आचार्य नरेंद्र देव को पछाड़ने को कांग्रेस ने शुरु की थी श्रीराम जन्म भूमि मंदिर राजनीति
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1948 का उपचुनाव, जब कांग्रेस ने रखी थी राम मंदिर आंदोलन की नींव… फिर हमेशा के लिए बदल गई अयोध्या की राजनीति
1948 में अयोध्या में उपचुनाव हुए। इस चुनाव में कांग्रेस को उनके ही पुराने सहयोगी आचार्य नरेंद्र देव से चुनौती मिली। जवाब में कांग्रेस ने बाबा राघव दास को उतारा और राम मंदिर के नाम पर वोट मांगे गए। आखिरकार बाबा राघव दास जीत गए और आचार्य नरेंद्र देव हारे
यूपी की राजनीति से राम मंदिर आंदोलन का मुद्दा लंबे वक्त से जुड़ा हुआ है
1989 में भाजपा ने राम मंदिर को अपने अजेंडे में शामिल कर लिया
इसकी शुरुआत 1948 के उपचुनाव में ही हो गई थी, जानिए कहानी
अयोध्या/लखनऊ
राम मंदिर आंदोलन… उत्तर प्रदेश की राजनीति से यह मुद्दा पिछले तीन दशक से लगातार जुड़ा हुआ है। हालांकि वास्तव में इसका राजनीतिकरण आजादी के एक साल बाद 1948 में ही शुरू हो गया था। तब इतिहास में पहली बार चुनाव में राम मंदिर उपयोग हुआ और कांग्रेस ने अपना बागी हराने को हिंदुत्व के नाम पर वोट मांगे थे। तब से लेकर आज तक राम और मंदिर राजनीति समय-समय पर हलचल मचाती रही है।
1934 में कांग्रेस के अंदर सोशलिस्ट पार्टी ने जन्म ले लिया था। इसमें राम मनोहर लोहिया से लेकर आचार्य नरेंद्र देव तक शामिल थे। इस वर्ग की मुख्य कांग्रेस से अक्सर टकराव रहती थी। 1948 आते-आते यह खींचतान और बढ़ गई और इस वर्ग ने कांग्रेस से खुद को अलग कर लिया। इतना ही नहीं सोशलिस्ट धड़े से 13 विधायकों ने यूपी विधानसभा से इस्तीफा दे दिया था।
इसके बाद उपचुनाव का ऐलान हुआ। उपचुनाव में फैजाबाद हॉट सीट बन गई थी। यहां से समाजवादी विचारक आचार्य नरेंद्र देव मैदान में थे, जो उन इस्तीफा देने वाले सोशलिस्ट विधायकों में शामिल थे। उस समय गोविंद वल्लभ पंत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, पंडित जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री और सरदार वल्लभभाई पटेल गृहमंत्री थे।
आचार्य नरेंद्र देव फैजाबाद के ही थे और वहां उनकी जबर्दस्त पकड़ थी। कांग्रेस को उन्हें हराना चुनौती था। तब हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की राजनीति का जन्म हुआ और आचार्य के मुकाबले कांग्रेस ने महाराष्ट्र के बाबा राघव दास को खड़ा किया। ये वही राघव दास हैं जिनके नाम पर गोरखपुर में मेडिकल कॉलेज है। महाराष्ट्र में जन्मे बाबा राघव दास की कर्मभूमि पूर्वी उत्तर प्रदेश थी। देवरिया के बरहज कस्बे में उनका आश्रम है। वैसे बाबा राघव दास की पहचान किसी धार्मिक संत की नहीं बल्कि गांधीवादी समाजसेवक की थी। उन्हें पूर्वांचल का गांधी और संत विनोबा के भूदान आंदोलन का ‘हनुमान’ कहा जाता है।
बाबा राघव दास ने सौगंध ली कि वह राम जन्मभूमि विधर्मियों से मुक्त कराएंगे। उपचुनाव पूर्व अयोध्या में पोस्टर लगे जिसमें आचार्य नरेंद्र देव को रावण जैसा दिखाया गया और कांग्रेस प्रत्याशी बाबा राघव दास राम की तरह ।
गोविंद वल्लभ पंत और आचार्य नरेंद्र देव
बाबा राघवदास ने जनसभाओं में खुलकर राम जन्मभूमि को संकल्प लिया और कहा कि अगर वह चुनाव जीतते हैं तो विधर्मियों से अयोध्या मुक्त कराएंगे। चुनाव में आचार्य नरेंद्र देव मात्र 1,312 वोटों से हार जबकि राम मंदिर कार्ड खेल बाबा राघव दास जीत गए। आचार्य नरेंद्र देव को चुनाव में 4,080 वोट जबकि राघव दास को 5,392 वोट मिले। यह घटना आज इतिहास में दर्ज है।
आचार्य नरेंद्र देव हार गए तो राघव दास अपना संकल्पपूर्ति में जुट गए। अयोध्या में साधु-संतों से बैठक कर दिसंबर 1949 में बाबा राघव दास और अवैद्यनाथ समेत 5 लोगों ने सरयू स्नान किया और राम मूर्ति लेकर बाबरी मस्जिद का ताला खोलकर वहां भगवान राम की मूर्ति रख दी और भजन- कीर्तन शुरू हो हुए।
अगली सुबह काफी हंगामा भरी रही। अयोध्या में जो कुछ हो रहा था, पूरे देश के लिए सनसनीखेज था। उस वक्त केके नायर फैजाबाद के डीएम थे। अयोध्या के हालातों से परेशान पंडित जवाहर लाल नेहरू ने गोविंद वल्लभ पंत को पत्र लिखा। इस खत में कड़े शब्दों में कहा गया कि ‘इससे ज्यादा गलत कुछ नहीं हो सकता कि वहां पर मूर्ति रख दी गई है। अगर यह सच है तो बहुत गलत चीज है। कांग्रेस तो वहां (यूपी) पर विभाजित है। इस तरह के कदम रोके जाने चाहिए। तत्काल रूप से मूर्तियां हटवानी चाहिए।’
गोविंद पंत ने पत्र के आधार पर डीएम को मूर्ति हटाने के निर्देश दिए लेकिन केके नायर ने मूर्ति हटाने से इनकार कर दिया यह कहकर कि मूर्ति हटाई गई तो हिंसा हो जाएगी, खून खराबा होगा। मामला फंसा तो पंडित जवाहर लाल नेहरू ने सरदार पटेल से कहा कि अयोध्या में बड़ा गलत हो रहा है। इस बार पटेल ने पंत को पत्र लिखा कि प्रधानमंत्री ऐसा चाहते हैं और इस मामले का विकल्प देखा जाए। पंत ने डीएम पर दबाव डाला तो केके नायर ने अपने पद से ही इस्तीफा दे दिया।
यहां से हुई थी राम मंदिर आंदोलन की शुरुआत जिसे 90 के दशक से बीजेपी ने भुनाया और फिर हर चुनाव से पहले यह मुद्दा उभरता गया। लगभग हर दल ने अयोध्या के नाम पर जमकर सियासी रोटियां सेंकी। यानी यह आंदोलन शुरू किसी ने किया, बीच में पकड़ा किसी और दल ने और अब अयोध्या में भव्य मंदिर का निर्माण हुआ तो श्रेय ले गई भाजपा लेकिन फैजाबाद लोकसभा चुनाव हार गई.
बाबरी मस्जिद को लेकर जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल का क्या था नज़रिया

बाबरी मस्जिद को लेकर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बयान को लेकर कांग्रेस नेताओं की ओर से तीख़ी प्रतिक्रिया के बाद ये विवाद और तेज़ हो गया है.
मंगलवार को राजनाथ सिंह ने गुजरात में एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि देश के पहले प्रधानमंत्री ‘जवाहरलाल नेहरू सार्वजनिक धन से बाबरी मस्जिद बनवाना चाहते थे, लेकिन सरदार वल्लभभाई पटेल ने उनकी योजना सफल नहीं होने दी.’
विपक्ष के कई नेताओं ने रक्षा मंत्री के बयान की आलोचना करते हुए कहा कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ऐतिहासिक तथ्यों को विकृत करने और असल मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है.
साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में राम मंदिर के निर्माण की मंज़ूरी दी थी और अभी पिछले 25 नवंबर को ही ध्वजारोहण कार्यक्रम हुआ जिसके साथ ही मंदिर निर्माण के पूरा होने की बात कही गई.
राजनाथ सिंह ने क्या कहा था?
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह मंगलवार को गुजरात में सरदार वल्लभ भाई पटेल के 150वें जन्मदिवस पर एक कार्यक्रम में बोल रहे थे.
उन्होंने कहा, “जब पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरकारी खजाने से पैसा खर्च करके बाबरी मस्जिद बनवाने की चर्चा छेड़ी थी तो उसका भी विरोध सरकार वल्लभ भाई पटेल ने किया था. उस समय उन्होंने सरकारी पैसे से बाबरी मस्जिद नहीं बनने देने की बात कही थी।
राजनाथ सिंह ने कहा, “फिर नेहरू जी ने सोमनाथ के पुनर्निर्माण का मुद्दा उठाया तो सरदार पटेल ने शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा कि सोमनाथ मंदिर का मामला अलग है, वहां 30 लाख रुपये जनता ने दान दिए हैं, ट्रस्ट बनाया है और सरकार का एक भी पैसा नहीं खर्च हुआ है.”
उन्होंने कहा, “इसी तरह अयोध्या में आज जो भव्य राम मंदिर बनकर तैयार हुआ है, उसमें सरकार के खजाने से एक पैसा खर्च नहीं हुआ है.”
“सारा खर्च देश की जनता ने दिया है. यही पंथनिरपेक्षता और सेक्युलरिज़्म की परिभाषा है और सरदार पटेल ने इसे व्यवहार में उतारा.”
कांग्रेस की तीखी प्रतिंक्रिया
राजनाथ सिंह के बयान पर कांग्रेस और विपक्ष के नेताओं की ओर से तीखी प्रतिक्रियाएं आई हैं.
कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि अगर उनके पास सबूत है तो उसे सामने लाएं और सबको बताएं.”
कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने पूछा, “उन्हें ये सूचनाएं कहां से मिलती हैं. वो रक्षा मंत्री हैं, मुख्यमंत्री रह चुके हैं. उन्हें गंभीर राजनेता माना जाता है.”
“इसलिए उन्हें वो सम्मान बनाए रखना चाहिए कि जब भी आप इस तरह के बयान दें, ख़ासकर ऐतिहासिक संदर्भ में, तो आपके पास तथ्यात्मक सबूत ज़रूर होने चाहिए.”
कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा, “मुझे रक्षा मंत्री से ऐसे बयान की उम्मीद नहीं थी…उनसे पास कोई सबूत नहीं हैं लेकिन हमारे पास सबूत है कि 800 साल पुराना झंडेवालान मंदिर आरएसएस की पार्किंग के लिए ढहा दिया गया…राजनाथ सिंह को सलाह है कि वो प्रधानमंत्री के क़दमों पर न चलें.”
भाजपा राज्यसभा सदस्य राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने बुधवार को पार्टी मुख्यालय में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “राजनाथ सिंह ने जो कहा, उसका स्रोत ‘इनसाइड स्टोरी ऑफ सरदार पटेल, डायरी ऑफ मणिबेन पटेल’ नाम की किताब है.”
त्रिवेदी ने कहा कि किताब के 24वें पेज पर है, “नेहरू ने भी बाबरी मस्जिद का सवाल उठाया था, लेकिन सरदार पटेल ने स्पष्ट कर दिया था कि सरकार मस्जिद बनवाने पर कोई पैसा खर्च नहीं कर सकती.”
प्रेसवार्ता में त्रिवेदी ने पुस्तक के कुछ अंश पढ़े-, “उन्होंने (पटेल ने) नेहरू से कहा कि सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का प्रश्न बिल्कुल अलग है, क्योंकि इस उद्देश्य को ट्रस्ट बना है और लगभग 30 लाख रुपये एकत्र किए गए हैं.”
बाबरी मस्जिद का ज़िक्र करते नेहरू के पत्र

इंडियन एक्सप्रेस ने नेहरु आर्काइव्स से नेहरू के उन पत्रों का उल्लेख किया है जो 1949 में बाबरी मस्जिद के बारे में लिखे गए थे.
इसके अनुसार, 22 दिसंबर 1949 को कुछ लोग अयोध्या के बाबरी मस्जिद परिसर में घुसे और केंद्रीय गुंबद के नीचे भगवान राम और सीता की मूर्ति रख दी.
अखबार के मुताबिक इससे खिन्न नेहरू ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत समेत कई नेताओं को पत्र लिखा. ये सभी पत्र द नेहरू आर्काइव्स में मौजूद हैं.
नेहरू का मानना था कि अयोध्या की स्थिति का असर कश्मीर मुद्दे पर और अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान से भारत के व्यवहार पर पड़ेगा. वह उस समय के अयोध्या के ज़िला मजिस्ट्रेट केके नैयर से भी नाराज़ थे, जिन्होंने मूर्तियाँ हटाने से इनकार कर दिया था.
26 दिसंबर 1949 को, मूर्तियाँ रखे जाने के तुरंत बाद, नेहरू ने पंत को एक तार भेजा, “अयोध्या की घटनाओं से मैं परेशान हूँ. आशा है कि आप व्यक्तिगत रूप से इस मामले में दिलचस्पी लेंगे. वहाँ एक ख़तरनाक उदाहरण पेश हो रहा है जो बुरे नतीजे देगा.”
फरवरी 1950 में, उन्होंने पंत को एक और पत्र लिखा, “अगर आप मुझे अयोध्या की स्थिति से अवगत कराते रहें तो मुझे खुशी होगी. जैसा कि आप जानते हैं, मैं इसे बहुत अहमियत देता हूँ और इसके पूरे भारत पर, खासकर कश्मीर पर असर को भी गंभीरता से देखता हूँ.”
उन्होंने यह भी पूछा कि क्या उन्हें खुद अयोध्या जाना चाहिए, जिस पर पंत ने जवाब दिया कि “अगर समय सही होता तो मैं खुद आपको अयोध्या जाने को कहता.”
महीने बाद, गांधीवादी केजी मशरूवाला को पत्र लिख उन्होंने कहा, “आपने अयोध्या मस्जिद का ज़िक्र किया है. यह घटना दो-तीन महीने पहले हुई और मैं इसको लेकर बहुत गंभीरता से परेशान रहा हूँ.”
“उत्तर प्रदेश सरकार ने बहादुरी का दिखावा किया, लेकिन असल में बहुत कम किया… पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने कई मौकों पर इस कृत्य की निंदा की, लेकिन ठोस कार्रवाई से इसलिए रुके रहे क्योंकि उन्हें बड़े दंगे का डर था…मुझे पूरा यक़ीन है कि हमारी तरफ़ से व्यवहार ठीक होता, तो पाकिस्तान से निपटना कहीं आसान होता.”
उन्होंने अपनी लाचारी भी जताई, “मुझे नहीं पता कि देश में बेहतर माहौल कैसे बनाया जाए. सिर्फ़ सद्भाव की बात करना लोगों को चिढ़ाता है. बापू शायद कर सकते थे, लेकिन हम इस तरह की बातों के लिए बहुत छोटे हैं.”
जुलाई 1950 में, उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री को लिखा, “हम फिर किसी तरह की तबाही की तरफ़ बढ़ रहे हैं….जैसा कि आप जानते हैं, अयोध्या में बाबरी मस्जिद मामला हमारे लिए एक बड़ा मुद्दा है और हमारी पूरी नीति और प्रतिष्ठा गहराई से प्रभावित करता है.”
“लेकिन इसके अलावा, लगता है कि अयोध्या की हालत बद से बदतर हो गई है.संभव है कि ऐसी परेशानी मथुरा और अन्य जगहों पर भी फैल जाए.”
इससे पहले, अप्रैल में, उन्होंने पंत को एक लंबा पत्र लिखा, “मैं लंबे समय से महसूस कर रहा हूँ कि उत्तर प्रदेश का वातावरण कम्यूनिस्ट हो रहा है.”
“सच तो यह है कि उत्तर प्रदेश मेरे लिए पराई ज़मीन बनता जा रहा है. मैं वहाँ फिट नहीं होता… उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी, जिससे मैं 35 साल से जुड़ा हूँ, अब जैसे काम करती है वह मुझे हैरान करता है विश्वंभर दयाल त्रिपाठी जैसे कांग्रेस सदस्य लिखने और बोलने का ऐसा दुस्साहस रखते हैं जो हिंदू महासभा के किसी सदस्य के लिए भी आपत्तिजनक होता.”
सरदार पटेल बाबरी मस्जिद पर

नेहरू की तरह, पटेल ने भी मूर्तियां रखे जाने के बाद पंत को पत्र भेजा (संदर्भ: सरदार पटेल्स कॉरस्पॉन्डेंस, वॉल्यूम 9, संपादक दुर्गा दास).
“प्रधानमंत्री ने आपको पहले ही एक तार भेजा है जिसमें उन्होंने अयोध्या की घटनाओं पर चिंता जताई है. मैंने भी लखनऊ में आपसे इस पर बात की थी. मुझे लगता है कि यह विवाद बेहद अनुचित समय पर उठाया गया है…”
उन्होंने लिखा, “व्यापक साम्प्रदायिक मुद्दों को हाल में ही विभिन्न समुदायों की आपसी सहमति से सुलझाया गया है. जहाँ तक मुसलमानों का सवाल है, वे अभी अपने नए परिवेश में स्थिर हो रहे हैं.”
“हम कह सकते हैं कि विभाजन का पहला झटका और उसकी अनिश्चितताएं अब कम हो रही हैं और यह भी कि बड़े पैमाने पर वफ़ादारियों के बदलाव की संभावना कम है.”
उन्होंने आगे कहा, “…मेरा मानना है कि इस मुद्दे को आपसी सहनशीलता और सद्भाव की भावना में शांतिपूर्वक सुलझाया जाना चाहिए. मैं समझता हूँ कि जो कदम उठाया गया है उसके पीछे गहरा भावनात्मक तत्व है.”
“लेकिन ऐसी बातें तभी शांतिपूर्वक हल हो सकती हैं जब हम मुस्लिम समुदाय की स्वेच्छा को अपने साथ लें. ज़बरदस्ती से ऐसे विवाद नहीं सुलझाए जा सकते. उस स्थिति में कानून और व्यवस्था की ताक़तों को हर हाल में शांति बनाए रखनी पड़ेगी.”
“अगर इसलिए शांत और समझाने वाले तरीक़ों को अपनाना है, तो किसी भी आक्रामक या दबाव आधारित एकतरफा कार्रवाई को स्वीकार नहीं किया जा सकता.”
“मैं पूरी तरह यक़ीन रखता हूँ कि इस मुद्दे को इतना जीवंत नहीं बनाया जाना चाहिए और मौजूदा अनुचित विवादों को शांतिपूर्ण तरीक़े से हल किया जाना चाहिए. जो काम हो चुका है उसे आपसी समझदारी की राह में बाधा नहीं बनने देना चाहिए.”
