भाजपा “नवीन” टीम में 14 परिवर्तन, किसकी जगह कौन?
कौन आया, कौन गया… भाजपा की ‘नवीन’ टीम से कितने पुराने चेहरे गायब?
भाजपा की नई टीम बन गई है. सोमवार को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने अपनी टीम घोषित कर दी. इस टीम में कई नए चेहरे है.
नितिन नवीन की टीम से कई पुराने चेहरे बाहर कर दिये गये हैं.
नई दिल्ली 18 अगस्त 2026। भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने सोमवार अपनी नई टीम घोषित की. टीम में कई नए चेहरे हैं, जबकि कई बाहर किये गये हैं. सबसे चौंकाऊ नाम अमित मालवीय है, जो 2015 से भाजपा की आईटी सेल संभाल रहे थे. उनकी जगह अब दीपक महस्के लाये गये हैं.
नितिन नवीन की टीम में स्मृति ईरानी को भी जगह मिली. उन्हे राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है. उपाध्यक्ष पद 13 नेताओं को मिला है.
नई टीम में कौन आया, कौन बाहर हुआ?
राष्ट्रीय महासचिव
अरुण सिंह की जगह हरीश द्विवेदी.
राधा मोहन दास अग्रवाल की जगह स्मृति ईरानी.
तरुण चुग की जगह सतीश पूनिया.
दुष्यंत गौतम की जगह गजेंद्र पटेल.
दो खाली पदों पर बिप्लब देव और संजय भाटिया लाये गये हैं.
युवा मोर्चा
तेजस्वी सूर्या की जगह डॉक्टर हेमंत जोशी.
सोशल मीडिया सेल
अमित मालवीय की जगह दीपक महस्के.
कोषाध्यक्ष
राजेश अग्रवाल की जगह पीयूष गोयल.
महिला मोर्चा अध्यक्ष
वनथी श्रीनिवासन की जगह रूप कुमारी चौधरी.
ओबीसी मोर्चा अध्यक्ष
के. लक्ष्मण की जगह अमरपाल मौर्य.
किसान मोर्चा अध्यक्ष
राजकुमार चहर की जगह बंसीलाल गुर्जर.
एससी मोर्चा
लाल सिंह आर्य की जगह शिवेश कुमार राम.
एसटी मोर्चा
समीर ओरांव की जगह मंगलम रावत.
अल्पसंख्यक मोर्चा
जमाल सिद्दिकी की जगह कुंवर बासित अली.
नई टीम को पीएम मोदी ने दी बधाई
भाजपा की नई टीम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बधाई दी. उन्होंने X पर पोस्ट कर लिखा, ‘भाजपा के नवनियुक्त राष्ट्रीय पदाधिकारियों के साथ ही उन सभी साथियों को बहुत-बहुत बधाई, जिन्हें पार्टी में अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं. इस ऊर्जावान टीम के पास जहां संगठन का भरपूर अनुभव है, वहीं जमीनी जुड़ाव भी है.’
वहीं, नितिन नवीन ने अपने सोशल X पर पोस्ट में कहा, ‘भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय टीम के सभी नवनियुक्त पदाधिकारियों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं. अनुभव और ऊर्जा से समृद्ध यह टीम प्रधानमंत्री मोदी के मार्गदर्शन में संगठन को नई गति देगी.
उप्र चुनावी रंगमंच पर कितना असर डालेगी स्मृति ईरानी,क्या सोच भाजपा ने दिया अवसर?
स्मृति ईरानी ने पश्चिम बंगाल और असम विधानसभा चुनावों में जम कर मेहनत कर राष्ट्रीय महासचिव पर शानदार वापसी की है.
भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम में स्मृति ईरानी ने सर्वाधिक ध्यानाकर्षण किया है, वह नितिन नवीन की टीम में अकेली महिला राष्ट्रीय महासचिव हैं.उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव देख उनका चयन काफी महत्वपूर्ण माना जाता है.अमेठी सांसद रहीं स्मृति ईरानी 2024 की हार बाद से ही संगठन और सरकार से दूर थीं.ऐसे में अब उनकी वापसी की चर्चा होनी ही है.स्मृति ईरानी को कोई परिचय नहीं चाहिए. छोटा पर्दा हो या फिर राजनीतिक रंगमंच,उन्होंने अपनी प्रतिभा और कड़े परिश्रम से अपनी अलग विशिष्ट पहचान बनाई.छोटे पर्दे पर उन्होंने क्योंकि सास भी कभी बहू थी में तुलसी विरानी चरित्र में अपने शानदार अभिनय से घर-घर पहचान बनाई तो वहीं राजनीति में राहुल गांधी को उन्हीं के गढ़ में हरा कर ऐतिहासिक उपलब्धि पाई थी.
इसके बाद से उन्हें जायंट किलर कहा गया. हालांकि वे 2024 में अमेठी में लोक सभा चुनाव हार गईं,उसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी.पार्टी की दी गईं जिम्मेदारियों का निर्वहन किया.पश्चिम बंगाल और असम के विधानसभा चुनावों में जम कर मेहनत की.अब राष्ट्रीय महा सचिव पर शानदार वापसी की.ईरानी को यह जिम्मेदारी सीधे उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से जुड़ी है.राज्य में फरवरी-मार्च में विधानसभा चुनाव हैं,जहां भाजपा मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के नेतृत्व में हैट्रिक लगाने को कमर कस रही है.तेजतर्रार स्मृति ईरानी न केवल राहुल के नेतृत्व वाली कांग्रेस से दो-दो हाथ कर सकती हैं बल्कि अखिलेश यादव को भी टक्कर दे सकती हैं.
उत्तर प्रदेश उनके लिए नया नहीं है.यहां पहली बार उन्होंने 2014 में एक कड़े मुकाबले में हिस्सा लिया था.वे पहली बार नेहरु-गांधी परिवार के गढ़ अमेठी से चुनाव लड़ी थीं। वह चुनाव हार गई थीं,लेकिन उन्होंने अमेठी नहीं छोड़ा। वे जमीनी स्तर पर काम करती रहीं. गांव वालों से मिलती रहीं और उनके दुख-दर्द में हिस्सा बन गईं.उन्होंने कांग्रेस की इस पारंपरिक सीट पर भाजपा को जमीनी स्तर पर मजबूत किया.फिर पांच साल बाद लौटीं तो मजबूत संगठन और आत्मविश्वास उनके काम आया और नतीजा जीत में बदला.उन्होंने सीधी टक्कर में राहुल गांधी को उन्हीं की सीट पर हरा दिया.
अमेठी वाला गढ़ जीतीं और फिर हारीं, अब दोबारा दमदार वापसी
स्मृति ईरानी की इस ऐतिहासिक जीत ने दशकों पुराने गांधी परिवार का गढ़ ध्वस्त कर दिया और उन्हें भारतीय राजनीति में जायंट किलर स्थापित कर दिया. हालांकि, 2024 के चुनाव में वें कांग्रेस उम्मीदवार किशोरी लाल शर्मा के हाथों हारी. तभी से उनके राजनीतिक भविष्य पर सवाल उठने लगे थे. इस हार बाद उन्हें सरकार से बाहर होना पड़ा और संगठन में भी कोई दायित्व नहीं मिला.ऐसे समय जब महिला मतदाताओं पर सभी राजनीतिक दलों का फोकस है,स्मृति ईरानी की वापसी से भाजपा महिला मतदाताओं को बड़ा राजनीतिक संदेश दे सकती है.
चुनावी अभियान कुशल और बहु भाषा प्रवीण
वह एक प्रभावी वक्ता हैं और कई भाषाओं में भाषण देती हैं. वह महिलाओं में विशेषकर लोकप्रिय हैं. ऐसे में विधानसभा चुनावों से ठीक पहले उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर आगे लाकर पार्टी महिलाओं को फिर से साधने और अपने पाले में मजबूत करने की पुरजोर कोशिश करेगी. वह प्रखर वक्ता होने के साथ ही आक्रामक अभियानकर्ता भी हैं. चुनावों में प्रचार को उनकी मांग भाजपा की राज्य ईकाइयों की ओर से होती है. वह विपक्षी हमलों का जवाब दे जनसभाओं में नैरेटिव सेट करने में कुशल हैं.
अब तक स्मृति ईरानी की यात्रा
स्मृति ईरानी ने अपने करियर की शुरुआत टीवी उद्योग से की थी. मशहूर धारावाहिक ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ में ‘तुलसी विरानी’ चरित्र से वे देशभर में घर-घर पहचानी गईं. वह 2003 में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुईं. इसके बाद वे 2010 से 2013 तक भाजपा महिला मोर्चा राष्ट्रीय अध्यक्ष और पार्टी की राष्ट्रीय सचिव भी रहीं. वे गुजरात और महाराष्ट्र से राज्यसभा सांसद रहीं. 2014 से 2024 तक वे मोदी सरकार में शिक्षा,कपड़ा, सूचना एवं प्रसारण,महिला एवं बाल विकास और अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री रहीं.
अमित मालवीय आईटी सेल हेड से क्यों हटे, टीम नवीन में क्यों नहीं मिली जगह?
भाजपा ने अपना आईटी सेल हेड बदल दिया है. अमित मालवीय की जगह दीपक महास्के नये हेड बनें हैं.
भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की टीम के गठन में कई चौंकाने वाले फैसलों में सबसे अधिक चर्चित है भाजपा आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय का हटना. तरह-तरह की बातें हैं कि आखिर उन्हें हटाने के पीछे क्या कारण है. इसे जेन जी के आंदोलन और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भाजपा को कांग्रेस तथा अन्य विपक्षी दलों से मिल रही कड़ी टक्कर से भी जोड़ कर देखा जा रहा है.
मालवीय ने ही सुझाए थे कई नाम
हालांकि भाजपा सूत्रों ने इन दावों से इनकार किया है. उनके अनुसार अमित मालवीय पिछले 11 वर्षों से भाजपा सोशल मीडिया प्रभारी रहे . केवल पिछले कुछ महीनों के घटनाक्रम से इसे जोड़ कर देखना एक फौरी विश्लेषण है जो सही नहीं है. वे केवल सोशल मीडिया और आईटी सेल के प्रभारी ही नहीं रहे बल्कि पश्चिम बंगाल के सह प्रभारी भी रहे हैं. सूत्रों के अनुसार अमित मालवीय स्वयं कई बार इच्छा प्रकट कर चुके थे कि उन्हें इस दायित्व से मुक्त किया जाए. 2019 और 2024 के लोक सभा चुनाव परिणाम आने के बाद उन्होंने शीर्ष नेतृत्व से इस बारे में बात की थी. नितिन नवीन के अध्यक्ष बनने के बाद भी वे अपनी भविष्य की भूमिका के बारे में चर्चा कर चुके थे. यहां तक कि उनकी जगह लेने वालों के बारे में भी पार्टी नेतृत्व से उनकी लंबी चर्चा हुई थी. सूत्रों का कहना है कि इनमें से कई नाम स्वयं अमित मालवीय के ही सुझाए गए हैं.
कई राजनीतिक कारण हैं जिनके चलते अमित मालवीय को नितिन नवीन की टीम में किसी अन्य भूमिका में भी जगह नहीं मिल सकी. जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों की भी इसमें भूमिका रही है. वे उत्तर प्रदेश से हैं जहां अगले साल विधानसभा चुनाव होंगें. नवीन की टीम में दो महासचिव स्मृति ईरानी और हरीश द्विवेदी तथा रेखा वर्मा और तारिक मंसूर उपाध्यक्ष हैं. अमरपाल मौर्य पिछड़ा वर्ग मोर्चा अध्यक्ष और कुंवर बासित अली अल्पसंख्यक मोर्चा अध्यक्ष हैं. सह संगठन मंत्री शिवप्रकाश भी उत्तर प्रदेश से हैं. भाजपा ने ब्राह्मण प्रतिनिधित्व को हरीश द्विवेदी को महासचिव बनाया जो युवा मोर्चा में नितिन नवीन के साथ काम कर चुके . ऐसे में अमित मालवीय जो स्वयं ब्राह्मण हैं, महासचिव समायोजित नहीं हो सकते थे. वे इतने वयोवृद्ध भी नहीं कि उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया जाता या फिर सचिव की जिम्मेदारी दी जाती. भविष्य में उनकी क्या भूमिका होगी,अभी यह तय नहीं है. पिछले छह साल पश्चिम बंगाल के सह प्रभारी रूप में उनका प्रदर्शन बेहद सराहनीय माना जाता है. खासतौर से एसआईआर में उन्होंने नीचे स्तर तक जाकर प्रभावी काम किया था.
भाजपा नेताओं के अनुसार अमित मालवीय के आईटी और सोशल मीडिया सेल के प्रमुख रहते पिछले एक दशक में कई उतार-चढ़ाव आए हैं. विरोधी उन पर विपक्षी दलों के नेताओं पर सुनियोजित ढंग से सोशल मीडिया पर हमले करने का आरोप लगाते हैं. वहीं भाजपा नेताओं का कहना है कि आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय का दायित्व था कि वह न केवल पार्टी और सरकार की बातें प्रमुखता से रखें बल्कि विपक्षी हमले कुंद करें. इसे उन्होंने बखूबी निभाया भी. आंकड़े इसके गवाह हैं. गुजरात के मुख्यमंत्री रहते नरेंद्र मोदी ने सबसे पहले सोशल मीडिया पर अपनी मौजूदगी मजबूती से दर्ज करायी थी. 2009 लोकसभा चुनाव में भाजपा के प्रधानमंत्री पद उम्मीदवार लाल कृष्ण आडवाणी ने भी सोशल मीडिया पर चुनाव प्रचार अभियान शुरू किया था. इस दृष्टि से भाजपा को सोशल मीडिया पर फर्स्ट मूवर एडवांटेज रहा था.
2013 के शुरुआती डिजिटल दौर में भाजपा ने बढ़त बना ली थी. तब एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर भाजपा के 2-3 लाख फॉलोअर्स थे. आज यह संख्या 2.3 करोड़ है. वहीं कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर देर से दस्तक दी. 2013 में उसके 50 हजार से एक लाख फॉलोअर्स थे जो आज भाजपा से करीब आधे यानी 1.1 करोड़ हैं. इसी तरह फेसबुक पर 2013 में भाजपा के 15- 20 लाख लाइक्स/फॉलोअर्स थे आज 1.6 करोड़ हो चुके हैं. वहीं कांग्रेस के फेसबुक पर 2013 में लगभग 3-5 लाख लाइक्स/फॉलोअर्स थे जो 67 लाख हैं. यूट्यूब पर भाजपा के आधिकारिक चैनल पर 2013 में 20-30 हजार सब्सक्राइबर ही थे जो आज 63 लाख हो गए जबकि कांग्रेस के 48 लाख हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आज 10 करोड़ से अधिक फॉलोअर्स हैं जबकि राहुल गांधी के 2.7 करोड़ फॉलोअर्स हैं. यहां यह ध्यान रखना जरूरी है कि 2013 में डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ट्रैकिंग बहुत प्रभावी नहीं थी इसलिए अनुमानित आंकड़े दिए गए हैं. भाजपा ने इंस्टाग्राम पर भी अपनी पकड़ मजबूत करनी शुरू की है. पार्टी के नई सोशल मीडिया टीम के सामने अब यह चुनौती रहेगी कि वह जेन जी को अपने पाले में लाए और उनसे संवाद करने के बेहतर तरीके ढूंढे।
केमिस्ट्री की क्लासरूम से बीजेपी के वॉर रूम तक: अमित मालवीय की जगह लेने वाले कौन हैं दीपक ?
अमित मालवीय साल 2015 से भारतीय जनता पार्टी (BJP) के आईटी सेल के प्रमुख (राष्ट्रीय संयोजक) रहे हैं. लेकिन बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने अपने नई टीम में उन्हें पद से मुक्त कर दिया है.
केमिस्ट्री की क्लासरूम से बीजेपी के वॉर रूम तक: अमित मालवीय की जगह लेने वाले कौन हैं दीपक म्हस्के?
भारतीय जनता पार्टी के सोशल मीडिया नेटवर्क और डिजिटल मैसेजिंग मशीन को लेकर एक बहुत बड़ा रणनीतिक बदलाव दिख रहा है. पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से भाजपा के ऑनलाइन मैसेज,नैरेटिव और तीखे राजनीतिक हमलों की कमान संभालने वाले अमित मालवीय की जगह अब दीपक म्हस्के पार्टी के नये राष्ट्रीय सोशल मीडिया संयोजक बने हैं.नितिन नवीन की राष्ट्रीय टीम में छत्तीसगढ़ के इस नेता की एंट्री ऐसे समय में हुई है,जब देश की राजनीति और सोशल मीडिया एक-दूसरे में पूरी तरह से रच-बस चुके हैं.
अमित मालवीय जहां हर दिन सोशल मीडिया पर राजनीतिक वार-पलटवार और तीखी बयानबाजी को जाने जाते थे,वहीं दीपक म्हस्के की पहचान भाजपा में डेटा एनालिसिस,वोटर ट्रेंड्स और पर्दे के पीछे रहकर रणनीति बनाने वाले लीडर की रही है.
भाजपा नेताओं का मानना है कि म्हस्के ने टीवी डिबेट्स या सोशल मीडिया चर्चाओं से दूर रहकर डेटा एनालिटिक्स और कैंपेन मैनेजमेंट की बारीकियों पर काम करके अपनी जगह बनाई है.
प्रोफेसर से लेकर ऑर्गेनिक फार्मिंग तक का सफर
दीपक म्हस्के मूलत: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से हैं और भाजपा के वरिष्ठ नेतृत्व के करीब माने जाते हैं.उनका करियर काफी अनोखा रहा है.उनके पास केमिस्ट्री में मास्टर डिग्री (M.Sc),सीमेंट टेक्नोलॉजी में डिप्लोमा और कंप्यूटर प्रोग्रामिंग का प्रशिक्षण है. फुल टाइम राजनीति से पहले वह कॉलेज स्तर पर केमिस्ट्री पढ़ाते थे.
2009 से संभाल रहे भाजपा का टेक और डेटा नेटवर्क
बीजेपी के आईटी और सोशल मीडिया तंत्र में उनकी भूमिका आज की नहीं है, बल्कि वह साल 2009 से ही इससे जुड़े हुए हैं. इस दौरान उन्होंने छत्तीसगढ़ बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख और प्रवक्ता के रूप में जिम्मेदारी निभाई है. साथ ही उन्होंने कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में चुनावी रणनीति और डेटा आधारित प्रचार को धार देने का काम किया.
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, उन्होंने ऐसे बेनिफिशियरी डेटाबेस और डेटा-आधारित आउटरीच मॉडल तैयार करने में अहम भूमिका निभाई है, जो आज के समय में बीजेपी के आधुनिक चुनाव अभियानों की रीढ़ बन चुके हैं.
प्रशासनिक जिम्मेदारियों का अनुभव
पार्टी संगठन के अलावा दीपक म्हस्के को प्रशासनिक काम-काज का भी अच्छा-खासा अनुभव है. वर्तमान में वह राज्य मंत्री के दर्जे के साथ छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन लिमिटेड के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. इसके अलावा वह इससे पहले इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड के बोर्ड में स्वतंत्र निदेशक के रूप में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं.
आक्रामक हमलों से ज्यादा डेटा और लॉजिक पर जोर
दीपक म्हस्के की इस नई जिम्मेदारी को पार्टी के भीतर सोशल मीडिया रणनीति में बड़े बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है. बीजेपी ने अब आक्रामक तीखे हमलों के बजाय संगठन और डेटा-संचालित सोशल मीडिया मॉडल पर फोकस करने का संकेत दिया है.
सीधे शब्दों में कहें तो पार्टी ने इस पद पर किसी आक्रामक योद्धा के बजाय एक शांत रणनीतिकार को बिठाया है. पद संभालने के तुरंत बाद दीपक म्हस्के ने साफ कर दिया कि उनकी सबसे पहली प्राथमिकताओं में फर्जी खबरों और भ्रामक जानकारी से निपटना शामिल है.
रायपुर में अपनी नियुक्ति के बाद उन्होंने कहा, “भारतीय जनता पार्टी की प्राथमिकताएं पूरी तरह स्पष्ट हैं. हमारा लक्ष्य जनता की सेवा के लिए चुनाव जीतना है और पूरी टीम सोशल मीडिया के माध्यम से इसके लिए पूरे मन से काम करेगी.”
उन्होंने आगे कहा कि ‘दुष्प्रचार’ या प्रोपेगैंडा से भले ही कुछ देर के लिए भ्रम फैलाया जा सके, लेकिन लगातार संवाद और तर्कपूर्ण जवाबों के जरिए ही लोगों के मन से गलतफहमियों को दूर किया जा सकता है.
नितिन नवीन की अगुवाई में बीजेपी के इस संगठनात्मक पुनर्गठन को एक मील का पत्थर माना जा रहा है. यह फैसला संकेत देता है कि आने वाले समय में बीजेपी सोशल मीडिया पर केवल तीखी बयानबाजी या शोर-शराबे के बजाय डेटा, मजबूत संगठन और तार्किक संचार को प्राथमिकता देगी. अब देखना यह होगा कि दीपक म्हस्के पर्दे के पीछे रहकर रणनीति बनाने वाले मास्टरमाइंड बने रहते हैं या फिर अमित मालवीय की तरह राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रखर राजनीतिक वक्ता के रूप में उभरते हैं.

