हार के आगे है अवसर… शिक्षा-क्रांति की राह दिखा दी Gen-Z ने,क्या तैयार है मोदी सरकार?
NEET पेपर लीक विवाद और छात्र आंदोलन व्यवस्था की नींव हिला गया. शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के पदत्याग और नंदन नीलेकणी टास्क फोर्स के गठन बाद सवाल यह है- क्या मोदी सरकार इसे मात्र डैमेज कंट्रोल तक सीमित रखेगी या दशकों पुरानी कमियां दूर कर नई ‘शिक्षा क्रांति’ शुरु करेगी? यह समय विवादों से परे बड़े बदलावों का है.
मोदी सरकार क्या सिर्फ NEET विवाद तक सीमित रह जायेगी,या एजुकेशन सिस्टम में आमूल-चूल परिवर्तन की तैयारी है?
धीरेंद्र राय
नई दिल्ली,01 अगस्त 2026,NEET पेपर लीक विवाद बाद आंदोलन के भारी दबाव में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का पदत्याग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नंदन नीलेकणी के नेतृत्व में एक हाई-पावर्ड टास्क फोर्स का गठन, सीधा संकेत है कि सरकार को अपनी भूल पता चली है.
लेकिन, जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी खुद कहते हैं – ‘हर आपदा एक अवसर लेकर आती है.’ उनकी सरकार को यह मात्र डैमेज कंट्रोल का टाइम नहीं है. न ही वो छात्रों से मिली हार के धक्के में ज्यादा देर रह सकती. Gen-Z ने उन्हें थाली में परोसकर ऐतिहासिक अवसर दिया है दशकों से जंग खाती शिक्षा व्यवस्था में ‘शिक्षा क्रांति’ लाने का.
जंतर-मंतर पर जो दिखा, वह सिर्फ परीक्षा में धांधली का गुस्सा नहीं था. यह उस Gen-Z का आक्रोश था, जो सालों से लचर, विवादित और दिशाहीन शिक्षा प्रणाली का बोझ ढो रही है. अब यदि सरकार कोई बड़ा रिफॉर्म लाती है, तो विपक्ष भी उस पर ज्यादा राजनीति नहीं कर पाएगा. क्योंकि हर कदम पर युवाओं की नजर होगी.
जब सरकार को इतना सुनहरा अवसर मिला है तो क्या सिर्फ परीक्षा प्रणाली सुरक्षित कर देना काफी है? क्या कड़े एंटी-पेपर लीक कानून से समस्या समाधान हो जाएगा? नहीं. यह समय शिक्षा मंत्रालय को अपनी ‘परंपरागत कार्यशैली’ से मुक्ति पाने का है, जिसके चलते वह अपने मूल काम एजुकेशन को छोड़कर हमेशा विवादों में घिरा रहा है.
-शिक्षा मंत्रालय कभी NCERT के मुगल चैप्टर से हिंदू-मुस्लिम बहस में फंसा, तो कभी ज्यूडिशरी के करप्शन चैप्टर से.
-कभी यूनिवर्सिटी वाइस-चांसलर (VC) की विवादित नियुक्तियों पर, तो कभी एकेडमिक इंडिपेंडेंस को लेकर.
-मंत्रालय कभी UGC में जातिगत भेदभाव की बेतुकी परिभाषा बनाकर हेडलाइन बनाता है, तो कभी थ्री-लैंग्वेज फॉर्मूला की अनावश्यक राजनीति करके.
-स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम अपनी उपयोगिता से ज्यादा स्कैम को कुख्यात हो जाते हैं.
-NTA जैसी परीक्षा एजेंसी से लेकर बड़े पैमाने पर टीचिंग स्टाफ की व्यवस्था को एड-हॉक या आऊटसोर्सिंग के भरोसे छोड़ दिया जाता है.
-और बची-खुची कसर NEET-UG और ऐसे एग्जाम के पेपर लीक होने से पूरी हो जाती है.
बीमारी बहुत गहरी है, सिर्फ क्रांति ही इलाज है
नीलेकणी कमेटी केवल ‘लॉक मजबूत’ कर सकती है, लेकिन देश जिस ‘घर’ की सेफ्टी और स्ट्रेंथ देश चाहता है, उसकी दीवारें दरक चुकी. शिक्षा व्यवस्था की कमियों पर ताजा स्टडीज और डेटा भयावह तस्वीर दिखाते हैं:
1. शिक्षकों की भारी कमी और 1.1 लाख ‘सिंगल टीचर स्कूल’:
UNESCO की ‘स्टेट ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट फॉर इंडिया’ के आंकड़ों के अनुसार देश में 10 लाख से अधिक शिक्षक कम हैं. देश के लगभग 1.1 लाख एकल शिक्षक स्कूल हैं (जिनमें 89% ग्रामीण इलाकों में). स्कूल में टीचर ही नहीं हैं, तो स्मार्ट क्लास की बातें व्यर्थ हैं. अच्छी शिक्षा की तो बात ही छोड़ दीजिये.
क्रांति तब होगी जब शिक्षक-स्टूडेंट अनुपात सुधरेगा. नॉर्वे के प्राइमरी स्कूलों में नौ छात्रों पर एक शिक्षक है.
2. शिक्षकों पर गैर-शैक्षणिक कामों का बोझ:
चुनाव ड्यूटी से लेकर जनगणना और मिड-डे मील के राशन का हिसाब रखने तक- शिक्षक सब कुछ करता है, सिवाय पढ़ाने के. यह न सिर्फ उनकी क्षमता खत्म कर रहा है. बल्कि एक ऐसा सिस्टम खड़ा कर रहा है जिसमें उनसे खराब रिजल्ट की जवाबदेही का मौका ही नहीं.
क्रांति तब होगी जब शिक्षक और स्टूडेंट संबंध स्मार्ट होगा. फिनलैंड और न्यूजीलैंड जैसे देशों में टीचर्स परफॉर्मेंस इसलिए नहीं बेस्ट है, क्योंकि वे क्लासरूम में ज्यादा वक्त बिताते हैं. वहां टीचर्स को परफॉर्म करने की आजादी है, उनका स्टूडेंट से नाता इतना करीबी है कि स्मार्ट इंस्ट्रक्शन से वहां पढ़ाई में कायापलट हो रही है.
3. ग्लोबल स्टैंडर्ड में पिछड़ापन और आउटडेटेड सिलेबस:
सरकार को ‘राइट टू एजुकेशन (RTE)’ कठोरता से लागू करना होगा और सरकारी स्कूलों को केंद्रीय विद्यालयों (KVs) की तरह अपग्रेड करना होगा. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और क्वांटम कंप्यूटिंग के समय हमारा सिलेबस आज भी रट्टू विद्या आधारित है. अच्छे शिक्षकों को न तो सही प्रोत्साहन मिल रहा है और न ही उनकी ट्रेनिंग ग्लोबल स्टैंडर्ड की है.
क्रांति तब होगी जब स्कूली सिलेबस भविष्य की तैयारियों वाला होगा. फ़िनलैंड का सिलेबस रटने के बजाय प्रैक्टिकल लर्निंग, क्रिएटिविटी और छात्रों की मेंटल हेल्थ केंद्रित है. वहीं सिंगापुर का सिलेबस मैथ्स, साइंस और प्रॉब्लम सॉल्विंग स्किल में अद्भुत है. यहाँ स्कूल से ही कोडिंग, रोबोटिक्स और ‘स्किल्सफ्यूचर’ प्रोग्राम से फ्यूचर टेक्नोलॉजी की ट्रेनिंग मिलती है.
4. सरकारी स्कूलों की ‘खानापूर्ति’ और ट्यूशन माफिया का दबदबा:
NGO ‘प्रथम’ की ASER 2024 रिपोर्ट के अनुसार, कोविड के बाद हालांकि सरकारी स्कूलों में नामांकन बढ़ा है और कक्षा 3 के बच्चों के बेसिक रीडिंग लेवल में कुछ सुधार (23.4%) हुआ है, लेकिन आज भी कक्षा 8 का एक बड़ा वर्ग कक्षा 2 की किताबें पढ़ने या सामान्य मैथ के सवाल हल करने में संघर्ष करता है. स्कूलों में पढ़ाई न होने से गरीब से गरीब माता-पिता भी पेट काटकर बच्चों को ट्यूशन भेजने को मजबूर हैं. ट्यूशन अब विकल्प नहीं, मजबूरी बना है. क्योंकि एक अच्छे प्राइवेट स्कूल की फीस एक मिडिल क्लास फैमिली की मासिक आय से ज्यादा है.
क्रांति तब होगी जब सबको अफोर्डेबल के साथ ग्लोबल स्टैंडर्ड एजुकेशन मिलेगी. इसे दो उदाहरणों से समझें. फ़िनलैंड की स्कूली शिक्षा तो पूरी तरह मुफ़्त और विश्वस्तरीय है. जहां होमवर्क बहुत कम होता है और ट्यूशन कल्चर है ही नहीं. लेकिन, चीन ने 2021 में अपनी ‘डबल रिडक्शन नीति’ लागू करके क्रांति ला दी. प्राइवेट ट्यूशन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया. इसका उद्देश्य एजुकेशन पर होने वाले भारी खर्च घटाना और पब्लिक स्कूलों को ही सर्वसुलभ बनाना था.
5. मेडिकल सीटों का ऊंट के मुंह में जीरा होना:
मेडिकल एजुकेशन का सीधा रिश्ता स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ा है. भारत में 800 लोगों में एक डॉक्टर सेवारत है. देश उस अनुपात में डॉक्टर बना ही नहीं रहा है, जिसकी जरूरत है. NMC के 2026 के आंकड़ों के अनुसार, देश में कुल 823 मेडिकल कॉलेजों में मात्र 1,36,939 MBBS सीटें हैं (63,296 सरकारी और 73,643 प्राइवेट). जबकि NEET छात्रों की संख्या 22 लाख पार कर चुकी. डिमांड और सप्लाय का यह भारी अंतर ही पेपर लीक और डोनेशन माफिया को जन्म देता है.
क्रांति तब होगी जब अच्छी मेडिकल एजुकेशन के साथ मेडिकल कॉलेजों में सीटों की संख्या बढ़ेंगी. अमेरिका और ब्रिटेन में दुनिया की सबसे मॉडर्न मेडिकल एजुकेशन और क्लीनिकल ट्रेनिंग मिलती है, लेकिन यहां सीटें बहुत सीमित और प्रवेश प्रक्रिया कठिन है. वहीं दूसरी ओर, रूस, जॉर्जिया और कजाकिस्तान में विश्वस्तरीय मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ एडमिशन की इच्छा रखने वाले छात्रों को कॉलेजों में पर्याप्त सीटें हैं. आसान प्रवेश परीक्षा और उचित फीस से यहां छात्र-सीट अनुपात सबसे बेहतर है.
6. स्किल डेवलपमेंट के नाम पर सिर्फ ‘स्कैम’:
युवाओं को भविष्य के जॉब लायक बनाने को ‘प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY)’ लाई गई थी. लेकिन 2025-26 की CAG रिपोर्ट और संसदीय समिति (PAC) की जांच में पता चला कि ट्रेनिंग पार्टनर फर्जी हैं, प्लेसमेंट रेट मात्र 8.45% तक गिर गया, और जिन सेक्टर्स में जॉब ही नहीं है, उसकी ट्रेनिंग दी जा रही है. सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम ईमानदारी से चलें, न कि NGOs को कमाई का जरिया बनें.
क्रांति तब होगी जब नीति निर्माता भविष्य के जॉब मार्केट की कल्पना करके स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम स्कूलों और कॉलेजों में उपलब्ध करवाएंगे. जैसे, स्विट्जरलैंड और जर्मनी में होता है. वहां का ‘ड्यूअल एजुकेशन सिस्टम’ पढ़ाई के साथ-साथ सीधे इंडस्ट्री में प्रैक्टिकल ट्रेनिंग देता है. छात्र स्कूलों और कॉलेजों के साथ बड़ी कंपनियों में AI, ऑटोमेशन और कोडिंग जैसे मॉडर्न स्किल पर काम करते हैं.
विशेषज्ञों की राय: नीति बनाम नीयत का फर्क
विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि भारत की नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) कागजों पर दुनिया की सबसे बेहतरीन नीतियों में से एक है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में भारी कमियां हैं. शिक्षाविदों के अनुसार शिक्षा बजट GDP के 6% तक ले जाने का वादा आज भी अधूरा है.
ASER सेंटर निदेशक विलिमा वाधवा बता रही थीं कि फाउंडेशनल लर्निंग (FLN) में सुधार दिख रहा है, लेकिन अभी भी एक लंबा रास्ता तय करना है. ऐसे बच्चे जो बड़ी कक्षाओं में चले गए हैं, लेकिन उनकी नींव कमजोर रह गई है, उनके लिए अलग से रणनीति बनाने की जरूरत है.
पब्लिक अकाउंट्स कमिटी (PAC) का अनावरण तो और भी चिंताजनक हालात बताता है- ‘बेरोजगारी देश का सबसे बड़ा खतरा है और युवाओं को ऐसी स्किल दी जा रही है जिसकी बाजार में कोई मांग ही नहीं है.’
यह आपदा नहीं, क्रांति को मिला अवसर है
मोदी सरकार को ऐसा अवसर मिला है, जो दशकों तक किसी सरकार को नहीं मिला. Gen-Z ने सरकार को यह अहसास करा दिया है कि उन्हें हिंदू-मुस्लिम या पाठ्यक्रम में इतिहास बदलने वाले विवादों से कोई फर्क नहीं पड़ता. उन्हें एक सुरक्षित भविष्य, पारदर्शी परीक्षाएं, अच्छी गुणवत्ता वाले स्कूल और नौकरियां चाहिए.
अब नए शिक्षा मंत्री और नीलेकणी टास्क फोर्स को सिर्फ लीकेज रोकने तक सीमित नहीं रहना चाहिए. शिक्षा मंत्रालय को विवादों की पाठशाला बनने से रोकें. अगर आज सरकारी स्कूलों में लाखों खाली पड़े शिक्षकों के पद भर दिए जाएं, टीचर्स को गैर-शैक्षणिक कामों से मुक्त कर दिया जाए, मेडिकल और हायर एजुकेशन में सीटों का दायरा बढ़ा दिया जाए, और स्किल डेवलपमेंट को इंडस्ट्री से जोड़ दिया जाए, तो यह सही मायनों में भारत की ‘शिक्षा क्रांति’ होगी.
सरकार हारकर भी जीत सकती है, बशर्ते वह अपने Gen-Z से मिले सबक को एक विजन में बदल दे.
Sat, 1 Aug 2026
जरूरत है शिक्षा में क्रांति की
– अनिरुद्ध जोशी ‘शतायु’
भारत में शिक्षा के चार स्तर थे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, लेकिन योरप-अरब में शिक्षा सिर्फ पंथक रही। प्राचीन भारत की शिक्षा मोक्ष मार्गीय थी, लेकिन आज की शिक्षा भोग मार्गीय है। भोग मार्ग बनने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन किस शर्त पर?

शिक्षा में ज्ञान, अहिंसा, उचित आचरण की शिक्षा दी जाती रही है। माना जाता था कि शिक्षा से ‘आदर्श समाज’ का निर्माण होगा। पिछले 25-30 वर्षों में ज्ञान का विस्फोट हुआ है और हर वर्ग में शिक्षा का स्तर बढ़ा है। लेकिन, क्या हम ‘आदर्श समाज’ का निर्माण कर पाए हैं?
पिछले 100 वर्षों की अपेक्षा आज दुनिया में सबसे ज्यादा शिक्षित और ज्ञानी लोग हैं, लेकिन फिर भी दुनिया में अपराध, आतंक, भ्रष्टाचार और तमाम तरह की बुराइयों का ग्राफ बढ़ा ही हैं। आखिर क्या वजह है इसकी? क्या जानकारी हासिल करना शिक्षित होना है?
आज से दो हजार वर्ष पूर्व बौद्ध काल में भी हिंसा का बोलबाला था और आज भी। महावीर किसे शिक्षा देते थे कि चोरी मत करो? आज भी चोरी कायम है। पिछले हजार वर्ष में सब कुछ बदला, लेकिन आदमी की प्रवृत्ति नहीं बदली, आचरण नहीं बदला बल्कि पहले की अपेक्षा वह और अधिक बदतर होता चला गया। क्यों?
दुनिया के सबसे बड़े आतंकवादियों और अपराधियों की शिक्षा और ज्ञान का स्तर सामान्य शिक्षितों से कहीं ज्यादा रहा है और उन्हें दुनियाभर का ज्ञान था। इससे सिद्ध होता है कि शिक्षा मौलिक रूप से ही कहीं न कहीं गलत है?
प्राचीन लोग धार्मिक शिक्षा को ही शिक्षा मानते थे। आज धार्मिक शिक्षा लोगों का संस्कार बन गई है। मदरसों, कॉन्वेंट्स या अन्य पंथक स्कूलों में बच्चे संस्कारित किये जाते हैं ताकि कि वे देश के अच्छे नागरिक बनें, खूब तरक्की कर माता-पिता का नाम प्रकाशित करें। लेकिन वहां से निकले बच्चे कैसे संस्कारित निकलते हैं यह सब जानते हैं।


दुनिया में धार्मिक, राजनीतिक और आर्थिक क्रांतियां हुई ।अब तकनीकी क्रांतियां चल रही है। लेकिन इन पांच-छह हजार वर्षों में मानव कल्याण और दुनिया को स्वर्ग बनाने को अब तक जो भी प्रयोग हुए हैं सभी असफल सिद्ध हो गए। धरती का पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन समाप्त होने को है। हम सबने सात अरब के पार होकर दुनिया के अन्य पशु और पक्षियों की हजारों जाति-प्रजातियां लुप्त कर दी हैं। धरती की हरियाली के साथ ही उसकी शांति भी छीन ली है और भविष्य में धरती को किसी ब्लैक होल जैसा छोड़ दिया है।
सोचे आखिर किस काम आई हमारी धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक और वैज्ञानिक क्रांतियां? आज पहले से कहीं अधिक गरीबी, कुपोषण, भ्रूण हत्या, बलात्कार, चोरी, हिंसा, दीनता, दरिद्रता और पशुता है। हम पहले से कहीं अधिक विज्ञान और तकनीकी शिक्षा से सम्पन्न होने के बावजूद दीन और हीन क्यों हैं?
आज शिक्षकों से कहीं ज्यादा जानता है विद्यार्थी। शिक्षा के नाम पर शोषण जारी है। मोटी फीस, डोनेशन और तमाम तरह के ग्लैमर से सजी शिक्षा हमें सम्पन्न और आधुनिक तो बना सकती है, लेकिन हमसे हमारा सुख-चैन छीनकर।
प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च, औपचारिक, प्रौढ़, वैकल्पिक शिक्षा आदि सभी तरह की शिक्षा प्रणालियों में सुधार की आवश्यकता बताई जाती रही है, लेकिन कितना भी सुधार करने के बावजूद आदमी नहीं बदला जा सकता। जरूरत है आदमी बदलने की। प्राचीन और मध्ययुगिन मानसिकता बदलने की।
पिछले 25 साल से शिक्षण संस्थान धड़ाधड़ खोले जा रहे हैं। भड़कीले रंगों की पुताई कर बिल्डिंगें बन रही है। दिखावटी चीजों के बलबूते शिक्षण संस्थान खड़े किए जाते रहे, लेकिन गुणवत्ता के नाम पर क्या? नैतिकता के नाम पर क्या? ये संस्थान व्यक्ति को इंजीनियर, डॉक्टर, वकील, पत्रकार, राजनीतिज्ञ आदि सब कुछ बना सकते हैं, लेकिन एक अच्छा, समझदार और संवेदनशील मानव नहीं।
निश्चित ही शिक्षा में क्रांति आवश्यक है। कैसी हो शिक्षा? इस पर देशभर में बहस आयोजित होता ही रही है, बड़े-बड़े ग्रंथ भी लिखे गए, लेकिन बाजारवाद से शैक्षणिक स्तर शायद ही कभी सुधरे। अब शायद ही सिखाया जाए कि अपना आचरण कैसे सुधारे, अहिंसक कैसे बनें, प्रकृति के निकट कैसे रहें और सबसे बड़ी बात , मनुष्य कैसे बनें।

भारत की शिक्षा क्रांति:1947 से अब तक महत्वपूर्ण बदलाव
*दारिका गुप्ता (करियर परामर्श में अग्रणी लेखिका)
190 वर्षों की औपनिवेशिक शिक्षा के बाद, 1947 में स्वतंत्रता के बाद भारत ने अपनी स्वयं की शिक्षा प्रणाली को अपनाया। प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने निरक्षरता को खत्म करने और सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए पहली पंचवर्षीय योजना बनाई। 2023 की जनगणना के अनुसार भारत की साक्षरता दर 77.7 प्रतिशत है, लेकिन 1947 में यह सिर्फ 16 प्रतिशत थी।
कई सरकारों ने शैक्षिक सुधारों पर महत्वपूर्ण जोर दिया है, यहां एक समयरेखा दी गई है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत की शिक्षा प्रणाली में कैसे सुधार किया गया है।
NEP 1968: कोठारी आयोग की सिफारिश के अनुसार, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 1968) में मातृभाषा में शिक्षा पर जोर दिया गया। स्थानीय भाषाओं में शिक्षा के अलावा, NEP ने छात्रों को नौकरी बाजारों के लिए तैयार करने के लिए पेशेवर क्षमता के साथ-साथ माध्यमिक और विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा में व्यापक बदलाव की सिफारिश की। NEP ने 10+2+3 प्रणाली के समान स्कूली शिक्षा पैटर्न का भी प्रस्ताव रखा।
NEP 1986: NEP 1968 के एक दशक बाद, NEP 1986 ने सीखने की प्रक्रिया में प्रारंभिक बचपन और बाल-केंद्रित दृष्टिकोण का विचार प्रस्तावित किया। पूर्व प्रधान मंत्री राजीव गांधी द्वारा शुरू की गई NEP ने महिला सशक्तिकरण और वयस्क साक्षरता की आवश्यकता पर जोर दिया।
NEP 2020: PM नरेंद्र मोदी सरकार के तहत राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) का लक्ष्य मैट्रिक स्तर तक सभी के लिए शिक्षा को सुलभ बनाना है। NEP ने कक्षा 5 तक शिक्षा के माध्यम के रूप में स्थानीय भाषा का प्रस्ताव रखा और 5+3+3+4 स्कूल पाठ्यक्रम की सिफारिश की।
सर्व शिक्षा अभियान: स्कूली शिक्षा के सभी स्तरों पर समान गुणवत्ता वाली शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए समग्र शिक्षा नामक योजना शुरू की गई। इस योजना के तीन भाग हैं- सर्व शिक्षा अभियान (एसएसए), राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान (आरएमएसए) और शिक्षक शिक्षा (टीई) और इसका लक्ष्य प्री-स्कूल से वरिष्ठ माध्यमिक स्तर तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना है।
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ: पूरे देश में महिला शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना शुरू की गई थी। इस योजना में महिला शिक्षा पर विशेष ध्यान देते हुए मुख्य रूप से हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश राज्यों पर ध्यान केंद्रित किया गया।
PM श्री स्कूल: PM श्री स्कूल भारत सरकार से केवीएस और एनवीएस सहित केंद्र/राज्य सरकार/निकायों से प्रबंधित 1.45 लाख से अधिक स्कूलों को विकसित करने की पहल है। यह योजना पाँच वर्षों-2022-23 से 2026-27 की अवधि में लागू की गई है और 20 लाख से अधिक छात्रों के प्रत्यक्ष लाभार्थी होने की उम्मीद है।
मध्याह्न भोजन योजना: मध्याह्न भोजन योजना जिसे 2021 में PM पोषण योजना का नाम दिया गया, इसमें बालवाटिकस (3-5 वर्ष की आयु) के छात्रों को शामिल किया गया है। पूरे देश में बुनियादी शिक्षा को बढ़ावा देने और स्कूलों में ड्रॉपआउट अनुपात को कम करने के लिए 1995 में मध्याह्न भोजन योजना शुरू की गई।
प्रज्ञाता: प्रज्ञाता ऑनलाइन शिक्षा को दिशानिर्देशों का एक समूह है जिसका उद्देश्य देश की डिजिटल शिक्षा प्रणाली सुधारना है। प्रज्ञाता दिशानिर्देश छात्रों को स्क्रीन समय सीमा की सलाह देते हैं। प्री-प्राइमरी छात्रों को 30 मिनट से अधिक की ऑनलाइन कक्षाएं नहीं हों, जबकि कक्षा 1-8 में दो सत्र और कक्षा 9-12 में चार सत्र होने चाहिए।


