कोर्ट में नही टिके CBI के 16 मुकदमे,तो क्या सच था सुरेंद्र कोली का?
निठारी में मिलीं लड़कियों की लाशें, गिरफ्तारी, सजा, बरी और अब आत्महत्या… सुरेंद्र कोली की पूरी कहानी!
क्या था निठारी कांड? कौन था सुरेंद्र कोली? कैसे सामने आया था यह मामला? साल 2005 से 2025 तक की तारीखवार जानें इस मामले की सिलसिलेवार कहानी और सुप्रीम कोर्ट के आखिरी फैसले की पूरी जानकारी.
हरिद्वार/नोएडा/नई दिल्ली,18 सितंबर 2026, हरिद्वार में सुरेंद्र कोली ने आत्महत्या कर ली. ये वही सुरेंद्र कोली था, जो साल 2006 में निठारी कांड के मुख्य आरोपित समझा गया था. मामले ने पूरा देश हिलाकर रख दिया था. सुरेंद्र कोली को हत्या, बलात्कार और शवों के टुकड़े करने का मुख्य आरोपित बनाया गया था और उसे कई मामलों में मौत की सजा हुई थी. लेकिन बाद में वह सभी निठारीकांड से जुड़े सभी मामलों में छूट गया था.
अक्टूबर 2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 12 मामलों में उसकी सजा पलट दी थी और 30 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने बरी करने के फैसले यथावत रखे थे. फिर 11 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने रिम्पा हलदर वाले आखिरी लंबित मामले में भी उसकी सजा निरस्त कर छोड दिया था.
निठारी कांड: आखिर क्या हुआ था?
निठारी गांव नोएडा के सेक्टर-31 से सटा इलाका है. वहां कारोबारी मोनिंदर सिंह पंढेर का मकान D-5, सेक्टर-31 था. सुरेंद्र कोली उसी मकान में घरेलू सहायक के रूप में काम करता था. साल 2005 से निठारी इलाके में बच्चों और महिलाओं के गायब होने की शिकायतें सामने आने लगी थीं. बाद में इन्हीं गुमशुदगियों का संबंध D-5 के आसपास मिले मानव अवशेषों से जोड़ा गया. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि निठारी कांड में 19 FIR दर्ज हुई थीं, लेकिन CBI ने 16 मामलों में चार्जशीट दाखिल की और इन्हीं में मुकदमे चले.
कौन था सुरेंद्र कोली?
सुरेंद्र कोली उत्तराखंड के अल्मोड़ा क्षेत्र से आया था और नोएडा में घरेलू काम करता था.
अदालत के रिकॉर्ड में उसकी पहचान मोनिंदर सिंह पंढेर के D-5 मकान के घरेलू सहायक के रूप में हुई है. पंढेर इस मकान का मालिक था. कोली पर आरोप था कि वह बच्चों और युवतियों को बहाने से D-5 के भीतर लाता, उनके साथ यौन हिंसा करता और हत्या के बाद शव के टुकड़े कर उन्हें आसपास के इलाके तथा नाले में फेंक देता था. यह अभियोजन की कहानी थी और इसी आधार पर उसके खिलाफ हत्या, अपहरण, बलात्कार और सबूत मिटाने जैसे आरोपों में मुकदमे चले.

लेकिन बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस पूरी अभियोजन कहानी के मुख्य सबूतों पर गंभीर सवाल उठाए. हाईकोर्ट ने कहा कि कथित इकबालिया बयान की स्वेच्छा और विश्वसनीयता स्थापित नहीं हुई तथा जिस जगह से हड्डियां और खोपड़ियां मिलीं, वह D-5 के भीतर का निजी स्थान नहीं बल्कि सार्वजनिक/खुला क्षेत्र था, जहां खुदाई आरोपित के पहुंचने से पहले शुरू हो चुकी थी.
2025 में सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि इन मामलों में जिस साक्ष्य-आधार पर दोषसिद्धियां हुई थीं, उसमें ऐसी कानूनी कमियां थीं कि उस आधार पर अंतिम दोषसिद्धि कायम नहीं रह सकती. चलिए आपको एक फिर से बताते हैं, निठारी कांड की पूरी सिलसिलेवार कहानी.
साल 2004-05: D-5 मकान और गुमशुदगियों की शुरुआत
अदालती रिकॉर्ड के अनुसार पंढेर ने फरवरी 2004 में D-5 बंगला खरीदा था और जुलाई 2004 में सुरेंद्र कोली वहां घरेलू सहायक के तौर पर काम करने लगा. सुप्रीम कोर्ट के 2025 के फैसले में दर्ज है कि 2005 की शुरुआत से निठारी के लोगों ने महिलाओं और बच्चों के गायब होने की शिकायतें करना शुरू कर दिया था. मार्च 2005 में आसपास खेल रहे बच्चों ने D-5 और D-6 के बीच के खुले हिस्से में एक मानव हाथ देखा था. यह तथ्य बाद की जांच में बेहद महत्वपूर्ण बना, क्योंकि 29 दिसंबर 2006 को बड़ी संख्या में मानव अवशेष मिलने के बाद पुलिस के सामने यह सवाल आया कि क्या स्थानीय स्तर पर पहले से मौजूद संकेतों की अनदेखी हुई थी.
7 मई 2006: एक लड़की गायब हुई
इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2023 के विस्तृत फैसले के अनुसार, 7 मई 2006 को एक लड़की गायब हुई. उसके पिता नंदलाल ने पुलिस में शिकायत की. लेकिन तत्काल FIR दर्ज नहीं हुई. इसके बाद 24 अगस्त 2006 को नंदलाल ने CrPC की धारा 156(3) के तहत अदालत का रुख किया. और मोनिंदर सिंह पंढेर और सुरेंद्र कोली के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की. 27 सितंबर 2006 को CJM, गौतमबुद्ध नगर ने FIR दर्ज करने का आदेश दिया और आखिरकार 7 अक्टूबर 2006 को सेक्टर-20 थाना, नोएडा में केस क्राइम नंबर 838/2006 के तहत FIR दर्ज हुई. इसमें IPC की धारा 363 और 366 लगाई गई थी. यानी निठारी की जांच का एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि एक प्रमुख गुमशुदगी के मामले में शिकायत से FIR तक लगभग पांच महीने का अंतर रहा.
दिसंबर 2006: निठारी का राज खुला
3 दिसंबर 2006 को नाले की सफाई के दौरान D-1 से D-6 मकानों के सामने एक मानव हाथ दिखाई देने की बात अदालत के रिकॉर्ड में दर्ज है. लेकिन असली मोड़ 29 दिसंबर 2006 को आया. पुलिस सुरेंद्र कोली को गुमशुदगी के मामले में हिरासत में लेकर D-5 पहुंची. उसी दिन मोनिंदर पंढेर को भी मकान के बाहर से हिरासत में लिया गया. उस समय वहां बड़ी भीड़ जमा थी और D-5, D-6 तथा जल बोर्ड की जमीन के बीच के खुले हिस्से में खुदाई चल रही थी. वहां से खोपड़ियां, हड्डियां, जूते और कपड़े मिलने लगे. यहीं से निठारी कांड ने पूरे देश का ध्यान खींच लिया.
30-31 दिसंबर 2006: एक के बाद एक मानव अवशेष
30 दिसंबर 2006 को अलग-अलग लापता लोगों के संबंध में कई FIR दर्ज की गईं. 31 दिसंबर 2006 को D-1 से D-6 के सामने बने कवर किए गए स्टॉर्म-वॉटर ड्रेन से भी मानव अवशेष और अन्य सामान बरामद किए गए. इसके बाद निठारी में लापता बच्चों और महिलाओं के परिवार बड़ी संख्या में पहुंचे. कई परिवारों ने अपने लापता बच्चों के फोटो और कपड़ों के जरिए पहचान कराने की कोशिश की. इसी दौरान D-5 को मीडिया में ‘हाउस ऑफ हॉरर’ कहा जाने लगा
क्या थी पुलिस की कहानी?
पुलिस और बाद में CBI की अभियोजन कहानी के अनुसार सुरेंद्र कोली पीड़ितों को D-5 में लाता था. आरोप था कि वहां उनके साथ यौन हिंसा की जाती और हत्या के बाद शवों को काटकर उनके हिस्से पीछे के खुले हिस्से और नाले में फेंक दिए जाते. अभियोजन ने यह भी कहा कि कोली ने पुलिस को उन जगहों तक पहुंचाया, जहां से हड्डियां और अन्य सामान मिले. उसके कथित खुलासे के आधार पर चाकू आदि बरामद होने की बात भी कही गई. लेकिन बाद की अदालतों ने इन बरामदगियों की वैधानिक विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाए.
29 दिसंबर 2006 से ही सबसे बड़ा विवाद
यह निठारी मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू है. इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक जिस खुले हिस्से से खोपड़ियां और हड्डियां मिलीं, वह D-5 की चारदीवारी के भीतर नहीं था. वह D-5 और D-6 के बीच का सर्विस लेन/खुला क्षेत्र था और रिकॉर्ड में इसे नोएडा की जमीन बताया गया. हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि जब पुलिस पहुंची तो खुदाई पहले ही शुरू हो चुकी थी और आसपास के लोग उस जगह पर मानव अवशेष होने की जानकारी रखते थे. इसलिए अदालत ने सवाल उठाया कि ऐसी स्थिति में इसे आरोपी के खुलासे पर हुई बरामदगी कैसे माना जाए. यही बिंदु बाद में कोली की दोषसिद्धि के खिलाफ सबसे महत्वपूर्ण कानूनी आधारों में से एक बना.
9 जनवरी 2007: CBI ने जांच संभाली
निठारी मामले की गंभीरता को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने 9 जनवरी 2007 को जांच CBI को सौंप दी. 11 जनवरी 2007 को CBI ने औपचारिक रूप से जांच संभाली. इसके बाद AIIMS, CFSL और FSL जैसी एजेंसियों की मदद से D-5 और आसपास के इलाकों की जांच की गई. CBI ने पुराने FIR दोबारा दर्ज किए और मामले को अलग-अलग केस के रूप में आगे बढ़ाया.
जनवरी 2007: वैज्ञानिक जांच और बरामदगी
CBI के दौरान D-5 और आसपास कई बार तलाशी ली गई. AIIMS की टीम, CFSL और अन्य विशेषज्ञों ने हड्डियों, कपड़ों और अन्य सामग्री की जांच की. DNA परीक्षणों के जरिए कुछ मानव अवशेषों को लापता लोगों के परिवारों से जोड़ने की कोशिश हुई. लेकिन बाद में हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फर्क किया. DNA ने कुछ अवशेषों की पहचान में मदद की, लेकिन इससे यह साबित नहीं हुआ कि उन लोगों की हत्या D-5 में कोली ने की थी. यही अंतर पूरे मुकदमे की कानूनी दिशा बदलने वाला था.
13 जनवरी 2007: कथित अनावरण
CBI के अनुसार 13 जनवरी 2007 को कोली ने D-5 और आसपास के इलाकों में हत्या और शवों को ठिकाने लगाने से संबंधित जानकारी दी और उसके आधार पर कुछ बरामदगी हुई. CBI ने इसके बाद कोली के कथित बयान, बरामदगी और वैज्ञानिक परीक्षणों को जोड़कर केस तैयार किया.
1 मार्च 2007: कथित स्वीकारोक्ति
यह निठारी कांड का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण और सबसे विवादित हिस्सा है. 28 फरवरी 2007 को CBI कोली को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में लेकर गई ताकि उसका बयान दर्ज किया जा सके. 1 मार्च 2007 को मजिस्ट्रेट के सामने CrPC की धारा 164 के तहत उसका कथित कबूलनामा रिकॉर्ड हुआ. उसमें उसने पीड़ितों को बहाने से बुलाने, हत्या करने और शवों को ठिकाने लगाने की कहानी बताई थी. ट्रायल कोर्ट ने इस स्वीकारोक्ति को स्वैच्छिक और विश्वसनीय माना. लेकिन 2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसी कबूलनामे की विश्वसनीयता को स्वीकार नहीं किया.
स्वीकारोक्ति पर अदालत को क्या आपत्ति थी?
हाईकोर्ट के अनुसार कोली लगभग 60 दिनों तक लगातार पुलिस हिरासत में रहा था. अदालत ने माना कि उसे प्रभावी और निजी कानूनी सहायता नहीं मिली थी. अदालत ने यह भी नोट किया कि स्वीकारोक्ति में खुद ऐसे संदर्भ थे जिनमें टॉर्चर के आरोप सामने आते थे. इसके अलावा कन्फेशन रिकॉर्ड करने की प्रक्रिया में जांच अधिकारी की मौजूदगी/निकटता को भी अदालत ने गंभीर माना. साल 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इन्हीं कमियों को निर्णायक माना और कहा कि कन्फेशन जिस साक्ष्य-संबंधी आधार पर आधारित था, उसे कानूनी रूप से सुरक्षित नहीं माना जा सकता.
2007-2008: 16 मामलों में CBI की चार्जशीट
CBI ने कुल 16 मामलों में चार्जशीट दाखिल की. मीडिया रिपोर्टों में 19 FIR का आंकड़ा इसलिए मिलता है क्योंकि कुल 19 मामले दर्ज हुए थे, जबकि 16 में ट्रायल आगे बढ़ा. तीन मामलों में पर्याप्त सबूत नहीं मिलने के कारण आगे मुकदमा नहीं चला. इसी वजह से निठारी कांड में 19 पीड़ित, 16 मामले और 13 मामलों में कोली को मौत की सजा जैसे आंकड़े सुनने को मिलते हैं.
13 फरवरी 2009: पहली दोषसिद्धि
उस दिन गाजियाबाद की विशेष CBI अदालत ने 14 वर्षीय रिम्पा हलदर की हत्या, अपहरण, बलात्कार और सबूत मिटाने के आरोपों में सुरेंद्र कोली को दोषी ठहराया और मौत की सजा दी. इस मामले में अदालत ने उसके कन्फेशन, बरामदगी, परिस्थितिजन्य साक्ष्य, कपड़ों की पहचान और DNA साक्ष्य को महत्वपूर्ण माना था.
11 सितंबर 2009: इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
इस पहले मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 11 सितंबर 2009 को कोली की दोषसिद्धि और मौत की सजा बरकरार रखी. लेकिन उसी फैसले में मोनिंदर सिंह पंढेर को बरी कर दिया गया, क्योंकि अदालत को उसके खिलाफ पर्याप्त प्रत्यक्ष या ठोस साक्ष्य नहीं मिला. यह एक महत्वपूर्ण मोड़ था क्योंकि निठारी मामले में शुरू से ही सवाल था कि D-5 का मालिक पंढेर अपराधों में किस हद तक शामिल था.
सुप्रीम कोर्ट ने यथावत रखी कोली की मौत की सजा
15 फरवरी 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने रिम्पा हलदर मामले में कोली की दोषसिद्धि और मौत की सजा यथावत रखी. तब सुप्रीम कोर्ट ने उसकी स्वीकारोक्ति, बरामदगी, DNA और अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को पर्याप्त माना और मामले को ‘बेहद दुर्लभ’ श्रेणी में रखा था. यानी तब की न्यायिक स्थिति में कोली को दोषी माना जा चुका था.
2014: मौत की सजा के खिलाफ आखिरी कानूनी कोशिश
सुरेंद्र कोली की पुनर्विचार याचिका भी 28 अक्टूबर 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दी. इस बीच उसकी दया याचिका राष्ट्रपति के पास भी गई. लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं हुआ.
28 जनवरी 2015: मौत की सजा बदली
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 28 जनवरी 2015 को सुरेंद्र कोली की मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया. इसका प्रमुख कारण दया याचिका के निपटारे में हुई लंबी देरी थी. हाईकोर्ट ने इसे असाधारण देरी माना. उस समय दोषसिद्धि खत्म नहीं हुई थी, सिर्फ मौत की सजा आजीवन कारावास में बदली गयी थी.
2010-2021: एक के बाद एक मुकदमें
रिम्पा हलदर केस के बाद भी कोली के खिलाफ निठारी के दूसरे मामलों में मुकदमे चलते रहे. साल 2010 से 2021 के बीच 12 अतिरिक्त मामलों में उसे दोषी ठहराया गया. इन मामलों में भी मुख्य साक्ष्य-संबंधी आधार वही था- 2007 का कन्फेशन और आरोपित के कथित खुलासे पर हुई बरामदगी. कई मामलों में उसे मौत की सजा मिली. ऐसा भी हुआ, जब कोली को निठारी के अलग-अलग मामलों में 13 मौत की सजा मिल चुकी थीं, हालांकि उनमें से एक बाद में आजीवन कारावास में बदल गई थी.
16 अक्टूबर 2023: पूरा केस पलट गया
यह निठारी कांड का सबसे बड़ा कानूनी मोड़ था. 16 अक्टूबर 2023 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुरेंद्र कोली को 12 मामलों में छोड दिया. मोनिंदर सिंह पंढेर को भी उसके खिलाफ लंबित दो मामलों में छोडा गया.
हाईकोर्ट ने गिनाईं जांच में गंभीर कमियां
इस मामले में मुख्य सवाल थे कि कन्फेशन वास्तव में स्वैच्छिक था या नहीं? लगभग 60 दिन की पुलिस हिरासत के बाद दिया गया कन्फेशन कितना विश्वसनीय था? क्या आरोपी को पर्याप्त कानूनी सहायता मिली? क्या बरामदगी वास्तव में आरोपी की जानकारी पर हुई? जब पुलिस और स्थानीय लोग पहले से वहां खुदाई कर रहे थे तो धारा 27 Evidence Act की रिकवरी कैसे मानी जाए? D-5 के भीतर हत्या और शव काटने के दावे को समर्थन देने वाला पर्याप्त फॉरेंसिक एविडेंस कहां था? क्या बरामद चाकू और कुल्हाड़ी का अपराध से वैज्ञानिक संबंध साबित हुआ? क्या जांच ने अन्य संभावित एंगल की पर्याप्त जांच की? हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन इन सवालों का भरोसेमंद जवाब नहीं दे सका.
हाईकोर्ट ने D-5 में क्या पाया और क्या नहीं?
यह तथ्य खास तौर पर महत्वपूर्ण है. फॉरेंसिक टीमों ने D-5 की जांच की, लेकिन हाईकोर्ट के अनुसार वहां कई हत्याओं और शवों के टुकड़े किए जाने के अनुरूप मानव खून या अन्य निर्णायक जैविक सबूत नहीं मिला. एक अज्ञात खून का दाग और एक सीमेन स्टेन का उल्लेख हुआ, लेकिन सीमेन स्टेन कोली से मैच नहीं हुआ. चाकू और कुल्हाड़ी बरामद होने की बात भी सामने आई, लेकिन अदालत के मुताबिक उन पर मानव खून या टिश्यू का ऐसा वैज्ञानिक संबंध स्थापित नहीं हुआ, जिससे यह साबित हो कि इन्हीं हथियारों से हत्या या शव काटे गए थे.
30 जुलाई 2025: सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कीं 14 अपील
2023 के हाईकोर्ट फैसले के खिलाफ CBI और कुछ पीड़ित परिवारों की ओर से अपील की गई. 30 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने 14 अपीलें निरस्त कर दीं और इलाहाबाद हाईकोर्ट का छोडने का फैसला यथावत रखा. मतलब था कि कोली 12 मामलों में कानूनी रूप से छूट चुका था और पंढेर के खिलाफ भी निठारी से जुड़े सभी मामले समाप्त हो गए थे. लेकिन कोली अभी भी रिम्पा हलदर केस में 2015 में बदली गई आजीवन कारावास की सजा से जेल में था.
11 नवंबर 2025: सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला
इसके बाद कोली ने सुप्रीम कोर्ट में उपचारात्मक याचिका दी. तर्क था कि एक तरफ उसी स्वीकारोक्ति और उसी तरह की बरामदगियों पर आधारित 12 मामलों में उसे छोड दिया गया, जबकि दूसरे मामले में उसी प्रकार के सबूतों पर उसकी दोषसिद्धि कायम थी. सुप्रीम कोर्ट ने इस विरोधाभास को गंभीर माना.
11 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने उपचारात्मक याचिका स्वीकार कर ली और अपना फैसला वापस लिया. 2014 का ऑर्डर की समीक्षा भी रद्द कर दी. 2009 की ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषसिद्धि और 2009 के हाईकोर्ट फैसले को रद्द किया गया. कोली को IPC की धारा 302, 364, 376 और 201 के आरोपों से बरी कर दिया. सभी सजा और जुर्माने खत्म कर दिए गए और आदेश दिया कि यदि किसी अन्य मामले में उसकी जरूरत नहीं है तो उसे तत्काल रिहा किया जाए.
12 नवंबर 2025: सुरेंद्र कोली जेल से बाहर
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 12 नवंबर 2025 को सुरेंद्र कोली जेल से बाहर आ गया. इसके साथ निठारी कांड में उसके खिलाफ चल रहे सभी आपराधिक मामलों में उसकी दोषसिद्धियां समाप्त हो गईं.
निठारी केस की पूरी टाइमलाइन
फरवरी 2004 – मोनिंदर सिंह पंढेर ने D-5, सेक्टर-31, नोएडा का बंगला खरीदा.
जुलाई 2004 – सुरेंद्र कोली पंढेर के यहां घरेलू सहायक के तौर पर काम करने लगा.
2005 की शुरुआत – निठारी में बच्चों और महिलाओं के गायब होने की शिकायतें सामने आने लगीं.
मार्च 2005 – बच्चों ने D-5 और D-6 के बीच खुले हिस्से में मानव हाथ देखा.
2005 – रिम्पा हलदर सहित कई लोगों की गुमशुदगी बाद की जांच का हिस्सा बनी.
7 मई 2006 – एक लड़की लापता हुई; उसके पिता ने पुलिस में शिकायत की.
24 अगस्त 2006 – पिता ने CrPC 156(3) के तहत अदालत से FIR दर्ज कराने की मांग की.
27 सितंबर 2006 – CJM ने FIR दर्ज करने का आदेश दिया.
7 अक्टूबर 2006 – केस क्राइम 838/2006 दर्ज हुआ.
3 दिसंबर 2006 – नाले की सफाई में मानव हाथ दिखाई देने की बात रिकॉर्ड में आई.
29 दिसंबर 2006 – कोली हिरासत में लिया गया. पंढेर भी हिरासत में लिया गया. D-5 के पीछे खोपड़ियां और हड्डियां मिलीं.
30 दिसंबर 2006 – कई लापता लोगों के संबंध में अलग FIR दर्ज हुईं.
31 दिसंबर 2006 – सामने के नाले से और मानव अवशेष मिले.
4–6 जनवरी 2007 – FSL आगरा ने D-5 की जांच की.
9 जनवरी 2007 – UP सरकार ने जांच CBI को सौंपी.
11 जनवरी 2007- CBI ने जांच संभाली.
13 जनवरी 2007 – CBI के अनुसार कोली ने कथित disclosure दिया.
28 फरवरी 2007 – कोली को confession रिकॉर्ड कराने के लिए अदालत में पेश किया गया.
1 मार्च 2007 – धारा 164 CrPC के तहत कथित confession रिकॉर्ड हुआ.
2007-2008 – CBI ने 16 मामलों में चार्जशीट दाखिल की.
13 फरवरी 2009 – रिम्पा हलदर केस में ट्रायल कोर्ट ने कोली को मौत की सजा दी.
11 सितंबर 2009 – इलाहाबाद HC ने कोली की सजा बरकरार रखी, पंढेर को बरी किया.
2010–2021 – अन्य 12 मामलों में कोली को दोषी ठहराया गया.
15 फरवरी 2011 – सुप्रीम कोर्ट ने रिम्पा केस में मौत की सजा बरकरार रखी.
28 अक्टूबर 2014 – सुप्रीम कोर्ट ने review petition खारिज की.
28 जनवरी 2015 – इलाहाबाद HC ने मौत की सजा को उम्रकैद में बदला.
16 अक्टूबर 2023 – इलाहाबाद HC ने कोली को 12 और पंढेर को 2 मामलों में बरी किया.
30 जुलाई 2025 – सुप्रीम कोर्ट ने CBI/पीड़ित परिवारों की 14 अपीलें खारिज कर HC के acquittals बरकरार रखे.
11 नवंबर 2025 – सुप्रीम कोर्ट ने रिम्पा हलदर केस में भी कोली को बरी कर दिया.
12 नवंबर 2025 – कोली जेल से रिहा हुआ.
तो आखिर निठारी में हत्याएं किसने कीं? आज की कानूनी स्थिति में इसका कोई न्यायिक रूप से कोई जवाब नहीं है.
यह बात 2025 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में असाधारण रूप से साफ है. अदालत ने कहा कि इतने लंबे समय की जांच के बावजूद वास्तविक अपराधी की पहचान कानूनी मानकों के अनुसार स्थापित नहीं हो सकी. अदालत ने यह भी कहा कि गंभीर संदेह को पुख्ता सबूत का विकल्प नहीं बनाया जा सकता.
निठारी कांड में सुरेंद्र कोली को मुख्य आरोपी बनाया गया था और अलग-अलग अदालतों ने उसे दोषी भी ठहराया था, लेकिन 2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट और 2025 में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बाद उसके सभी दोष खत्म हो गए और वो बरी हो गया था.
निठारी कांड में सबसे बड़े अनसुलझे सवाल
1. इतनी गुमशुदगियों के बावजूद समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
2. 29 दिसंबर 2006 से पहले मिले मानव हाथ की जांच क्यों निर्णायक नहीं बनी?
3. बरामदगी की जगह को लेकर विवाद क्यों हुआ?
4. कबूलनामा इतना महत्वपूर्ण क्यों बना?
5. DNA से क्या साबित हुआ?
6. D-5 में खून/मानव अवशेष क्यों नहीं मिले?
7. असली हत्यारा कौन था?
Nithari Case Accused Surendra Koli Dies Where Is Moninder Pandher Released After 17 Years Called Himself A Victim
निठारी कांड के आरोपित रहे सुरेंद्र कोली की मौत, दूसरा आरोपी मोनिंदर सिंह पंढेर अब कहां है?
Nithari Kand: निठारी कांड के आरोपी सुरेंद्र कोली की हरिद्वार में कथित आत्महत्या से मौत के बाद मोनिंदर सिंह पंढेर फिर चर्चा में है। 2023 में इलाहाबाद हाई कोर्ट से बरी होने के बाद पंढेर चंडीगढ़ चला गया था। जुलाई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने भी राहत बरकरार रखी। जानिए जेल से रिहाई के बाद अब कहां है हैढेर
नोएडा के बहुचर्चित निठारी कांड की चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है। इस मामले में आरोपी रहे सुरेंद्र कोली की हरिद्वार में कथित आत्महत्या से मौत की खबर सामने आने के बाद अब मोनिंदर सिंह पंढेर को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आखिर निठारी कांड का दूसरा प्रमुख आरोपी अब कहां है और उसकी जिंदगी किस मोड़ पर पहुंच चुकी है?
17 साल जेल में रहने के बाद 2023 में रिहा हुआ पंढेर
मोनिंदर सिंह पंढेर निठारी के उस मकान का मालिक था, जहां सुरेंद्र कोली घरेलू सहायक के तौर पर काम करता था। दिसंबर 2006 में मकान के पीछे नाले के पास बच्चों के अवशेष मिलने के बाद इस मामले ने पूरे देश को हिला दिया था। जांच के दौरान पंढेर और कोली दोनों को गिरफ्तार किया गया।
पंढेर को निठारी हत्याकांड से जुड़े मामलों में दोषी ठहराया गया था। इनमें से एक मामले में उसे मौत की सजा भी सुनाई गई थी। हालांकि, बाद में उच्च अदालतों ने इस मामले की तस्वीर बदल दी। 20 अक्टूबर 2023 को इलाहाबाद हाई कोर्ट से राहत मिलने के बाद पंढेर नोएडा जेल से बाहर आया। वह करीब 17 साल तक जेल में रहा था। हाई कोर्ट ने उसके खिलाफ लंबित दो मामलों में दोषसिद्धि रद्द करते हुए उसे बरी कर दिया। इसी फैसले में सुरेंद्र कोली को भी 12 मामलों में राहत मिली थी।
अब कहां रह रहा है मोनिंदर सिंह पंढेर?
जेल से रिहाई के बाद पंढेर के चंडीगढ़ चले जाने की जानकारी सामने आई थी। इसके बाद उसकी सार्वजनिक गतिविधियों को लेकर बहुत ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं रही है। हालांकि, नवंबर 2025 में सुरेंद्र कोली को सुप्रीम कोर्ट से अंतिम मामले में राहत मिलने के बाद पंढेर ने मीडिया से बातचीत की थी। उसने निठारी कांड में खुद को भी पीड़ित बताया था। पंढेर ने कहा था, मैं भी पीड़ित हूं। मुझे भी न्याय चाहिए।
निठारी कांड में पंढेर पर क्या आरोप थे?
निठारी कांड की जांच 2005 और 2006 के दौरान महिलाओं और बच्चों के लापता होने की घटनाओं के इर्द-गिर्द घूमती थी। मामले में पंढेर के मकान डी-5, निठारी से जुड़े सुराग सामने आए थे। पंढेर और कोली दोनों पर हत्या से जुड़े आरोप लगे। हालांकि, अभियोजन की जांच और सबूतों को लेकर बाद में अदालतों में गंभीर सवाल उठे। अक्टूबर 2023 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पंढेर के खिलाफ बचे दो मामलों में भी उसे बरी कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से खत्म हुई लंबी कानूनी लड़ाई
जुलाई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने पंढेर और कोली को 12 निठारी मामलों में मिली बरी होने की राहत को बरकरार रखा। सीबीआई, उत्तर प्रदेश सरकार और पीड़ित परिवारों की ओर से दाखिल अपीलें खारिज कर दी गईं। इस फैसले के बाद पंढेर की निठारी मामलों से जुड़ी लंबी कानूनी लड़ाई प्रभावी तौर पर समाप्त हो गई। वह पहले ही जेल से बाहर आ चुका था।
दूसरी ओर, सुरेंद्र कोली एक अलग मामले में जेल में बंद रहा। यह मामला किशोरी रिम्पा हलदार की हत्या से जुड़ा था। नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों वाली संविधान पीठ ने कोली की क्यूरेटिव याचिका स्वीकार कर ली। इसके बाद उसकी दोषसिद्धि और मौत की सजा से जुड़ा पिछला फैसला वापस लिया गया और उसे रिहा करने का आदेश दिया गया, बशर्ते किसी अन्य मामले में उसकी जरूरत न हो।
क्यों चर्चा में आया मामला?
निठारी हत्याकांड के मामले में सुप्रीम कोर्ट से बरी हुए सुरेंद्र कोली का शव हरिद्वार में अपनी चाय की दुकान से बरामद किया गया। उसके गले में फंदा पड़ा था। घटना भूपतवाला क्षेत्र में सप्त सरोवर रोड स्थित लालमाता मंदिर के सामने की बताई जा रही है।
कोली पिछले कुछ दिनों से यहां चाय बेचने का काम कर रहा था। चाय की दुकान में रस्सी के सहारे उसका शव लटका मिला। सूचना मिलते ही सप्तऋषि पुलिस चौकी की टीम मौके पर पहुंची और शव को कब्जे में लेकर जांच शुरू की।
पुलिस के अनुसार सुरेंद्र अल्मोड़ा जिले के भिकियासैंण क्षेत्र के ग्राम मंगरुखाल का रहने वाला था। पुलिस ने उसके परिजनों को सूचना दे दी है और घटना के सभी पहलुओं की जांच की जा रही है।


