशंस: अहोम सैनिक अपनी नावों को मुगल जहाजों के एकदम करीब ले जाकर उन पर चढ़ जाते थे और आमने-सामने की लड़ाई (Hand-to-hand combat) शुरू कर देते थे।
​4. तुलना: अहोम बचारी बनाम मुगल जहाज

 

 

 

 

रोचक तथ्य
​लचित बोरफुकन स्वयं एक विशेष रूप से सज्जित बचारी नाव पर सवार होकर युद्ध का नेतृत्व कर रहे थे। जब उन्होंने देखा कि अहोम सैनिक पीछे हट रहे हैं, तो उन्होंने अपनी इसी नाव को सीधे मुगल बेड़े के बीच में उतार दिया था, जिससे पूरी सेना में जोश भर गया।
​क्या आप चाहते हैं कि मैं अहोमों के ‘किलों’ (Forts) के बारे में बताऊँ जो उन्होंने नदी किनारे बनाए थे, या आप मराठा नौसेना के महान सेनापति ‘कान्होजी आंग्रे’ के जहाजों के बारे में जानना चाहेंगे?

अहोम साम्राज्य की रक्षा प्रणाली केवल उनकी नौसेना (बचारी नावों) पर ही नहीं, बल्कि उनके अभेद्य और रणनीतिक रूप से बनाए गए किलों (Forts) पर भी टिकी थी। अहोमों ने असम की भौगोलिक स्थिति—पहाड़ों, घने जंगलों और नदियों—का उपयोग करके किलों का एक ऐसा जाल बिछाया था जिसे भेदना मुगलों के लिए लगभग असंभव था।
​अहोम किलों की मुख्य विशेषताएं और उनके प्रकार यहाँ दिए गए हैं:
​1. गढ़ (Garh) – मिट्टी के विशाल किले
​अहोम अपने किलों को ‘गढ़’ कहते थे। ये पत्थर के बजाय मिट्टी, बांस और लकड़ी से बने होते थे, जो पूर्वोत्तर की भारी बारिश और दलदली जमीन के लिए सबसे उपयुक्त थे।
​अंधारूबली (Andharubali): सरायघाट के युद्ध के दौरान गुवाहाटी में नदी के किनारे मिट्टी की एक विशाल दीवार (गढ़) बनाई गई थी। यह इतनी ऊंची और चौड़ी थी कि मुगलों के तोप के गोले भी इसे पार नहीं कर पाते थे।
​बांस की बाड़ (Bamboo Stockades): मिट्टी की दीवारों के ऊपर कांटेदार बांसों की बाड़ लगाई जाती थी, जिससे हाथियों और घोड़ों का उन पर चढ़ना असंभव हो जाता था।
​2. पानी के किले और ‘चोकी’ (Chokis)
​चूंकि ब्रह्मपुत्र ही असम का मुख्य मार्ग था, इसलिए अहोमों ने नदी के किनारों पर छोटे-छोटे सैन्य ठिकाने बनाए थे जिन्हें ‘चोकी’ कहा जाता था।
​इटाखुलि का किला (Itakhuli Fort): यह गुवाहाटी में एक पहाड़ी पर स्थित था। यहाँ से अहोम सैनिक ब्रह्मपुत्र नदी के हर जहाज पर नजर रख सकते थे।
​रणनीतिक स्थान: ये किले हमेशा ऐसी जगह बनाए जाते थे जहाँ नदी संकरी हो या जहाँ पहाड़ नदी के एकदम करीब हों, ताकि ऊपर से दुश्मनों पर तीरों और पत्थरों से हमला किया जा सके।
​3. सुरंगें और गुप्त मार्ग
​अहोम किलों की एक बड़ी विशेषता उनके गुप्त मार्ग (Secret Tunnels) थे।
​तलातल घर (Talatali Ghar): शिवसागर में स्थित यह महल और किला इंजीनियरिंग का अद्भुत नमूना है। इसमें तीन मंजिलों वाली सुरंगें थीं। दो सुरंगें गुप्त रूप से दिक़्खू नदी और अन्य किलों से जुड़ी थीं ताकि घेराबंदी के समय सैनिक सुरक्षित बाहर निकल सकें या रसद (Supplies) ला सकें।
​4. किलेबंदी की तकनीक (Fortification Tactics)
​अहोमों ने किलों को रक्षात्मक के साथ-साथ आक्रामक हथियार की तरह इस्तेमाल किया:
​पाइक प्रणाली (Paik System): अहोम साम्राज्य का हर वयस्क नागरिक एक प्रशिक्षित सैनिक था। किलों की रक्षा के लिए ये ‘पाइक’ हमेशा तैयार रहते थे।
​जहरीले गड्ढे: किलों के चारों ओर गहरी खाइयाँ (Ditches) खोदी जाती थीं, जिनमें पानी भरकर जहरीले बांस के खूंटे गाड़ दिए जाते थे।
​छापामार हमला: किले केवल छिपने के लिए नहीं थे; अहोम सैनिक किलों से निकलकर मुगलों पर रात में अचानक हमला करते और फिर वापस सुरक्षित किलों में लौट जाते थे।
​अहोम किलों की मुगल किलों से तुलना

 

 

 

 

 

निष्कर्ष
​अहोम किलों ने असम को कभी गुलाम नहीं होने दिया। मुगलों की विशाल तोपें इन मिट्टी के गढ़ों के सामने बेकार साबित हुईं क्योंकि मिट्टी तोप के गोलों के झटकों को सोख लेती थी।

शिवसागर (असम) में स्थित तलातल घर (Talatali Ghar) अहोम वास्तुकला का सबसे अद्भुत और रहस्यमयी नमूना है। यह केवल एक राजमहल नहीं था, बल्कि एक सैन्य अड्डा और एक अभेद्य किला भी था।
​इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी सात मंजिला संरचना और गुप्त सुरंगें थीं। यहाँ इसके मुख्य बिंदु दिए गए हैं:
​1. सात मंजिला अनूठी संरचना
​तलातल घर का निर्माण राजा राजेश्वर सिंह ने 1751 ईस्वी में करवाया था।
​चार मंजिलें जमीन के ऊपर: ये मंजिलें शाही परिवार के रहने और दरबार लगाने के लिए थीं।
​तीन मंजिलें जमीन के नीचे: इन्हें ‘तलातल’ कहा जाता था (जिसका अर्थ है—जमीन के नीचे)। ये मंजिलें पूरी तरह से सैन्य रणनीति, गुप्त बैठकों और आपातकालीन निकास के लिए बनाई गई थीं।
​2. रहस्यमयी गुप्त सुरंगें (Secret Tunnels)
​तलातल घर अपनी दो मुख्य सुरंगों के लिए इतिहास में प्रसिद्ध है, जिन्हें घेराबंदी के समय उपयोग के लिए बनाया गया था:
​पहली सुरंग (करीब 16 किमी लंबी): यह सुरंग तलातल घर को गरगाँव के महल से जोड़ती थी। यदि दुश्मन किले को घेर लेते, तो राजा और उनकी सेना सुरक्षित रूप से दूसरे शहर निकल सकते थे।
​दूसरी सुरंग (करीब 3.5 किमी लंबी): यह सुरंग दिखू नदी के किनारे तक जाती थी। यह सुरंग रसद (Supplies) पहुँचाने और नदी के रास्ते भागने के लिए एक गुप्त मार्ग प्रदान करती थी।
​3. निर्माण तकनीक और सामग्री
​अहोमों ने इस विशाल किले को बनाने के लिए सीमेंट का उपयोग नहीं किया था। उन्होंने एक विशेष स्वदेशी मिश्रण का उपयोग किया:
​कड़ई-कुमति (Karai-Kumati): यह चिपचिपे चावल (Bora Rice), बत्तख के अंडों की जर्दी, गुड़ और चूने का मिश्रण था। यह मिश्रण इतना मजबूत था कि आज सैकड़ों साल बाद भी यह किला सुरक्षित खड़ा है।
​बिना नींव का निर्माण: स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इसकी वास्तुकला इस प्रकार थी कि यह अपनी सात मंजिलों का भार बिना किसी गहरी आधुनिक नींव के सहन कर लेता था।
​4. सैन्य महत्व: एक अभेद्य किला
​भूलभुलैया: इसकी भूमिगत मंजिलें एक भूलभुलैया (Labyrinth) की तरह थीं। यदि कोई दुश्मन सैनिक अंदर घुस भी जाता, तो वह रास्तों में ही खो जाता था।
​हवा और रोशनी का प्रबंध: अहोम इंजीनियरों ने भूमिगत मंजिलों में भी वेंटिलेशन और प्राकृतिक रोशनी के लिए छोटे-छोटे छिद्रों का ऐसा जाल बनाया था कि नीचे कभी घुटन नहीं होती थी।
​तलातल घर और गरगाँव महल (Kareng Ghar) की तुलना

 

 

 

 

आज भी तलातल घर की भूमिगत मंजिलों को सुरक्षा कारणों से पर्यटकों के लिए बंद कर दिया गया है, क्योंकि वहां के रास्ते इतने पेचीदा हैं कि लोगों के खो जाने का डर रहता है।
​क्या आप चाहते हैं कि मैं उन अन्य गुप्त किलों के बारे में बताऊँ जहाँ अहोमों ने अपनी तोपें छिपाई थीं, या हम दक्षिण भारत के ‘विजयनगर साम्राज्य’ के सैन्य रहस्यों की चर्चा करें?

 

 

अहोम साम्राज्य की रक्षा नीति केवल विशाल किलों तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन्होंने असम के दुर्गम भूगोल का लाभ उठाकर ‘गुप्त किलों’ और ‘रणनीतिक ठिकानों’ का एक ऐसा जाल बनाया था, जिसे मुगल सेना कभी समझ ही नहीं पाई।
​अहोमों के गुप्त किलों और उनकी रक्षा रणनीति के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
​1. छद्म किले (Camouflaged Forts)
​अहोमों ने घने जंगलों के बीच ऐसे किले बनाए थे जो दूर से केवल पहाड़ियों या घने पेड़ों का हिस्सा लगते थे।
​मिट्टी और वनस्पति का उपयोग: इन किलों की बाहरी दीवारों पर तेजी से उगने वाली कटीली झाड़ियाँ और लताएं लगा दी जाती थीं। मुगल सैनिक अक्सर इनके पास से गुजर जाते थे और उन्हें पता भी नहीं चलता था कि वहां कोई सैन्य चौकी है।
​अचानक हमला: जब मुगल सेना नदी के किनारे आराम कर रही होती, तब इन गुप्त किलों से अहोम सैनिक निकलकर ‘गुरिल्ला’ हमला करते और वापस जंगलों में गायब हो जाते।
​2. ‘पाइक’ चौकियाँ और भूमिगत बंकर
​अहोमों ने ब्रह्मपुत्र के किनारे छोटे-छोटे ऊंचे टीलों के अंदर गुप्त कमरे बनाए थे।
​निगरानी केंद्र: इन टीलों के ऊपर से सैनिक नदी में आती नावों पर नजर रखते थे। यदि कोई दुश्मन दिखता, तो वे ढोल बजाकर या आग जलाकर मुख्य किले को संकेत भेज देते थे।
​हथियारों का भंडारण: ‘हिला’ (छोटी तोपें) और बारूद को इन्हीं गुप्त ठिकानों में सुरक्षित रखा जाता था ताकि बारिश में वे खराब न हों।
​3. कजलीमुख और अन्य रणनीतिक स्थल
​कुछ स्थान ऐसे थे जो प्राकृतिक रूप से किले का काम करते थे:
​कजलीमुख (Kajalimukh): यह वह स्थान था जहाँ कपिली नदी ब्रह्मपुत्र से मिलती है। यहाँ अहोमों ने पानी के भीतर जहरीले बांस के खूंटे गाड़े हुए थे। ऊपर से देखने पर पानी शांत लगता था, लेकिन जैसे ही दुश्मन की नावें यहाँ आतीं, वे इन खूंटों से टकराकर डूब जाती थीं। इसे अहोमों का “गुप्त जल-किला” माना जाता था।
​इटाखुलि (Itakhuli): यद्यपि यह एक ज्ञात किला था, लेकिन इसके भीतर कई गुप्त कक्ष थे जहाँ से सुरंगें सीधे नदी के तल तक जाती थीं।
​4. गुप्त तोपखाना (Hidden Artillery)
​अहोमों के पास तोप बनाने की स्वदेशी तकनीक थी। उन्होंने अपनी सबसे शक्तिशाली तोपें किलों की दीवारों के पीछे नहीं, बल्कि विशेष रूप से बनाए गए ‘गुप्त झरोखों’ (Hidden embrasures) में छिपाई थीं।
​अचूक निशाना: इन तोपों को केवल तभी बाहर निकाला जाता था जब दुश्मन का जहाज एकदम करीब आ जाए। इससे मुगलों को कभी अंदाजा नहीं हो पाता था कि हमला किस दिशा से हो रहा है।

5. ‘पिरिका’ (Pirika) – मोबाइल किले
​अहोम युद्ध कला में ‘पिरिका’ का भी उल्लेख मिलता है, जो असल में बांस और मिट्टी से बने चलते-फिरते (Portable) रक्षा कवच थे। सैनिक इन्हें अपने साथ ले जाते थे और युद्ध के मैदान में तुरंत एक “मिनी किला” खड़ा कर देते थे।
​अहोमों की सफलता का रहस्य
​अहोमों के गुप्त किले उनकी ‘छापामार युद्ध नीति’ (Guerilla Warfare) का आधार थे। मुगलों की तोपें और भारी कवच उन गुप्त ठिकानों के सामने बेकार साबित हुए जो दिखते ही नहीं थे।
​क्या आप अहोमों की उन “विशिष्ट तोपों” और उनके “बारूद बनाने की गुप्त विधि” के बारे में जानना चाहेंगे, या हम किसी अन्य साम्राज्य की सैन्य तकनीक पर चर्चा करें?

 

अहोम साम्राज्य की सैन्य शक्ति का सबसे बड़ा रहस्य उनकी अग्रि-अस्त्र (Firearms) तकनीक थी। जहाँ मध्य भारत में लोग अक्सर बाहरी आक्रमणकारियों से तोप और बारूद की तकनीक सीख रहे थे, वहीं अहोमों ने अपनी स्वदेशी विधि विकसित कर ली थी।
​इतिहासकार जे.एन. सरकार के अनुसार, अहोमों के पास मुगलों से भी बेहतर और विविध प्रकार की तोपें थीं।
​1. अहोमों की विशिष्ट तोपें
​अहोमों के पास विभिन्न आकारों और मारक क्षमता वाली तोपें थीं, जिन्हें वे ‘हि़ला’ (Hila) और ‘बोरतोप’ (Bortop) कहते थे।
​हिला (Hila/Hand Cannons): ये छोटी और हल्की तोपें थीं जिन्हें सैनिक अपने हाथों में पकड़कर या नावों पर रखकर चलाते थे। सरायघाट के युद्ध में बचारी नावों पर इन्हीं का प्रयोग हुआ था।
​बोरतोप (Bortop/Big Cannons): ये भारी तोपें थीं जो किलों की सुरक्षा के लिए उपयोग की जाती थीं।
​विशिष्ट बनावट: अहोम तोपें अक्सर कांसे (Bronze) और लोहे के मिश्रण से बनी होती थीं। कुछ तोपों का आकार मगरमच्छ (Dragon) या बाघ के मुँह जैसा होता था, जिन्हें ‘मगरुआ बोरतोप’ कहा जाता था।
​2. बारूद बनाने की गुप्त विधि
​अहोमों के पास उच्च गुणवत्ता वाला बारूद (Gunpowder) बनाने की अपनी तकनीक थी, जो मुगलों के बारूद से कहीं अधिक शक्तिशाली और नमी-रोधी (Moisture resistant) थी।
​मुख्य सामग्री और मिश्रण:
​साल्टपीटर (Shoro/Potassium Nitrate): अहोमों ने असम की मिट्टी से ही इसे निकालने की विधि खोज ली थी।
​गंधक (Sulphur): यह ज्वालामुखी क्षेत्रों या खदानों से प्राप्त किया जाता था।
​कोयला (Charcoal): अहोम एक विशेष प्रकार के पेड़ की लकड़ी का कोयला उपयोग करते थे, जो बारूद को बहुत अधिक ज्वलनशील बनाता था।
​गुप्त निर्माण प्रक्रिया:
​धान की भूसी का प्रयोग: अहोम बारूद को नमी से बचाने के लिए उसमें धान की भूसी और कुछ औषधीय अर्क मिलाते थे। इससे असम की भारी बारिश और उमस में भी उनका बारूद कभी खराब नहीं होता था।
​अनुपात की गोपनीयता: बारूद बनाने वाले विशेषज्ञों को ‘खारघरिया’ (Kharghariya) कहा जाता था। उनके पास बारूद के मिश्रण का एक सटीक गणितीय अनुपात था जिसे वे केवल अपने वंशजों या राजा के विश्वसनीय लोगों के साथ साझा करते थे।
​3. खारघरिया फुकन (Kharghariya Phukan) – आयुध विभाग
​अहोम प्रशासन में हथियारों और बारूद के प्रबंधन के लिए एक विशिष्ट मंत्री पद होता था, जिसे ‘खारघरिया फुकन’ कहा जाता था।
​भंडारण: बारूद को बांस के पाइपों में भरकर मिट्टी के नीचे या गुप्त गुफाओं में रखा जाता था।
​परीक्षण: हर युद्ध से पहले बारूद की शक्ति का परीक्षण किया जाता था। यदि बारूद उम्मीद के मुताबिक नहीं जलता था, तो पूरे बैच को दोबारा तैयार किया जाता था।
​4. मुगलों पर प्रभाव
​जब मुगलों ने अहोमों से युद्ध किया, तो वे यह देखकर हैरान रह गए कि असम जैसे दलदली और वर्षा वाले क्षेत्र में अहोमों के तोपखाने इतनी सुचारू रूप से कैसे काम कर रहे हैं। 1662 में मीर जुमला के आक्रमण के समय मुगलों ने अहोमों से 600 से अधिक तोपें और भारी मात्रा में बारूद जब्त किया था, जो उनकी विशाल सैन्य उत्पादन क्षमता को दर्शाता है।

अहोम साम्राज्य की तोपें न केवल युद्ध के हथियार थीं, बल्कि वे धातु विज्ञान (Metallurgy) और कला का बेजोड़ संगम थीं। अहोमों ने तोपों को डरावना और प्रभावशाली बनाने के लिए उन्हें जानवरों के आकार में ढाला था।
​यहाँ उनकी कुछ सबसे विशिष्ट तोपों और उनसे जुड़ी रोचक जानकारी दी गई है:

 

1. विशिष्ट तोपों के प्रकार और उनकी कलाकृति
​मगरुआ बोरतोप (Magarua Bortop)
​यह अहोमों की सबसे प्रसिद्ध और शक्तिशाली तोप थी।
​बनावट: इसके आगे का हिस्सा एक विशाल मगरमच्छ (Dragon/Crocodile) के खुले हुए मुँह जैसा बनाया जाता था।
​मनोवैज्ञानिक युद्ध: जब इस तोप से गोला निकलता था, तो ऐसा प्रतीत होता था जैसे मगरमच्छ आग उगल रहा हो। इसकी भयानक गर्जना से दुश्मन के हाथियों और घोड़ों में भगदड़ मच जाती थी।
​सिंहास्य बोरतोप (Singhasya Bortop)
​इस तोप का मुख शेर (Lion) के समान होता था। यह शक्ति और राजसी गौरव का प्रतीक मानी जाती थी और अक्सर मुख्य किलों के द्वारों पर तैनात की जाती थी।
​दगा तोप (Daga Top)
​यह तोप अपनी अचूक मारक क्षमता के लिए जानी जाती थी। इसका उपयोग विशेष रूप से उन नावों को डुबाने के लिए किया जाता था जो अहोम सीमा में अनधिकृत रूप से प्रवेश करती थीं।
​2. तकनीकी विशेषताएँ

3. “खारघरिया फुकन” का विभाग
​अहोम प्रशासन में तोपों के रखरखाव के लिए एक विशेष पद होता था जिसे ‘खारघरिया फुकन’ कहा जाता था।
​वे न केवल तोपों की देखभाल करते थे, बल्कि ‘हथिशाल’ (हथियार बनाने की कार्यशाला) में नई तोपों के निर्माण की निगरानी भी करते थे।
​असम की अत्यधिक नमी और बारिश के बावजूद, अहोमों ने अपनी तोपों को जंग से बचाने के लिए उन पर विशेष तेल और जड़ी-बूटियों का लेप लगाने की विधि विकसित की थी।
​4. ऐतिहासिक महत्व
​1662 में जब मुगल सेनापति मीर जुमला ने अहोमों पर आक्रमण किया, तो वह अहोमों के तोपखाने को देखकर दंग रह गया। उसने लिखा था कि अहोमों के पास ऐसी तोपें हैं जो मुगलों के पास भी नहीं हैं। मुगलों ने उस समय लगभग 675 से अधिक भारी तोपें अहोमों से जब्त की थीं, जिनमें से कई आज भी असम राज्य संग्रहालय (Guwahati) में देखी जा सकती हैं।
​क्या आप इनमें से किसी विशिष्ट तोप के “युद्ध इतिहास” के बारे में और जानना चाहेंगे, या हम यह चर्चा करें कि अहोमों ने अपनी तोप बनाने की तकनीक मुगलों से कैसे गुप्त रखी थी?

अहोम साम्राज्य ने अपनी सैन्य तकनीक, विशेष रूप से तोप और बारूद बनाने की विधि को मुगलों और अन्य बाहरी शत्रुओं से गुप्त रखने के लिए एक बहुत ही सख्त और संगठित प्रणाली विकसित की थी। यह उस समय की “कड़ी सुरक्षा वाली सैन्य गोपनीयता” (High-Security Military Secrecy) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
​अहोमों ने अपनी तकनीक को गुप्त रखने के लिए निम्नलिखित तरीके अपनाए थे:
​1. ‘खारघरिया’ (Kharghariya) जाति की विशिष्टता
​अहोमों ने बारूद और हथियार बनाने का काम किसी भी आम नागरिक को नहीं दिया था। इसके लिए एक विशिष्ट समुदाय या समूह बनाया गया था जिसे ‘खारघरिया’ कहा जाता था।
​वंशानुगत ज्ञान: यह तकनीक पिता से पुत्र को सौंपी जाती थी। बाहरी लोगों का इस समूह में प्रवेश वर्जित था।
​शपथ: इन कारीगरों को राजा के प्रति अटूट निष्ठा की शपथ लेनी पड़ती थी। यदि कोई जानकारी लीक करने की कोशिश करता, तो उसे मृत्युदंड दिया जाता था।
​2. उत्पादन केंद्रों की गोपनीयता (Hidden Workshops)
​अहोमों के हथियार बनाने के कारखाने (हथिशाल) कभी भी राजधानी या भीड़भाड़ वाले इलाकों में नहीं होते थे।
​जंगलों में छिपे केंद्र: ये कारखाने घने जंगलों, पहाड़ियों की गुफाओं या दुर्गम क्षेत्रों में स्थित थे। मुगलों के जासूसों के लिए इन केंद्रों तक पहुँचना लगभग असंभव था।
​विखंडित उत्पादन (Fragmented Production): तोप के अलग-अलग हिस्से अलग-अलग गुप्त स्थानों पर बनाए जाते थे, ताकि यदि एक केंद्र पकड़ा भी जाए, तो दुश्मन को पूरी तकनीक समझ में न आए।
​3. कूट भाषा और मौखिक परंपरा (Oral Tradition)
​अहोमों ने अपनी बारूद बनाने की विधियों (Chemical Formulas) को कहीं भी लिखित रूप में दर्ज नहीं किया था।
​मौखिक सूत्र: साल्टपीटर, गंधक और कोयले के अनुपात को विशिष्ट गीतों या मुहावरों के रूप में याद किया जाता था।
​संकेत लिपि: यदि कुछ लिखा भी जाता था, तो वह अहोम लिपि की एक ऐसी गुप्त शैली में होता था जिसे केवल राजपरिवार के विश्वसनीय ‘फुकन’ ही पढ़ सकते थे।
​4. मुगलों को भ्रमित करना (Deception Tactics)
​युद्ध के दौरान जब अहोमों को लगता था कि उनका कोई हथियार या तोप दुश्मन के हाथ लग सकती है, तो वे उसे नष्ट कर देते थे या गहरी नदी में फेंक देते थे।
​नकली तोपें: कई बार वे लकड़ी की तोपें बनाकर किलों पर तैनात कर देते थे ताकि मुगलों को उनकी असली संख्या और तकनीक का अंदाजा न हो सके।
​कैदियों पर प्रतिबंध: अहोमों ने अपनी कार्यशालाओं में कभी भी विदेशी या मुस्लिम युद्धबंदियों को काम पर नहीं लगाया, ताकि वे वापस जाकर मुगलों को तकनीक न बता सकें।
​अहोम बनाम मुगल: तकनीकी गोपनीयता की तुलना

 

 

 

ऐतिहासिक परिणाम
​यही कारण था कि मुगलों ने असम पर कई बार आक्रमण किया और कुछ तोपें जब्त भी कीं, लेकिन वे कभी भी अहोमों जैसा बारूद (जो बारिश में भी काम करे) नहीं बना पाए। मुगलों के लिए अहोमों की ‘अग्रि-शक्ति’ हमेशा एक अनसुलझी पहेली बनी रही।

 

सन् 1757 के मराठा मुगल युद्ध मे पेशवा रघुनाथ राव और मल्हार राव होल्कर ने दिल्ली जीत ली थी और लाल किले पर भगवा फहरा दिया था। इसके साथ ही तत्कालीन मुगल बादशाह आलमगीर को भी मार दिया गया, उसके बेटे शाहजहां तृतीय ने मराठाओ के आगे समर्पण कर दिया और दिल्ली पर मराठाओ का ध्वज स्वीकार कर लिया।

अब जरा कोई बुद्धिजीवी बताये की यह युद्ध हमे कभी स्कूलों में क्यो नही पढ़ाया गया, हमे सिर्फ वही युद्ध क्यो पढ़ाये गए जिनमे हिन्दुओ की हार हुई और दूसरी बात जब मुगल खुद 1757 में दिल्ली हमारे हवाले कर चुके थे तो हमे क्यो पढ़ाया जाता है कि मुगलो ने 1857 तक राज किया।

राजा 2 प्रकार के होते है एक वो जिन्होंने राज्य की स्थापना की हो दूसरे वो जिन्होंने उस राज्य को जीत लिया हो, दिल्ली की स्थापना धर्मराज युधिष्ठिर ने की थी मुगलो ने उसे लूटा मगर मराठाओ ने फिर से कब्जा कर लिया तो आखिर क्यों हम मुगलो को बादशाह माने, क्यो दिल्ली पर हमारी जीत का ऐतिहासिक जश्न नही मनाया जाता।

हमारे राजा युधिष्ठिर और मराठा है हम दिल्ली पर मुगलो के आधिपत्य को क्यो स्वीकार करे या तो दिल्ली का सिंहासन पांडवो का है या फिर पेशवा रघुनाथ राव का, दोनो ही स्थिति में हमारा गौरव है और सेक्युलर्स, वामपंथियो की नाक कटना तय है।

जो लोग मानते है कि अंग्रेज बहुत शिक्षित थे होशियार थे इसलिए भारत पर राज कर गए, वो एक बार उस पेंटिंग को जरूर देखें वो पेंटिंग है प्रथम आंग्ल मराठा युद्ध की जिसमे आप देख सकते है ब्रिटिश गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स पुणे में पेशवा माधवराव द्वितीय के सामने किस तरह सरेंडर कर रहा है। 1785 में बनी ये पेंटिंग गवाह है कि भारतीयो की ताकत के सामने ब्रिटेन की कभी कोई औकात थी ही नही सिर्फ कुछ गद्दारों ने हमारी सोने की चिड़िया के पर कतर दिए। तुम विजेता होकर भी खुद को 800 साल का गुलाम कहते हो क्योकि तुम अपना गौरवशाली इतिहास भूल गए जबकि उन्हें खुद के फ़टे पन्ने भी याद है।

ये पेंटिंग है प्रथम आंग्ल मराठा युद्ध की जिसमे आप देख सकते है ब्रिटिश गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स पुणे में पेशवा माधवराव द्वितीय के सामने किस तरह सरेंडर कर रहा है। दरसल बंगाल को जीतकर अंग्रेजो ने भारतीयों को बहुत हल्के में ले लिया था। उन्हें लगा उनके पास उन्नत तोपे है, बम्बई और कलकत्ता के बंदरगाह है तो भारत विजय तो बस चुटकी की बात है। मगर हुआ इसका विपरीत

उस समय भारत मे छोटे छोटे हिस्सो में जाट और राजपूत थे दिल्ली और अवध में मुगल थे हैदराबाद में निजाम था मगर ये सब मराठा साम्राज्य के अधीन राज्य थे, शासन चलाने के लिए इन्हें मराठो को टैक्स देना पड़ता था। मराठा साम्राज्य गिरा दिया मतलब दिल्ली जीत ली। 1775 मे पेशवा परिवार के सबसे जरूरी और प्रभावशाली सदस्य रघुनाथ राव अंग्रेजो से जा मिले और अंग्रेजो को हस्तक्षेप करने का मौका मिल गया।

1775 में एक समस्या और थी वो ये की नए पेशवा माधवराव द्वितीय मात्र 1 वर्ष के थे तो इतना बड़ा राज्य कौन चलाएगा। इसलिए मराठा सरदारों ने फैसला किया कि अब साम्राज्य का अंत करते है और संघ बनाते है। साम्राज्य को एक ही व्यक्ति चलाता है जबकि संघ को 3-4 लोग मिलकर एक राय से चलाते है। मराठा साम्राज्य की ताकत को बांट दिया गया ग्वालियर, इंदौर, नागपुर और बड़ोदा के मराठा राजा अब पेशवा के नाम पर राज्य चलाने लगे। इन चारों में सबसे शक्तिशाली ग्वालियर के महाराज महादजी सिंधिया (शिंदे) थे। अंग्रेजो ने अचानक से पुणे पर हमले का ऐलान कर दिया अंग्रेजो का लक्ष्य था पेशवा को अपने कब्जे में लेकर भारत मे अस्थिरता पैदा करना।

मगर अंग्रेजो का दुर्भाग्य था कि महादजी सिंधिया उस समय ग्वालियर में ना होकर महाराष्ट्र में ही थे। उन्होंने अंग्रेजो को खंडाला की पहाड़ी पर घेर लिया और उनके भोजन की आवाजाही रोक डाली। भूखे अंग्रेजो ने 3 दिन में ही हथियार डाल दिये। मगर अंग्रेज भी कहाँ रुकने वाले थे कोलकाता से उनका दूसरा लश्कर निकला, इस बार लक्ष्य ग्वालियर था। मराठो ने राजपूतो की मदद मांगी मगर कोई मदद नही मिली उल्टे ढेरो राजपूत राजा अंग्रेजो के बहकावे में आ गए और उनकी तरफ हो गए।

कोलकाता वाला लश्कर ग्वालियर और इंदौर को तबाह करने आ रहा था इस बात से अंजान की नर्मदा के तट पर यमराज खड़े थे। आधे अंग्रेजो को मराठाओ ने नर्मदा में ही डूबा दिया। इधर रंजनगढ़ के राणा ने अंग्रेजो की मदद की और ग्वालियर पर अंग्रेजो का कब्जा हो गया। ग्वालियर का किला जीतना तकरीबन असंभव था और सिंधिया महाराष्ट्र में अंग्रेजो से लड़ रहे थे। मगर गुरिल्ला युद्ध मराठाओ के लिये वरदान साबित हुआ, अंग्रेजो ने घुटने टेक दिए। बाद में सिंधिया भागते हुए ग्वालियर गए और उस किले को भी जीत ही लिया।

इस तरह 8 सालो के इस ख़ूनी संघर्ष के बाद विजयश्री ने मराठाओ का वरण किया, अंग्रेज बुरी तरह बर्बाद हो गए। उन्हें सलबाई की शर्मनाक संधि करनी पड़ी। मराठो ने उनके सारे बड़े किले छीन लिए अंग्रेजो ने जितना कमाया सारा गवा दिया। ब्रिटेन में तो वारेन हेस्टिंग्स के खिलाफ केस तक चला, वारेन हेस्टिंग्स की तस्वीर आपके सामने है जिसमे उसे पुणे में सरेंडर करते हुए दिखाया गया। हालांकि मराठे यही नही रुके अब जरूरत थी गद्दारों को सबक सीखाने की। जिस राजा ने अंग्रेजो से जितने पैसे खाये थे उस पर दोगुना दंड लगाकर नुकसान की भरपाई की गई।

अब सोचिये ये युद्ध 1783 में खत्म हुआ था उस समय भी हम विजेता थे फिर भी हमारे बीच ऐसे लोग मौजूद है जो बार बार भारत को 800 साल का गुलाम कहते है। एक बात समझ लीजिए जब तक आप अपने पुरखों का सम्मान नही करोगे इतिहास आपको सम्मान नही देगा।

खैर इस जीत ने महादजी सिंधिया का नाम भारत के इतिहास में सदा के लिए अमर कर दिया। 9 वर्ष बाद उनकी मृत्यु हो गयी मगर भारत के इस वीर सपूत ने मातृभूमि का ऋण चुका दिया। इसके बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी ने खुद कहा कि हमने पूरे एशिया को जीता मगर दिल्ली अभी बहुत दूर है। उस सदी में मराठा साम्राज्य को एशिया का सबसे शक्तिशाली साम्राज्य कहा गया। हालांकि बाद में मराठे अपने मद में चूर हो गए उनका ध्यान अब राज्य के विकास से ज्यादा आपसी लड़ाई में लग गया और उनका दुर्भाग्यपूर्ण पतन हुआ।

मगर इतना तो तय था कि भारत जीतने की किसी की भी हैसियत नही थी, हम अपने ही घरेलू कारणों से गुलाम हुए। आज भी ये कारण मौजूद है हमे जरूरत है राजनीति में महादजी सिंधिया जैसे लोगो को ढूंढने की और कोशिश करनी होगी कि जिन रियासतों ने अंग्रेजो का साथ दिया था उस सोच के लोग राजनीति में सक्रिय ना हो सके। यदि ऐसा ही चलता रहा तो भारत भूमि बार बार उस महान युद्ध और उसकी जीत का गवाह बनती रहेगी।

Source – Scindia of Gwalior, Colonial rule in Asia, The great Maratha (TV Serial)

भारतीय इतिहास का स्वर्णिम अध्याय जो आपसे छुपाया गया। औरंगजेब की मौत के बाद मुगलो ने अपनी राजधानी आगरा से दिल्ली शिफ्ट कर दी।

सन 1747 में दिल्ली पर अहमदशाह अब्दाली पहला हमला करता है और उसे लूटता है। 1756 तक वो 4 बार दिल्ली लूट चुका था और मुगल हर बार हार जाते।

आखिरकार मुगल बादशाह समझ गया कि अब्दाली से लड़ना उसके बस में नही है। वो ग्वालियर आया और मराठाओ से मदद मांगी।

मराठो की कमान पेशवा नाना साहब के हाथ मे थी और ग्वालियर में जयप्पा जी सिंधिया उनके सेनापति थे।

पेशवा और सिंधिया ने मदद के बदले एक बड़ी रणनीति बना दी उन्होंने शर्त रखी कि अब्दाली को खदेड़ने के बाद दिल्ली पर मराठाओ का राज होगा, बादशाह सिर्फ नाम का बादशाह होगा।
https://en.m.wikipedia.org/wiki/Battle_of_Delhi_(1757)

बादशाह ने यह शर्त स्वीकार ली और अंततः पेशवा ने अपने छोटे भाई रघुनाथ राव को हमले के लिए दिल्ली भेजा। रघुनाथ राव के नेतृत्व में मराठाओ ने अफगानों का जमकर संहार किया।

राघोबा यही नही रुके, अफगानों का पीछा करते हुए वो अटक पहुँच गए और वहाँ भी उनको धोया।
https://en.m.wikipedia.org/wiki/Battle_of_Attock_(1758)

हद तब हो गयी जब मराठा फौज अफगानिस्तान के ही कई इलाकों में घुस गई और अब्दाली के सैनिको को चुन चुनकर मारने लगी।

बहरहाल अब दिल्ली पर मराठाओ का शासन था, बादशाह पेंशनभोगी था। पानीपत में अब्दाली की जीत एक किस्मत की बात थी क्योकि मराठाओ को भौगोलिक लाभ नही मिल सके।

फिर भी मराठाओ को पानीपत से बहुत ज्यादा नुकसान नहीं हुआ और वो खड़े हो गए। दिल्ली जीतने के बाद मराठे अंग्रेजो को खदेड़ने का मन बनाने लगे, हर मोर्चे पर जीत मिलने लगी मगर तभी पेशवा माधवराव की मृत्यु हो गयी।

माधवराव के बाद उनका भाई नारायणराव पेशवा बना मगर उसकी भी हत्या हो गयी। पुणे के आंतरिक षडयंत्रो ने मराठा साम्राज्य को अंदर से खोखला कर दिया। शुरू में अंग्रेजो से जीत मिली मगर बाद में फिर दिल्ली भी गवा बैठे।

1818 आते आते मराठा साम्राज्य का आधिकारिक पतन हो गया। इसीलिए कहा जाता है कि पेशवा माधवराव की मृत्यु भारत के लिए अभिशाप थी। यही व्यक्ति था जिसने अंग्रेजो का खतरा भांप लिया था।

पोस्ट का पूरा सार आपको यह बताना है कि ब्रिटिश शासन की नींव मराठा साम्राज्य के ऊपर रखी गयी मुगल साम्राज्य पर नही। मुगल साम्राज्य पहले ही खत्म हो चुका था उसका महज एक नाम बचा था।

इसलिए गर्व करे रघुनाथ राव, माधवराव, महादजी सिंधिया और नाना फडणवीस जैसे नामो पर। जिनके कारण हिन्दू स्वराज की स्थापना हुई विद्यालयों में नही पढ़ाया जाता इसमें इतिहास का कोई दोष नही है।

दी वायर के किसी संपादक ने कहा है कि भारतीय होने में गर्व करने जैसा क्या है और हम किस इतिहास पर घमंड करते है हमने सभी निर्णायक युद्ध हारे है। लगता है ये बंदा कभी राजस्थान के बाहर निकला नही इसलिए इसने सिर्फ खानवा और हल्दीघाटी के युद्ध पढ़े है। खैर गलतफहमी हम दूर करते है-

1) 1191 – दिल्ली के राजा पृथ्वीराज की मुहम्मद गौरी पर विजय।

2) 1040 – भीमदेव सोलंकी ने गजनवी की सेना को धूल चटाई।

3) 1520 – राजा कृष्णदेव राय ने एक साथ 3 बहमनी सुल्तानों को पराजित किया।

4) 1661 – शिवाजी ने 13 हजार की सेना लेकर आदिलशाह की 50 हजार की फौज को हराया।

5) 1702 – गुरु गोविंद सिंह ने औरंगजेब को पस्त किया।

6) 1737 – पेशवा बाजीराव ने मुगलो को हराकर दिल्ली पर कब्जा किया।

7) 1757 – पेशवा रघुनाथ राव ने दिल्ली पर स्थायी कब्जा करके मुगल शक्ति का अंत किया।

8) 1822 – महाराज रणजीत सिंह ने अफगानों को धूल चटाई और आज के पूरे पाकिस्तान पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।

9) 1775 – मराठो की अंग्रेजो पर ऐतिहासिक विजय

10) 1739 – मराठाओ द्वारा पुर्तगाल की शक्तियों का अंत।

11) 1967 – भारत की चीन पर विजय तथा चोला पोस्ट और सिक्किम का अधिग्रहण

12) 4 भारत पाकिस्तान युद्ध – पाकिस्तान की बत्तीसी उखाड़ दी आज भी उसका कर्ज उसकी जीडीपी से कई गुना ज्यादा है।

क्या अब भी आपको लगता है कि भारतीय इतिहास में गर्व करने जैसा कुछ नही है??

एक तो पाठ्यक्रमों में सिर्फ हल्दीघाटी और खानवा को ठूस दिया गया क्योंकि उसमें हिन्दू पराजित हुए थे। मगर यह इंटरनेट का युग है अब कोई धूर्त मण्डली भारत के गौरवशाली इतिहास को नही रोक सकते। हमे गर्व है हम भारतीय है और हमारे पुरखो ने 1757 में मुगलो को खदेड़ा, 1740 में पुर्तगालियो को और 1947 में निजाम तथा अंग्रेजो को धोया।

धूर्त गैंग ने इतिहास को किस तरह भ्रष्ट किया और कैसे एक पक्षीय इतिहास हमे परोसा गया, उसकी धज्जियां उड़ाने में सहयोग करे-

1) भारत का इतिहास सिंधु घाटी सभ्यता से शुरू नही होता बल्कि सरयू तट से शुरू होता है जहाँ महर्षि मनु को अपने मनुष्य होने का ज्ञान हुआ और मानव सभ्यता विकसित हुई।

2) रामायण और महाभारत हिन्दुओ के धर्मग्रंथ हो सकते है मगर शैक्षिक रूप से ये भारत का इतिहास है, जिन्हें पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किया गया।

3) सिंध को अरबो ने जीता अवश्य था मगर बप्पा रावल ने उन्हें मार मार कर भगाया भी था, मगर सिर्फ अरबो की विजय पढ़ाई जाती है और बप्पा रावल को कहानी किस्सों के भरोसे छोड़ दिया जाता है।

4) व्यवस्था के अनुसार सम्राट पोरस ने सिकन्दर को रोका यह पढ़ाना आवश्यक नही था लेकिन अलाउद्दीन खिलजी ने मंगोलों को रोका ये बात याद से लिखी गयी।

5) बाबर से औरंगजेब तक हर बादशाह के लिये अलग अध्याय है जबकि मुगलो के इतिहास से हिंदुस्तान के वर्तमान को ज्यादा प्रभाव नही पड़ता।

6) मुगलो का 1707 तक का तो इतिहास बता दिया मगर बड़ी ही चतुराई से उसके बाद सीधे 1757 का प्लासी युद्ध लिखकर अंग्रेजो को ले आये। इतनी जल्दी क्या थी जनाब, जरा 1737 में पेशवा बाजीराव द्वारा मुगलो की धुलाई भी पढ़ा देते।

7) 1757 में मुगल सल्तनत का मराठा साम्राज्य में विलय हो गया था मगर जबरदस्ती उसका अंत 1857 मे पढ़ाया जाता है। 1757 से 1803 मुगल मराठा साम्राज्य के अधीन रहे और 1803 से 1857 अंग्रेजो के। 1757 के बाद कोई मुगल सल्तनत नही थी।

8) पानीपत में मराठो की हार हुई ठीक है मगर ये उनका अंतिम युद्ध नही था वे दोबारा खड़े हुए और अंग्रेजो को भी धो दिया, ये कब पढ़ाओगे??? सिर्फ पानीपत पढ़ा दिया ताकि संदेश यह जाए कि हिन्दुओ ने हर युद्ध हारा है जबकि युद्ध के बाद महादजी सिंधिया ने अफगानों को जमकर कूटा था।

9) जितने कागज बलबन, फिरोजशाह तुगलक और बहलोल लोदी पर लिखने में बर्बाद किये उन कागजो पर महादजी सिंधिया, नाना फडणवीस और तुकोजी होल्कर का वर्णन होना चाहिए था।

10) भारत ब्रिटेन का गुलाम नही उपनिवेश था।

11) भारत 200 नही 129 वर्ष ब्रिटेन की कॉलोनी रहा, (1818 में मराठा साम्राज्य के पतन से 1947 में कांग्रेस शासन तक)

12) आंग्ल मराठा युद्ध 1857 की क्रांति से भी बड़े थे इसलिए उनका विवरण पहले होना चाहिए मगर गायब है क्योकि बखान टीपू सुल्तान का करना था।

13) 1947 में 2 राष्ट्रों का उदय नही हुआ बल्कि एक ही का हुआ, हिंदुस्तान सदियों से उदित है और हमेशा रहेगा। ज्यादा सेक्युलर हो तो दूसरे आतंकी राष्ट्र की चिंता करो, नक्शे पर कुछ ही दिन का मेहमान है।

14) 1962 में भारत चीन से पराजित हुआ मगर 1967 में चीन को हराया भी, वो कौन पढ़ायेगा???

15) सामाजिक विज्ञान में एक पाठ आता है भारत और आतंकवाद, उसमे बड़े बड़े उदाहरण बताए जाते है मगर उनके पीछे का इस्लामिक कारण नही पढ़ाया जाता।

हमारी शिक्षा व्यवस्था बहुत ही रूढ़ है आवश्यकता है ऐसे लोगो को जोड़ने की जो शिक्षा मंत्रालयों में कार्यरत हो, कार्यरत होने से ज्यादा संजग और तत्पर हो। कृपया ऐसे मित्रो तक नेटवर्क बनाने में सहयोग करे।

भारत के कुछ महान शासक जिन्होंने राज करने के साथ साथ आदर्श का एक महान उदाहरण प्रस्तुत किया –

इक्ष्वाकु – एक महानतम शासक जिन्होंने मानव सभ्यता का प्रचार किया, और यही से सभ्यता (civilization) अपने अस्तित्व में आयी।

भरत – अपने समय के सबसे कर्तव्यनिष्ठ और चक्रवर्ती शासक जिनके नाम पर आज इस देश का नाम भारत है।

भागीरथ – भूमि विकास की शुरुआत करने वाले पहले शासक जिनकी राजधानी अयोध्या थी उत्तराखंड की भूमि को उपजाऊ बनाने और गंगा के अवतरण के लिये ये आज भी जाने जाते है।

रघु – धर्म के लिए अपना सबकुछ न्यौछावर किया, अपना राजपाठ सब गवाकर कुटिया में रहने लगे मगर दुष्ट शक्तियों से ऋषि मुनियों और धर्म की रक्षा करने का प्रण नही त्यागा।

राम – भारत के अब तक के सर्वश्रेष्ठ राजा रहे ये उपरोक्त वर्णित इक्ष्वाकु, भागीरथ और रघु के वंशज थे। राम राज्य के नाम से आज भी मिसालें दी जाती है।

युधिष्ठिर – धर्मराज के नाम से जाने वाले चक्रवर्ती सम्राट जिन्होंने अपने जीवन मे कभी झूठ नही बोला, अधर्म पर धर्म की विजय का महाभारत इन्ही के नेतृत्व में लड़ा गया।

कृष्ण – द्वारिका जैसे गौरवशाली नगर की स्थापना करने और महाभारत में अहम भूमिका निभाने के लिये इन्हें आज भी याद किया जाता है।

नंद प्रथम – पांडवो के अंतिम वंशज धनमेजय का वध करके नंद ने अपने वंश की नींव रखी और राजधानी इंद्रप्रस्थ से मगध में स्थापित की।

चंद्रगुप्त मौर्य – नंद वंश के अंतिम शासक नंद का अंत करके सम्राट का पद संभाला और पूरे भारत को एकसूत्र में बांधा।

अशोक – शुरू में काफी हिंसक रहे, ढेरो युद्ध किये मगर फिर बौद्ध धम्म को अपनाया और विदेशों में फैलाया, श्रीलंका, भूटान और चीन में बौद्ध धम्म इन्ही के शासनकाल में प्रचारित हुआ।

पुष्यमित्र शुंग – मौर्य वंश के अंतिम शासक ब्रहद्रथ मौर्य का वध करके बौद्धों की अहिंसावादी कुरीति को समाप्त किया और हिन्दू धर्म को भारत मे पुनर्जीवित किया।

विक्रमादित्य – अवन्तिका (उज्जैन) के सम्राट जिन्होंने भारत को एकसूत्र में बांधने का प्रयास किया काफी ज्यादा सफल रहे, अपनी प्रजावत्सलता के लिये आज भी मध्यभारत में इनका नाम आदर से लिया जाता है।

अजातशत्रु – व्यक्तिगत रूप से विलेन रहे क्योकि इन्होंने अपने ही पिता की हत्या की थी मगर एक राजा के रूप में आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया।

हर्षवर्धन – भारत को फिर से एकसूत्र में बांधने का प्रयास किया हालांकि सफलता पूरी तरह से नही मिल सकी मगर काफी हद तक सफल रहे।

भीमदेव सोलंकी प्रथम – गुजरात के चक्रवर्ती सम्राट जिनके राजा बनने के बाद महमूद गजनवी सोमनाथ तो क्या भारत की ओर भी आँख उठाकर भी ना देख सका।

पृथ्वीराज चौहान – दिल्ली के अंतिम हिन्दू शासक जिन्हें मुहम्मद गौरी बिना छल के हरा नही सका अंततः धोखे से इनकी हत्या की गई और भारत मे मुस्लिम वंश की नींव रखी गई।

महाराणा प्रताप – घास की रोटी खाना स्वीकार किया मगर मुगलो की अधीनता स्वीकार नहीं की, अंततः अपने राज्य का अधिकांश भाग जीतकर मृत्यु को प्राप्त हुए।

कृष्ण देव राय – दक्षिण में विजयनगर साम्राज्य के सम्राट जिन्होंने मुगलो को कभी दक्षिण में प्रवेश नही करने दिया, दक्षिण के हिंदुहदय सम्राट है।

छत्रपति शिवाजी – हिन्दुराष्ट्र की पुनः स्थापना का सपना देखने वाले और उसे सफलता के साथ क्रियान्वित करने वाले पहले हिन्दू शासक। मुगल वंश के अंत की शुरुआत इन्ही के राजतिलक से हुई।

यशवंत राव होल्कर प्रथम – मध्यभारत से मुगलो का पूरा सफाया किया और तमाम प्राचीन मंदिरों का पुनरूत्थान किया।

महादजी सिंधिया – आगरा के तख्त को सबसे नजदीक से चुनौती देने वाले शासक ग्वालियर और झाँसी पर नियंत्रण के साथ ही मुगल साम्राज्य सिर्फ आगरा भर में सिमट गया।

कृष्णराज वाडियार – मैसूर में जब टीपू सुल्तान को समाप्त करके अंग्रेजो ने कब्जा लिया था तब अंग्रेजो की ही मदद से कर्नाटक में फिर से हिन्दुओ का ध्वज फहराया।

ये हमारे भारत के वे शासक है जिनका भूत, वर्तमान सब इसी धरती से जुड़ा रहा। इनमे से अधिकांश राजाओ के बारे मे हमे पढ़ाया नही जाता और आधे से ज्यादा पौराणिक कथा बन चुके है। मगर सच्चाई यह है कि ये ना होते तो आज दिल्ली में शायद हरा झंडा फहरा रहा होता, हमारी मूल संस्कृति पूरी नष्ट हो गई होती या हम भी सऊदी के शेखों की तारीफ करने में गौरव महसूस करते। भारत के इन सभी राजाओ को शत शत नमन।
✍🏻परख सक्सेना की पोस्टों से संग्रहित

ये वो दौर था जब भारत का पश्चिमी द्वार बार-बार के महमूद गजनवी के हमलों से टूट चुका था। भारतीय राजा छोटी रियासतों की तरह, पुरानी नीतियों से लड़ते थे और इस्लामिक हमलावरों के हाथों एक-एक करके मारे जा रहे थे। आज की तरह सोशल मीडिया से युद्ध की ख़बरें फ़ौरन तो नहीं पहुँचती थीं, मगर साल-दो साल में तीर्थ यात्रियों, भागे-बचे परिवारों के जरिये जो गुलाम बनाना, निहत्थों को काट डालना, लूट, आगजनी, बलात्कार, धर्म-परिवर्तन जैसी घटनाएँ सुनाई दे रही थीं, वो भारत के लिए बिलकुल नयी थीं। इसके वाबजूद भारतीय राजा अलग-अलग लड़ने और अपने व्यक्तिगत शौर्य के पुराने तरीके छोड़ नहीं रहे थे।

गजनवी के बाद उसके भांजे-भतीजे सलार मसूद को लगा कि भरात बड़ी फौज से जीता जा सकता है। काफिरों का काफी माल-असबाब भी लूटने का मौका मिलता। इसी नियत के साथ उसने एक विशाल फौज इकठ्ठा की और भारत की ओर चढ़ दौड़ा। उसका इरादा था कि अगर भारत में हिंदुत्व का गढ़ माने जाने वाले वाराणसी पर कब्ज़ा कर लिया जाए तो निस्संदेह सारे काफ़िरों को सही राह दिखाने का सबाब उसे मिलेगा। इस इरादे से उसने सैय्यद इब्राहीम मशहदी को अपने साथ लिया। कहा जाता था कि जिस ओर का रुख सैय्यद इब्राहीम मशहदी बारह हजारी करता था वहां कोई काफ़िर बच नहीं सकता था।

भारत में उसका सामना एक आश्चर्य से होने वाला था। हिंदुत्व किसी किताबी इशारे पर चलता नहीं, इसलिए यहाँ तौर तरीके बदले जा सकते थे। इस्लामिक हमलावरों के आगे बढ़ने की खबर फैलते ही लक्ष्मीपुर, सीतापुर, लखनऊ, बाराबंकी, उन्नाव, फैजाबाद, बहरैच, श्रावस्ती, और गोंड इलाकों पर शासन करने वाले कई सरदार एक साथ जुट आये। करीबन इक्कीस सरदारों की समिति ने सर्वसम्मति से राजा सुहेलदेव राजभर को सेना की कमान सौंपी। सेनाएं बढीं और अलग अलग मोर्चों पर युद्ध हुआ। धुन्धागढ़ का किला घेरने की कोशिश में सैय्यद इब्राहीम मशहदी बारह हजारी अपने एक दूसरे सरदार के साथ मारा गया।

ऐसा माना जाता है कि बहराइच की जंग सलार मसूद और राजा सुहेलदेव राजभर के बीच 13 जून 1033 को हुई थी। इस्लामिक हमलावर फौज़ का दाहिना हिस्सा मीर नसरुल्लाह के मारे जाते ही टूटने लगा। थोड़ी ही देर में सलार मिया रजाब भी मार गिराया गया। आखिर में राजा सुहेलदेव ने सलार मसूद का सर काट लिया। अपनी इस जीत के उपलक्ष्य में श्रावस्ती के आस पास कई बावड़ियाँ बनवाई। इस जीत के साथ ही राजा सुहेलदेव की सेना ने हमलावर फौज का लगभग सफाया कर डाला था। लाखों सिपाहियों में से शायद ही दो-चार हज़ार भी बचे हों।

बहराइच में मई के महीने में अभी भी “गाजी सलार मसूद” की मजार पर उर्स का मेला लगता है। राजा सुहेलदेव राजभर की समाधी कहाँ है, कहीं है भी या नहीं, ये हमें मालूम नहीं। अगर अप्रैल 2016 में गाजीपुर से आनंद विहार (दिल्ली) के लिए राजा सुहेलदेव राजभर एक्सप्रेस नाम की ट्रेन शुरू ना हुई होती तो शायद राजा सुहेलदेव का नाम स्थापित इतिहास रचियेताओं ने मिटा ही डाला था। इसके अलावा भी राजभर नाम के साथ एक दूसरा वाकया जुड़ा हुआ मिल जायेगा। इसके लिए हमें हजार साल नहीं बल्कि थोड़े ही साल पीछे, ब्रिटिश दौर में जाना होगा।

ब्रिटिश काल में एक कानून बना “क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट-1871” जिसमें समय समय पर सुधार होते रहे। अंततः इससे “क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट – 1924” बना। इसमें जिन्हें शामिल किया गया था उनमें “राजभर” भी थे। जाति को ब्रिटिश ने जो कानूनी स्वरुप के जरिये बनाया, उसका खात्मा आजादी के बाद हुआ और जो पहले “क्रिमिनल ट्राइब्स” थीं वो “डीनोटिफाईड कास्ट” कहलाने लगीं। इनमें से अधिकांश को बाद में आरक्षण का लाभ मिला, जैसे कि मीणा भी “डीनोटिफाईड कास्ट” में आते थे। राजभर आज भी “डीनोटिफाईड कास्ट” ही हैं, वो ना जनरल होते हैं, ना ओबीसी, और ना ही अनुसूचित जाति-जनजातियों में आते हैं।

बाकी ये सारा किस्सा इसलिए क्योंकि अमिश त्रिपाठी ने राजा सुहेलदेव पर एक किताब लिखी है। 20 जून को आई ये किताब अमेज़न बेस्टसेलर की लिस्ट में पहुँच चुकी है और कल रात से अब तक में हम इसकी कीमत करीब 180 से करीब 280 जाते देख चुके हैं। उम्मीद की जाए कि राजा सुहेलदेव अब उतने गुमनाम नहीं रह जायेंगे जितना फेंकी बोटियों पर पलने वाले इतिहास रचियेताओं ने उन्हें बना रखा था!
✍🏻आनन्द कुमार

 

भारत के पुराने नक्शों में कई भाषा के आधार पर बने नक़्शे भी दिखते हैं। इनमें एक ख़ास बात ये नजर आती है कि आज का जो भारत का केन्द्रीय हिस्सा होता है, जिसमें मध्यप्रदेश पूरा, महाराष्ट्र-तेलंगाना के इलाके, कुछ हिस्सा उत्तर प्रदेश का भी और कई बार ओड़िसा तक एक गोंड भाषा का इलाका दिखाया जाता है। मुगलों से लेकर अंग्रेजों के दौर तक लगातार ये समुदाय स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत भी नजर आ जाते हैं।

आज के दौर के इतिहास में जो अटपटा सा मुग़ल शासन लगता है, उस दौर में भी देखेंगे तो नजर आएगा कि इन सभी इलाकों पर लगातार इस्लामिक आक्रमण जारी रहे। सवाल जवाब ना करने की जो शिक्षा स्कूल में दी जाती है उसके वाबजूद ये बार बार दिमाग में आता है कि अगर रानी दुर्गावती के दौर में इन इलाकों पर मुग़ल शासन था तो फिर औरंगज़ेब दक्कन पर चढ़ाई क्यों कर रहा था ? हर दस बीस साल में ये फिर विद्रोह कर के स्वतंत्र हो जाते थे क्या ?

असल में स्त्रियों के दबे-कुचले होने और मुग़ल बादशाहों के दयावान होने की कहानियों को इतिहास में स्थापित करने के लिए आम तौर पर पाठ्यक्रम से उन कहानियों को हटा दिया जाता है जो दिल्ली से दूर थीं। ऐसी ही कहानियों में से एक रानी दुर्गावती की कहानी भी है। गोंड समुदाय के लिए देवितुल्य पूजित इस रानी की कहनी भी इतिहास से गायब की जाती है। अकबर ने अपनी करीब 20-21 जीतों में हारने वालों के साथ क्या किया था इसे गायब करके उसे धर्मनिरपेक्ष दिखाने के लिए भी इस कहानी को गायब करना जरूरी होता है।

अकबर की निगाह जब रानी दुर्गावती के छोटे से राज्य पर पड़ी तो वो करीब 22 वर्ष का रहा होगा। अपने पति दलपत शाह मडावी की मृत्यु के उपरांत तीन वर्ष के पुत्र की ये माता उस समय गढ़मंडला का शासन संभाल रही थीं। अकबर करीब चालीस की वय की रानी को अपने हरम में, और गढ़मंडला को अपनी हुकूमत में मिलाना चाहता था। गढ़मंडला के पास का ही एक और मुस्लिम शासक बाजबहादुर को भी पड़ोस में एक रानी का शासन मंजूर नहीं था। कोई स्त्री भला शासन कैसे संभाल सकती है ?

इन कारणों से बाजबहादुर अक्सर गढ़मंडला पर आक्रमण करता रहता लेकिन वो कभी कामयाब नहीं हो पाया था। हर बार उसे हारकर लौटना पड़ता। तुलनात्मक रूप से अकबर के पास फौज़ की गिनती बहुत ज्यादा थी। उसने विवाद शुरू करने के लिए रानी से उनका विश्वस्त वजीर और उनका हाथी मांग लिया। मांगें ठुकराए जाने पर अकबर के रिश्तेदार आसफ खान के नेतृत्व में गढ़मंडला पर हमला हुआ। रानी खुद भी लड़ सकती होगी ये मुग़ल सिपाहियों को शायद पता नहीं था। पहले हमले में उन्हें हारकर लौटना पड़ा।

दूसरी बार फिर और फौजें जमा कर के आसफ खान के ही नेतृत्व में आक्रमण हुआ। पहले दिन तो 3000 मुग़ल सैनिकों की भी क्षति हुई लेकिन दुसरे दिन की लड़ाई लड़ने के लायक गढ़मंडला की शक्ति नहीं बची थी। 24 जून 1564 को जबलपुर के पास नरेई नाले के किनारे हुए इस युद्ध में रानी को पहले बांह और फिर आँख और गले में तीर लगे। जी हाँ, इस्लामिक आक्रमण का ख़ास तरीका, जिसमें कुछ फ़िदायीन सीधा विपक्ष के नेतृत्व की हत्या करने निकलते हैं वही इसमें भी इस्तेमाल हुआ था। घायल रानी ने अपने पुत्र को सुरक्षित स्थान पर भेजा और अपने मंत्री को अपना सर काट देने कहा।

जब वजीर आधारसिंह इसके लिए तैयार नहीं हुआ तो रानी अपनी कटार स्वयं ही अपने सीने में भोंककर आत्म बलिदान के पथ पर बढ़ गयीं। उन्होंने मृत्यु से पहले गढ़मंडला पर पंद्रह वर्ष शासन किया था। जबलपुर के पास जहां यह ऐतिहासिक युद्ध हुआ था, उस स्थान का नाम बरेला है, जो मंडला रोड पर स्थित है, वही रानी की समाधि बनी है, जहां गोण्ड जनजाति के लोग जाकर अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं। जबलपुर मे स्थित रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय भी रानी के नाम पर है।

खजुराहो के आस पास के कई मंदिर चंदेल राजवंश के बनवाये हुए हैं। रानी दुर्गावती का कला प्रेम उन मंदिरों और कालिंजर दुर्ग की कलाकृतियों में आज भी जीवित है। उनके मुग़ल सेना से युद्ध के बारे में कहा जा सकता है कि उसमें आम हिन्दुओं की सभी मूर्खताएं नजर आती हैं। उनकी सेना ने जब पहले दिन का युद्ध जीत लिया था, तो वो रात में ही आक्रमण करना चाहती थीं। लेकिन जैसा कि सर्वविदित है, नैतिकता का सारा ठेका तो हिन्दुओं के पास ही है, इसलिए उनके सिपहसलार रात में हमला करने से हिचके। अगली सुबह तक जब रानी अपने हाथी पर सवार लड़ने आई तो आसफ खान ने रानी दुर्गावती की सेना को कुचलने के लिए बड़ी तोपें मंगवा ली थी।

महारानी दुर्गावती कालिंजर के राजा कीर्तिसिंह चंदेल की एकमात्र संतान थीं। बांदा जिले के कालिंजर किले में 1524 ईसवी की दुर्गाष्टमी पर जन्म के कारण उनका नाम दुर्गावती रखा गया। रानी दुर्गावती के मायके और ससुराल पक्ष की जाति भिन्न थी। गोण्डवाना साम्राज्य के राजा संग्राम शाह मडावी ने अपने पुत्र दलपत शाह मडावी से विवाह करके, उन्हें अपनी पुत्रवधू बनाया था। कैलेंडर के हिसाब से 1524 की दुर्गाष्टमी 5 अक्टूबर को हुई होगी। विदेशी आक्रमणकारियों की काम-पिपासा से लड़ने वाली स्त्री-शक्ति को नमन ! उनके पंद्रह साल के शासन को नमन करने आज भी रानी की समाधी पर बरेला, मंडला रोड पर मेला लगा होगा तो सोचा याद दिला दें।

#तुम्हें_याद_हो_कि_ना_याद_हो

ओंके ओबव्वा
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क्या हुआ ? अजीब सा शब्द लग रहा है ! वो इसलिए क्योंकि आपको आपकी नायिकाओं के नाम किसी ने बताये ही नहीं है। काफी साल पहले (सन 1779 में) चित्रदुर्ग पर मदकरी नायक का शासन था। उनके किले को हमला कर रहे हैदर अली की फौजों ने घेर रखा था और जीतने के कोई ख़ास विकल्प नहीं दिख रहे थे। लेकिन किला बंद कर के अन्दर बैठे सिपाहियों पर सीधा हमला करने का कोई उपाय भी नहीं था। ऐसे ही एक दिन एक पहरेदार कहले मुड्डा हनुमा का पहरा का वक्त था जब उसकी पत्नी उसे खाने के लिए बुलाने आई।

जबतक पहरेदार खाना खाता पत्नी पास के ऊँचे टीले सी जगह पर पानी लाने गई। इतने में उसकी नजर एक छेद पर पड़ी जिससे इस्लामिक हमलावर घुसने की कोशिश कर रहे थे। ओबव्वा के पास हथियार नहीं थे। धान पीटने की मोटी लाठी उसने उठा ली। उसे “ओंके” कहते हैं। छेद से एक बार में एक ही सिपाही अन्दर आ पाता था, और अब पहरे पर ओबव्वा तैनात थी। जब तक पत्नी के पानी लेकर ना लौटने पर खिसियाता पति वहां पहुँचता, इस्लामिक हमलावरों की लाशों का ढेर लग गया।

एक एक कर के कई हमलावर ओबव्वा के ओंके का शिकार हो गए थे। घुस रहे हमलावरों को शक ना हो इसलिए वो एक एक लाश उठा कर किनारे करती जाती थी। मदकरी नायक जीते नहीं थे, हार गए थे और 1779 में उनके चित्रदुर्ग किले पर हैदर अली का कब्ज़ा हो गया। वो होलयास (चलावाडी) समुदाय की महिला ओबव्वा तब से ओंके ओबव्वा के नाम से ही याद की जाती है। कन्नड़ सम्मान के इस प्रतीक ने किले के जिस झिरी पर पहरा दिया था उसे आज ओंके ओबव्वा किंडी कहते हैं।

नगराहवू फिल्म में उनके इस प्रयास का एक लम्बा दृश्य है। चित्रदुर्ग का स्पोर्ट स्टेडियम आज ओनके ही नाम पर “वीर वनिथे ओंके ओबव्वा स्टेडियम” कहलाता है।

✍🏻आनन्द कुमार जी की पोस्टों से संग्रहित

 

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